बुधवार, 20 जुलाई 2011

''तेरहवीं'


''तेरहवीं''

''पापा''अब क्या करोगे ,दीदी की शादी को महीना भर ही रह गया है और ऐसे में दादाजी की मृत्यु, ये तो बहुत बड़ा खर्चा पड़ गया ,विजय ने परेशान होते हुए अपने पापा मनोज से कहा .मनोज बोला -''बेटा;क्यों परेशान होता है ,ये तो हमारे लिए बहुत आराम का समय है .वो कैसे पापा?
इसलिए न तो मैं पिताजी का वो ऐसे बेटा कीमैं तो तेरे चाचाओं  से  पहले ही कह दूंगा की मुझे तो अपनी बेटी की शादी की तैयारी करनी है इसलिए न तो मैं अंतिम संस्कार ही कर पाऊँगा और न ही इससे सम्बंधित कोई खर्चा ,वैसे भी हम वैश्य जातिऔर सभी जानते हैं की वैश्य जाति में शादी में  के हैं और सभी जानते हैं की वैश्य जाति में  शादी में कितना खर्चा होता है .पापा की बात सुन विजय के चेहरे पर भी चमक आ गयी ,तभी जैसे उसे कुछ याद आया और वह बोला ,''पर पापा चाचा तो बाबाजी के पैसे मांगेगे और कहेंगे कीहमें वे ही दे दो हम उनसे ही उनके अंतिम संस्कार  का खर्चा निकाल लेंगे ,अरे बेटा तू तो बहुत आगे की सोच रहा है ,पिताजी के पास अब कोई पैसा था ही कहाँ ,वो तो सारा ही बाँट चुके थे और रहा जो उनके बक्से में कुछ पैसा रखा है उसे उठा और अपने कमरे में ले चल ,वो कह देंगे की उनके खाने और इलाज में खर्च हो गया .''
इस तरह जब मनोज का बेटा विजय संतुष्ट हो गया और वह वो बक्सा अपने कमरे में ले गया तब मनोज ने भाइयों को फोन पर पिताजी के मरने की सूचना दी और भाइयों के आने पर उन्हें अपना फैसला सुना दिया .आपस की बातों से ये निश्चय हुआ की पिता का अंतिम संस्कार दूसरे नंबर का बेटा करेगा और मनोज की बेटी की शादी की बात कहकर कम से कम 
पैसे में तेरहवीं आदि कर दी जाएगी .
जैसे जैसे जो सोचा गया था सभी भाइयों ने मिलकर वह कर दिया और तेरहवीं के बाद जब मेहमान जाने लगे तो सभी के हाथ जोड़कर अपने बनाये हुए पिता के वाक्य सभी के सामने दोहरा दिए .मनोज ने कहा-''पिताजी ने ही कहा था की मेरे कारण पोती की शादी में कोई कमी न करना वर्ना मेरी आत्मा नरक में भटकती रहेगी .''मनोज के ये शब्द सभी मेहमानों के दिल में घर कर गए और सभी उसे सांत्वना दे अपने अपने घर चले गए .

शालिनी कौशिक
http://shalinikaushik2.blogspot.com
 

14 टिप्‍पणियां:

Sunil Kumar ने कहा…

मज़बूरी में किये गए समझौते या कुछ और ? इन प्रश्नों के उत्तर खोजने होंगे|

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

कटु सत्य है समाज का।

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

hmmm paise ke aage kisi ki nahee chaltee!!

ZEAL ने कहा…

The whole world is growing more selfish with each passing day.
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vidhya ने कहा…

बहुत सुन्दर लिखा है आप ने |
आपको मेरी हार्दिक शुभकामनायें.
अगर आपको love everbody का यह प्रयास पसंद आया हो, तो कृपया फॉलोअर बन कर हमारा उत्साह अवश्य बढ़ाएँ।

संध्या शर्मा ने कहा…

हकीक़त बयां करती कहानी... हमारे समाज का आईना...

रविकर ने कहा…

सरक-सरक के निसरती, निसर निसोत निवात |
चर्चा-मंच पे आ जमी, पिछली बीती रात ||

http://charchamanch.blogspot.com/

kanu..... ने कहा…

paisa itana bada ho gaya hai kya?
sochne par majboor karti rachna....aabhaar

kumar ने कहा…

आज कुछ लोगो की मानसिकता ही खराब हो गयी है...उनके लिए शायद पैसा ही सबसे ऊपर है....समाज का एक चेहरा दिखाती रचना.....बहुत अच्छा लगा आप को पढकर....
आभार....

Maheshwari kaneri ने कहा…

हमारे विकृत समाज का सही आईना दिखाया... आभार..

Vikas Garg ने कहा…

बहुत सुन्दर लिखा है आप ने |
आपको मेरी हार्दिक शुभकामनायें.

sm ने कहा…

true story
complete Indian family drama

उपेन्द्र ' उपेन ' ने कहा…

बहुत ही मार्मिक प्रस्तुति। वाकई रिस्तोँ को इस तरह से तौलने वाले इन्सान नहीँ।लने वाले इन्सान नहीँ।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

यथार्थ दर्शाती लघुकथा।

क्या आदमी सच में आदमी है ?

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