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तुम राम बनके दिल यूँ ही दुखाते रहोगे .

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अवसर दिया श्रीराम ने पुरुषों को हर कदम , अग्नि-परीक्षा नारी की तुम लेते रहोगे , करती रहेगी सीता सदा मर्यादा का पालन पर ठेकेदार मर्यादा के यहाँ तुम ही रहोगे . .......................................................... इक रात भी नारी अगर घर से रही बाहर घर से निकाल तुम उसे बाहर ही करोगे , पर लौटके तुम आ रहे दस साल में भी गर पवित्रता की मूर्ति बन सजते रहोगे . ................................................... इज़्ज़त के नाम पे यहां नारी की खिंचाई इज़्ज़त के वास्ते उसे तुम क़त्ल करोगे , हमको खबर है बहक कलियुगी सूर्पणखा से सबकी नज़र में इज़्ज़तदार बने रहोगे . ....................................................... कुदरत ने दिया नारी को माँ बनने का जो वर उसको कलंक तुम ही बनाते रहोगे , नारी की लेके कदम-कदम अग्नि-परीक्षा तुम राम बनके दिल यूँ ही दुखाते रहोगे . ...........................................................    शालिनी कौशिक      [कौशल ]

बनोगी उसकी ही कठपुतली

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माथे ऊपर हाथ वो धरकर बैठी पत्थर सी होकर जीवन अब ये कैसे चलेगा चले गए जब पिया छोड़कर .......................................... बापू ने पैदा होते ही झाड़ू-पोंछा हाथ थमाया माँ ने चूल्हा-चौका दे दिया चकला बेलन हाथ थामकर . ...................................... पढ़ना चाहा पाठशाला में बाबा जी से कहकर देखा बापू ने जब आँख तरेरी माँ ने डांट दिया धमकाकर . ........................................ आठ बरस की होते मुझको विदा किया बैठाकर डोली तबसे था बस एक सहारा मेरे पिया मेरे हमजोली . ...................................... उनके बच्चे की माता थी उनके घर की चौकीदार सारा जीवन अपना देकर मिला न एक भी खेवनहार . .......................................... आज गए वो मुझे छोड़कर घर-गृहस्थी कहीं और ज़माने बच्चों का भी लगा कहीं मन मुझको सारे बोझ ही मानें . .............................................. व्यथा कहूं क्या इस जीवन की जिम्मेदारी है ये खुद की मर्द के हाथ में दी जब डोरी बनोगी उसकी ही कठपुतली . ............................................... शालिनी कौशिक     [कौशल]

''बेटी को इंसाफ -मरने से पहले या मरने के बाद ?

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   '' वकील साहब '' कुछ करो ,हम तो लुट  गए ,पैसे-पैसे को मोहताज़ हो गए ,हमारी बेटी को मारकर वो तो बरी हो गए और हम .....तारीख दर तारीख अदालत के सामने गुहार लगाने के बावजूद कुछ नहीं कर पाए ,क्या वकील साहब अब कहीं इंसाफ नहीं है ? " रोते रोते उसने मेरे सामने अपनी बहन की दहेज़ हत्या में अदालत के निर्णय पर नाखुशी ज़ाहिर करते हुए फूट-फूटकर रोना आरम्भ कर दिया ,मैंने मामले के एक-एक बिंदु के बारे में उससे समझा-बुझाकर जानने की कोशिश की. किसी तरह उसने अपनी बहन की शादी से लेकर दहेज़-हत्या तक व् फिर अदालत में चली सारी कार्यवाही के बारे में बताया ,वो बहन के पति व् ससुर को ,पुलिस वालों को ,अपने वकील को ,निर्णय देने वाले न्यायाधीश को कुछ न कुछ कहे जा रहा था और रोये जा रहा था और मुझे गुस्सा आये जा रहा था उसकी बेबसी पर ,जो उसने खुद ओढ़ रखी थी .              जो भी उसने बताया ,उसके अनुसार ,उसकी बहन को उसके पति व् ससुर ने कई बार प्रताड़ित कर घर से निकाल दिया था और तब ये उसे उसकी विनती पर घर ले आये थे ,फिर बार-बार पंचायतें कर उसे वापस ससुराल भेजा जाता रहा और उसका परिणाम यह रहा कि एक दिन वही

काश ऐसी हो जाए भारतीय नारी

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चली है लाठी डंडे लेकर भारतीय नारी , तोड़ेगी सारी बोतलें अब भारतीय नारी . ................................................ बहुत दिनों से सहते सहते बेदम हुई पड़ी थी , तोड़ेगी उनकी हड्डियां आज भारतीय नारी . .......................................................... लाता नहीं है एक भी तू पैसा कमाकर , करता नहीं है काम घर का एक भी आकर , मुखिया तू होगा घर का मेरे कान खोल सुन जब जिम्मेदारी मानेगा खुद शीश उठाकर , गर ऐसा करने को यहाँ तैयार नहीं है , मारेगी धक्के आज तेरे भारतीय नारी . .......................................................... उठती सुबह को तुझसे पहले घर को सँवारुं, खाना बनाके देके तेरी आरती उतारूँ, फिर लाऊँ कमाई करके सिरपे ईंट उठाकर तब घर पे आके देख तुझे भाग्य सँवारुं . मेरे ही नोट से पी मदिरा मुझको तू मारे, अब मारेगी तुझको यहाँ की भारतीय नारी . ............................................................. पिटना किसी भी नारी का ही भाग्य नहीं है , अब पीट भी सकती है तुझे भारतीय नारी . ........................................................... जीवन लिखा है स

आधुनिक ससुराल में बहू

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बैठी थी इंतज़ार में सुहाग सेज़ पर मन में थी उमंग भरी अनंत मिलन को देखूंगी आज रूप मैं भी अपने राम का नाता बंधा है जिनसे मेरा जनम जनम का वो देख निहारेंगे मुझे सराहेंगे किस्मत कुदरत का आभार अभिव्यक्त करेंगे जानेंगे मुझसे रुचियाँ सब मेरी ख्वाहिशें तकलीफें खुशियां खुद की सारी साझा करेंगे व्यतीत हो रहा था समय जैसे प्रतिपल ह्रदय था डूब रहा मन टूट रहा था दरवाजा खुला ऐसे जैसे धरती हो कांपी बातों को उसकी सुनके दिल कांप रहा था सम्बन्धी था ससुराल का आया था जो करने बचने को उससे रास्ते मन खोज रहा था आवाज़ थी लगायी उसने प्राण-प्रिय को सम्बन्धी फिर भी फाड़ नज़र ताक रहा था झपटा वो जैसे बेधड़क कोमलांगी पर चाकू दिखाके छोड़ने की भीख मांग रही थी जैसे ही हरकतें बढ़ी उस रावण की अधिक चाकू को अपने पेट में वो मार रही थी जीवन की सारी ख्वाहिशें एक पल में थी ख़त्म , भारत की नारी की व्यथा बखान रही थी , सुरक्षा ससुराल में करना काम पति का , मरके भी फटी आँख वो तलाश रही थी . ...................................................... शालिनी कौशिक    (कौशल)