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मई, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मेक-अप से बिगाड़ करती महिलाएं

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  कवि शायर कह कह कर मर गए- ''इस सादगी पे कौन न मर जाये ए-खुदा,'' ''न कजरे की धार,न मोतियों के हार, न कोई किया सिंगार फिर भी कितनी सुन्दर हो,तुम कितनी सुन्दर हो.'' पर क्या करें आज की महिलाओं  के दिमाग का जो बाहरी सुन्दरता  को ही सबसे ज्यादा महत्व देता रहा है और अपने शरीर का नुकसान तो करता ही है साथ ही घर का बजट  भी बिगाड़ता है.लन्दन में किये गए एक सर्वे के मुताबिक ''एक महिला अपने पूरे जीवन में औसतन एक लाख पौंड यानी तकरीबन ७२ लाख रूपए का मेकअप बिल का भुगतान कर देती है  .इसके मुताबिक १६ से ६५ वर्ष तक की उम्र की महिला ४० पौंड यानी लगभग तीन हज़ार रूपए प्रति सप्ताह अपने मेकअप पर खर्च करती हैं .दो हज़ार से अधिक महिलाओं के सर्वे में आधी महिलाओं का कहना था कि'' बिना मेकअप के उनके बॉय  फ्रैंड उन्हें पसंद ही नहीं करते हैं .'' ''दो तिहाई का कहना है कि उनके मेकअप किट की कीमत ४० हज़ार रूपए है .'' ''ब्रिटेन की महिलाओं के सर्वे में ५६ प्रतिशत महिलाओं का कहना था कि १५०० से २००० रूपए का मस्कारा

पराया घर गन्दा कहने से अपना घर स्वच्छ नहीं हो जाता

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Uma Bharti Defends Smriti Irani, Asks, 'What is Sonia Gandhi's Qualification'?   नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने इस बार शासन सत्ता संभाली किन्तु जहाँ सत्ता है वहां विवाद भी हैं और विवाद आरम्भ हो गए .मानव संसाधन विकास मंत्रालय का प्रभार स्मृति ईरानी को सौंपा जाना इस विवाद का जन्मदाता है .विपक्षी दल कॉंग्रेस के अजय माकन कहते  है कि शिक्षा मंत्री ग्रेजुएट तक नहीं है तो भाजपा बिफर पड़ती है और सबसे ज्यादा बिफरती हैं उमा भारती जिन्हें हर बात के लिए सोनिया गांधी को घेरना होता है किन्तु हर बार की तरह इस बार भी वे सोनिया गांधी से मात खायेंगी क्योंकि सोनिया गांधी ऐसे विवादास्पद और कुतुर्क करने वाले मुद्दों को कभी भी तरजीह नहीं देती और 'एक चुप सौ को हरावे '' की नीति पर ही चलती हैं किन्तु उमा भारती को तो ये जानना ही होगा भले ही सोनिया जवाब दें या न दें कि वे यूपीए की चेयरपर्सन रही हैं न कि केंद्र सरकार के किसी विभाग की मंत्री और आज तक इस तरह के गठबंधनों के लिए कोई योग्यता निर्धारित नहीं की गयी है यदि की जाती तब की बात अलग होती और तब शायद एक बार फिर उमा भारती

बीवी -डिबली की लौ -एक लघु कथा

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      औरत के नाम में संपत्ति लेने पर स्टाम्प शुल्क में कमी हो जाती है दामोदर ने ये सोचा और झोपडी में रह रही अपनी बीवी को गाड़ी में बैठाकर रजिस्ट्री कार्यालय ले गया और बीवी के नाम में नई कोठी का बैनामा ले लिया .          दामोदर की नई कोठी में आज पार्टी थी .इसी शहर के ही नहीं बड़े-बड़े शहरों के बड़े-बड़े लोग इस भव्य शानदार पार्टी में मौजूद थे .शराब कॉफी सब चल रही थी तभी एक बोला ,''भई! ये कोठी तो दामोदर ने बीवी के नाम पर ली थी उसे नहीं बुलाया ?''...अरे ! उसके ऐसे भाग्य कहाँ जो दामोदर जैसे आत्ममुग्ध चतुर चालाक शिकारी के साथ रह सके,वह तो डिबली  की लौ है और इसलिए झोपडी में ही जलती है ''......रवि के ऐसा कहते ही सारे दोस्त ठहाका लगाकर हंस पड़े और दामोदर हाथ बांधे उनकी बात सुन मुस्कुराता रहा . शालिनी कौशिक  [कौशल ]

युगपुरुष पंडित जवाहरलाल नेहरू को शत-शत नमन

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''सिमटे तो ऐसे सिमटे तुम             बंधे पाँखुरी में गुलाब की ,   बिखरे तो ऐसे बिखरे तुम            खेत खेत की फसल हो गए .''         मशहूर कवि भारत भूषण जी की ये पंक्तियाँ देश के प्रथम प्रधानमंत्री और उससे भी पहले देश के ह्रदय पर विराजने वाले ,देश के माथे पर मुकुट की भांति शोभायमान पंडित जवाहर लाल नेहरू जी को समर्पित हैं और दो पंक्तियों में ही नेहरू जी के व्यक्तित्व का व्यापक विश्लेषण हम जैसी आने वाली पीढ़ियों के समक्ष प्रस्तुत किया है जिससे हम आज के मिथ्यावादी स्वार्थ में डूबी हुई राजनेताओं की पंक्ति से उन्हें पृथक कर देश के एक ऐसे रत्न को जान सकें जिन्होंने देश और देश की जनता से मात्र ये आशा की थी कि- ''अगर मेरे बाद कुछ लोग मेरे बारे में सोचें तो मैं चाहूंगा कि वे कहें -वह एक ऐसा आदर्श था जो अपने पूरे दिल और दिमाग से हिन्दुस्तानियों से मुहब्बत करता था और हिंदुस्तानी भी उसकी कमियों को भूलकर उसको बेहद अज़हद मुहब्बत करते थे .''        २७ मई १९६४ को देश को असहनीय दुःख देते हुए पंडित जवाहर लाल नेहरू स्वर्ग सिधार गए .देश असहनीय दुःख में डूब गया .पुर्त

ये प्रेम जगा है .

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  ज़रुरत पड़ी तो चले आये मिलने न फ़ुरसत थी पहले न चाहत थी जानें हैं किस हाल में मेरे अपने वहां पर खिसकने लगी जब से पैरों की धरती उडी सिर के ऊपर से सारी छतें ही हड़पकर हकों को ये दूजे के बैठे झपटने लगे इनसे भी अब कोई किया जो इन्होने वो मिलने लगा है तो अपनों की खातिर ये प्रेम जगा है . ........................................ शालिनी कौशिक [कौशल ]

लाभ के पद पर बोले मोदी सरकार

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    ''लाभ का पद '' हमेशा से एक विवाद का विषय रहा है .इस पदावली की संविधान में या लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम १९५१ में कोई परिभाषा नहीं दी गयी है .न्यायिक निर्णयों से ही लाभ के पद के अर्थ को समझा जा सकता है .देवरस बनाम केशव ए.आई.आर.१९५८ बम्बई ३१७ में कहा गया है कि ''लाभ के पद से तात्पर्य ऐसे पद से है जिससे लाभ मिल सकता हो या जिससे व्यक्ति युक्तियुक्त रूप से लाभ प्राप्त करने की आशा कर सकता है .''        और इस सीमा में ये विशेष रूप से सरकारी नौकरी करने वाले कर्मचारी को ही लेकर आते हैं क्योंकि लाभ के पद में लाभ तत्व ही पर्याप्त नहीं मानते हैं वरन इसके लिए यह भी आवश्यक मानते हैं कि वह लाभ का पद भारत सरकार के या राज्य सरकार के अधीन हो .कोई लाभ का पद सरकार के अधीन है या नहीं इसके निर्धारण की निम्नलिखित कसौटियां हैं -  [१]-क्या सरकार को नियुक्ति का अधिकार है ?  [२]-क्या पद धारक को उसके पद से हटाने या पदमुक्त करने का सरकार को अधिकार है ?  [३]-क्या पद धारक को सरकार वेतन देती है ?  [४]-पद धारक के कार्य क्या हैं और क्या वह उन कार्यों को सरकार के लिए करता ह

दहेज़ :इकलौती पुत्री की आग की सेज

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  दहेज़ :इकलौती पुत्री की आग की सेज   एक ऐसा जीवन जिसमे निरंतर कंटीले पथ पर चलना और वो भी नंगे पैर सोचिये कितना कठिन होगा पर बेटी ऐसे ही जीवन के साथ इस धरती पर आती है .बहुत कम ही माँ-बाप के मुख ऐसे होते होंगे जो ''बेटी पैदा हुई है ,या लक्ष्मी घर आई है ''सुनकर खिल उठते हों .                   'पैदा हुई है बेटी खबर माँ-बाप ने सुनी ,                 उम्मीदों का बवंडर उसी पल में थम गया .'' बचपन से लेकर बड़े हों तक बेटी को अपना घर शायद ही कभी अपना लगता हो क्योंकि बात बात में उसे ''पराया धन ''व् ''दूसरे  घर जाएगी तो क्या ऐसे लच्छन [लक्षण ]लेकर जाएगी ''जैसी उक्तियों से संबोधित कर उसके उत्साह को ठंडा कर दिया जाता है .ऐसा नहीं है कि उसे माँ-बाप के घर में खुशियाँ नहीं मिलती ,मिलती हैं ,बहुत मिलती हैं किन्तु ''पराया धन '' या ''माँ-बाप पर बौझ '' ऐसे कटाक्ष हैं जो उसके कोमल मन को तार तार कर देते  हैं .ऐसे में जिंदगी गुज़ारते गुज़ारते जब एक बेटी और विशेष रूप से इकलौती बेटी का ससुराल में पदार्पण होता है तब

कांग्रेस व् भाजपा से देश को मुक्ति .

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१६ वीं लोकसभा चुनावों के परिणाम सामने आ गए. चारों तरफ भगवा ही भगवा छा गया.भारतीय जनता पार्टी में ख़ुशी की लहर दौड़ गयी ,इतनी बड़ी जीत की आशा भाजपा को सपनों में भी नहीं थी फिर आम जनता में भी इस बात को लेकर चर्चा थी कि सुषमा स्वराज या लाल कृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में भी इस सफलता की आशा नहीं की जा सकती थी .वास्तव में इस जीत के एकमात्र हक़दार गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ही हैं जिन्होंने अपने अकेले दम पर पार्टी के घोषणापत्र से लेकर प्रचार-प्रसार का जिम्मा संभाला और जनता में अपने को लेकर यह विश्वास उत्पन्न किया कि वास्तव में अब ''अच्छे दिन आने वाले हैं ''और इस तरह मोदी ने अपने नाम की लहर से अपनी इतनी बड़ी पार्टी को जो अब तक नहीं मिला था वह दिलाया ''अपने दम पर बहुमत ''इसलिए लाख कोई इस जीत का सेहरा भाजपा के माथे पर बाँधे किन्तु वास्तविकता यह है कि मात्र कांग्रेस का ही इन चुनावों में खात्मा नहीं हुआ है वरन इन चुनावों में देश की दूसरी महत्वपूर्ण राष्ट्रीय पार्टी भाजपा का भी खात्मा हो गया है जिसको अब केवल मोदी की पार्टी के रूप में ही आगे पहचान मिलने वाली है क्य