गुरुवार, 1 मई 2014

कल्पना /यथार्थ
































उड़ता है मन 
कल्पनाओं के 
रोज़ नए लोक में ,
पाता है नित नयी 
ऊंचाइयां 
तैरकर के सोचता 
पाउँगा इच्छित सभी, 
पूरी आकांक्षाएं 
होंगी मेरी अभी ,
तभी लगे हैं ठोकरें 
यथार्थ से जो पाँव में 
टुकड़े टुकड़े हो ह्रदय 
घिरता जाये शोक में .
.............
शालिनी कौशिक 
[कौशल ]

6 टिप्‍पणियां:

राजेंद्र कुमार ने कहा…


आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (02.05.2014) को "क्यों गाती हो कोयल " (चर्चा अंक-1600)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, वहाँ पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

jyoti khare ने कहा…


सार्थक सोच की भावमय और प्रभावपूर्ण रचना
उत्कृष्ट प्रस्तुति

आग्रह है----
और एक दिन

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

ख़याली पुलाव पकाना -यही तो मन का काम है ,पता महीं तब अक्ल कहाँ चली जाती है !

Neeraj Kumar ने कहा…

तभी लगे हैं ठोकरें
यथार्थ से जो पाँव में
टुकड़े टुकड़े हो ह्रदय
घिरता जाये शोक में..... बहुत ही सुन्दर भाव..

vishvnath ने कहा…

बहुत सुन्दर लिखा है , बड़े ही कोमल शब्दों में लिखी ये कविता एक अंजना सा सकून दे रही है।

हिमकर श्याम ने कहा…

बहुत भावपूर्ण अभिव्यक्ति. ...

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