जाति और पार्टी दोनों शर्मिंदा मोदी से .


''मेरी जाति नीची लेकिन राजनीति नहीं .''कहकर मोदी ने भले ही राजनीति में एक और नयी चाल खेली हो किन्तु इस वक्तव्य के उच्चारण से उन्होंने जिस जाति से वे आते हैं उस जाति से जुड़े लोगो का सिर शर्म से नीचे किया है .
     मोदी जिस जाति से जुड़े हैं उसके बारे में बार बार मायावती जी के द्वारा पूछे जाने पर भी वे उल्लेख नहीं करते किन्तु प्रियंका गांधी के ''नीच राजनीति ''कथन में से अपनी पसंद का नीच शब्द उन्होंने चुना और उसका खूब उल्लेख कर सारे में अपनी जाति को नीच बताया जबकि आज न तो भारतीय संविधान में किसी भी जाति के लिए ऐसे किसी शब्द का कोई स्थान है और न ही जिन भगवान राम का अपनी सभा में पांच-पांच बार नाम लेकर वे वोट की राजनीति कर रहे हैं ,जो कि उनके अनुसार वे नहीं करते ,उनके जीवन में भी इस शब्द का कोई स्थान नहीं रहा .हमें याद है कि रामानंद सागर की रामायण देखते हुए जब हम उसमे श्री राम की वन आगमन की लीला देखते हैं तो उसमे भगवान राम सर्वप्रथम माता सीता ,भ्राता लक्ष्मण और मित्र निषाद राज गुह के साथ भरद्वाज मुनि के आश्रम में पहुँचते हैं और वहां आसन पर विराजते हैं ऐसे में निषाद राज गुह जब नीचे बैठने लगते हैं तब भरद्वाज मुनि उन्हें प्रभु श्रीराम के बराबर में आसन देते हैं तब निषाद राज कहते हैं कि हम नीच हैं तो तत्क्षण भरद्वाज मुनि उन्हें टोकते हैं और कहते हैं कि प्रभु का मित्र होने पर तुम अपने को नीच कैसे कहते हो ....और प्रभु ने नीच तो किसी को रहने ही नहीं दिया ...''फिर उन भगवान राम के नाम का उच्चारण करने वाले मोदी कैसे अपनी राजनीति चमकाने के लिए अपनी जाति को नीच कहकर शर्मिंदा कर सकते हैं ?जबकि प्रियंका गांधी का कटाक्ष सभी जानते हैं कि आज के दौर की राजनीति के निम्न स्तर को  लेकर था न कि मोदी या किसी और की जाति को लेकर ,कमाल है ये बात मायावती जी की समझ में आ सकती है किन्तु बुद्धिमानों के शंहशाह बनने वाले भाजपाइयों की समझ में नहीं ,सब जानते हैं कि जो बात मायावती जी कह रही हैं सही भी वही  है किन्तु चुनाव के आखिरी दौर में अपनी नैया को कैसे भी करके पार लगाने की कोशिश के लिए उन्हें प्रियंका को ही घेरना था क्योंकि आज प्रियंका के आगमन ने भाजपाइयों की नींद उड़ाई हुई है और भाजपाई कैसे भी करके उन्हें जनता की नज़र में गिराने में लगे हैं सुब्रमनियन स्वामी उन्हें शराबी व् कृतघ्न बेटी कहकर तो उमा भारती कभी वाड्रा की घरवाली तो कभी राखी सावंत कहकर अपमानित करने की चेष्टा करती हैं क्योंकि प्रियंका ने इन लोगों को सीधे घेरा है न कि इस तरह घुमा फिराकर और ये बात इनसे बर्दाश्त नहीं हो रही है और होगी भी कैसे जिनकी नैया की बागडोर ही ऐसे हाथों में हो जो ऊपर से राम राम कहता फिरे और अंदर से अपने मन में -
''एकोअहम द्वितयो न अस्ति ,न भूतो न भविष्यति .' 
   कहकर स्वयं रावण बनकर फिरता हो ,जो अपने सामने राम को देखकर भी अपने झूठे अहंकार को लेकर उन्हें ही दुर्दशा में घिरे दिखाने की चेष्टा करता हो ,रावण ने राम के साथ कभी श्री शब्द का उच्चारण नहीं किया और उनका वनवासी कहकर वैसे ही मखौल उडाता फ़िर जैसे आज मोदी राहुल गांधी का मखौल उड़ने की चेष्टा करता है और राहुल गांधी राम की तरह उसके सामने उसकी वास्तविकता रखते हैं और नीच शब्द को लेकर की जाने वाली उसकी राजनीति का करारा जवाब उसी तरह देते हैं जैसे राम ने युद्ध के दौरान रावण को दुर्दशा का असली परिचय दिया था ,राहुल गांधी ने नीच शब्द को जो परिभाषा दी है उसे राजनीति के मैदान में आदर्श ही कहा जायेगा जिसमे  वे सीधी सोच रखते हुए कहते हैं कि 
 ''कोई जाति नीच नहीं होती ,नीच सोच व् नीच कर्म होते हैं .''
   यह भारतीय ज्ञान व् आध्यात्म की परिभाषा है जो कि राहुल गांधी ने इन भाजपाइयों द्वारा नमूना ,पप्पू व् बुद्धू कहे जाने के बाद दी है और मोदी इसे अपनी ही तरह अपने रंग में रंगकर मुखौटों में ढालकर वोट में बदलना चाह रहे हैं  और राहुल गांधी ने उन्हें फिर एक मौका दिया है तो अब तो उनकी तड़प और बढ़ जानी चाहिए और उनकी तरफ से अब यही बयान आना चाहिए कि 
''मेरी जाति नीची हो सकती है ,सोच व् कर्म नहीं ,''
    और आश्चर्य है कि प्रियंका गांधी की नीच राजनीति की टिप्पणी पर तो उनपर दो-दो मुक़दमे दर्ज़ हो गए और मोदी के द्वारा स्वयं की जाति को ही नीच कहने पर उनपर एक बी मुकदमा दर्ज़ नहीं हुआ जबकि मोदी खुएलाम सम्पूर्ण जाति को नीच कह रहे हैं जिसकी इजाजत उन्हें भारतीय संविधान नहीं देता और इस तरह तो मोदी अपनी जाति को शर्मिंदा कर रहे हैं और 
  ''प्राण जाये पर वचन न जाये ''
 जैसी रघुकुल रीति का उल्लेख कर अपनी पार्टी को ,क्योंकि रघुकुल रीति से जितनी  इनकी पार्टी भारतीय जनता पार्टी बंधी है इतना कोई नहीं .
   राम मंदिर बनाने के नाम पर सत्ता हासिल करने वाली ये पार्टी इस दम पर एक बार तेरह दिन ,दूसरी बार तेरह महीने व् तीसरी बार पूरे पांच साल का शासन पा गयी और राम मंदिर के नाम पर एक ईंट तक आज तक भी वहां नहीं रख सकी जबकि वह यही वचन देकर सत्ता में आई थी और अब लोकसभा चुनाव के सात दौर बीतने के बाद अपनी नैया को डूबता देख भाजपा का झंडा बुलंद करने वाले मोदी रघुकुल रीति का हवाला देकर जनता को वचन न निभाने वालों को सबक सीखने को कह रहे हैं और इस तरह १९९२ में बेवकूफ बनायीं गयी जनता को फिर बेवकूफ बनाने की कोशिश कर रहे हैं और इस तरह स्वयं ही अपनी राजनीति की नीचता को साबित कर रहे हैं जो जाति के मामले में राम को दरकिनार कर अपनी सोच को ऊपर रखते हुए अपनी जाति को अपनेआप ही नीच  कहकर उसे दूसरों  का नाम देकर उबलने के लिए प्रेरित रहे हैं और इस तरह सम्पूर्ण जाति को खून के घूँट पिए जाने को विवश कर रहे हैं और दूसरी तरह राम को अपने नैया का खेवनहार बनने का प्रयत्न कर रहे हैं और रघुकुल रीति का उच्चारण कर अपने को राम भक्त दिखाने की चेष्टा कर रहे हैं जबकि साफ तौर पर न वे राम भक्त हैं न ही अपनी जाति के नायक क्योंकि उनके जीवन का मूलमंत्र जहाँ तक उनकी कार्यशैली से ज्ञात होता है वह यही है कि 
''प्राण भी खाए और वचन न निभाए .''
  
शालिनी कौशिक 
[कौशल ]
  

टिप्पणियाँ

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (09.05.2014) को "गिरती गरिमा की राजनीति
" (चर्चा अंक-1607)"
पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, वहाँ पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।
J.L. Singh Singh ने कहा…
भ्रष्टाचार के खात्मे, विकास और सभी वर्गों के प्रतिनिधत्व के साथ शुरू की गयी राजनीति आखिरकार क्षुद्र जाति पर अंत हुई, मर्यादाएं टूटी है... शायद इसीलिये अच्छे लोग राजनीति में नहीं आते...

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