सोमवार, 30 सितंबर 2013

आगे बढ़कर हाथ मिला .

सन्दर्भ -समाचार सरहद पर अमन के बाद होगी बात .

पाकिस्तान हमेशा से भारत के शांति प्रयासों का मजाक उडाता आया है और अब भी वह इसी राह पर है कुछ यूँ -





आ रहे हैं तेरे दर पर ,आगे बढ़कर हाथ मिला .

दिल मिले भले न हमसे ,आगे बढ़कर हाथ मिला .



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घर तेरे आकर भले हम खून रिश्तों का करें ,

भूल जा तू ये नज़ारे ,आगे बढ़कर हाथ मिला .

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जाहिरा तुझसे गले मिल भीतर चलायें हम छुरियां ,

क्या करेगा देखकर ये,आगे बढ़कर हाथ मिला .

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हम सदा से ही निभाते दोस्त बनकर दुश्मनी ,

तू मगर है दोस्त अपना,आगे बढ़कर हाथ मिला .

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घर तेरा गिरने के दुःख में आंसू मगरमच्छी बहें,

पर दुखी न दिल हमारा,आगे बढ़कर हाथ मिला .

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आग की लपटों से घिरकर तेरे अरमां यूँ जलें ,

मिल गयी ठंडक हमें ,अब आगे बढ़कर हाथ मिला .



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जिंदगी में तेरी हमने क्या न किया ''शालिनी '',

भूल शहादत को अपनी, आगे बढ़कर हाथ मिला .



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शालिनी कौशिक

[कौशल ]

रविवार, 29 सितंबर 2013

भारत के रत्न मान पायें भारत के बाहर .

भारत के रत्न मान पायें भारत के बाहर .




नवाज शरीफ ने वैसे ''देहाती औरत ''शब्द नहीं कहा किन्तु यदि उन्होंने हमारे प्रधानमंत्री जी को देहाती औरत कहा है तो उन्होंने उनकी सही पहचान की है देहात में औरत जितनी ईमानदारी और मेहनत से काम कर अपने घर व् खेत के लिए काम करती है वैसे शहरी औरत कर ही नहीं सकती क्योंकि यहाँ वह दूसरों के लिए काम करती है और देहाती औरत अपने घर व् खेत के लिए काम करती है .

साथ ही औरत शब्द का उच्चारण उनके लिए करना उनके सम्मान को बढ़ाना ही है क्योंकि ये कहा भी गया है की अगर औरत में आदमी के गुण आ जाएँ तो वह कुलटा हो जाती है और अगर आदमी में औरत के गुण आ जाएँ तो वह देवत्व पा लेता है .

ऐसे में वे या पाकिस्तानी ने उन्हें सही तरह देश भक्त की पहचान दी है वैसे भी हमारे देश के रत्नों को देश के बाहर ही महत्व मिलता है हमारे लिए तो ''घर की मुर्गी दाल बराबर ''होती है .

शालिनी कौशिक

[कौशल ]

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शनिवार, 28 सितंबर 2013

contest 4-मात्र दिखावा हैं ये आयोजन हिंदी दिवस पर ‘पखवारा’ के आयोजन का कोई औचित्य है या बस यूं ही चलता रहेगा यह सिलसिला?


पखवारे का आयोजन हिंदी पखवारे का आयोजन एक लम्बे समय से हो रहा है और आगे भी होता रहेगा किन्तु ये आयोजन हिंदी को कोई समृद्ध स्थान नहीं दिला सकते क्योंकि आयोजक ही इसके प्रति वफादार नहीं हैं पखवारे में हिंदी के बारे में बढ़ चढ़कर बोलने वाले जब अपने घर पहुँचते हैं तो सबसे पहले उनके शब्द होते हैं ''where is your madam ''.बच्चे के मुंह से अगर गलती से भी पापा निकल जाये तो उसके मुहं पर जोरदार तमाचा पड़ता है और फिर उसके मुहं से डैडी ही निकलता है और कुछ नहीं ,जल्दी में अगर मोबाइल नुम्बर .बताने में वह हिंदी के एक दो बोल दे तो उसे धिक्कारा जाता है और ऐसा दिखाया जाता है कि वह बहुत नीचे गिर गया है और फिर वह भले ही हिंदी नंबर .का मोबाइल लिए हो नंबर अंग्रेजी में ही बोलेगा और ये हाल उनके घरों का है जो थोड़ी देर पहले लम्बे चौड़े भाषण देकर हिंदी के उज्जवल भविष्य की कामना करते हैं और उसे बेचारी दिखाकर उसके प्रति सहानुभूति भी व्यक्त करते हैं किन्तु नहीं देख पाते कि आज अगर हिंदी बेचारी है तो स्वयं ऐसे लोगों के कारण जिन्हें उसे अपनाने में अपनी हेठी दिखाई देती है जो समझते हैं कि हम हिंदी बोलकर पिछड़े हुए समझें जायेंगे जबकि कहने को वे पढ़े लिखे समझदार लोग हैं और जानते हैं कि भाषा मात्र विचारों की अभिव्यक्ति का साधन है और हम कोई भी भाषा बोलें किन्तु हम आधुनिक व् समझदार अपने विचारों से समझे जायंगे न कि भाषा से और हिंदी हमारी मातृभाषा है हम सभी जानते हैं कि हम अपने विचारों की अभिव्यक्ति जितनी कुशलता से हिंदी में कर सकते हैं उतनी किसी और भाषा में नहीं .रूस के नागरिकों को देखिये वे जहाँ जाते हैं अपनी भाषा ही बोलते हैं उन्हें क्यूं शर्म महसूस नहीं होती ये हम ही हैं जिन्होंने अपनी भाषा को अपनी ही नज़रों में गिर लिया है क्योंकि हम हैं ही ऐसे ज़रा सा उच्च पद पर पहुँचते ही तो हम अपने माँ-बाप तक को अपने माता पिता कहने से हिचकते हैं फिर ये तो भाषा है हम इसके प्रति कैसे दूसरा दृष्टिकोण रख सकते हैं और इसलिए ये कहना पड़ता है कि ये आयोजन मात्र खाना पूर्ति हैं दिवस की और कुछ नहीं हम जिसके प्रति वफादार हैं जिसे अपनाने के लिए लालायित हैं उसके लिए ऐसे किसी दिखावे की कोई आवश्यकता नहीं और जिसके लिए हमारे मन में शर्म है उसके लिए लाख दिवस मनाएं हज़ार पुरुस्कार बांटे तब भी उसे वह स्थान नहीं दिलवा सकते जिसका वह वास्तव में हक़दार है और इसलिए इन आयोजनों से हिंदी की स्थिति में तनिक भी फर्क पड़ने वाला नहीं है .

शालिनी कौशिक

[कौशल ]



गुरुवार, 26 सितंबर 2013

गुलामी नारी की नियति


बढ़ रही हैं

गगन छू रही हैं

लोहा ले रही हैं

पुरुष वर्चस्व से

कल्पना

कपोल कल्पना

कोरी कल्पना

मात्र

सत्य

स्थापित

स्तम्भ के समान प्रतिष्ठित

मात्र बस ये

विवशता कुछ न कहने की

दुर्बलता अधीन बने रहने की

हिम्मत सभी दुःख सहने की

कटिबद्धता मात्र आंसू बहने की .

न बोल सकती बात मन की है यहाँ बढ़कर

न खोल सकती है आँख अपनी खुद की इच्छा पर

अकेले न वह रह सकती अकेले आ ना जा सकती

खड़ी है आज भी देखो पैर होकर बैसाखी पर .

सब सभ्यता की बेड़ियाँ पैरों में नारी के

सब भावनाओं के पत्थर ह्रदय पर नारी के

मर्यादा की दीवारें सदा नारी को ही घेरें

बलि पर चढ़ते हैं केवल यहाँ सपने हर नारी के .

कुशलता से करे सब काम

कमाये हर जगह वह नाम

भले ही खास भले ही आम

लगे पर सिर पर ये इल्ज़ाम .

कमज़ोर है हर बोझ को तू सह नहीं सकती

दिमाग में पुरुषों से कम समझ तू कुछ नहीं सकती

तेरे सिर इज्ज़त की दौलत वारी है खुद इस सृष्टि ने

तुझे आज़ाद रहने की इज़ाज़त मिल नहीं सकती .

सहे हर ज़ुल्म पुरुषों का क्या कोई बोझ है बढ़कर

करे है राज़ दुनिया पर क्यूं शक करते हो बुद्धि पर

नकेल कसके जो रखे वासना पर नर अपनी

ज़रुरत क्या पड़ी बंधन की उसकी आज़ादी पर ?

मगर ये हो नहीं सकता

पुरुष बंध रो नहीं सकता

गुलामी का कड़ा फंदा

नहीं नारी से हट सकता

नहीं दिल पत्थर का करके

यहाँ नारी है रह सकती

बहाने को महज आंसू

पुरुष को तज नहीं सकती

कुचल देती है सपनो को

वो अपने पैरों के नीचे

गुलामी नारी की नियति

कभी न मिल सकती मुक्ति .



शालिनी कौशिक

[कौशल ]

शनिवार, 21 सितंबर 2013

सज संवरके हाथ अपने बांध तब लीजिये ,


तस्वीर बनकर सामने जो हाथ बांधे हों खड़े ,

नुमाइंदगी की इनसे उम्मीद क्या कर लीजिये ,

थामने को अब मशाल क्रांति नई लाने को ,

संग इस रहनुमा के सेवक रख लीजिये .

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बढ़ चले यूँ हम अगर मूर्ति के साथ में ,

अपने साथ इसकी भी रखवाली आप कीजिये ,

करना पड़े ये काम भी गर ऐसे हालात में ,

इनको आगे चलने का ,फिर क्यूं मुक़द्दर दीजिये .

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हालात ही ख़राब हैं मुल्क के इन दिनों ,

चाहता है देश अब ख्याल कुछ कीजिये ,

दिल को ज़ख़्मी होने से तो आप नहीं रोक सके ,

कम से कम ज़ख्म पर मरहम रख दीजिये .

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देखकर विवाद को आपसे है आसरा ,

समर्थ बन भाइयों के मिटा भेद दीजिये ,

गांठ जो धागे में है प्रेम के यूँ लग रही ,

अपने हाथ खोलकर उसे भी खोल दीजिये .

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बाँधने से हाथ को न कोई कुछ कर सके ,

जनता और दल को न यूँ निराश कीजिये ,

महज गरजने से नहीं मुश्किलों के हल मिलें ,

देखकर मुखालिफों को अब सुधर लीजिये .

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सामने जो आपके चढ़ाये आस्तीन खड़े ,

मुश्किलों से लड़ने की उनसे सीख लीजिये ,

काम अभी देश में पड़े हैं अनकिये हुए ,

मुंह की जगह हाथ से ही काम अब लीजिये .

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बुराईयाँ मुखालिफों की गिनाना आसान है ,

अपनी खासयितों को खुद की नज़र कीजिये ,

आज के हालात का जिम्मेवार कौन यहाँ ,

अपने गिरेबान में झांक देख लीजिये .

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अहम् भरे भाव लिए जनता के सामने ,

सज संवरके हाथ अपने बांध तब लीजिये ,

झोंक दिया देश को मजहबी जिस आग में ,

उससे निकल पाने का उपाय कर दीजिये .



शालिनी कौशिक

[कौशल ]

गुरुवार, 19 सितंबर 2013

''आखिर मुसलमानों में ऐसा क्या है ?''

''आखिर मुसलमानों में ऐसा क्या है ?''




भारत विभिन्न धर्म-संस्कृतियों का देश है ,हिन्दू,मुसलमान ,सिख ,ईसाई,जैन ,बौद्ध आदि,आदि विभिन्न धर्मावलम्बी इस देश में बसे हैं और जैसे ये देश उन्हें अपनी संतान मानता है वैसे ही ये भी उसे अपनी माँ का स्थान देते हैं ,जैसे ये देश उनके पालन पोषण में कोई कोताही नहीं बरतता वैसे ही ये सभी इस देश पर अपने प्राण न्योछावर करने को तैयार रहते हैं .शहीद भगत सिंग ,अशफाक उल्लाह खान ,लाला लाजपत राय आदि आदि ऐसे बहुत से नाम हैं जिन्होंने इस देश के लिए कुर्बानी देने में एक क्षण भी नहीं लगाया .



जहाँ एक तरफ श्याम लाल गुप्त''पार्षद ''कहते हैं -



''विजयी विश्व तिरंगा प्यारा ,झंडा ऊँचा रहे हमारा ,''



वहीँ मुहम्मद इकबाल के दिल से भी यही शब्द निकलते हैं -



''सारे जहाँ से अच्छा ,हिन्दोस्तां हमारा .''



ऐसे देश में जहाँ हिन्दू धर्मावलम्बियों का वर्चस्व है और वे बहुसंख्यक भी हैं और अन्य सभी धर्मावलम्बी यहाँ अल्पसंख्यक श्रेणी में हैं ,मुसलमान ,जैन बौद्ध आदि अदि किन्तु यहाँ अल्पसंख्यक बहुसंख्यक से भी पृथक एक श्रेणी है ''विशेष दर्जा ''और वह केवल प्राप्त है मुसलमानों को ,और यही वे धर्मावलम्बी हैं जो किसी भी चुनाव में सत्ता पलटने की ताकत रखते हैं .मात्र13% होने पर और यही वह धर्म है जिसके साथ जुड़ने पर धर्म निरपेक्ष की छवि मिलती है यहाँ किसी भी दल को और यही वह धर्म है जिसके बारे में यहाँ अल्पसंख्यक के नाम पर महत्वपूर्ण योजनायें चलायी जाती हैं जबकि इससे भी अल्पसंख्यक धर्म यहाँ मौजूद हैं ये आप इस सूची में देख सकते हैं -



According to 2001 Population Census



Religion Population (%)

Hindus 827,578,868 80.5

Muslims 138,188,240 13.4

Christians 24,080,016 2.3

Sikhs 19,215,730 1.9

Buddhists 7,955,207 0.8

Jains 4,225,053 0.4

Other Religions & Persuasions 6,639,626 0.6

Religion not Stated 727,588 0.1

Total 1,028,610,328 100.0

किन्तु ये उतनी मजबूत शक्ति नहीं रखते जितनी मजबूत शक्ति यह धर्म अपने अस्तित्व को लेकर रखता है .



मुजफ्फरनगर में दंगे होते हैं मुख्यमंत्री जनता के हाल पूछने ,देखने आते है और मिलते हैं केवल मुसलमानों से ,जो अपने घरों से भागकर शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं इनसे सहानुभूति सही है किन्तु क्या उनसे कोई सहानुभूति नहीं जिनकी ट्रैक्टर-ट्रोलियाँ गंगनहर में फैंक दी गयी ,लाशें तक बहा दी गयी और जिसके बारे में क्षेत्र के सभी लोगों का कहना था कि यह हमला नक्सली हमले से प्रेरित था और जिसमे गायब लोगों का अभी तक कुछ पता नहीं क्या उनके परिजनों को सांत्वना देने की कोई आवश्यकता नहीं थी सही है क्योंकि जब यही दिखाया जा रहा हो कि मात्र मुसलमान ही दंगे से पीड़ित हैं तब यही होना था जबकि इस दंगे की शुरुआत जहाँ से हुई अर्थात कवाल गाँव से वहां इसमें मरने वालों में एक मुसलमान व् दो हिन्दू थे .

प्रधानमंत्री आते हैं ,मिलते किससे हैं मात्र मुसलमानों से क्योंकि वे घर छोड़कर भाग खड़े हुए हैं ,उनसे क्यूं नहीं जो दबे सहमे अपने घरों में ही दंगों की आंच में झुलस रहे हैं .

भाजपा स्वयं की धर्म निरपेक्ष छवि दिखाना चाहती है और हिन्दुओं की अगुवा भी बने रहना .गुजरात में हुए दंगों के नाम पर हिन्दुओं की शक्तिशाली छवि दिखा हिन्दुओं का खैरख्वाह बनाकर नरेन्द्र मोदी को २०१४ के चुनावों का नेतृत्व सौंपती है किन्तु इस पर भी आशंका से घिरी स्वयं मुसलमानों की ही शरण लेती है .कहीं नहीं दिखाया जाता कि मोदी हिन्दुओं के साथ .उनकी सद्भावना भी तभी दिखती है जब वे मुसलमानों के बीच खड़े होते हैं और उन्हीं के दल के शिवराज सिंह चौहान जो की मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं मुस्लिम मतों के लिए मोदी से दूरी बनाते हैं और जन आशीर्वाद यात्रा से मोदी को आउट करते हैं .

समझ में नहीं आता कि आखिर मुसलमानों में ऐसा क्या है जो सभी दल इनके आकर्षण में बंधे हैं और इनका अपने दल से जुड़ना ही सत्ता के द्वार में प्रवेश के लिए आवश्यक मानते हैं .यदि हम अपने आस-पास देखें तो शायद इसका उत्तर पा सकते हैं और जहाँ तक दिखता है वहां तक इसका एक ही जवाब है ''कट्टरता ''मुसलमानों की अपने धर्म के प्रति कट्टरता ही इन्हें वह मजबूत दर्जा दिल रही है जिसकी इस धर्म निरपेक्ष राष्ट्र में कोई जगह नहीं होनी चाहिए .



आज भी ''इस्लाम खतरे में है ''का नारा सारी विशेषताओं को दरकिनार कर मुसलमान उम्मीदवार को विजय दिला ले जाता है .आज भी यही कट्टरता कई योग्य अभ्यर्थियों के होते हुए इंटरव्यू पैनल में मुसलमान अधिकारी द्वारा मुसलमान को ही वरीयता दिलाती है ,यही कट्टरता गरीबी बेरोजगारी के भंवर में फंसे अन्य अल्पसंख्यकों के समक्ष मुसलमान लड़कियों के किये ही ''हमारी बेटी उसका कल ''जैसी योजनायें शुरू कराती है और यही कट्टरता है जो अन्य धर्मावलम्बियों में असुरक्षा की भावना भर मुजफ्फरनगर जैसे दंगों की भूमिका बनाती है .



यही कट्टरता है जो इनसे एकजुटता से वोट दिलाती है और इसकी यही खूबी राजनीतिक दलों को इसके करीब लाती है और नहीं दिखता है इन्हें कि इसका जन्म कहाँ से हुआ है तो ध्यान दीजिये कि यह उपजी है असुरक्षा की भावना से जो इनमे इन्हीं राजनीतिक दलों द्वारा भरी जाती है जो आपसी प्यार सद्भावना की जगह इन्हें हिन्दू-मुस्लिम सिख इसाई में बाँटने में ही अपना फायदा या हित देखते हैं .



पहले असुरक्षा और फिर कट्टरता के फेर में इन्हें उलझाकर राजनीतिक दल इनके प्रति सद्भाव का नाटक खेलते हैं और इन्हें इस्तेमाल कर सत्ता की सीढ़ी तैयार करते हैं क्योंकि जिस फेर में ये इन्हें उलझाते हैं उसमे उलझ भी केवल ये ही सकते हैं क्योंकि भारत-पाकिस्तान के बंटवारे ने इनके दिमाग में कहीं थोडा स्थान पाकिस्तान के लिए भी रख छोड़ा है और इससे इन्हें भी लगता है कि हम यहाँ पराये हैं .जबकि ये तो इनकी धरती है इनकी माँ है जो अलग हो गया वह इसका मात्र एक हिस्सा था वैसे ही जैसे किसी संतान का माँ से अलग हो जाना अन्य संतान के मन में तो वैर भर सकता है किन्तु माँ के लिए वह उसकी संतान ही रहता है इसलिए भारत देश इन्हें कैसे अलग मान सकता है किन्तु ये हमारे नेतागण इनकी इसी कमजोर नस को पकड़ते हैं और इनमे वैर के बीज बोते हैं .अगर वास्तव में कोई दल धर्मनिरपेक्ष है ,सद्भाव रखने वाला है तो वह इनमे प्यार जगायेगा ,विश्वास जगायेगा और केवल हिन्दू मुस्लिम नहीं बल्कि हर ज़रूरतमंद के काम आएगा और उसके कंधे से कन्धा मिलकर उसे सफलता की डगर पर अपने साथ ले जायेगा क्योंकि सच्चाई भी तो यही है -



''खुदा किसी का राम किसी का बाँट न इनको पाले में ,



तू मस्जिद में पूजा कर ,मैं सिजदा करूँ शिवाले में ,



जिस धारा में प्यार मुहब्बत वह धारा ही गंगा है ,



और अन्यथा क्या अंतर वह यहाँ गिरी या नाले में .''



शालिनी कौशिक



[कौशल ]

बुधवार, 18 सितंबर 2013

सही हर सोच है इनकी,भले बैठें गलत घर पर .


तखल्लुस कह नहीं सकते ,तखैयुल कर नहीं सकते ,

तकब्बुर में घिरे ऐसे ,तकल्लुफ कर नहीं सकते .

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मुसन्निफ़ बनने की सुनकर ,बेगम मुस्कुराती हैं ,

मुसद्दस लिखने में मुश्किल हमें भी खूब आती है ,

महफ़िलें सुन मेरी ग़ज़लें ,मुसाफिरी पर जाती हैं ,

मसर्रत देख हाल-ए-दिल ,मुख्तलिफ ही हो जाती है .

मुकद्दर में है जो लिखा,पलट हम कर नहीं सकते ,

यूँ खाली पेट फिर-फिर कर तखल्लुस कह नहीं सकते .

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ज़बान पर अवाम की ,मेरे अशआर चढ़ जाएँ ,

मुक़र्रर हर मुखम्मस पर ,सुने जो मुहं से कह जाये ,

मुखालिफ भी हमें सुनने ,भरे उल्फत चले आयें ,

उलाहना न देकर बेगम ,हमारी कायल हो जाएँ .

नक़ल से ऐसी काबिलियत हैं खुद में भर नहीं सकते ,

यूँ सारी रात जग-जगकर तखैयुल कर नहीं सकते .

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शहंशाही मर्दों की ,क़ुबूल की है कुदरत ने ,

सल्तनत कायम रखने की भरी हिम्मत हुकूमत ने ,

हुकुम की मेरे अनदेखी ,कभी न की हकीकत ने ,

बनाया है मुझे राजा ,यहाँ मेरी तबीयत ने .

तरबियत ऐसी कि मूंछे नीची कर नहीं सकते ,

तकब्बुर में घिरे ऐसे कभी भी झुक नहीं सकते .

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मुहब्बत करके भी देखो, किसी से बंध नहीं सकते ,

दिलकश हर नज़ारे को, यूँ घर में रख नहीं सकते ,

बुलंद इकबाल है अपना ,बेअदबी सह नहीं सकते

चलाये बिन यहाँ अपनी ,चैन से रह नहीं सकते .

चढ़ा है मतलब सिर अपने ,किसी की सुन नहीं सकते ,

शरम के फेर में पड़कर, तकल्लुफ कर नहीं सकते .

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शख्सियत है बनी ऐसी ,कहे ये ”शालिनी ”खुलकर ,

सही हर सोच है इनकी,भले बैठें गलत घर पर .

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शब्दार्थ-तखल्लुस-उपनाम ,तखैयुल-कल्पना ,तकब्बुर-अभिमान ,तकल्लुफ-शिष्टाचार ,मुसन्निफ़-लेखक,मुसाफिरी-यात्रा ,मसर्रत-ख़ुशी ,मुख्तलिफ -अलग

मुसद्दस -उर्दू में ६ चरणों की कविता ,मुखम्मस-५ चरणों की कविता ,मुखालिफ-विरोधी ,उल्फत-प्रेम, उलाहना -शिकायत ,कायल-मान लेना ,तरबियत-पालन-पोषण ,बुलंद इकबाल -भाग्यशाली

शालिनी कौशिक

[woman about man ]

सोमवार, 16 सितंबर 2013

क्या करेगी जन्म ले बेटी यहाँ




क्या करेगी जन्म ले बेटी यहाँ

साँस लेने के काबिल फिजा नहीं ,

इस अँधेरे को जो दूर कर सके

ऐसा एक भी रोशन दिया नहीं !

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क्या करेगी तरक्की की सोचकर

तेरे लिए ये जहाँ बना नहीं ,

हौसलों को तेरे जो पर दे सके

ऐसा दिलचला कोई मिला नहीं !

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क्या करेगी सोच साथ देने की

तेरी नहीं कोई ज़रुरत यहाँ ,

कद्र जो तेरी मदद की कर सके

ऐसा कदरदान है हुआ नहीं !

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क्या करेगी उनके ग़मों को बांटकर

तुझसे साझा उन्होंने किये नहीं ,

सह रही जो सदियों से तू आज तक

उनका साझीदार है यहाँ नहीं !

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''शालिनी''ही क्या अनेकों बेटियां

बख्तरों में बंद हो आई यहाँ ,

मुजरिमों की जिंदगी क्यूं है मिली

इसका खुलासा कभी किया नहीं !

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शब्दार्थ -दिलचला-दिलेर ,साहसी .बख्तर-लोहे का कवच .

शालिनी कौशिक

[कौशल ]

शनिवार, 14 सितंबर 2013

जागरण जंक्शन पर हिंदी के विभिन्न मुद्दों पर मेरी अभिव्यक्ति -क्या आप सहमत हैं

जागरण जंक्शन पर हिंदी के विभिन्न मुद्दों पर मेरी अभिव्यक्ति -क्या आप सहमत हैं




1-हिंदी ब्लॉगिंग हिंदी को मान दिलाने में समर्थ हो सकती है -



हिंदी ब्लॉग्गिंग आज लोकप्रियता के नए नए पायदान चढ़ने में व्यस्त है .विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं की तानाशाही आज टूट रही है क्योंकि उनके द्वारा अपने कुछ चयनित रचनाकारों को ही वरीयता देना अनेकों नवोदित कवियों ,रचनाकारों आदि को हतोत्साहित करना होता था और अनेकों को गुमनामी के अंधेरों में धकेल देता था किन्तु आज ब्लॉगिंग के जरिये वे अपने समाज ,क्षेत्र और देश-विदेश से जुड़ रहे हैं और अपनी भाषा ,संस्कृति ,समस्याएं सबके सामने ला रहे हैं . ब्लॉगिंग के क्षेत्र में आज सर्वाधिक हिंदी क्षेत्रों के चिट्ठाकार जुड़े हैं और.अंग्रेजी शुदा इस ज़माने में हिंदी के निरन्तर कुचले हुए स्वरुप को देख आहत हैं किन्तु हिंदी को उसका सही स्थान दिलाने में जुटे हैं और इस पुनीत कार्य में ज़माने से जुड़े रहने को अंग्रेजी से २४ घंटे जुड़े रहने वाले भी हिंदी में ब्लॉग लेखन में व्यस्त हैं .

हम सभी जानते हैं कि हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा ही नहीं मातृभाषा भी है और दिल की गहराइयों से जो अभिव्यक्ति हमारी ही कही जा सकती है वह हिंदी में ही हो सकती है क्योंकि अंग्रेजी बोलते लिखते वक़्त हम अपने देश से ,समाज से ,अपने परिवार से ,अपने अपनों से वह अपनत्व महसूस नहीं कर सकते जो हिंदी बोलते वक़्त करते हैं .

हिंदी जहाँ अपनों को कभी आप ,कभी तुम व् कभी तू से स्नेह में बांधती है अपनेपन का एहसास कराती है वहीँ अंग्रेजी इस सबको ''यू ''पर टिका देती है और दूर बिठाकर रख देती है ..

आज हिंदी ब्लॉग्गिंग के जरिये दूर-दराज बैठे ,बड़े बड़े पदों को सुशोभित कर औपचारिकता की टोपी पहनने वाले व्यक्तित्व साहित्यकार व् रचनाकार में परिवर्तित हो रहे हैं और इसी क्षेत्र में जुड़े अंजान ब्लोगर से जुड़ रहे हैं .अपनी अभिव्यक्ति पर प्रतिक्रिया की इच्छा रख रहे हैं और अन्यों की अभिव्यक्ति पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं और ये सब सुखद है इसलिए क्योंकि इससे अपने विचारों का दूसरों पर प्रभाव भी देखने में आसानी होती है और साथ ही यह भी पता चलता है कि आज भी लोगों के मन में हिंदी को लेकर मान है ,सम्मान है और हिंदी को उसका सही स्थान दिलाये जाने की महत्वाकांक्षा भी .

आज हिंदी ब्लॉगिंग के जरिये दूर-दराज बैठे ,बड़े बड़े पदों को सुशोभित कर औपचारिकता की टोपी पहनने वाले व्यक्तित्व साहित्यकार व् रचनाकार में परिवर्तित हो रहे हैं और इसी क्षेत्र में जुड़े अंजान ब्लोगर से जुड़ रहे हैं .अपनी अभिव्यक्ति पर प्रतिक्रिया की इच्छा रख रहे हैं और अन्यों की अभिव्यक्ति पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं और ये सब सुखद है इसलिए क्योंकि इससे अपने विचारों का दूसरों पर प्रभाव भी देखने में आसानी होती है और साथ ही यह भी पता चलता है कि आज भी लोगों के मन में हिंदी को लेकर मान है ,सम्मान है और हिंदी को उसका सही स्थान दिलाये जाने की महत्वाकांक्षा भी . आज हिंदी ब्लॉगिंग का बढ़ता प्रभाव ही समाचारपत्रों में ब्लॉग के लिए स्थान बना रहा है .पत्रकारों का एक बड़ा समूह हिंदी ब्लॉग्गिंग से जुड़ा है और समाचार पत्रों में संपादक के पृष्ठ पर ब्लॉग जगत को महत्वपूर्ण स्थान दिया जा रहा है .पाठकों की जिन प्रतिक्रियाओं को समाचार पत्र कूड़े के डिब्बे के हवाले कर देते थे आज उनके ब्लॉग से अनुमति ले छाप रहे हैं क्योंकि जनमत के बहुमत को लोकतंत्र में वरीयता देना सभी के लिए चाहे वह हमारे लोकतंत्र का कोई सा भी स्तम्भ हो अनिवार्य है और इसी के जरिये मीडिया आज विभिन्न मुद्दों पर जनमत जुटा रहा है और यही हिंदी ब्लॉगिंग आज हिंदी भाषियों को तो जोड़ ही रही है विश्व में अहिन्दी भाषियों को भी इसे अपनाने को प्रेरित कर रही है .यही कारण है कि आज बड़े बड़े राजनेता भी जनता से जुड़ने के लिए ब्लॉगिंग से जुड़ रहे हैं .आज वे हिंदी की जगह अपने ब्लॉग पर अंग्रेजी में लिख रहे हैं किन्तु वह दिन भी दूर नहीं जब वे जनता को अपने करीबी दिखने के लिए हिंदी के करीब आयेंगे क्योंकि जनता इससे जुडी है और जनता से जुड़ना उनकी आवश्यकता भी है और मजबूरी भी . इसलिए ये निश्चित है कि जिस तरह से हिंदी ब्लॉगिंग विश्व में अपना डंका बजा रही है वह इन राजनेताओं को भी अपना बनावटी लबादा उतरने को विवश करेगी और अपनी ताकत से परिचित कराकर सही राह भी दिखाएगी और इस तरह जनता को अपने से जोड़ने के लिए उन्हें हिंदी का हमराही बनाएगी .वैसे भी अपनी ताकत हिंदी ब्लॉगिंग ने आजकल के विभिन्न हालातों पर हर समस्या के जिम्मेदार को कठघरे में खड़ा कर दिखा ही दी है .नित्यानंद जी के शब्द यहाँ हिंदी ब्लॉगिंग की उपयोगिता व् निर्भीकता को अभिव्यक्त करने के लिए उत्तम हैं -

''उसे जो लिखना होता है ,वही वह लिखकर रहती है ,

कलम को सरकलम होने का बिलकुल डर नहीं होता .''



2-





हिंदी की जगह आज अंग्रेजी ही घेरती जा रही है -[हिंदी बाज़ार की भाषा है गर्व की नहीं ,हिंदी गरीबों अनपढ़ों की भाषा बनकर रह गयी है .]-contest -२

हिंदी हमारे देश की राष्ट्रभाषा बस कहने मात्र को ही रह गयी है .जिस प्रकार यह कहा गया है कि भारत में गाय की पूजा होती है और भारत में ही गाय काटी जाती है इसी सत्य पथ का अनुसरण आज ही क्या जबसे हिंदी को राष्ट्रभाषा के पद पर विराजमान किया गया है तब से ही किया जा रहा है .

भारत एक ऐसा देश है जहाँ लोकतंत्र की स्थापना की गयी थी यहाँ के स्वतंत्रता आन्दोलन में जुटी जनशक्ति देखकर और दुःख भी यहाँ का ये लोकतंत्र ही बनकर रह गया .जनता के प्रतिनिधि सत्ता में बैठकर स्वयं को जनता के सेवक न मानकर उसके सिर का ताज मानकर बैठ गए .और जनता भी कौन दोषमुक्त कही जाएगी वह भी अपने स्वार्थ सिद्ध करने में जुट गयी और परिणाम यह हुआ की यहाँ स्वार्थपूर्ति की दोनों ओर से ऐसी रेलमपेल चली की देश हित गहरे अंधकार में डूब गया .विभिन्न संस्कृतियों ,भाषाओँ के मेल वाला हमारा यह देश आज ऐसे जंगल में फंसकर रह गया है जहाँ जिसको जितना हिस्सा मिल जाता है वह हड़प लेता है .कोई सख्ती यहाँ चल ही नहीं पाती और इसलिए कोई सही काम इस देश में होना एक स्वप्न बनकर रह गया है .चीन जैसा देश सख्ती से एक बच्चे का कानून लागु कर सकता है फिर भारत क्यूं नहीं ?चीन गुलाम नहीं होता क्योंकि वहां गद्दार नहीं हैं किन्तु भारत गुलाम होता है और स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भी उसी ताकत का गुलाम रहता है क्योंकि यह उसकी इच्छा में है .

कोई भी कार्य जब तक उसके पीछे जनशक्ति न हो ,होना इस देश में असंभव है क्योंकि यहाँ एक -एक वोट एक ऐसी संपत्ति है जिसे हासिल करने के लिए सत्ताधारी दल कोई भी जुगत भिड़ाते हैं .गुलामी के दौरान यहाँ की जनता अंग्रेजियत की ऐसी गुलाम हुई कि आज तक भी उस दासता से मुक्त नहीं हुई .''dogs and indians are not allowed ''भी आज तक हिन्दुस्तानियों का अंग्रेजी प्रेम न घटा पाए .किसी हिंदुस्तानी के घर के द्वार पर कहीं भी यह देखने को नहीं मिला कि ''अंग्रेजी का हम अपमान नहीं करते क्योंकि हमारे यहाँ अतिथि देवो भवः की परंपरा है किन्तु हिंदी के घर में अंग्रेजी मात्र अतिथि है और वही रहेगी ,वह इस मकान की मालकिन नहीं बन सकती .''और यह लिखा होना मुश्किल है क्योंकि यहाँ की जनता अंग्रेजी के रंग में ऐसी रंगी जा रही है कि ये कहना कि हिंदी बाज़ार की भाषा है ,तो ये भी कहाँ सच है ?

बाजार में दुकानों पर जो गर्व ''शॉप ''लिखने में महसूस किया जाता है वह दुकान लिखने में नहीं ,सर्राफ स्वयं को ''गोल्ड स्मिथ'' कहलवाना ज्यादा पसंद करता है .पंसारी चाहता है कि उसे ''टिम्बर मर्चेंट ''कहा जाये .सर्राफ की दुकानों से चादर व् गोल तकिये गायब हो चुके हैं तकियों चादर का स्थान अब टेबिल-चेयर ने ले लिया है .बाजार में किसी उत्पाद के अभिकर्ता आयें या दुकानों पर उपभोक्ता अब कहाँ उनका स्वागत लस्सी या शरबत से होता है हर जगह चाय ,कॉफ़ी ,या फिर कोल्ड ड्रिंक ही इस्तेमाल होते हैं ..

दूसरी ओर ये कहना कि यह गरीबों अनपढ़ों की भाषा बनकर रह गयी है तो ये भी गलत क्योंकि आज के गरीब अनपढ़ भी हिंदी बोलकर नीचा नहीं दिखना चाहते ,वे भी अंग्रेजी बोलते हैं और उसी में शान महसूस करते हैं .कमजोरी न कह ''वीक्नेक्स'' बोलते हैं ''वीकनेस ''का अपभ्रंश .भले ही गलत बोल रहे हों किन्तु बोल तो अंग्रेजी रहे हैं इसका सुकून उनके चेहरे पर साफ देखा जा सकता है .अस्पताल की जगह हॉस्पिटल सबकी जबान पर चढ़ा है गवर्नमेंट कहने से सिर ऊँचा होता है सरकार कौन जानता है .और फिर मिसकॉल जनलोकप्रिय शब्द का स्थान ले चूका है कौन कहेगा इसे ''छूटी हुई पुकार ''

और क्या क्या कहें व् कहाँ कहाँ झांके ,हिंदी को तहखाने में मुहं बंद कर डाल चुकी अंग्रेजी अब उसी के घर में चाट पकौड़ी खा रही है और सभी को वही मालकिन नज़र आ रही है .



3-





contest -३ क्या हिंदी सम्मानजनक भाषा के रूप में मुख्यधारा में लाई जा सकती है ........अफ़सोस ये कि नहीं .....



भारतेंदु हरिश्चन्द्र ने कहा था -

''निज भाषा उन्नति अहै ,सब उन्नति को मूल ,

बिनु निज भाषा ज्ञान के ,मिटे न हिय को शूल ''

महात्मा गाँधी जी ने हिंदी को स्वराज्य वाहिका माना था .हमारे प्रत्येक नेता ने यथावसर हिंदी को भारत की जनता की भाषा कहा है .देश के राजनेताओं के लिए हिंदी का महत्व यहाँ से पता चलता है कि भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी की ''डाइनिंग टेबिल ''का नियम था कि वहां बैठने पर सभी हिंदी में ही बात करेंगे और यहाँ की जनता से जुड़ने के लिए इटली निवासी होने पर भी भारतीय बहू बनने पर सोनिया गाँधी जी ने हिंदी सीखी और आज जनसभाओं में गर्व से वे हिंदी भाषा में ही जनता को संबोधित करती हैं .

हमारे संविधान में हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार किया गया क्योंकि हिंदी का स्थान निर्विवाद रूप से राष्ट्रभाषा का है .आज से नहीं कई सदियों से ,महा प्रभु वल्लभाचार्य तथा संत कवियों ,भक्त कवियों से लेकर स्वामी दयानंद सरस्वती ,महात्मा गाँधी ,नेहरु जी तक प्रत्येक लोकनायक एवं लोकसेवक ने जनता की भाषा के रूप में ,राष्ट की बोली के रूप में हिंदी को अपनाया .संत कबीर ने कहा -

''संस्कीरत जल कूप है ,भाषा बहता नीर .''

गोस्वामी तुलसीदास ने भी भारत के कोने कोने तक श्री राम कथा का सन्देश पहुँचाने के लिए हिंदी भाषा का प्रयोग करना आवश्यक समझा .

इस तरह हिंदी की मान्यता के अनगिनत उदाहरण हो सकते हैं किन्तु फिर भी अफ़सोस और वह भी इसलिए कि हिंदी एक सम्मानजनक भाषा के रूप में मुख्यधारा में नहीं लाई जा सकती ,कारण सबके समक्ष है -

सर्वप्रथम तो संविधान निर्माण के समय ही हिंदी को १५ वर्ष का वनवास दे दिया गया .हिंदी इस देश की राष्ट्रभाषा कभी न बन सके इसके लिए केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने दो राजभाषा अधिनियम बनाये हैं .राजभाषा अधिनियम ३४३/१ के अधीन हिंदी के साथ अंग्रेजी को सहभाषा के रूप में प्रचलित रखने का प्रावधान किया गया इसके फलस्वरूप यह स्थिति बनी कि हिंदी के साथ अंग्रेजी को प्रचलित रखने की अवधि १५ वर्ष निश्चित कर दी गयी परन्तु अब यह अवधि अनिश्चित कालीन कर दी गयी है .राजभाषा अधिनियम की धरा ३/१ में यह जोड़ दिया गया है कि जब तक भारत के एक भी राज्य की सरकार हिंदी को अपने राज्य की राजभाषा स्वीकार करने में संकोच करेगी तब तक हिंदी पूरे संघ की राजभाषा नहीं हो सकेगी .स्पष्ट है कि इस प्रावधान द्वारा हिंदी के संघ की राजभाषा बनने की सम्भावना को सदा सर्वदा के लिए नकार दिया गया .तमिलनाडु जैसे राज्य तो हिंदी के कदीमी विरोधी थे ही नागालैंड जैसा छोटा राज्य भी अंग्रेजी को राजभाषा स्वीकार कर चुका है अतःकई ऐसे राज्य हैं जिनसे हिंदी के पक्ष में अर्थात राष्ट्रभाषा के पक्ष में निर्णय की आशा नहीं की जा सकती .

फिर जब स्वतंत्रता प्राप्ति के समय जनता पर एकाधिकार से प्रभुत्व रखने वाले पंडित जवाहर लाल नेहरु ये कह सकते हैं -

''हिंदी तथा अहिन्दी भाषियों को दो भागों में बाँट देने से देश का भारी अहित होगा .हिंदी को रजामंदी से आगे ले जाना है ,अगर हिंदी वाले जबरदस्ती करेंगे तो दूसरे लोग ऐंठ जायेंगे इससे ऐसी खाई पैदा हो जाएगी जो हिंदी के लिए नहीं वरन पूरे देश के लिए घातक सिद्ध होगी .हिंदी को और ताकत मिलेगी यदि हिंदी के साथ अंग्रेजी को सहायक भाषा रहने दिया जाये ,क्योंकि अंग्रेजी के जरिये नए नए विचार आते रहेंगे .''

साथ ही ,अपनी सादगी भरी जीवन शैली व् उच्च विचारों वाले तत्कालीन गृहमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी यह कह सकते हैं-

''जब तक हिंदी विकसित नहीं हो जाती और जब तक लोग उसे अच्छी तरह सीख नहीं लेते ,तब तक अंग्रेजी को बनाये रखना ही पड़ेगा .''

फिर आज के किसी नेता से तो इस सम्बन्ध में प्रभावशाली पहल की आशा करना ही व्यर्थ है क्योंकि आज के नेता तो इन नेताओं के महान चरित्र व् त्यागमयी भावनाओं के पास भी नहीं फटकते .ऐसे मे वे हिंदी के लिए सम्मानजनक स्थान बनाने की ओर बढ़ भी सकेंगे ,ये हम सोच भी नहीं सकते क्योंकि पहले के नेता नेता न होकर देश पर मरने मिटने वाले होते थे और आज के नेता देश को ही अपने पर लुटाने वाले होते हैं और ये तथ्य सभी जानते हैं .

और सबसे बढ़कर इस दिशा में हम स्वयं को पायेंगें जिन्हें भले ही टूटी-फूटी अंग्रेजी बोलनी पड़े किन्तु वह अपनी समृद्ध हिंदी के समक्ष अपने शीश को गर्व से उठाने के लिए आवश्यक जान पड़ती है .आज अहिन्दी भाषियों की तो क्या कहें हिंदी भाषी क्षेत्रों के परिवार अपने बच्चों को 'कॉवेन्ट 'में पढ़ाने की इच्छा रखते हैं भले ही उधार लेकर पढाना पड़े .प्राचीन गुरुकुल मान्यता अब समाप्त हो चुकी है क्योंकि भारतीय जनता जमीन पर बैठकर भोजन करने की नहीं अपितु चेयर -टेबिल पर बैठ लंच ,डिनर की आदि हो चुकी है .

इसलिए अफ़सोस के साथ यह कहना पड़ रहा है कि हिंदी कभी भी सम्मानजनक भाषा के रूप में मुख्य धारा में नहीं लाई जा सकती क्योंकि मुख्य धारा ही अब अंग्रेजी के रंग में रंगीली हो चुकी है .

शालिनी कौशिक

[कौशल ]

बुधवार, 11 सितंबर 2013

उभारी नफरतें बढ़कर ,सियासत ने जिन हाथों से ,

सरकशी बढ़ गयी देखो, बगावत को बढ़ जाते हैं ,


हवाओं में नफरतों के गुबार सिर चढ़ जाते हैं .

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मुहब्बत मुरदार हो गयी,सियासी चालों में फंसकर ,

अब तो इंसान शतरंज की मोहरें नज़र आते हैं.

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मुरौवत ने है मोड़ा मुंह ,करे अब क़त्ल मानव को ,

सियासत में उलझते आज इसके कदम जाते हैं .

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हुई मशहूर ये नगरी ,आज जल्लाद के जैसे ,

मसनूई दिल्लगी से नेता, हमें फांसी चढाते हैं .

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कभी महफूज़ थे इन्सां,यहाँ जिस सरपरस्ती में ,

सरकते आज उसके ही ,हमें पांव दिख जाते हैं .

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सयानी आज की नस्लें ,नहीं मानें बुजुर्गों की ,

रहे जो साथ बचपन से ,वही दुश्मन बन जाते हैं .

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जलाते फिर रहे ये आशियाँ ,अपने गुलिस्तां में ,

बसाने में एक बगिया ,कई जीवन लग जाते हैं .

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उभारी नफरतें बढ़कर ,सियासत ने जिन हाथों से ,

उन्हीं को सिर पर रखकर ,हमें हिम्मत बंधाते हैं .

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लगे थे जिस जुगत में ''शालिनी''के ये सभी दुश्मन ,

फतह अपने इरादों में ,हमारे दम पर पाते हैं .

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शब्दार्थ-मुरदार -मरा हुआ ,बेजान ,

मसनूई -बनावटी ,दिल्लगी-प्रेम ,सरकशी-उद्दंडता ,सरपरस्ती -सहायता .



शालिनी कौशिक

[कौशल ]



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सोमवार, 9 सितंबर 2013

अपने सामने रखके आईना बर्बाद देश को कह गए हैं .

भाजपा-संघ बैठकः मोदी का नाम तय, समय पर सस्पेंस

अपने ख्वाबों को ये ,कुछ यूँ देते अंजाम ,
छीन निवाला बच्चों का करते लूट बबाल ,
करते लूट बबाल करोड़ों फूंके खुद पर
असली छूना कठिन चढ़ें कल्पनाओं के रथ पर .
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मधु का छत्ता कहने पर देश को माँ हैं कहते ,
ऐसी तुलना देख मगरमच्छ टसुएँ बहते ,
उसी देश को अपने मुख से कह गए बर्बाद
ये कहने पर क्यूं नहीं शब्द वे आये याद .
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''देश माँ है मधुमक्खी का छत्ता नहीं '',
बर्बाद कहने में माँ को क्यूं दिल दुखा नही ,
माँ की तरक्की औलादों के दम से पाए तरक्की ,
क्यूं ऐसा कह बनाते हमको आप हैं शक्की .
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बढ़ रहे हैं आज निरंतर जग में हिंदुस्तानी ,
भारतीय दिमाग की ताकत सारे विश्व ने मानी ,
जिसके बेटे इस दुनिया में झंडे अपने गाड़ रहे
उसका माथा आज गर्व से क्यूं नहीं ऊँचा कहें ?
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बहक गए हैं ,फिसल गए हैं ,
चिढ में अपनी भटक गए हैं ,
अपने सामने रखके आईना
बर्बाद देश को कह गए हैं .
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शालिनी कौशिक
[कौशल ]

शनिवार, 7 सितंबर 2013

अपने अपनों की मोहब्बत को अगर समझें हम .



सन्दर्भ -मुजफ्फरनगर में सांप्रदायिक हिंसा, 6 की मौत


                     muzaffarnagar-kaval-communal-riot
''मुख्तलिफ  ख्यालात भले रखते हों मुल्क से बढ़कर न खुद  को समझें हम,
बेहतरी हो जिसमे अवाम की अपनी ऐसे क़दमों को बेहतर  समझें हम.
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है ये चाहत तरक्की की राहें आप और हम मिलके पार करें ,
जो सुकूँ साथ मिलके चलने में इस हकीक़त को ज़रा समझें हम .
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कभी हम एक साथ रहते थे ,रहते हैं आज जुदा थोड़े से ,
अपनी आपस की गलतफहमी को थोड़ी जज़्बाती  भूल  समझें हम .
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देखकर आंगन में खड़ी दीवारें आयेंगें तोड़ने हमें दुश्मन ,
ऐसे दुश्मन की गहरी चालों को अपने हक में कभी न  समझें हम .
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कहे ये ''शालिनी'' मिल  बैठ मसले  सुलझा लें ,
अपने अपनों की मोहब्बत को अगर समझें हम .

         शालिनी कौशिक 
                  [ कौशल ]

शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

पुरुष- दंभ का मानवीय रूप



पुरुष
दंभ का मानवीय रूप

टूट जायेगा
पर
झुकेगा नहीं !
दंभ
या तो फूलेगा
गैस के गुब्बारे की तरह
नहीं तो
डूब जायेगा
ऐसे अंधकार में
जहाँ साया
अपना साया
भी
साथ छोड़ खिसक जाता है
दूर कहीं अनंत पथ पर .

ऐसे ही पुरुष
गैस के गुब्बारे की तरह फूलता है
और बिना सोचे विचारे
स्वयं को मान सर्वशक्तिमान
बढ़ता रहता है
उड़ता रहता है
नहीं लगता उसे
संसार में कोई अपने
समकक्ष
किन्तु एक समय आता है
जब वह
स्वयं को अकेला पाता है

किन्तु झुकना नहीं
सीखा कभी
इसलिए
असहाय महसूस
करने पर भी
वह किसी से कुछ
नहीं कहता
और
कर लेता है
स्वयं को ऐसे
अंधकार के आधीन
जहाँ साया
अपना साया
भी
साथ छोड़ खिसक जाता है
दूर कहीं अनंत पथ पर .

                 शालिनी कौशिक
                         [कौशल ]



गुरुवार, 5 सितंबर 2013

शीश झुकाती आज ''शालिनी ''अहर्नीय के चरणों में ,

Sarvepalli Radhakrishnan


अर्पण करते स्व-जीवन शिक्षा की अलख जगाने में ,
रत रहते प्रतिपल-प्रतिदिन  शिक्षा की राह बनाने में .
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आओ मिलकर करें स्मरण नमन करें इनको मिलकर ,
जिनका जीवन हुआ सहायक हमको सफल बनाने में .
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जीवन-पथ पर आगे बढ़ना इनसे ही हमने सीखा ,
ये ही निभाएं मुख्य भूमिका हमको राह दिखाने में  .
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खड़ी बुराई जब मुहं खोले हमको खाने को तत्पर ,
रक्षक बनकर आगे बढ़कर ये ही लगे बचाने में .
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मात-पिता ये नहीं हैं होते मात-पिता से भी बढ़कर ,
गलत सही का भेद बताकर लगे हमें समझाने में .
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पुष्प समान खिले जब शिष्य प्रफुल्लित मन हो इनका ,
करें अनुभव गर्व यहाँ ये उसको श्रेय दिलाने में .
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शीश झुकाती आज ''शालिनी ''अहर्नीय के चरणों में ,
हुए सहाय्य ये ही सबके आगे कदम बढ़ाने में .
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               शालिनी कौशिक 
                   [कौशल ]

मंगलवार, 3 सितंबर 2013

ये देखो आज भरत से राम वध करा गयी .


शामली में बवाल, आगजनी व फायरिंग


Shamli

भाइयों के बीच ये मंथरा क्यूं आ गयी ,
त्रेता में किये काम का कलियुग में फल चखा गयी .
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मिल-बैठ मुश्किलों को थे गैर राह दिखा रहे ,
ये आके समझ-बूझ में आग ही लगा गयी .
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अमन दिलों में खूब था ,वतन ये पुरसुकून था ,
तीर ज़हर से भरे ये सबके ही चुभा गयी .
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फिजाओं में थी बह रही हमारे प्यार की महक ,
इसी की कूटनीतियाँ खाक बनके छा गयी .
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आपसी सद्भाव से तरक्की जो थे पा रहे ,
तोड़ धागा प्रेम का ये खाट से लगा गयी .
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बुजुर्गों की हिदायतें संभालती नई पीढियां ,
दबे कदम पधारकर ये दीमकें घुसा गयी .
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कुर्बानियों भरोसों की खड़ी थी जो इमारतें ,
बारूद की चिंगारियां ये नीव में दबा गयी .
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ज़रा ज़रा सी बात पर प्यासे हुए हैं खून के ,
ये देखो आज भरत से राम वध करा गयी .
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देखकर हालात ये संभल न सकी ''शालिनी ''
बुराई अब भलाई पर सहज में विजय पा गयी .
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शब्दार्थ -खाट से लगाना -अशक्त होना ,



   शालिनी कौशिक
               [कौशल ]





मुज़फ्फरनगर

सोमवार, 2 सितंबर 2013

फेसबुक दीवार


फेसबुक दीवार 

दीवार 
मेरी 
आपकी 
पडोसी की 
हर किसी की .
......................
हिफाज़त करे 
मेरी 
आपकी 
पडोसी की 
हर किसी की .
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राहत की साँस 
मेरी 
आपकी 
पडोसी की 
हर किसी की .
...........................
श्रृंगार भीतरी ,शान बाहरी,
मेरी 
आपकी 
पडोसी की 
हर किसी की .
......................
अब बन गयी 
ज़रुरत 
दिलों की भड़ास की ,
उत्पाद प्रचार की ,
वोट की मांग की ,
किसी के अपमान की ,
किसी के सम्मान की .
..................................
भरा जो प्यार दिल में 
   दिखायेगा दीवार पर ,
भरा जो मैल मन में 
   उतार दीवार पर ,
बेचना है मॉल जो 
   प्रचार दीवार पर ,
झुकानी गर्दन तेरी 
   लिखें हैं दीवार पर ,
पधारी कौन शख्सियत 
    देख लो दीवार पर .
.........................................
मार्क जुकरबर्ग ने 
     संभाला एक मोर्चा ,
देखकर गतिविधि 
   बैठकर यही सोचा ,
दीवार सी ही स्थिति 
   मैं दूंगा अंतर्जाल पर ,
लाऊंगा नई क्रांति 
   फेसबुक उतारकर ,
हुआ कमाल जुट गए 
   करोड़ों उपयोक्ता ,
दीवार का ही काम अब 
   फेसबुक कर रहा ,
जो चाहे लिख लो यहाँ ,
  जो चाहे फोटो डाल लो ,
क्रांति या बबाल की 
    लहर यहाँ उफान लो ,
करे कोई ,भरे कोई ,
   नियंत्रण न कोई हद ,
जगायेगा कभी लगे 
   पर आज बन गया है दर्द .
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    शालिनी कौशिक 
          [कौशल ]






समीक्षा - "ये तो मोहब्बत नहीं" - समीक्षक शालिनी कौशिक

समीक्षा -  '' ये तो मोहब्बत नहीं ''-समीक्षक शालिनी कौशिक उत्कर्ष प्रकाशन ,मेरठ द्वारा प्रकाशित डॉ.शिखा कौशिक 'नूतन...