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सितंबर, 2013 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

आगे बढ़कर हाथ मिला .

सन्दर्भ -समाचार सरहद पर अमन के बाद होगी बात . पाकिस्तान हमेशा से भारत के शांति प्रयासों का मजाक उडाता आया है और अब भी वह इसी राह पर है कुछ यूँ - आ रहे हैं तेरे दर पर ,आगे बढ़कर हाथ मिला . दिल मिले भले न हमसे ,आगे बढ़कर हाथ मिला . ..................................................................................................... घर तेरे आकर भले हम खून रिश्तों का करें , भूल जा तू ये नज़ारे ,आगे बढ़कर हाथ मिला . ............................................................................ जाहिरा तुझसे गले मिल भीतर चलायें हम छुरियां , क्या करेगा देखकर ये,आगे बढ़कर हाथ मिला . ............................................................................ हम सदा से ही निभाते दोस्त बनकर दुश्मनी , तू मगर है दोस्त अपना,आगे बढ़कर हाथ मिला . ........................................................................................ घर तेरा गिरने के दुःख में आंसू मगरमच्छी बहें, पर दुखी न दिल हमारा,आगे बढ़कर हाथ मिला . ..................................................

भारत के रत्न मान पायें भारत के बाहर .

भारत के रत्न मान पायें भारत के बाहर . नवाज शरीफ ने वैसे ''देहाती औरत ''शब्द नहीं कहा किन्तु यदि उन्होंने हमारे प्रधानमंत्री जी को देहाती औरत कहा है तो उन्होंने उनकी सही पहचान की है देहात में औरत जितनी ईमानदारी और मेहनत से काम कर अपने घर व् खेत के लिए काम करती है वैसे शहरी औरत कर ही नहीं सकती क्योंकि यहाँ वह दूसरों के लिए काम करती है और देहाती औरत अपने घर व् खेत के लिए काम करती है . साथ ही औरत शब्द का उच्चारण उनके लिए करना उनके सम्मान को बढ़ाना ही है क्योंकि ये कहा भी गया है की अगर औरत में आदमी के गुण आ जाएँ तो वह कुलटा हो जाती है और अगर आदमी में औरत के गुण आ जाएँ तो वह देवत्व पा लेता है . ऐसे में वे या पाकिस्तानी ने उन्हें सही तरह देश भक्त की पहचान दी है वैसे भी हमारे देश के रत्नों को देश के बाहर ही महत्व मिलता है हमारे लिए तो ''घर की मुर्गी दाल बराबर ''होती है . शालिनी कौशिक [कौशल ] .

contest 4-मात्र दिखावा हैं ये आयोजन हिंदी दिवस पर ‘पखवारा’ के आयोजन का कोई औचित्य है या बस यूं ही चलता रहेगा यह सिलसिला?

पखवारे का आयोजन हिंदी पखवारे का आयोजन एक लम्बे समय से हो रहा है और आगे भी होता रहेगा किन्तु ये आयोजन हिंदी को कोई समृद्ध स्थान नहीं दिला सकते क्योंकि आयोजक ही इसके प्रति वफादार नहीं हैं पखवारे में हिंदी के बारे में बढ़ चढ़कर बोलने वाले जब अपने घर पहुँचते हैं तो सबसे पहले उनके शब्द होते हैं ''where is your madam ''.बच्चे के मुंह से अगर गलती से भी पापा निकल जाये तो उसके मुहं पर जोरदार तमाचा पड़ता है और फिर उसके मुहं से डैडी ही निकलता है और कुछ नहीं ,जल्दी में अगर मोबाइल नुम्बर .बताने में वह हिंदी के एक दो बोल दे तो उसे धिक्कारा जाता है और ऐसा दिखाया जाता है कि वह बहुत नीचे गिर गया है और फिर वह भले ही हिंदी नंबर .का मोबाइल लिए हो नंबर अंग्रेजी में ही बोलेगा और ये हाल उनके घरों का है जो थोड़ी देर पहले लम्बे चौड़े भाषण देकर हिंदी के उज्जवल भविष्य की कामना करते हैं और उसे बेचारी दिखाकर उसके प्रति सहानुभूति भी व्यक्त करते हैं किन्तु नहीं देख पाते कि आज अगर हिंदी बेचारी है तो स्वयं ऐसे लोगों के कारण जिन्हें उसे अपनाने में अपनी हेठी दिखाई देती है जो समझते हैं कि हम हिंदी बोलकर पिछड़

गुलामी नारी की नियति

बढ़ रही हैं गगन छू रही हैं लोहा ले रही हैं पुरुष वर्चस्व से कल्पना कपोल कल्पना कोरी कल्पना मात्र सत्य स्थापित स्तम्भ के समान प्रतिष्ठित मात्र बस ये विवशता कुछ न कहने की दुर्बलता अधीन बने रहने की हिम्मत सभी दुःख सहने की कटिबद्धता मात्र आंसू बहने की . न बोल सकती बात मन की है यहाँ बढ़कर न खोल सकती है आँख अपनी खुद की इच्छा पर अकेले न वह रह सकती अकेले आ ना जा सकती खड़ी है आज भी देखो पैर होकर बैसाखी पर . सब सभ्यता की बेड़ियाँ पैरों में नारी के सब भावनाओं के पत्थर ह्रदय पर नारी के मर्यादा की दीवारें सदा नारी को ही घेरें बलि पर चढ़ते हैं केवल यहाँ सपने हर नारी के . कुशलता से करे सब काम कमाये हर जगह वह नाम भले ही खास भले ही आम लगे पर सिर पर ये इल्ज़ाम . कमज़ोर है हर बोझ को तू सह नहीं सकती दिमाग में पुरुषों से कम समझ तू कुछ नहीं सकती तेरे सिर इज्ज़त की दौलत वारी है खुद इस सृष्टि ने तुझे आज़ाद रहने की इज़ाज़त मिल नहीं सकती . सहे हर ज़ुल्म पुरुषों का क्या कोई बोझ है बढ़कर करे है राज़ दुनिया पर क्यूं शक करते हो बुद्धि पर नकेल कसके जो रखे वासन

सज संवरके हाथ अपने बांध तब लीजिये ,

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तस्वीर बनकर सामने जो हाथ बांधे हों खड़े , नुमाइंदगी की इनसे उम्मीद क्या कर लीजिये , थामने को अब मशाल क्रांति नई लाने को , संग इस रहनुमा के सेवक रख लीजिये . ............................................................................... बढ़ चले यूँ हम अगर मूर्ति के साथ में , अपने साथ इसकी भी रखवाली आप कीजिये , करना पड़े ये काम भी गर ऐसे हालात में , इनको आगे चलने का ,फिर क्यूं मुक़द्दर दीजिये . ......................................................................................... हालात ही ख़राब हैं मुल्क के इन दिनों , चाहता है देश अब ख्याल कुछ कीजिये , दिल को ज़ख़्मी होने से तो आप नहीं रोक सके , कम से कम ज़ख्म पर मरहम रख दीजिये . ................................................................................................ देखकर विवाद को आपसे है आसरा , समर्थ बन भाइयों के मिटा भेद दीजिये , गांठ जो धागे में है प्रेम के यूँ लग रही , अपने हाथ खोलकर उसे भी खोल दीजिये . ................................................................................

''आखिर मुसलमानों में ऐसा क्या है ?''

''आखिर मुसलमानों में ऐसा क्या है ?'' भारत विभिन्न धर्म-संस्कृतियों का देश है ,हिन्दू,मुसलमान ,सिख ,ईसाई,जैन ,बौद्ध आदि,आदि विभिन्न धर्मावलम्बी इस देश में बसे हैं और जैसे ये देश उन्हें अपनी संतान मानता है वैसे ही ये भी उसे अपनी माँ का स्थान देते हैं ,जैसे ये देश उनके पालन पोषण में कोई कोताही नहीं बरतता वैसे ही ये सभी इस देश पर अपने प्राण न्योछावर करने को तैयार रहते हैं .शहीद भगत सिंग ,अशफाक उल्लाह खान ,लाला लाजपत राय आदि आदि ऐसे बहुत से नाम हैं जिन्होंने इस देश के लिए कुर्बानी देने में एक क्षण भी नहीं लगाया . जहाँ एक तरफ श्याम लाल गुप्त''पार्षद ''कहते हैं - ''विजयी विश्व तिरंगा प्यारा ,झंडा ऊँचा रहे हमारा ,'' वहीँ मुहम्मद इकबाल के दिल से भी यही शब्द निकलते हैं - ''सारे जहाँ से अच्छा ,हिन्दोस्तां हमारा .'' ऐसे देश में जहाँ हिन्दू धर्मावलम्बियों का वर्चस्व है और वे बहुसंख्यक भी हैं और अन्य सभी धर्मावलम्बी यहाँ अल्पसंख्यक श्रेणी में हैं ,मुसलमान ,जैन बौद्ध आदि अदि किन्तु यहाँ अल्पसंख्यक बहुसंख्यक से भ

सही हर सोच है इनकी,भले बैठें गलत घर पर .

तखल्लुस कह नहीं सकते ,तखैयुल कर नहीं सकते , तकब्बुर में घिरे ऐसे ,तकल्लुफ कर नहीं सकते . ………………………………………………………………. मुसन्निफ़ बनने की सुनकर ,बेगम मुस्कुराती हैं , मुसद्दस लिखने में मुश्किल हमें भी खूब आती है , महफ़िलें सुन मेरी ग़ज़लें ,मुसाफिरी पर जाती हैं , मसर्रत देख हाल-ए-दिल ,मुख्तलिफ ही हो जाती है . मुकद्दर में है जो लिखा,पलट हम कर नहीं सकते , यूँ खाली पेट फिर-फिर कर तखल्लुस कह नहीं सकते . ………………………………………………………………………. ज़बान पर अवाम की ,मेरे अशआर चढ़ जाएँ , मुक़र्रर हर मुखम्मस पर ,सुने जो मुहं से कह जाये , मुखालिफ भी हमें सुनने ,भरे उल्फत चले आयें , उलाहना न देकर बेगम ,हमारी कायल हो जाएँ . नक़ल से ऐसी काबिलियत हैं खुद में भर नहीं सकते , यूँ सारी रात जग-जगकर तखैयुल कर नहीं सकते . …………………………………………………………….. शहंशाही मर्दों की ,क़ुबूल की है कुदरत ने , सल्तनत कायम रखने की भरी हिम्मत हुकूमत ने , हुकुम की मेरे अनदेखी ,कभी न की हकीकत ने , बनाया है मुझे राजा ,यहाँ मेरी तबीयत ने . तरबियत ऐसी कि मूंछे नीची कर नहीं सकते , तकब्बुर में घिरे ऐसे कभी भी

क्या करेगी जन्म ले बेटी यहाँ

क्या करेगी जन्म ले बेटी यहाँ साँस लेने के काबिल फिजा नहीं , इस अँधेरे को जो दूर कर सके ऐसा एक भी रोशन दिया नहीं ! ............................................................ क्या करेगी तरक्की की सोचकर तेरे लिए ये जहाँ बना नहीं , हौसलों को तेरे जो पर दे सके ऐसा दिलचला कोई मिला नहीं ! ........................................................ क्या करेगी सोच साथ देने की तेरी नहीं कोई ज़रुरत यहाँ , कद्र जो तेरी मदद की कर सके ऐसा कदरदान है हुआ नहीं ! .......................................................... क्या करेगी उनके ग़मों को बांटकर तुझसे साझा उन्होंने किये नहीं , सह रही जो सदियों से तू आज तक उनका साझीदार है यहाँ नहीं ! ....................................................... ''शालिनी''ही क्या अनेकों बेटियां बख्तरों में बंद हो आई यहाँ , मुजरिमों की जिंदगी क्यूं है मिली इसका खुलासा कभी किया नहीं ! ................................................. शब्दार्थ -दिलचला-दिलेर ,साहसी .बख्तर-लोहे का कवच . शालिनी कौशिक [कौशल

जागरण जंक्शन पर हिंदी के विभिन्न मुद्दों पर मेरी अभिव्यक्ति -क्या आप सहमत हैं

जागरण जंक्शन पर हिंदी के विभिन्न मुद्दों पर मेरी अभिव्यक्ति -क्या आप सहमत हैं 1-हिंदी ब्लॉगिंग हिंदी को मान दिलाने में समर्थ हो सकती है - हिंदी ब्लॉग्गिंग आज लोकप्रियता के नए नए पायदान चढ़ने में व्यस्त है .विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं की तानाशाही आज टूट रही है क्योंकि उनके द्वारा अपने कुछ चयनित रचनाकारों को ही वरीयता देना अनेकों नवोदित कवियों ,रचनाकारों आदि को हतोत्साहित करना होता था और अनेकों को गुमनामी के अंधेरों में धकेल देता था किन्तु आज ब्लॉगिंग के जरिये वे अपने समाज ,क्षेत्र और देश-विदेश से जुड़ रहे हैं और अपनी भाषा ,संस्कृति ,समस्याएं सबके सामने ला रहे हैं . ब्लॉगिंग के क्षेत्र में आज सर्वाधिक हिंदी क्षेत्रों के चिट्ठाकार जुड़े हैं और.अंग्रेजी शुदा इस ज़माने में हिंदी के निरन्तर कुचले हुए स्वरुप को देख आहत हैं किन्तु हिंदी को उसका सही स्थान दिलाने में जुटे हैं और इस पुनीत कार्य में ज़माने से जुड़े रहने को अंग्रेजी से २४ घंटे जुड़े रहने वाले भी हिंदी में ब्लॉग लेखन में व्यस्त हैं . हम सभी जानते हैं कि हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा ही नहीं मातृभाषा भी है और दिल की गहराइयों

उभारी नफरतें बढ़कर ,सियासत ने जिन हाथों से ,

सरकशी बढ़ गयी देखो, बगावत को बढ़ जाते हैं , हवाओं में नफरतों के गुबार सिर चढ़ जाते हैं . ........................................................................... मुहब्बत मुरदार हो गयी,सियासी चालों में फंसकर , अब तो इंसान शतरंज की मोहरें नज़र आते हैं. .......................................................................... मुरौवत ने है मोड़ा मुंह ,करे अब क़त्ल मानव को , सियासत में उलझते आज इसके कदम जाते हैं . ........................................................................ हुई मशहूर ये नगरी ,आज जल्लाद के जैसे , मसनूई दिल्लगी से नेता, हमें फांसी चढाते हैं . .......................................................................... कभी महफूज़ थे इन्सां,यहाँ जिस सरपरस्ती में , सरकते आज उसके ही ,हमें पांव दिख जाते हैं . ............................................................................ सयानी आज की नस्लें ,नहीं मानें बुजुर्गों की , रहे जो साथ बचपन से ,वही दुश्मन बन जाते हैं . .................................................................

अपने सामने रखके आईना बर्बाद देश को कह गए हैं .

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अपने ख्वाबों को ये ,कुछ यूँ देते अंजाम , छीन निवाला बच्चों का करते लूट बबाल , करते लूट बबाल करोड़ों फूंके खुद पर असली छूना कठिन चढ़ें कल्पनाओं के रथ पर . .............................................................................. मधु का छत्ता कहने पर देश को माँ हैं कहते , ऐसी तुलना देख मगरमच्छ टसुएँ बहते , उसी देश को अपने मुख से कह गए बर्बाद ये कहने पर क्यूं नहीं शब्द वे आये याद . .............................................................. ''देश माँ है मधुमक्खी का छत्ता नहीं '', बर्बाद कहने में माँ को क्यूं दिल दुखा नही , माँ की तरक्की औलादों के दम से पाए तरक्की , क्यूं ऐसा कह बनाते हमको आप हैं शक्की . ...................................................................... बढ़ रहे हैं आज निरंतर जग में हिंदुस्तानी , भारतीय दिमाग की ताकत सारे विश्व ने मानी , जिसके बेटे इस दुनिया में झंडे अपने गाड़ रहे उसका माथा आज गर्व से क्यूं नहीं ऊँचा कहें ? ................................................................... बहक गए हैं ,फिसल गए हैं , चिढ

अपने अपनों की मोहब्बत को अगर समझें हम .

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सन्दर्भ -मुजफ्फरनगर में सांप्रदायिक हिंसा, 6 की मौत                       ''मुख्तलिफ   ख्यालात  भले  रखते हों मुल्क से बढ़कर न खुद  को समझें हम, बेहतरी हो जिसमे अवाम की अपनी ऐसे क़दमों को  बेहतर   समझें हम. ..................................................  है ये  चाहत  तरक्की की राहें आप और हम  मिलके पार करें , जो सुकूँ साथ मिलके चलने में इस हकीक़त को ज़रा समझें हम . ..................................................  कभी हम एक साथ रहते थे ,रहते हैं आज जुदा थोड़े से , अपनी आपस की  गलत फहमी  को  थोड़ी जज़्बाती   भूल  समझें हम . ..................................................  देखकर  आंगन  में खड़ी दीवारें आयेंगें तोड़ने हमें दुश्मन , ऐसे दुश्मन की गहरी चालों को अपने  हक  में कभी न  समझें हम . ..................................................  कहे ये ''शालिनी'' मिल  बैठ मसले  सुलझा लें , अपने अपनों की मोहब्बत को अगर समझें हम .          शालिनी कौशिक                    [ कौशल ]

पुरुष- दंभ का मानवीय रूप

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पुरुष दंभ का मानवीय रूप टूट जायेगा पर झुकेगा नहीं ! दंभ या तो फूलेगा गैस के गुब्बारे की तरह नहीं तो डूब जायेगा ऐसे अंधकार में जहाँ साया अपना साया भी साथ छोड़ खिसक जाता है दूर कहीं अनंत पथ पर . ऐसे ही पुरुष गैस के गुब्बारे की तरह फूलता है और बिना सोचे विचारे स्वयं को मान सर्वशक्तिमान बढ़ता रहता है उड़ता रहता है नहीं लगता उसे संसार में कोई अपने समकक्ष किन्तु एक समय आता है जब वह स्वयं को अकेला पाता है किन्तु झुकना नहीं सीखा कभी इसलिए असहाय महसूस करने पर भी वह किसी से कुछ नहीं कहता और कर लेता है स्वयं को ऐसे अंधकार के आधीन जहाँ साया अपना साया भी साथ छोड़ खिसक जाता है दूर कहीं अनंत पथ पर .                  शालिनी कौशिक                          [कौशल ]

शीश झुकाती आज ''शालिनी ''अहर्नीय के चरणों में ,

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अर्पण करते स्व-जीवन शिक्षा की अलख जगाने में , रत रहते प्रतिपल-प्रतिदिन  शिक्षा की राह बनाने में . .......................................................................................... आओ मिलकर करें स्मरण नमन करें इनको मिलकर , जिनका जीवन हुआ सहायक हमको सफल बनाने में . ......................................................................................... जीवन-पथ पर आगे बढ़ना इनसे ही हमने सीखा , ये ही निभाएं मुख्य भूमिका हमको राह  दिखाने में    . ....................................................................................... खड़ी बुराई जब मुहं खोले हमको खाने को तत्पर , रक्षक बनकर आगे बढ़कर ये ही लगे बचाने में . ................................................................................... मात-पिता ये नहीं हैं होते मात-पिता से भी बढ़कर , गलत सही का भेद बताकर लगे हमें समझाने में . ................................................................................... पुष्प समान खिले जब शिष्य प्रफुल्लित मन हो इनका , करें अनुभव गर्व यहाँ ये

ये देखो आज भरत से राम वध करा गयी .

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शामली में बवाल, आगजनी व फायरिंग भाइयों के बीच ये मंथरा क्यूं आ गयी , त्रेता में किये काम का कलियुग में फल चखा गयी . ............................................................................. मिल-बैठ मुश्किलों को थे गैर राह दिखा रहे , ये आके समझ-बूझ में आग ही लगा गयी . ............................................................................. अमन दिलों में खूब था ,वतन ये पुरसुकून था , तीर ज़हर से भरे ये सबके ही चुभा गयी . .................................................................. फिजाओं में थी बह रही हमारे प्यार की महक , इसी की कूटनीतियाँ खाक बनके छा गयी . ..................................................................... आपसी सद्भाव से तरक्की जो थे पा रहे , तोड़ धागा प्रेम का ये खाट से लगा गयी . .................................................................. बुजुर्गों की हिदायतें संभालती नई पीढियां , दबे कदम पधारकर ये दीमकें घुसा गयी . ..................................................................... कुर्बानियों भरोसों की खड़ी थी जो इम

फेसबुक दीवार

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फेसबुक दीवार  दीवार  मेरी  आपकी  पडोसी की  हर किसी की . ...................... हिफाज़त करे  मेरी  आपकी  पडोसी की  हर किसी की . ............................ राहत की साँस  मेरी  आपकी  पडोसी की  हर किसी की . ........................... श्रृंगार भीतरी ,शान बाहरी, मेरी  आपकी  पडोसी की  हर किसी की . ...................... अब बन गयी  ज़रुरत  दिलों की भड़ास की , उत्पाद प्रचार की , वोट की मांग की , किसी के अपमान की , किसी के सम्मान की . .................................. भरा जो प्यार दिल में     दिखायेगा दीवार पर , भरा जो मैल मन में     उतार दीवार पर , बेचना है मॉल जो     प्रचार दीवार पर , झुकानी गर्दन तेरी     लिखें हैं दीवार पर , पधारी कौन शख्सियत      देख लो दीवार पर . ......................................... मार्क जुकरबर्ग ने       संभाला एक मोर्चा , देखकर गतिविधि     बैठकर यही सोचा , दीवार सी ही स्थिति     मैं दूंगा अंतर्जाल पर , लाऊंगा नई क्रांति     फेसबुक उतारकर , हुआ