सोमवार, 30 जनवरी 2017

औरत गुलाम है.

Hanging_dead : Suicide. Goth girl. Stock Photo

अभी अभी एक नए जोड़े को देखा पति चैन से जा रहा था और पत्नी घूंघट में ,भले ही दिखाई दे या न दे किन्तु उसे अब ऐसे ही चलने का अभ्यास करना होगा आखिर करे भी क्यूँ न अब वह विवाहित जो है जो कि एक सामान्य धारणा के अनुसार यह है कि अब वह धरती पर बोझ नहीं है ऐसा हमारे एक परिचित हैं उनका कहना है कि ''जब तक लड़की का ब्याह न हो जाये वह धरती पर बोझ है .''
मैंने अपने ही एक पूर्व आलेख ''विवाहित स्त्री होना :दासी होने का परिचायक नहीं '' में विवाह को दासता जैसी कुरीति से अलग बताया था किन्तु यह वह स्थिति है जिसमे विवाह संस्कार को वास्तविक रूप में होना चाहिए किन्तु ऐसा होता कहाँ है ?वास्तविक रूप में यहाँ कोई इस संस्था को रहने ही कहाँ देता है कहीं लड़के के माँ-बाप इस संस्कार का उद्देश्य मात्र लड़की वालों को लूटना -खसोटना और यदि देहाती भाषा में कहूँ तो'' मूंडना '' मान लेते हैं तो कहीं स्वयं लड़की वाले कानून के दम पर लड़के वालों को कानूनी दबाव में लेकर इसके बल पर ''कि दहेज़ में फंसाकर जेल कटवाएंगे ''उन्हें अपने जाल में फंसाते हैं और धन ऐंठकर ही छोड़ते हैं .कहीं लड़का ये सोचकर ''कि नारी हीन घर भूतों का डेरा ,नारी बिना कौन करेगा ढेर काम मेरा ''या ''इस लड्डू को जब जो खाये वह पछताए जो न खाये वह पछताए तो क्यूँ न खा कर पछताऊं ''किसी लड़की को ब्याहकर घर लाता है तो कहीं लड़की भी अपनी सामाजिक स्थिति को मजबूत करने के लिए,क्योंकि उसे समाज में ''बाप के ऊपर पहाड़ '' जैसी उक्तियों से नवाज़ा जाता है ,से मुक्ति पाने के लिए तो कहीं [कहने वालों और भुक्तभोगियों के अनुसार ]अपने कई स्वार्थ संजोये बहू बन आती है किन्तु जो सच्चाई हो कही वही जाती है और सच्चाई यही है कि आदमी औरत को अपनी गुलाम से बढ़कर कुछ नहीं समझता और अगर ऐसा नहीं है -
* तो क्यूँ एक जगह विवाह के समय लड़के द्वारा यह मांग कि लड़की अपने बड़े बड़े बालों को कटवाकर छोटा कर ले और एक जगह छोटे बालों वाली लड़की से अपने बाल बढाकर शादी करने की शर्त रखी जाती है ?
*क्यूँ शादी के बाद लड़की के रहन सहन ,पहनावे का बदल जाना ,मांग में सिन्दूर ,गले में मंगलसूत्र ,साडी या सूट हो किन्तु सिर ढका होना ,कहीं कहीं पूरे मुंह पर घूंघट पड़ा होना ,पैरों में बिछुए कहने को ये सब विवाहित होने की पहचान हैं ,स्त्री के सुहाग की रक्षा के लिए तो फिर पुरुष के रहन सहन पहनावे में कोई अंतर क्यूँ नहीं ?
*क्यूँ उसपर अपनी सुहागन की रक्षा का कोई दायित्व नहीं ,हाथ पैरों से तो उसकी पत्नी भी उसकी सेवा करती है तब भी उसपर इतने प्रतिबन्ध फिर सिर्फ उसके साथ को ही क्यूँ उसकी पत्नी की मजबूती माना जाता है उसे क्यूँ नहीं पहनने होते ये आभूषण आदि ?
* क्यूँ उसका विवाहित दिखना उसी तरह ज़रूरी नहीं जैसे नारी का विवाहित दिखना ज़रूरी है ?
* क्यूँ वही अगले जन्म में भी अपने पति को पाने के लिए व्रत रखे ,क्यूँ पति पर इस व्रत का दायित्व नहीं इसलिए तो नहीं क्योंकि वह धरती पर बोझ नहीं है उसका ब्याह हो या न हो वह तारणहार की भूमिका में ही है .अगर किसी नारी का पति किसी बीमारी या दुर्घटना वश मर जाये तो उसपर विधवा का ठप्पा लग जाता है और अगर किसी तरह उसका दूसरा विवाह होता है तो एक ''बेचारी ''कहकर ही किया जाता है किन्तु एक पुरुष भले ही दहेज़ के लिए स्वयं ही पत्नी की हत्या कर दे उसके लिए लड़कियों की ''कुंवारी ''लड़कियों की लाइन लगी रहती है ,यहाँ तक कि बुज़ुर्ग से बुजुर्ग पुरुषों को भी ''बेचारी तो बेचारी ''कुंवारी छोटी उम्र की लड़कियां भी सहजता से विवाह के लिए उपलब्ध हो जाती हैं भले ही उनके अपने बच्चे भी उस लड़की से बड़ी उम्र के ही क्यूँ न हों .
आज ''लिव इन रिलेशन ''को न्याय की संरक्षक सर्वोच्च संस्था सुप्रीम कोर्ट ही कानूनी जामा पहनाने में लगी है जबकि इसमें भी औरत की स्थिति रखैल की स्थिति से बेहतर नहीं है क्योंकि पुरुष विवाहित है या नहीं है उसकी कोई पहचान नहीं है और पहचान होने पर भी नारी की जो स्थिति है वह ''दिल के हाथों मजबूर'' की है और ऐसे में चंद्रमोहन चंद्रमोहन रहे या चाँद ,लाभ में रहता है और अनुराधा बाली फ़िज़ा बन लाश बन जाती है .
लड़कियां ही शादी के लिए खरीदी जाती हैं ,लड़कियां ही भ्रूण हत्या का शिकार बनती हैं , न कोई बड़ी उम्र की औरत शादी के लिए लड़का खरीदती है न कोई लड़का भ्रूण हत्या का शिकार होता है ऐसी बहुत सी स्थितियां हैं जहाँ ये स्पष्ट होता है कि नारी को पुरुषों ने केवल अपने गुलाम का दर्जा ही दिया है इससे बढ़कर कुछ नहीं जबकि हमारे शास्त्रों में पुराणों में नारी हीन घर भूतों का डेरा ,कहा गया है ,नारी की स्थिति को ''यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता ''कहकर सम्मानजनक स्थान दिया गया है किन्तु पहले कभी मिलने वाला ये सम्मान आज कहीं नहीं दिखाई देता आज नारी का केवल एक उत्पाद ,एक गुलाम की तरह ही इस्तेमाल नज़र आता है .कहीं नारी का घूंघट से ढका चेहरा तो कहीं छत के कुंडे में लटकता शरीर नज़र आता है .

शालिनी कौशिक

[कौशल) 

सोमवार, 23 जनवरी 2017

हमसफर फिल हकीकत में, फलक पर आज फहराये.


तिरंगा शान है अपनी ,फ़लक पर आज फहराए ,
फतह की ये है निशानी ,फ़लक पर आज फहराए .
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रहे महफूज़ अपना देश ,साये में सदा इसके ,
मुस्तकिल पाए बुलंदी फ़लक पर आज फहराए .
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मिली जो आज़ादी हमको ,शरीक़ उसमे है ये भी,
शाकिर हम सभी इसके फ़लक पर आज फहराए .
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क़सम खाई तले इसके ,भगा देंगे फिरंगी को ,
इरादों को दी मज़बूती फ़लक पर आज फहराए .
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शाहिद ये गुलामी का ,शाहिद ये फ़राखी का ,
हमसफ़र फिल हकीक़त में ,फ़लक पर आज फहराए .
..................................
वज़ूद मुल्क का अपने ,हशमत है ये हम सबका ,
पायतख्त की ये लताफत फ़लक पर आज फहराए .
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दुनिया सिर झुकाती है रसूख देख कर इसका ,
ख्वाहिश ''शालिनी''की ये फ़लक पर आज फहराए .


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शालिनी कौशिक
[कौशल]

शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

हिंदू - मुस्लिम - क्या हम सब कुछ बांटेंगे?


एक सार्वभौमिक सत्य के बारे में आप सभी जानते ही होंगें कि दूध गाय -भैंस ही देती हैं और जहाँ तक हैं इनका कोई धर्म जाति नहीं होती ,इनमे आपस में होती हो तो पता नहीं किन्तु जहाँ तक इंसान की बात है वह इस सम्बन्ध में  कम से कम मेरी जानकारी के अनुसार तो अनभिज्ञ ही कहा जायेगा .

पर आज मेरी यह जानकारी धरी की धरी रह गयी जब मैंने अपने पड़ोस में रहने वाली आंटी जी को पड़ोस की ही दूसरी आंटी जी से बात करते सुना ,वे उनसे दूध के बारे में पूछ रही थी और ये  बता रही थी कि उन्हें अपने यहाँ के एक धार्मिक समारोह के लिए ज्यादा दूध की आवश्यकता है। दूसरी आंटी  के ये कहने पर कि उनका दूधवाला बहुत अच्छा दूध लाता है पर वे फटाक से बोली लाता तो हमारा दूधवाला भी बहुत बढ़िया दूध है पर वह मुसलमान है ना ,......................................................
  आश्चर्य से हक्की-बक्की रह गयी मैं उनकी इस बात पर कि वे दूधवाले के मजहब से दूध-दूध में भेद कर रही हैं जबकि उन्हें दूध चाहिए था जो या तो गाय देती है या भैंस ,आज तक दूध के मामले में गाय-भैंस का अंतर तो सुना था पर हिन्दू-मुसलमान का अंतर कभी नहीं, मन में विचार आया कि फिर क्या वे अपने यहाँ बनने वाले भोजन में भी हिन्दू-मुसलमान  का भेद करेंगी  जिसका ये पता नहीं कि वह हिन्दू के खेत की पैदावार है या मुसलमान के खेत की।

ये सोच-समझ का अंतर केवल इन्ही की सोच-समझ का ही नहीं है अपितु आमतौर पर देखने में मिलता है ;जैसे हिन्दू अपने यहाँ मिस्त्री का काम मुसलमान मिस्त्री से भी करा लेते हैं किन्तु मुसलमान अपने घर पर हिन्दू मिस्त्री नहीं लगाते ,जैसे मुसलमान हिन्दू की थाली में बिना भेद किये खा लेते हैं जबकि हिन्दू मुसलमान की थाली इस्तेमाल करते हिचकिचाते हैं।

हिन्दू मुसलमान का यह वैचारिक मतभेद मिटना मुश्किल है क्योंकि मुसलमान यहाँ अपने को असुरक्षित महसूस करते हैं और हिन्दू इनकी जीवनचर्या को अपने सिद्धांतों के विपरीत और ये सोच का अन्धकार शिक्षा का उजाला भी दूर करने में अक्षम है और यही देश में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करने का हमारे नेताओं को मौका देता है जिसे इन नेताओं के हाथ से छीनना इन सोच-समझ की परिस्थितियों में नामुमकिन नहीं तो कठिन अवश्य है और इस मुश्किल को केवल आपसी समझ-बूझ से ही ख़त्म किया जा सकता है। जब गाय को मुसलमान के पास रहकर अपना पालन-पोषण कराने व् दूध देने में आपत्ति नहीं तो हम गाय-भैंस की वजह से हिन्दू-मुसलमान का अंतर क्यूँ कर रहे हैं और यही समझ-बूझ हमें विकसित करनी होगी जैसे कि आपने भी पढ़ा-सुना होगा ठीक ऐसे ही -

''खुदा किसी का राम किसी का ,

बाँट न इनको पाले में।

तू मस्जिद में पूजा कर ,

मैं सिज़दा करूँ शिवाले में।

जिस धारा में प्यार-मुहब्बत ,

वह धारा ही गंगा है।

और अन्यथा क्या अंतर ,

वह यहाँ गिरी या नाले मे। ''

शालिनी कौशिक

[कौशल ]

शुक्रवार, 13 जनवरी 2017

खादी वाले मोदी -मुंह में राम बगल में छुरी


"खुद जिन्दगी के हुस्न का मैयार बेचकर,
 दुनिया रईस हो गई किरदार बेचकर. "
       अशोक 'साहिल'  के ये शब्द और भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक दूसरे के समपूरक नजर आते हैं. चर्चाओं में बने रहने को मोदी कुछ भी कर सकते हैं, कुछ भी कह सकते हैं यह तो उनके प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनते ही लग गया था प्रधानमंत्री बनते ही उन्होंने उन सभी आशंकाओं पर अपनी मुहर भी लगा दी.
                    करोडों का सूट पहनने वाला शख्स स्वयं को फकीरों की श्रेणी का कहता है, मां का सम्मान कर दिखा ये स्वयं को नारी पूजक दिखाते हैं जो कि तभी पाखंड साबित हो जाता है जब कुआंरे बने फिरने वाले इनके लिए कांग्रेस के दिग्विजय सिंह द्वारा जसोदा बेन का नाम इनकी पत्नी के तौर पर सबके सामने लाया जाता है और जिसे फिर चुनाव लड़ने के लिए इन्हें अपने परिचय में लिखना पडता है, जो जसोदा बेन इतना सा ही होने पर ये सोचने लगती है कि शायद ज़िन्दगी भर की तपस्या का फल अब मिलने वाला है उसे फिर इनके द्वारा ऐसे ही भुला दिया जाता है जैसे दुष्यंत द्वारा शकुन्तला को भुला दिया गया था क्योंकि जसोदा बेन इनके हिसाब से कोई "नामी प्रोडक्ट" तो नहीं थी. ऐसे ही  गांधी व सरदार पटेल के नाम पर गुजरात को मोहने वाले ये आधुनिक कृष्ण कन्हैया खादी का नाम देख और अब गांधी का शारीरिक अस्तित्व न देख उनका नाम इस पर से मिटाने को इस हद तक आगे बढ जाता है कि शर्म  आ जाती है अपने हिन्दुस्तानी होने पर, जो केवल चमक दमक देख  किसी भी ऐरे गैरे को प्रधानमंत्री पद सौंप देते हैं कि जिनकी कार्यशैली सागर खय्यामी की इन पंक्तियों को नेताओं के बारे में एकदम सही साबित कर देती हैं, जो कहती हैं -
"मुझे इज्जत की परवाह है, न मैं जिल्लत से डरता हूँ,
 अगर हो बात दौलत की तो हर हद से गुजरता हूं,
 मैं नेता हूं मुझे इस बात की है तरबियत हासिल
 मैं जिस थाली में खाता हूँ उसी में छेद करता हूं. "
     ये ही कहा जा सकता है कि आज के इन प्रगतिशील , जन-जन पर अपनी मोहिनी का जाल बिछाने वाले प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी के सम्बन्ध में ,जिन्होंने आज अंग्रेजों को भी मात कर दिया. अपने पूर्व के गाँधी व् खादी चिंतन से मोदी यह दिखा रहे थे कि वे गाँधी के पदचिन्हों पर चलते हुए खादी के लिए उन्हीं की तरह काम कर रहे हैं जैसे गाँधी जी ने १९२० के दशक में किया था .महात्मा गाँधी के स्मरण दिवस पर नरेन्द्र मोदी कहते हैं -'' कि खादी के जरिये भारतवासियों को स्वावलंबी बनाने के राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के सपने को उनकी सरकार आगे बढ़ा रही है  .''उन्होंने कहा था कि -''मैंने कल पूज्य बापू की पुण्य तिथि पर देश में खादी एवं ग्रामोद्योग से जुड़े जितने लोगों तक पहुँच सकता हूँ पत्र लिखकर पहुँचने का प्रयास किया .'' खादी में तब उनकी रुचि को देखकर ऐसा लगता था कि वे पूज्य बापू के सपनो को साकार करने के लिए ऐसा कर रहे थे  लेकिन अब पता लग गया है कि वे अंग्रेजों की तरह ऊँगली पकड़कर पहुंचा  पकड़ रहे थे और अंग्रेजों को मात इसलिए क्योंकि अंग्रेज तो फिर भी बाहर के थे वे इसी देश के हैं और तो और वे गाँधी के ही राज्य गुजरात के हैं .मोदी जानते हैं कि खादी का नाम गाँधी से ऐसे जुड़ा है जैसे एक शरीर दो जान , एक के बिना दूसरे का कोई अस्तित्व ही नहीं है और गाँधी का नाम लिए बगैर वे खादी में नहीं घुस सकते इसलिए उनके नाम का सहारा लिया .
           हम सब जानते हैं कि मोदी की रूचि हर उस काम में है जिसमे नाम व् दाम दोनों हों और मोदी जानते हैं कि खादी आज जितना नाम काम रही है उससे जुड़ने पर मेरी भी चांदी ही चांदी है .वैसे भी इस दुनिया में उगते हुए सूरज को सलाम करने की परंपरा है और मोदी ने इस बात को बखूबी समझा है उन्होंने चमकती हुई चीज़ों से जुड़कर अपनी चमक बढ़ायी है और घर-घर में अपनी पहचान बनायीं है .योग के बारे में हम सभी जानते हैं और रोजमर्रा की आपाधापी वाली ज़िन्दगी में अपने महिर्षियों द्वारा अपनायी गयी इस विद्या से जुड़कर अपना जीवन संवारना चाहते हैं इस बात को मोदी ने पकड़ा और इसे प्रचारित कर संयुक्त राष्ट्र से २१ जून को योग दिवस का दर्जा दिलवाया ,जबकि योग की जो महत्ता है उसे ज़िन्दगी में उतारने के लिए किसी एक दिवस की आवश्यकता नहीं है .
       मोदी की कार्यप्रणाली देखकर कहा जा सकता है कि हर वह काम जिसमे मोदी का 'दी' जुड़ा हो मोदी उसमे खास दिलचस्पी लेते हैं ,चाहे वह नोटबंदी हो या खादी ,शादी हो या बर्बादी और इसी दिलचस्पी का असर है कि अब हमें अपनी आजादी भी खतरे में नज़र आ रही है क्योंकि' मुंह में राम बगल में छुरी ' किरदार वाले ये नेताजी जनता के दिलो-दिमाग पर जैसे छाते गए हैं वैसे ही इनके दिमाग पर प्रसिद्धि का नशा जिसका पहला परिणाम जनता ने नोटबंदी के रूप में अभी हाल ही में भुगता है और अब उसी नशे का परिणाम खादी कैलेंडर व् डायरी में गाँधी को हटा खुद को बिठाने के रूप में गाँधी की आत्मा व् गाँधी के समर्थक भुगत रहे हैं जो गाँधी के योगदान को कभी नहीं भूल सकते और जो मोदी का दुश्मनी निभाने का ढंग देख ,जो अभी केंद्रीय सूचना आयोग में कार्यरत ,१० सूचना आयुक्तों में सबसे बेहतर रिकॉर्ड वाले श्रीधर आचार्यलु भुगत रहे हैं  जिन्होंने करीब आठ माह पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की डिग्री का ब्यौरा सार्वजानिक करने का आदेश दिया था और जिनको पुरुस्कार ये मिला कि उनकी भूमिका में ही परिवर्तन कर दिया गया ,इसलिए अपने दुःख को सहन न करते हुए भी वे चुप हैं अपना नाम सामने नहीं लाना चाहते किन्तु गाँधी के प्रति ये धोखाधड़ी भी बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं .वे ही क्या गाँधी का खादी के लिए योगदान हम सब ही नहीं भूल सकते .गाँधी इस देश के राष्ट्रपिता हैं और उनसे ये दर्जा  छीनने की कोशिश बहुत बार की जाती रही है जबकि गाँधी ने अगर देखा जाये तो इस देश से क्या लिया स्वयं के लिए ,केवल हमारा प्यार ही तो है जिसपर वे अपनी सारी ज़िन्दगी हम सभी के लिए कुर्बान कर गए .
खादी पर गांधी जी के दृष्टिकोण में निहित और सूत के एक-एक धागे के साथ जुड़ी स्वाधीनता, संवेदना, आत्म सम्मान की भावना को समझना आज भी समझदारी की बात है। वह आज भी प्रासंगिक है। उन्होंने चरखे के चक्र में कल की गति के साथ ताल मेल करने और उससे होड़ लेने की भी अनोखी शक्ति को गहराई से देख लिया था। खादी के जन्म की कहानी भी कम  रोचक नहीं है।
      अपनी आत्म कथा में बापू लिखते हैं कि मुझे याद नहीं पड़ता कि सन् 1908 तक मैने चरखा या करधा कहीं देखा हो । फिर भी मैने ‘हिन्द स्वराज’ मे यह माना था कि चरखे के जरिये हिन्दुस्तान की कंगालियत मिट सकती है । और यह तो सबके समझ सकने जैसी बात है कि जिस रास्ते भुखमरी मिटेगी उसी रास्ते स्वराज्य मिलेगा । सन् 1915 मे मै दक्षिण अफ्रीका से हिन्दुस्तान वापस आया , तब भी मैने चरखे के दर्शन नही किये थे । आश्रम के खुलते ही उसमें करधा शुरू किया था । करधा शुरू किया था । करधा शुरू करने मे भी मुझे बड़ी मुश्किल का सामना करना पडा । हम सब अनजान थे, अतएव करधे के मिल जाने भर से करधा चल नही सकता था । आश्रम मे हम सब कलम चलाने वाले या व्यापार करना जानने वाले लोग इकट्ठा हुए थे , हममे कोई कारीगर नही था । इसलिए करधा प्राप्त करने के बाद बुनना सिखानेवाले की आवश्यकता पड़ी । कोठियावाड़ और पालनपूर से करधा मिला और एक सिखाने वाला आया । उसने अपना पूरा हुनर नही बताया । परन्तु मगनलाल गाँधी शुरू किये हुए काम को जल्दी छोडनेवाले न थे । उनके हाथ मे कारीगरी तो थी ही । इसलिए उन्होने बुनने की कला पूरी तरह समझ ली और फिर आश्रम मे एक के बाद एक नये-नये बुनने वाले तैयार हुए ।
      आगे गांधी जी लिखते हैं कि हमे तो अब अपने कपड़े तैयार करके पहनने थे । इसलिए आश्रमवासियो ने मिल के कपड़े पहनना बन्द किया और यह निश्यच किया कि वे हाथ-करधे पर देशी मिल के सूत का बुना हुआ कपड़ा पहनेगे । ऐसा करने से हमे बहुत कुछ सीखने को मिला ।
      हिन्दुस्तान के बुनकरों के जीवन की, उनकी आमदनी की, सूत प्राप्त करने मे होने वाली उनकी कठिनाई की, इसमे वे किस प्रकार ठगे जाते थे और आखिर किस प्रकार दिन-दिन कर्जदार होते जाते थे, इस सबकी जानकारी हमे मिली । हम स्वयं अपना सब कपड़ा तुरन्त बुन सके, ऐसी स्थिति तो थी ही नही। कारण से बाहर के बुनकरों से हमे अपनी आवश्यकता का कपड़ा बुनवा लेना पडता था। देशी मिल के सूत का हाथ से बुना कपड़ा झट मिलता नही था । बुनकर सारा अच्छा कपड़ा विलायती सूत का ही बुनते थे , क्योकि हमारी मिलें सूत कातती नहीं थी । आज भी वे महीन सूत अपेक्षाकृत कम ही कातती है , बहुत महीन तो कात ही नही सकती । बडे प्रयत्न के बाद कुछ बुनकर हाथ लगे , जिन्होने देशी सूत का कपडा बुन देने की मेहरबानी की ।
     इन बुनकरों को आश्रम की तरफ से यह गारंटी देनी पड़ी थी कि देशी सूत का बुना हुआ कपड़ा खरीद लिया जायेगा । इस प्रकार विशेष रूप से तैयार कराया हुआ कपड़ा बुनवाकर हमने पहना और मित्रो मे उसका प्रचार किया । यों हम कातने वाली मिलों के अवैतनिक एजेंट बने । मिलो के सम्पर्क मे आने पर उनकी व्यवस्था की और उनकी लाचारी की जानकारी हमे मिली । हमने देखा कि मीलों का ध्येय खुद कातकर खुद ही बुनना था । वे हाथ-करधे की सहायता स्वेच्छा से नही , बल्कि अनिच्छा से करती था । यह सब देखकर हम हाथ से कातने के लिए अधीर हो उठे। हमने देखा कि जब तक हाथ से कातेगे नही, तब तक हमारी पराधीनता बनी रहेगी । मीलों के एजेंट बनकर देश सेवा करते है , ऐसा हमे प्रतीत नहीं हुआ ।
                           लेकिन गांधी जी के अनुसार न तो कही चरखा मिलता था और न कही चरखे का चलाने वाला मिलता था । कुकड़ियाँ आदि भरने के चरखे तो हमारे पास थे, पर उन पर काता जा सकता है इसका तो हमे ख्याल ही नही था । एक बार कालीदास वकील एक वकील एक बहन को खोजकर लाये । उन्होने कहा कि यह बहन सूत कातकर दिखायेगी । उसके पास एक आश्रमवासी को भेजा , जो इस विषय मे कुछ बता सकता था, मै पूछताछ किया करता था । पर कातने का इजारा तो स्त्री का ही था । अतएव ओने-कोने मे पड़ा हुई कातना जानने वाली स्त्री तो किसी स्त्री को ही मिल सकती थी।
   बापू स्पष्ट करते हैं कि सन् 1917 मे मेरे गुजराती मित्र मुझे भेड़चाल शिक्षा परिषद मे घसीट ले गये थे । वहाँ महा साहसी विधवा बहन गंगाबाई मुझे मिली । वे पढी-लिखी अधिक नही थी , पर उनमे हिम्मत और समझदारी साधारणतया जितनी शिक्षित बहनो मे होती है उससे अधिक थी । उन्होंने अपने जीवन मे अस्पृश्यता की जड़ काट डाली थी, वे बेधड़क अंत्यजों मे मिलती थीं और उनकी सेवा करती थी । उनके पास पैसा था , पर उनकी अपनी आवश्यकताएँ बहुत कम थीं । उनका शरीर कसा हुआ था । और चाहे जहाँ अकेले जाने में उन्हें जरा भी झिझक नहीं होती थी । वे घोड़े की सवारी के लिए भी तैयार रहती थी । इन बहन का विशेष परिचय गोधरा की परिषद मे प्राप्त हुआ । अपना दुख मैंने उनके सामने रखा और दमयंती जिस प्रकार नल की खोज मे भटकी थी, उसी प्रकार चरखे की खोज मे भटकने की प्रतिज्ञा करके उन्होंने मेरा बोझ हलका कर दिया ।
         बापू का ये जीवन दर्शन हम सभी के लिए न केवल संग्रहणीय है बल्कि जीवन में कुछ करने की प्रेरणा देने वाला है और इस बात को आज तक जितने भी प्रधानमंत्री हुए सभी ने समझा
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       इसलिए किसी ने भी ऐसा कोई काम नहीं किया जिससे देश के लिए अपना जीवन कुर्बान करने वाले और विशेषकर निस्वार्थ जीवन लगाने वाली इन पवित्र आत्मा की कोई उपेक्षा प्रदर्शित हो और मोदी वही सब कर रहे हैं .ऐसा नहीं है कि ये केवल  दूसरों के साथ ऐसे हैं बल्कि ये वे व्यक्तित्व  हैं जो अपनों  को भी काटने में पीछे नहीं हैं तभी तो पार्टी में मुरली मनोहर जैसे शिक्षाविद के होते हुए स्मृति ईरानी जैसी नवोदित और कम पढ़ी लिखी को मानव-संसाधन जैसे विभाग का मुखिया बना देते हैं इसीलिए कहना पड़ रहा है कि  मोदी जी अनोखे प्रधानमंत्री हैं और ये उस जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं जो अपने पिता के कामों को दरकिनार करते हुए अपनी योग्यता के बाजे बजाती है और जो जोर-शोर से कहती है कि वे ये सब नहीं जानते थे .ये उनके बस का नहीं था .
    राष्ट्रपिता का दर्जा ऐसे ही नहीं मिलता .ये पहली सरकार आयी है जिसे सारे दर्जे खुद के लिए ही लेने हैं भले ही देश के स्वतंत्रता संग्राम में इनका इतिहास शून्य हो .आज गाँधी को खादी के कैलेंडर डायरी से हटा अगर मोदी ये सोचते हैं कि वे देश की जनता के दिलोदिमाग से गाँधी को मिटा देंगे तो ये इनकी भूल है क्योंकि इस तरह वे गाँधी की स्मृति जनता व् नयी पीढ़ियों के दिल व् दिमाग में और ताज़ी कर रहे हैं .जो बच्चे आज केवल विराट कोहली ,धोनी ,शाहरुख़ खान आदि को ही जानते हैं वे भी अब आगे बढ़कर पूछ रहे हैं कि '' गाँधी कौन हैं ''और तो और इन्टरनेट द्वारा उनका देश के लिए योगदान सर्च कर रहे हैं इसलिए ऐसे में गाँधी की आत्मा व् गाँधी समर्थकों का प्यार मोदी से केवल इतना ही कहेगा -
'' तू हर तरह से ज़ालिम मेरा सब्र आजमाले ,
 तेरे हर सितम से मुझको नए हौसले मिले हैं .''

शालिनी कौशिक
      [कौशल ]

गुरुवार, 12 जनवरी 2017

अब पछताये क्या होत - कहानी




विनय के घर आज हाहाकार मचा था .विनय के पिता का कल रात ही लम्बी बीमारी के बाद निधन हो गया .विनय के पिता चलने फिरने में कठिनाई अनुभव करते थे .सब जानते थे कि वे बेचारे किसी तरह जिंदगी के दिन काट रहे थे और सभी अन्दर ही अन्दर मौत की असली वजह भी जानते थे किन्तु अपने मन को समझाने के लिए सभी बीमारी को ही मौत का कारण मानकर खुद को भुलावा देने की कोशिश में थे .विनय की माँ के आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे .बच्चे और पत्नी इधर उधर के कामों में व्यस्त थे ....नहीं थी तो बस अवंतिका......विनय की बेटी....कहाँ है अवंतिका ...छोटी सी सबकीआँखों का तारा आज कहाँ है ,दादा जी के आगे पीछे डोल डोल कर कभी टॉफी ,कभी आइसक्रीम के लिए उन्हें मनाने वाली अवंतिका .....सोचते सोचते विनय अतीत में पहुँच गया.

मम्मी पापा का इकलौता बेटा होने का खूब सुख उठाया विनय ने ,जो भी इच्छा होती तत्काल पूरी की जाती ,अब कॉलिज जाने लगा था .मित्र मण्डली में लड़कियों की संख्या लडकों से ज्यादा थी .दिलफेंक ,आशिक ,आवारा ,दीवाना न जाने ऐसी कितनी ही उपाधियाँ विनय को मिलती रहती पर मम्मी ,वो तो शायद बेटे के प्यार में अंधी थी ,कहती -''यही तो उम्र है  अब नहीं करेगा तो क्या बुढ़ापे में करेगा .''और पापा शायद पैसा कमाने में ही इतने व्यस्त थे कि बेटे की कारगुज़ारी पता ही नहीं चलती और यदि चल भी जाती तो जैसे सावन के अंधे को हरा ही हरा दिखता है ऐसे ही पैसे के आगे उन्हें कुछ नहीं दिखता .

ऐसे ही गुज़रती जा रही थी विनय की जिंदगी .एक दिन वह  माँ के साथ बाज़ार गया .....मम्मी..मम्मी ....मम्मी विनय फुसफुसाया ...हाँ ... मम्मी बोली तब विनय ने माँ का हाथ पकड़कर कहा -''माँ !मेरी उस लड़की से दोस्ती करा दो ,देखो कितनी सुन्दर ,स्मार्ट है .हाँ ...सो तो है ..मम्मी ने कहा ...पर .बेटा ...मैं नहीं जानती उसे ...मम्मी प्लीज़ ...अच्छा ठीक है .....कोशिश करती हूँ ,तुम यहीं रुको मैं आती हूँ .मम्मी उस लड़की के पास पहुंची ,''बेटी !हाँ हाँ ....मैं तुम्ही से कह रही हूँ .जी -वह युवती बोली ...क्या अपनी गाड़ी में तुम मुझे मेरे घर तक छोड़ दोगी...,पर ...आंटी मैं आपको नहीं जानती हूँ न आपके घर को फिर भला मैं आपको आपके घर कैसे छोड़ सकती हूँ  .... युवती ने हिचकिचाते हुए कहा ..बेटी मेरी तबीयत ख़राब हो रही है ,मेरा बेटा साथ है पर वह बाईक पर है और मुझे कुछ चक्कर आ रहे हैं .....यह कहते हुए मम्मी ने थोड़े से चक्कर आने का नाटक किया ....लड़की कुछ घबरा गयी और उन्हें गाड़ी में बिठा लिया ....अच्छा आंटी अब अपना पता बताओ ,मैं घर पहुंचा दूँगी ....मम्मी ने धीरे धीरे घर का पता बताया और आराम से गाड़ी में बैठ गयी .

''लो आंटी ''ये ही है आपका घर ,युवती बोली ..हाँ बेटी ...यही  है ...''आओ आओ अन्दर तो आओ ''गाड़ी से उतारते हुए मम्मी ने कहा ,नहीं आंटी जल्दी है .... ....फिर कभी ...ये कह युवती ने जाना चाहा  तो मम्मी बोली....नहीं बेटा ऐसा नहीं हो सकता ..... तुम मेरे घर तक आओ और बिना चाय पिए चली जाओ ...मम्मी की जबरदस्ती के आगे युवती की एक नहीं चली और उसे घर में आना ही पड़ा .थोड़ी ही देर में विनय भी आ गया .विनय बेटा....तुम इनके साथ यहाँ बैठो ,मैं चाय लेके आती हूँ ...बीमार मम्मी एकदम ठीक होती हुई रसोईघर में चली गयी और थोड़ी ही देर में ड्राइंगरूम से हंसने खिलखिलाने की आवाज़ आने लगी .

फिर तो ये रोज़ का सिलसिला शुरू हो गया .एक दिन विनय एक लड़की के साथ ड्राइंगरूम में उसकी गोद में सिर रखकर लेटा हुआ था कि पापा आ गए .पापा !आप ....कहकर हडबड़ाता  हुआ विनय उठा ....हाँ मैं ये कहकर गुस्सा दबाये पापा बाहर चले गए ....पर विनय घबरा गया और लड़की को फिर मिलने की बात कह टाल दिया .घबराया विनय मम्मी के पास पहुंचा ,''मम्मी मम्मी !....क्या है इतना क्यूं घबरा रहा है ?मम्मी पापा आये थे ....पापा आये थे ....कहाँ हैं पापा ..इधर उधर देख मम्मी ने विनय से पूछा और साथ ही कहा तू कहीं पागल तो नहीं हो गया ....नहीं मम्मी ...पापा आये थे और हॉल में मुझे सिमरन की गोद में सिर रखे देखा तो गुस्से में वापस लौट गए .तो तू क्यूं घबरा रहा है ..तेरे पापा को तो मैं देख लूंगी ...तू डर मत ....और हुआ भी यही... रात को पापा के आने पर मम्मी ने उन्हें ऐसी बातें सुने कि पापा की बोलती बंद कर दी ..''वो बड़े घर का लड़का है ,जवान है ,फिर दोस्ती क्या बुरी चीज़ है ...अब आप तो बुड्ढे हो गए हो क्या समझोगे उसकी भावनाओं को और ज्यादा ही है तो उसकी शादी कर दो सब ठीक हो जायेगा ,विनय के पापा को यह बात जँच गयी .

आज विनय की शादी है .मम्मी पापा की ख़ुशी का ठिकाना नहीं और विनय उसे तो फोन सुनने से ही फुर्सत नहीं ,''अरे यार !कल को मिल रहा हूँ न ,तुम गुस्सा क्यूं हो रही हो ,अच्छा यार कल को मिलते हैं कहकर फोन को काट दिया ...विनय ..हाँ मम्मी ...बेटा ये फोन अभी बंद कर दे कल से जो चाहे करना ....जी मम्मी ...आई लव यू  ..आई लव यू बेटा ...और इस तरह के स्नेहपूर्ण संबोधन के संचार होते ही फोन बंद कर दिया गया .शादी हो गयी .

धीरे धीरे विनय की बाहर की जिंदगी के साथ घर की जिंदगी चलती रही .कहीं कोई बदलाव नहीं था बदलाव था तो बस इतना ही कि विनय के एक बेटा और एक बेटी हो गयी थी .कारोबार पापा ही सँभालते रहे ..विनय तो बस एक दो घंटे को जाता और उसके बाद रातो रातो अपनी मित्र मण्डली में घूमता फिरता .

''विनय'' पापा ने गुस्से में विनय को पुकारा तो विनय अन्दर तक कांप उठा  ''जी पापा!''थाने से फोन आया है ...''क्यूं ''विनय असमंजस भरे स्वर में बोला ..अभय ....तेरा बेटा ...मेरा पोता ..चांदनी जैसे बदनाम होटल में एक कॉल गर्ल के साथ पकड़ा गया है ...''क्याआआआआआअ ''विनय का मुंह खुला का खुला रह गया ...उसकी इतनी हिम्मत ...मैं उसे जिंदा नहीं छोडूंगा ''विनय का मुहं गुस्से से लाल हुआ जा रहा था ...क्यूं मैंने कौन तुम्हे मार डाला ...पापा ने विनय से प्रश्न किया तो विनय सकते  में आ गयाअब पहले अभय की जमानत करनी है फिर देखते हैं क्या करना है चलो मेरे साथ ...पापा के साथ जाकर विनय अभय को घर तो ले आया लेकिन अभय को माफ़ नहीं कर पाया .

एक दिन सुबह जब विनय ने देखा कि घर के सभी लोग सो रहे हैं तो वो अभय के कमरे में पहुँच गया ..पर ये क्या ...अभय वहां नहीं था ..विनय थोड़ी देर अभय का वहां इंतजार कर बाहर निकलने ही वाला था कि पीछे से पापा आ गए ...अभय अब तुम्हे नहीं मिलेगा ...क्यूं पापा? मैंने उसे उसके मामा के घर भेज दिया है ...अच्छे काबिल लोग हैं कम से कम वहां रहकर अभय काबिल तो बनेगा तुम्हारे जैसा आवारा निठल्ला नहीं ...तभी विनय की मम्मी वहां आ गयी और तेज़ आवाज़ में बोली ,''किसने कहा आपसे कि मेरा विनय आवारा निठल्ला है और किसने हक़ दिया आपको अभय को उसके मामा के घर भेजने का ,मैं कहती हूँ आप होते कौन हैं परिवार की बातों में बोलने वाले ,किया क्या है आपने हम सबके लिए ,पैसा वो तो ज़मीन जायदाद से हमें मिलता ही रहता ,आपने कौन कारोबार में अपना समय देकर हमारी जिंदगी बनायीं है ,विनय मेरा बेटा है और मुझे पता है कि वह कितना काबिल है और जिस मामले का आपसे मतलब नहीं है उसमे आप नहीं बोलें तो अच्छा !कभी मेरे लिए या अपने बेटे के लिए दो मिनट भी मिले हैं आपको ..'' विनय की मम्मी बोले चली जा रही थी और विनय के पापा का दिल बैठता जा रहा था ..कितनी मेहनत और संघर्षों से उन्होंने ज़मीन जायदाद को दुश्मनों से बचाया था ...कैसे दिन रात एक कर कारोबार को ऊँचाइयों पर पहुँचाया था ..विनय की मम्मी को इससे कोई मतलब नहीं था ...पापा बीमार रहने लगे और विनय और उसकी मम्मी की बन आई अब उन्हें दिन या रात की कोई परवाह नहीं थी और उधर विनय की पत्नी दिन रात बढती विनय की आवारागर्दी से तंग हर वक़्त रोती रहती थी .घर में नौकरानी से ज्यादा हैसियत नहीं थी उसकी ,उसकी अपनी इच्छा का तो किसी के लिए कोई मूल्य नहीं था .

उधर अवंतिका ,अपने पापा के नक़्शे कदम पर आगे बढती जा रही थी ,दिनभर लडको के साथ घूमना ,फिरना और रात में मोबाइल पर बाते करना यही दिनचर्या थी उसकी .''दादीईईईईईईईईईईईइ ,मैं कॉलिज जा रही हूँ शाम को थोड़ी देर से आऊंगी....क्यूं ...वो मेरी बर्थडे पार्टी दी है नील व् निकी ने होटल में ...ठीक है कोई बात नहीं ....आराम से मजे करना बर्थडे कोई रोज़ रोज़ थोड़े  ही आती है ...थैंक यू दादी ,''सो नाईस ऑफ़ यू ''कह अवंतिका ने दादी के गालों को चूम लिया और उधर अवंतिका की मम्मी उसे रोकना चाहकर भी रोक नहीं पाई क्योंकि अवंतिका माँ के आगे से ऐसे निकल गयी जैसे वो उसकी माँ न होकर कोई नौकरानी खड़ी हो .

रात गयी सुबह हो गयी अब शाम के चार बजने वाले थे अवंतिका घर नहीं आई ...दादी ने अवंतिका को ..उसके दोस्तों को फोन मिलाया पर किसी ने भी फोन नहीं उठाया ..परेशां होकर दादी ने विनय से कहा ,''विनय ..अवंतिका कल सुबह घर से गयी थी अब तक भी नहीं आई ''और आप मुझे अब बता रही हो -विनय गुस्से से बोला .कल उसका बर्थडे था और वह बता कर गयी थी कि दोस्तों ने होटल में पार्टी दी है ..रात को देर से आऊंगी ....घबराते हुए मम्मी ने कहा ..और आपने उसे जाने दिया ..आपको उसे रोकना चाहिए था ...मैंने तुझे कब रोका जो उसे रोकती ...मम्मी मुझमे और उसमे अंतर............कहते हुए खुद को रोक लिया विनय ने ..आखिर वह भी तो लड़कियों के साथ ही मौज मस्ती करता था और आज जब अपनी बेटी वही करने चली तो अंतर दिख रहा था उसे ....विनय सोचता हुआ घर से निकल गया .

विनय देर रात थका मांदा टूटे क़दमों से घर में घुसा तो मम्मी एकदम से पास में आकर बोली ...कहाँ है अवंतिका ...विनय कहाँ है वो ....मम्मी वो रॉकी के साथ भाग गयी ...क्याआआआआआअ  रॉकी के साथ ,हाँ नील ने मुझे बताया और कहा ये प्लान तो उनका एक महीने से बन रहा था  सुन मम्मी अपने सिर पर हाथ रख कर बैठ गयी ...पापा जो अब तक चुप बैठे थे बोले ,''विनय की मम्मी देख लिया अपने लालन पालन का असर यही होना था ,जो आज़ादी तुम बच्चों के लिए वरदान समझ रही थी उसमे यही होना था .बच्चों की इच्छाएं पूरी करना सही है किन्तु सही गलत में अंतर करना क्या वे कहीं और से सीखेंगे कहते कहते पापा कांपने लगे ....पापा आप शांत हो जाइये मैं अवंतिका को ढूंढ लाऊंगा ....बेटा मैं जीवन भर चुप ही रहा हूँ यदि न रहता तो ये दिन न देखना पड़ता कहते कहते पापा रोने लगे और निढाल होकर गिर पड़े ..

''विनय ''चलो बेटा ...सुन जैसे सोते से जाग गया हो उठा और अपने पापा के अंतिम संस्कार के लिए सिर झुका अर्थी के साथ चल दिया .


शालिनी कौशिक
(कौशल) 

मंगलवार, 10 जनवरी 2017

कमज़र्फ़ के एहसान से अल्लाह बचाये...

"डिग्री, मेहनत और योग्यता, रखी रही बेकार गयी, 
उनकी हर तिकड़म रंग लाई, हमें शराफत मार गई." 
           सत्ताधारी दल के सामने विपक्ष की यह बेबसी जग जाहिर है. विपक्ष सत्ताधारी दल को हमेशा देश के कानून की पेचीदगियां बता-बताकर उसे बार-बार चेताकर इस कोशिश में लगा रहता है कि किसी तरह उसे सत्ता का नाजायज फायदा उठाने से रोक दिया जाये किन्तु एेसा संभव नहीं हो पाता, सत्ता की ताकत से सत्ताधारी दल मदमस्त हाथी की तरह सबको कुचलता चलता है और अपनी हर हार को जीत में तब्दील करने के लिए मौजूदा कानून के और पूर्व स्थापित आदर्शों के उल्लंघन से भी गुरेज नहीं करता. 
          आज देश में पांच राज्यों में चुनावी आहट शुरू हो चुकी है और भारतीय संविधान में भारत को 'राज्यों का संघ' कहा गया है. डी. डी. बसु के अनुसार - "भारत का संविधान एकातमक तथा संघातमक का सम्मिश्रण है." और के. सी. विहयर के अनुसार - "भारत का संविधान संघीय कम और एकातमक अधिक है." व इसकी मुख्य बात यह है कि इसमें इकाईयों को अर्थात राज्यों को संघ से पृथक होने की स्वतंत्रता नहीं है, स्पष्ट है कि राज्य पूरी तरह से केन्द्र का अंग हैं ऐसे में केन्द्र में घट रही किसी भी गतिविधि का राज्य पर प्रभाव पडने से इंकार नहीं किया जा सकता. 
        4जनवरी 2017 को उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा, मणिपुर में चुनावी शंखनाद बज गया और इसका पहला असर यह हुआ कि चुनाव आचार संहिता लागू हो गई फलस्वरूप चुनावी बखान करने वाले होर्डिंग्स उतरने शुरू हो गये. बिना चुनाव आयोग की अनुमति के सरकार नियुक्तियां व तबादले नहीं कर सकेगी. उदघाटन व शिलान्यास तथा वित्तीय स्वीकृतियां जारी नहीं हो सकेंगे. चुनावी दौरे के लिए मंत्रियों को सरकारी वाहनों आदि के इस्तेमाल की भी अनुमति नहीं होगी. इतनी सारी रोक किन्तु जहां आ गई केन्द्रीय बजट द्वारा जनता पर सत्ताधारी दल के प्रभाव पडने की बात, तो हर आचार संहिता धरी की धरी रह गई. पैसा जो मानवीय कमजोरी रहा है, जीवन का आवश्यक पक्ष  है और जिसे लेकर पूरे विश्व में अव्यवस्था कभी भी मच सकती है और अभी पैसे को लेकर ही अव्यवस्था नोटबंदी के रूप में देश में मची और अब भी जारी है, उस पर भी विपक्ष द्वारा शिकायत करने पर भी कोई समुचित कार्यवाही नहीं की जा रही. 
       प्राप्त जानकारी के अनुसार, चुनाव आयोग सरकार को यह सलाह जरूर दे सकता है कि बजट पेश करने के दौरान वह लोकलुभावन घोषणाओं से बचे किन्तु आम बजट की तारीख बदलवाने का अधिकार सिर्फ राष्ट्रपति को है और राष्ट्रपति ने राज्य सभा की बैठक 31 जनवरी को ही बुलाकर स्वयं के "रबर स्टैंप" होने का पुख्ता सबूत दे दिया है. अपने को देश की सबसे काबिल सरकार साबित करने में जुटी भाजपा सरकार सभी आदर्शों को ताक पर रखने में जुटी है. ऐसा नहीं है कि वह पहली सरकार है जिसके सिर पर बजट पेश करने के समय राज्यों में चुनावों की चुनौती सामने खड़ी हुई हैं जबकि यह देश में अब तक स्थापित आदर्शो पर भाग्य की मार कहें या दुर्भाग्य की ( ऐसा ही कहना पडेगा क्योंकि भीतर भ्रष्ट मन धारण कर भी स्वयं को ईमानदार, देशभक्त कहलाने की कवायद में लगी यह भाजपानीत सरकार अपने हर कदम को अनोखा व देश के हित का दिखा रही है चाहे आग लगी हो या बाढ आई हो, सब कुछ देश के लिये जरूरी दिखाया जा रहा है) कहा भी है -
 " चांद में आग हो तो गगन क्या करे, 
   फूल ही उग्र हो तो चमन क्या करे, 
    रोकर ये कहता है मेरा तिरंगा
   कुर्सियां ही भ्रष्ट हों तो वतन क्या करे? " 
      अपनी पूर्व सरकार की नालायकी का फायदा उठाकर  सत्ता में पहुंच गई है और अब जी-जान से उसी रंग में लिपट उन्हीं कारगुजारियों में जुटी है. पूर्व सरकार की नालायकी से प्रेरित ये सरकार उसके आदर्शों से कुछ नहीं ले रही है, जबकि पूर्व में ही कांग्रेस सरकार इस संबंध में आदर्श प्रस्तुत कर चुकी है, जो कि इस सरकार के अनुसार देश को विश्व मंच पर सिरमौर के रूप में खडा होने की योग्यता देने के बाद भी एक गई गुजरी सरकार रही है, राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद के अनुसार - "2012 में जब पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान विपक्ष ने आपत्ति जताई थी तो कांग्रेस ने उनका अनुरोध स्वीकार कर केन्द्रीय बजट की तिथि 28 फरवरी से बदलकर 16 मार्च कर दी थी." 
      लेकिन कहते हैं न गुरु गुड चेला शक्कर, सही है अब ये सरकार शक्कर के रूप में रिकार्ड बनायेगी और सेर को सवा सेर लौटायेगी, ये सरकार पूर्व की गलतियों को दोहराने के मूड में नहीं है और इस सरकार के अनुसार हाथ आई मछली को हाथ से निकल जाने देना गलती ही तो है, जो पूर्व की सरकार कर चुकी है. देश के कानून ने राष्ट्रपति को जो स्थिति दी है उसे "रबर स्टैंप" की स्थिति संविधानविदों द्वारा कहा जाता है, राष्ट्रपति यहां नाममात्र का प्रधान है और असली प्रधानता जहाँ है वहां से नियमों की अनदेखी की जा रही है, कानून चुप है, कानून के सिपहसालार चुप हैं -
 "गलत है कि रोटी हम खा रहे हैं, 
हकीकत में रोटी हमें खा रही है." 
     बडी बडी बातें करने वाले आज केवल अपने बड़े हित साधने पर ही आ गये हैं और उसे देशहित का नाम दे जरूरी दिखा हम पर उपकार के रूप में प्रदर्शित कर रहे हैं जबकि हम तो अब बस हफीज मेरठी के शब्दों में ये ही कह सकते हैं -
 " कैसी भी मुसीबत हो, बडे शौक से आये, 
कमज़र्फ़  के एहसान से अल्लाह बचाये. " 

शालिनी कौशिक
 ( कौशल)

... पता ही नहीं चला.

बारिश की बूंदे  गिरती लगातार  रोक देती हैं  गति जिंदगी की  और बहा ले जाती हैं  अपने साथ  कभी दर्द  तो  कभी खुशी भी  ...