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जनवरी, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

औरत गुलाम है.

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अभी अभी एक नए जोड़े को देखा पति चैन से जा रहा था और पत्नी घूंघट में ,भले ही दिखाई दे या न दे किन्तु उसे अब ऐसे ही चलने का अभ्यास करना होगा आखिर करे भी क्यूँ न अब वह विवाहित जो है जो कि एक सामान्य धारणा के अनुसार यह है कि अब वह धरती पर बोझ नहीं है ऐसा हमारे एक परिचित हैं उनका कहना है कि ''जब तक लड़की का ब्याह न हो जाये वह धरती पर बोझ है .'' मैंने अपने ही एक पूर्व आलेख '' विवाहित स्त्री होना :दासी होने का परिचायक नहीं  '' में विवाह को दासता जैसी कुरीति से अलग बताया था किन्तु यह वह स्थिति है जिसमे विवाह संस्कार को वास्तविक रूप में होना चाहिए किन्तु ऐसा होता कहाँ है ?वास्तविक रूप में यहाँ कोई इस संस्था को रहने ही कहाँ देता है कहीं लड़के के माँ-बाप इस संस्कार का उद्देश्य मात्र लड़की वालों को लूटना -खसोटना और यदि देहाती भाषा में कहूँ तो'' मूंडना '' मान लेते हैं तो कहीं स्वयं लड़की वाले कानून के दम पर लड़के वालों को कानूनी दबाव में लेकर इसके बल पर ''कि दहेज़ में फंसाकर जेल कटवाएंगे ''उन्हें अपने जाल में फंसाते हैं और धन ऐंठकर ही छ

हमसफर फिल हकीकत में, फलक पर आज फहराये.

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तिरंगा शान है अपनी ,फ़लक पर आज फहराए , फतह की ये है निशानी ,फ़लक पर आज फहराए . ............................................... रहे महफूज़ अपना देश ,साये में सदा इसके , मुस्तकिल पाए बुलंदी फ़लक पर आज फहराए . ............................................. मिली जो आज़ादी हमको ,शरीक़ उसमे है ये भी, शाकिर हम सभी इसके फ़लक पर आज फहराए . ............................... क़सम खाई तले इसके ,भगा देंगे फिरंगी को , इरादों को दी मज़बूती फ़लक पर आज फहराए . .................................. शाहिद ये गुलामी का ,शाहिद ये फ़राखी का , हमसफ़र फिल हकीक़त में ,फ़लक पर आज फहराए . .................................. वज़ूद मुल्क का अपने ,हशमत है ये हम सबका , पायतख्त की ये लताफत फ़लक पर आज फहराए . ........................ दुनिया सिर झुकाती है रसूख देख कर इसका , ख्वाहिश ''शालिनी''की ये फ़लक पर आज फहराए . ............................ शालिनी कौशिक [कौशल]

हिंदू - मुस्लिम - क्या हम सब कुछ बांटेंगे?

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एक सार्वभौमिक सत्य के बारे में आप सभी जानते ही होंगें कि दूध गाय -भैंस ही देती हैं और जहाँ तक हैं इनका कोई धर्म जाति नहीं होती ,इनमे आपस में होती हो तो पता नहीं किन्तु जहाँ तक इंसान की बात है वह इस सम्बन्ध में  कम से कम मेरी जानकारी के अनुसार तो अनभिज्ञ ही कहा जायेगा . पर आज मेरी यह जानकारी धरी की धरी रह गयी जब मैंने अपने पड़ोस में रहने वाली आंटी जी को पड़ोस की ही दूसरी आंटी जी से बात करते सुना ,वे उनसे दूध के बारे में पूछ रही थी और ये  बता रही थी कि उन्हें अपने यहाँ के एक धार्मिक समारोह के लिए ज्यादा दूध की आवश्यकता है। दूसरी आंटी  के ये कहने पर कि उनका दूधवाला बहुत अच्छा दूध लाता है पर वे फटाक से बोली लाता तो हमारा दूधवाला भी बहुत बढ़िया दूध है पर वह मुसलमान है ना ,......................................................   आश्चर्य से हक्की-बक्की रह गयी मैं उनकी इस बात पर कि वे दूधवाले के मजहब से दूध-दूध में भेद कर रही हैं जबकि उन्हें दूध चाहिए था जो या तो गाय देती है या भैंस ,आज तक दूध के मामले में गाय-भैंस का अंतर तो सुना था पर हिन्दू-मुसलमान का अंतर कभी नहीं, मन में विचार आया

खादी वाले मोदी -मुंह में राम बगल में छुरी

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"खुद जिन्दगी के हुस्न का मैयार बेचकर,  दुनिया रईस हो गई किरदार बेचकर. "        अशोक 'साहिल'  के ये शब्द और भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक दूसरे के समपूरक नजर आते हैं. चर्चाओं में बने रहने को मोदी कुछ भी कर सकते हैं, कुछ भी कह सकते हैं यह तो उनके प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनते ही लग गया था प्रधानमंत्री बनते ही उन्होंने उन सभी आशंकाओं पर अपनी मुहर भी लगा दी.                     करोडों का सूट पहनने वाला शख्स स्वयं को फकीरों की श्रेणी का कहता है, मां का सम्मान कर दिखा ये स्वयं को नारी पूजक दिखाते हैं जो कि तभी पाखंड साबित हो जाता है जब कुआंरे बने फिरने वाले इनके लिए कांग्रेस के दिग्विजय सिंह द्वारा जसोदा बेन का नाम इनकी पत्नी के तौर पर सबके सामने लाया जाता है और जिसे फिर चुनाव लड़ने के लिए इन्हें अपने परिचय में लिखना पडता है, जो जसोदा बेन इतना सा ही होने पर ये सोचने लगती है कि शायद ज़िन्दगी भर की तपस्या का फल अब मिलने वाला है उसे फिर इनके द्वारा ऐसे ही भुला दिया जाता है जैसे दुष्यंत द्वारा शकुन्तला को भुला दिया गया था क्योंकि जसोदा बेन इनके हिसा

अब पछताये क्या होत - कहानी

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विनय के घर आज हाहाकार मचा था .विनय के पिता का कल रात ही लम्बी बीमारी के बाद निधन हो गया .विनय के पिता चलने फिरने में कठिनाई अनुभव करते थे .सब जानते थे कि वे बेचारे किसी तरह जिंदगी के दिन काट रहे थे और सभी अन्दर ही अन्दर मौत की असली वजह भी जानते थे किन्तु अपने मन को समझाने के लिए सभी बीमारी को ही मौत का कारण मानकर खुद को भुलावा देने की कोशिश में थे .विनय की माँ के आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे .बच्चे और पत्नी इधर उधर के कामों में व्यस्त थे ....नहीं थी तो बस अवंतिका......विनय की बेटी....कहाँ है अवंतिका ...छोटी सी सबकीआँखों का तारा आज कहाँ है ,दादा जी के आगे पीछे डोल डोल कर कभी टॉफी ,कभी आइसक्रीम के लिए उन्हें मनाने वाली अवंतिका .....सोचते सोचते विनय अतीत में पहुँच गया. मम्मी पापा का इकलौता बेटा होने का खूब सुख उठाया विनय ने ,जो भी इच्छा होती तत्काल पूरी की जाती ,अब कॉलिज जाने लगा था .मित्र मण्डली में लड़कियों की संख्या लडकों से ज्यादा थी .दिलफेंक ,आशिक ,आवारा ,दीवाना न जाने ऐसी कितनी ही उपाधियाँ विनय को मिलती रहती पर मम्मी ,वो तो शायद बेटे के प्यार में अंधी थी ,कहती -'&

कमज़र्फ़ के एहसान से अल्लाह बचाये...

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"डिग्री, मेहनत और योग्यता, रखी रही बेकार गयी,  उनकी हर तिकड़म रंग लाई, हमें शराफत मार गई."             सत्ताधारी दल के सामने विपक्ष की यह बेबसी जग जाहिर है. विपक्ष सत्ताधारी दल को हमेशा देश के कानून की पेचीदगियां बता-बताकर उसे बार-बार चेताकर इस कोशिश में लगा रहता है कि किसी तरह उसे सत्ता का नाजायज फायदा उठाने से रोक दिया जाये किन्तु एेसा संभव नहीं हो पाता, सत्ता की ताकत से सत्ताधारी दल मदमस्त हाथी की तरह सबको कुचलता चलता है और अपनी हर हार को जीत में तब्दील करने के लिए मौजूदा कानून के और पूर्व स्थापित आदर्शों के उल्लंघन से भी गुरेज नहीं करता.            आज देश में पांच राज्यों में चुनावी आहट शुरू हो चुकी है और भारतीय संविधान में भारत को 'राज्यों का संघ' कहा गया है. डी. डी. बसु के अनुसार - "भारत का संविधान एकातमक तथा संघातमक का सम्मिश्रण है." और के. सी. विहयर के अनुसार - "भारत का संविधान संघीय कम और एकातमक अधिक है." व इसकी मुख्य बात यह है कि इसमें इकाईयों को अर्थात राज्यों को संघ से पृथक होने की स्वतंत्रता नहीं है, स्पष्ट है कि राज्य पूरी तरह स