सोमवार, 2 जनवरी 2017

कल आप हैं निशाना

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" कहने को हैं बहुत कुछ, गर कहने पर आयें,
फट जायेगा कलेजा, गर दास्ताने हकीकत सुनायें."
सर्दियों की शाम, 7.30 का वक्त, अचानक दो स्कूटी तीन मोटर साइकिल आकर रूकती हैं, दस बारह लड़के दुकान का शटर गिरा रहे एक लड़के को घेर लेते हैं और लड़के के धांय धांय धांय कर तीन गोलियां मार देते हैं और फिर आराम से अपनी अपनी बाईक स्कूटी पर बैठते हैं और तमंचे लहराकर फुर्र हो जाते हैं, सारा बाजार अपलक ये सब देखता है और किसी की हिम्मत नहीं जो आगे जाकर किसी को रोके और पुलिस के हवाले कर दे, पहचान तो दूर की बात है कहना भी बस इतना कि पलक झपकते ही क्या हो गया हमारी तो समझ में ही नहीं आया.
लोगों से ठसाठस भरी बस, बीच में एक सीट पर दो औरतों के साथ बैठी एक लड़की, शायद कालेज जा रही थी, कालेज में शायद पेपर थे इसलिए लगातार पढने में लगी हुई थी, तभी एक जगह सवारी चढाने को बस रूकती है, बस में चार-पांच लड़के चढते हैं और लड़की को छेडना शुरू करते हैं, बस से खींचने की कोशिश करते हैं और अन्त में बस को रूकवा कर लड़की को बस से उतार लेते हैं, लड़की चीखती रहती है, मदद की गुहार लगाती है पर कोई नहीं सुनता, कोई हाथ मदद को नहीं बढता, एक बच्चा थोड़ा परेशान हो कुछ करना चाहता है तो उसकी माँ उसे समझाकर चुपकर बैठा लेती है.
      ये नजारे हम लोग आये दिन अपने आसपास देख ही लेते हैं किन्तु दूसरे के फटे में टांग कौन अड़ाए , सोच चुप रह जाते हैं. सिर्फ़ यही नहीं कहीं न कहीं हम ये सोचकर भी चुप रहते हैं कि ये दूसरों के साथ हो रहा है हमारे साथ तो नहीं, फिर हम क्यूं बोलें? फिर हमारी इनसे बोलचाल ही तो है, हमारा इनसे मेलमिलाप ही तो है, ये हमारा पड़ोसी ही तो है आदि सब सोचकर हम किसी के बुरे में अपना बुरा क्यूं करें? क्योंकि -
''मुस्कुराना ज़रूरी है यूँ तो मगर ,
हर समय मुस्कुराना भी अच्छा नहीं ,
जिससे चाहो मिलो पर जरा सोचकर
दिल सभी से लगाना भी अच्छा नहीं .''
        सभी से .....कहाँ आज का जो समाज है मुख्यतः शहरी व् कस्बाई समाज दिल लगाता भी है तो मतलब देखकर और इसी का ये परिणाम है कि आज एक पर तो कल को दूसरे पर हमले जारी हैं . आज एक की दुकान लुटती है तो कल उसके सामने की दुकान के ताले टूटते हैं ,आज एक के घर में चोर घुसते हैं तो कल को उसके सामने के घर में डकैती पड़ती है .चोर ,लुटेरे ,डकैत  सब जान चुके हैं समाज ये समाज कैसा है ? कुछ भी कर लो कोई कुछ नहीं बोलेगा .
      और गांव ,ग्रामीण आबादी जिसे पहले ये ही सभ्य समाज वाले गंवार ,असभ्य कहते थे और अब भी कहते हैं ,में अगर एक के साथ कुछ होता था तो कल को वह किसी दूसरे के साथ हो इससे पहले ही पूरा गांव उस वारदात के विरोध में उठ खड़ा होता था लेकिन कहते हैं न खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग पलटता है तो अब गांव में भी कहीं कहीं शहरी असर आ रहा है और गांव में भी ऐसे मामलों में विरोध के स्वर नाममात्र को ही दिखाई देते हैं .
         नारी पुरुष के गुणों के सम्बन्ध में हमने एक कहावत सुनी है '' कि यदि नारी के गुण पुरुष में आ जाएँ तो वह देवता हो जाता है और यदि पुरुष के गुण नारी में आ जाएँ तो वह कुलटा हो जाती  है '' और अब ऐसा लगता है कि इसी कहावत का थोड़ा सा हेर-फेर हमें गांव व् शहर के सम्बन्ध में भी करना होगा क्योंकि हम ऐसा देख रहे हैं और हम ये कह सकते हैं '' कि यदि गांव के गुण शहर में आ जाएँ तो वह रहने लायक ,प्रेम करने लायक जगह बन जाये और यदि शहर के गुण गांव में आ जाएँ तो वह मतलबी ,स्वार्थी ,''...और ये इसी का असर है कि कल ही गंगानगर में रिटायर्ड सूबेदार के परिवार को ११ लोग खुलेआम सड़कों पर मारते रहे कोई नहीं आया क्योंकि यही मतलब ,स्वार्थ हावी हो गया .सबने यही सोचा होगा जो हो रहा है इनके साथ हो रहा है हमारे साथ तो नहीं ,हम क्यों कहें ''आ बैल मुझे मार ''.
   हम ये क्यों नहीं समझते कि हम आफत बुलाएँ या न बुलाएं जब यह आफत निकल ही पड़ी है तो हमारे गले भी पड़ने की सम्भावना बनती ही है ,जब कोई कुत्ता कटखना हो जाता है तो भले ही आपने उसे कुछ कहा हो या न कहा हो वो आपको सामने पाकर काटेगा ज़रूर ,ये समाज हमारे आपसी प्रेम ,सद्भावना ,विश्वास से बना है ,बसा है ,अगर हमारे पड़ौसी का घर जलता है तो लपटें हमारे घर को भी झुलसायेगी .
         ये हमारा चमन है और रिश्तों नातों से ऊपर हमारी बस्ती है ,मौहल्ला है ,कॉलोनी है .आप खुद देखते होंगे , महसूस करते होंगे कि हमें जब भी कोई ज़रुरत होती है हमारे अपनों से पहले हमारे पड़ौसी ,हमारे आस-पास रहने वाले हमारे साथ खड़े होते हैं .ऐसे में हमें सोचना  होगा ,विचारना होगा कि यदि हम यूँ ही सिमटे  रहे तो कोई बाहर वाला आकर हम पर राज करेगा ,हमें ख़त्म करेगा ऐसे हम खुद को ही उजाड़ेंगे, हमें ये बात वक्त रहते समझनी होगी और पलायनवादी होने की जगह स्थितियों से दो दो हाथ करने लायक बनना होगा ,स्वयं को एक दूसरे की भावनाओं को समझने लायक बनाना होगा .हमें गोपाल दास ''नीरज'' जी की इन पंक्तियों को अपनाकर अपने इस चमन को खिलाना होगा ,क्योंकि -
'' गीत जब मर जायेंगे ,फिर क्या यहाँ रह जायेगा ,
 एक सिसकता आंसुओं का कारवां रह जायेगा ,
  आग लेकर हाथ में पगले जलाता है किसे
  जब न ये बस्ती रहेगी ,तू कहाँ रह जायेगा .''

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शालिनी कौशिक
  [कौशल ]

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.............तभी कम्बख्त ससुराली ,

थी कातिल में कहाँ हिम्मत  ,मुझे वो क़त्ल कर देता  ,         अगर  मैं  अपने  हाथों  से  ,न  खंजर  उसको  दे  देता  . .....................