शुक्रवार, 13 जनवरी 2017

खादी वाले मोदी -मुंह में राम बगल में छुरी


"खुद जिन्दगी के हुस्न का मैयार बेचकर,
 दुनिया रईस हो गई किरदार बेचकर. "
       अशोक 'साहिल'  के ये शब्द और भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक दूसरे के समपूरक नजर आते हैं. चर्चाओं में बने रहने को मोदी कुछ भी कर सकते हैं, कुछ भी कह सकते हैं यह तो उनके प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनते ही लग गया था प्रधानमंत्री बनते ही उन्होंने उन सभी आशंकाओं पर अपनी मुहर भी लगा दी.
                    करोडों का सूट पहनने वाला शख्स स्वयं को फकीरों की श्रेणी का कहता है, मां का सम्मान कर दिखा ये स्वयं को नारी पूजक दिखाते हैं जो कि तभी पाखंड साबित हो जाता है जब कुआंरे बने फिरने वाले इनके लिए कांग्रेस के दिग्विजय सिंह द्वारा जसोदा बेन का नाम इनकी पत्नी के तौर पर सबके सामने लाया जाता है और जिसे फिर चुनाव लड़ने के लिए इन्हें अपने परिचय में लिखना पडता है, जो जसोदा बेन इतना सा ही होने पर ये सोचने लगती है कि शायद ज़िन्दगी भर की तपस्या का फल अब मिलने वाला है उसे फिर इनके द्वारा ऐसे ही भुला दिया जाता है जैसे दुष्यंत द्वारा शकुन्तला को भुला दिया गया था क्योंकि जसोदा बेन इनके हिसाब से कोई "नामी प्रोडक्ट" तो नहीं थी. ऐसे ही  गांधी व सरदार पटेल के नाम पर गुजरात को मोहने वाले ये आधुनिक कृष्ण कन्हैया खादी का नाम देख और अब गांधी का शारीरिक अस्तित्व न देख उनका नाम इस पर से मिटाने को इस हद तक आगे बढ जाता है कि शर्म  आ जाती है अपने हिन्दुस्तानी होने पर, जो केवल चमक दमक देख  किसी भी ऐरे गैरे को प्रधानमंत्री पद सौंप देते हैं कि जिनकी कार्यशैली सागर खय्यामी की इन पंक्तियों को नेताओं के बारे में एकदम सही साबित कर देती हैं, जो कहती हैं -
"मुझे इज्जत की परवाह है, न मैं जिल्लत से डरता हूँ,
 अगर हो बात दौलत की तो हर हद से गुजरता हूं,
 मैं नेता हूं मुझे इस बात की है तरबियत हासिल
 मैं जिस थाली में खाता हूँ उसी में छेद करता हूं. "
     ये ही कहा जा सकता है कि आज के इन प्रगतिशील , जन-जन पर अपनी मोहिनी का जाल बिछाने वाले प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी के सम्बन्ध में ,जिन्होंने आज अंग्रेजों को भी मात कर दिया. अपने पूर्व के गाँधी व् खादी चिंतन से मोदी यह दिखा रहे थे कि वे गाँधी के पदचिन्हों पर चलते हुए खादी के लिए उन्हीं की तरह काम कर रहे हैं जैसे गाँधी जी ने १९२० के दशक में किया था .महात्मा गाँधी के स्मरण दिवस पर नरेन्द्र मोदी कहते हैं -'' कि खादी के जरिये भारतवासियों को स्वावलंबी बनाने के राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के सपने को उनकी सरकार आगे बढ़ा रही है  .''उन्होंने कहा था कि -''मैंने कल पूज्य बापू की पुण्य तिथि पर देश में खादी एवं ग्रामोद्योग से जुड़े जितने लोगों तक पहुँच सकता हूँ पत्र लिखकर पहुँचने का प्रयास किया .'' खादी में तब उनकी रुचि को देखकर ऐसा लगता था कि वे पूज्य बापू के सपनो को साकार करने के लिए ऐसा कर रहे थे  लेकिन अब पता लग गया है कि वे अंग्रेजों की तरह ऊँगली पकड़कर पहुंचा  पकड़ रहे थे और अंग्रेजों को मात इसलिए क्योंकि अंग्रेज तो फिर भी बाहर के थे वे इसी देश के हैं और तो और वे गाँधी के ही राज्य गुजरात के हैं .मोदी जानते हैं कि खादी का नाम गाँधी से ऐसे जुड़ा है जैसे एक शरीर दो जान , एक के बिना दूसरे का कोई अस्तित्व ही नहीं है और गाँधी का नाम लिए बगैर वे खादी में नहीं घुस सकते इसलिए उनके नाम का सहारा लिया .
           हम सब जानते हैं कि मोदी की रूचि हर उस काम में है जिसमे नाम व् दाम दोनों हों और मोदी जानते हैं कि खादी आज जितना नाम काम रही है उससे जुड़ने पर मेरी भी चांदी ही चांदी है .वैसे भी इस दुनिया में उगते हुए सूरज को सलाम करने की परंपरा है और मोदी ने इस बात को बखूबी समझा है उन्होंने चमकती हुई चीज़ों से जुड़कर अपनी चमक बढ़ायी है और घर-घर में अपनी पहचान बनायीं है .योग के बारे में हम सभी जानते हैं और रोजमर्रा की आपाधापी वाली ज़िन्दगी में अपने महिर्षियों द्वारा अपनायी गयी इस विद्या से जुड़कर अपना जीवन संवारना चाहते हैं इस बात को मोदी ने पकड़ा और इसे प्रचारित कर संयुक्त राष्ट्र से २१ जून को योग दिवस का दर्जा दिलवाया ,जबकि योग की जो महत्ता है उसे ज़िन्दगी में उतारने के लिए किसी एक दिवस की आवश्यकता नहीं है .
       मोदी की कार्यप्रणाली देखकर कहा जा सकता है कि हर वह काम जिसमे मोदी का 'दी' जुड़ा हो मोदी उसमे खास दिलचस्पी लेते हैं ,चाहे वह नोटबंदी हो या खादी ,शादी हो या बर्बादी और इसी दिलचस्पी का असर है कि अब हमें अपनी आजादी भी खतरे में नज़र आ रही है क्योंकि' मुंह में राम बगल में छुरी ' किरदार वाले ये नेताजी जनता के दिलो-दिमाग पर जैसे छाते गए हैं वैसे ही इनके दिमाग पर प्रसिद्धि का नशा जिसका पहला परिणाम जनता ने नोटबंदी के रूप में अभी हाल ही में भुगता है और अब उसी नशे का परिणाम खादी कैलेंडर व् डायरी में गाँधी को हटा खुद को बिठाने के रूप में गाँधी की आत्मा व् गाँधी के समर्थक भुगत रहे हैं जो गाँधी के योगदान को कभी नहीं भूल सकते और जो मोदी का दुश्मनी निभाने का ढंग देख ,जो अभी केंद्रीय सूचना आयोग में कार्यरत ,१० सूचना आयुक्तों में सबसे बेहतर रिकॉर्ड वाले श्रीधर आचार्यलु भुगत रहे हैं  जिन्होंने करीब आठ माह पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की डिग्री का ब्यौरा सार्वजानिक करने का आदेश दिया था और जिनको पुरुस्कार ये मिला कि उनकी भूमिका में ही परिवर्तन कर दिया गया ,इसलिए अपने दुःख को सहन न करते हुए भी वे चुप हैं अपना नाम सामने नहीं लाना चाहते किन्तु गाँधी के प्रति ये धोखाधड़ी भी बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं .वे ही क्या गाँधी का खादी के लिए योगदान हम सब ही नहीं भूल सकते .गाँधी इस देश के राष्ट्रपिता हैं और उनसे ये दर्जा  छीनने की कोशिश बहुत बार की जाती रही है जबकि गाँधी ने अगर देखा जाये तो इस देश से क्या लिया स्वयं के लिए ,केवल हमारा प्यार ही तो है जिसपर वे अपनी सारी ज़िन्दगी हम सभी के लिए कुर्बान कर गए .
खादी पर गांधी जी के दृष्टिकोण में निहित और सूत के एक-एक धागे के साथ जुड़ी स्वाधीनता, संवेदना, आत्म सम्मान की भावना को समझना आज भी समझदारी की बात है। वह आज भी प्रासंगिक है। उन्होंने चरखे के चक्र में कल की गति के साथ ताल मेल करने और उससे होड़ लेने की भी अनोखी शक्ति को गहराई से देख लिया था। खादी के जन्म की कहानी भी कम  रोचक नहीं है।
      अपनी आत्म कथा में बापू लिखते हैं कि मुझे याद नहीं पड़ता कि सन् 1908 तक मैने चरखा या करधा कहीं देखा हो । फिर भी मैने ‘हिन्द स्वराज’ मे यह माना था कि चरखे के जरिये हिन्दुस्तान की कंगालियत मिट सकती है । और यह तो सबके समझ सकने जैसी बात है कि जिस रास्ते भुखमरी मिटेगी उसी रास्ते स्वराज्य मिलेगा । सन् 1915 मे मै दक्षिण अफ्रीका से हिन्दुस्तान वापस आया , तब भी मैने चरखे के दर्शन नही किये थे । आश्रम के खुलते ही उसमें करधा शुरू किया था । करधा शुरू किया था । करधा शुरू करने मे भी मुझे बड़ी मुश्किल का सामना करना पडा । हम सब अनजान थे, अतएव करधे के मिल जाने भर से करधा चल नही सकता था । आश्रम मे हम सब कलम चलाने वाले या व्यापार करना जानने वाले लोग इकट्ठा हुए थे , हममे कोई कारीगर नही था । इसलिए करधा प्राप्त करने के बाद बुनना सिखानेवाले की आवश्यकता पड़ी । कोठियावाड़ और पालनपूर से करधा मिला और एक सिखाने वाला आया । उसने अपना पूरा हुनर नही बताया । परन्तु मगनलाल गाँधी शुरू किये हुए काम को जल्दी छोडनेवाले न थे । उनके हाथ मे कारीगरी तो थी ही । इसलिए उन्होने बुनने की कला पूरी तरह समझ ली और फिर आश्रम मे एक के बाद एक नये-नये बुनने वाले तैयार हुए ।
      आगे गांधी जी लिखते हैं कि हमे तो अब अपने कपड़े तैयार करके पहनने थे । इसलिए आश्रमवासियो ने मिल के कपड़े पहनना बन्द किया और यह निश्यच किया कि वे हाथ-करधे पर देशी मिल के सूत का बुना हुआ कपड़ा पहनेगे । ऐसा करने से हमे बहुत कुछ सीखने को मिला ।
      हिन्दुस्तान के बुनकरों के जीवन की, उनकी आमदनी की, सूत प्राप्त करने मे होने वाली उनकी कठिनाई की, इसमे वे किस प्रकार ठगे जाते थे और आखिर किस प्रकार दिन-दिन कर्जदार होते जाते थे, इस सबकी जानकारी हमे मिली । हम स्वयं अपना सब कपड़ा तुरन्त बुन सके, ऐसी स्थिति तो थी ही नही। कारण से बाहर के बुनकरों से हमे अपनी आवश्यकता का कपड़ा बुनवा लेना पडता था। देशी मिल के सूत का हाथ से बुना कपड़ा झट मिलता नही था । बुनकर सारा अच्छा कपड़ा विलायती सूत का ही बुनते थे , क्योकि हमारी मिलें सूत कातती नहीं थी । आज भी वे महीन सूत अपेक्षाकृत कम ही कातती है , बहुत महीन तो कात ही नही सकती । बडे प्रयत्न के बाद कुछ बुनकर हाथ लगे , जिन्होने देशी सूत का कपडा बुन देने की मेहरबानी की ।
     इन बुनकरों को आश्रम की तरफ से यह गारंटी देनी पड़ी थी कि देशी सूत का बुना हुआ कपड़ा खरीद लिया जायेगा । इस प्रकार विशेष रूप से तैयार कराया हुआ कपड़ा बुनवाकर हमने पहना और मित्रो मे उसका प्रचार किया । यों हम कातने वाली मिलों के अवैतनिक एजेंट बने । मिलो के सम्पर्क मे आने पर उनकी व्यवस्था की और उनकी लाचारी की जानकारी हमे मिली । हमने देखा कि मीलों का ध्येय खुद कातकर खुद ही बुनना था । वे हाथ-करधे की सहायता स्वेच्छा से नही , बल्कि अनिच्छा से करती था । यह सब देखकर हम हाथ से कातने के लिए अधीर हो उठे। हमने देखा कि जब तक हाथ से कातेगे नही, तब तक हमारी पराधीनता बनी रहेगी । मीलों के एजेंट बनकर देश सेवा करते है , ऐसा हमे प्रतीत नहीं हुआ ।
                           लेकिन गांधी जी के अनुसार न तो कही चरखा मिलता था और न कही चरखे का चलाने वाला मिलता था । कुकड़ियाँ आदि भरने के चरखे तो हमारे पास थे, पर उन पर काता जा सकता है इसका तो हमे ख्याल ही नही था । एक बार कालीदास वकील एक वकील एक बहन को खोजकर लाये । उन्होने कहा कि यह बहन सूत कातकर दिखायेगी । उसके पास एक आश्रमवासी को भेजा , जो इस विषय मे कुछ बता सकता था, मै पूछताछ किया करता था । पर कातने का इजारा तो स्त्री का ही था । अतएव ओने-कोने मे पड़ा हुई कातना जानने वाली स्त्री तो किसी स्त्री को ही मिल सकती थी।
   बापू स्पष्ट करते हैं कि सन् 1917 मे मेरे गुजराती मित्र मुझे भेड़चाल शिक्षा परिषद मे घसीट ले गये थे । वहाँ महा साहसी विधवा बहन गंगाबाई मुझे मिली । वे पढी-लिखी अधिक नही थी , पर उनमे हिम्मत और समझदारी साधारणतया जितनी शिक्षित बहनो मे होती है उससे अधिक थी । उन्होंने अपने जीवन मे अस्पृश्यता की जड़ काट डाली थी, वे बेधड़क अंत्यजों मे मिलती थीं और उनकी सेवा करती थी । उनके पास पैसा था , पर उनकी अपनी आवश्यकताएँ बहुत कम थीं । उनका शरीर कसा हुआ था । और चाहे जहाँ अकेले जाने में उन्हें जरा भी झिझक नहीं होती थी । वे घोड़े की सवारी के लिए भी तैयार रहती थी । इन बहन का विशेष परिचय गोधरा की परिषद मे प्राप्त हुआ । अपना दुख मैंने उनके सामने रखा और दमयंती जिस प्रकार नल की खोज मे भटकी थी, उसी प्रकार चरखे की खोज मे भटकने की प्रतिज्ञा करके उन्होंने मेरा बोझ हलका कर दिया ।
         बापू का ये जीवन दर्शन हम सभी के लिए न केवल संग्रहणीय है बल्कि जीवन में कुछ करने की प्रेरणा देने वाला है और इस बात को आज तक जितने भी प्रधानमंत्री हुए सभी ने समझा
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       इसलिए किसी ने भी ऐसा कोई काम नहीं किया जिससे देश के लिए अपना जीवन कुर्बान करने वाले और विशेषकर निस्वार्थ जीवन लगाने वाली इन पवित्र आत्मा की कोई उपेक्षा प्रदर्शित हो और मोदी वही सब कर रहे हैं .ऐसा नहीं है कि ये केवल  दूसरों के साथ ऐसे हैं बल्कि ये वे व्यक्तित्व  हैं जो अपनों  को भी काटने में पीछे नहीं हैं तभी तो पार्टी में मुरली मनोहर जैसे शिक्षाविद के होते हुए स्मृति ईरानी जैसी नवोदित और कम पढ़ी लिखी को मानव-संसाधन जैसे विभाग का मुखिया बना देते हैं इसीलिए कहना पड़ रहा है कि  मोदी जी अनोखे प्रधानमंत्री हैं और ये उस जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं जो अपने पिता के कामों को दरकिनार करते हुए अपनी योग्यता के बाजे बजाती है और जो जोर-शोर से कहती है कि वे ये सब नहीं जानते थे .ये उनके बस का नहीं था .
    राष्ट्रपिता का दर्जा ऐसे ही नहीं मिलता .ये पहली सरकार आयी है जिसे सारे दर्जे खुद के लिए ही लेने हैं भले ही देश के स्वतंत्रता संग्राम में इनका इतिहास शून्य हो .आज गाँधी को खादी के कैलेंडर डायरी से हटा अगर मोदी ये सोचते हैं कि वे देश की जनता के दिलोदिमाग से गाँधी को मिटा देंगे तो ये इनकी भूल है क्योंकि इस तरह वे गाँधी की स्मृति जनता व् नयी पीढ़ियों के दिल व् दिमाग में और ताज़ी कर रहे हैं .जो बच्चे आज केवल विराट कोहली ,धोनी ,शाहरुख़ खान आदि को ही जानते हैं वे भी अब आगे बढ़कर पूछ रहे हैं कि '' गाँधी कौन हैं ''और तो और इन्टरनेट द्वारा उनका देश के लिए योगदान सर्च कर रहे हैं इसलिए ऐसे में गाँधी की आत्मा व् गाँधी समर्थकों का प्यार मोदी से केवल इतना ही कहेगा -
'' तू हर तरह से ज़ालिम मेरा सब्र आजमाले ,
 तेरे हर सितम से मुझको नए हौसले मिले हैं .''

शालिनी कौशिक
      [कौशल ]

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (15-01-2017) को "कुछ तो करें हम भी" (चर्चा अंक-2580) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
मकर संक्रान्ति की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

बेटी की...... मां ?

बेटी का जन्म पर चाहे आज से सदियों पुरानी बात हो या अभी हाल-फ़िलहाल की ,कोई ही चेहरा होता होगा जो ख़ुशी में सराबोर नज़र आता होगा ,लगभग...