सोमवार, 31 दिसंबर 2012

शुभकामना देती ''शालिनी''मंगलकारी हो जन जन को .-2013



अमरावती सी अर्णवनेमी पुलकित करती है मन मन को ,
अरुणाभ रवि उदित हुए हैं खड़े सभी हैं हम वंदन को .


अलबेली ये शीत लहर है संग तुहिन को लेकर  आये  ,
घिर घिर कर अर्नोद छा रहे कंपित करने सबके तन को .


मिलजुल कर जब किया अलाव  गर्मी आई अर्दली बन ,
अलका बनकर ये शीतलता  छेड़े जाकर कोमल तृण को .


आकंपित हुआ है जीवन फिर भी आतुर उत्सव को ,
यही कामना हों प्रफुल्लित आओ मनाएं हर क्षण को .


पायें उन्नति हर पग चलकर खुशियाँ मिलें झोली भरकर ,
शुभकामना देती ''शालिनी''मंगलकारी हो जन जन को .
                     शालिनी कौशिक
                         [कौशल]


शब्दार्थ :अमरावती -स्वर्ग ,इन्द्रनगरी ,अरुणिमा -लालिमा ,अरुणोदय-उषाकाल ,अर्दली -चपरासी ,अर्नोद -बादल ,तुहिन -हिम ,बर्फ ,अर्नवनेमी -पृथ्वी 

रविवार, 30 दिसंबर 2012

सरकार का विरोध :सही तथ्यों पर हो

Protests against Delhi gang rape: Pics (© Reuters):
दिल्ली गैंगरेप केस न केवल सरकारी मशीनरी के दुरूपयोग का घ्रणित उदाहरण है बल्कि सरकार के दोष को खुलेरूप में प्रदर्शित करता है .गैंगरेप राजधानी की सड़कों पर हुआ और एक ऐसी बस में किया गया जिसे वहां आवागमन का अधिकार ही नहीं था क्या  कहा जाये इसे ?यदि राजधानी में इस तरह की बस में इस तरह का घिनोना अपराध किया जा सकता है तो देश के अन्य स्थानों की सुरक्षा के सम्बन्ध में तो कुछ कहा ही नहीं जा सकता पिछले काफी समय से अन्ना ,केजरीवाल ,बाबा रामदेव जिस भ्रष्टाचार  के खिलाफ जंग लड़ रहे थे और दिल्लीवासी जिसमे बढ़ चढ़कर उनका साथ दे रहे थे उसकी भेंट एक उदयीमान प्रतिभा को ही चढ़ना पड़ गया .घरेलू हिंसा के मामले में सरकार की सीधी  जिम्मेदारी नहीं बनती है किन्तु यहाँ सरकार दोषी है पूरी तरह से दोषी है और संभव है कि इसकी भरपाई सरकार को सत्ता से बाहर  होकर करनी पड़े और ये सही भी है जो सरकार अपने कर्तव्य  के पालन में असफल है उसे सत्ता में बने रहने  का कोई नैतिक हक़ नहीं है क्योंकि सत्ता वह मुकुट है जो काँटों से भरा है जिसे पहनने वाला भी काँटों से पीड़ित होता है और पहनने की इच्छा रख  छीनने की कोशिश करने वाला  भी .और वर्तमान सरकार का जहाँ तक इस घ्रणित दुष्कृत्य के घटित  होने की बात है तो पूरा दोष है किन्तु घटना की सूचना प्राप्त होने के बाद से सरकार व् सरकारी मशीनरी द्वारा जो कार्य प्रणाली अपनाई गयी वह सराहनीय कही जाएगी .
    घटना की सूचना पर मात्र ४ मिनट में पुलिस का पहुंचना ,७२ घंटे में सभी आरोपियों का पकड़ा जाना पुलिस की कार्यप्रणाली पर ऊँगली उठाने की इजाजत  नहीं देता .
     डाक्टरों द्वारा पहले ये कहना कि पीडिता की हालत ऐसी नहीं है कि उसे कहीं बाहर ले जाया जाये फिर एकाएक उसे सिंगापूर ले जाना एकबारगी राजनितिक हस्तक्षेप को दर्शाता है किन्तु इस स्थिति को वह भली भांति समझ सकते हैं जिनका कोई अपना कहीं न जाने की स्थिति में पहले बीमारी झेलता है किन्तु स्थिति काबू से बाहर होने पर परिवारीजनो द्वारा सारी विपरीत स्थितयों का सामना करते हुए उसे सूदूर स्थान पर स्थित अस्पताल में पहुँचाया जाता है ताकि यथासंभव इलाज कराया जा सके .
   आनन् फानन में पीडिता का दाह संस्कार कराया जाना भी विवाद का विषय बना है जबकि सामान्य से सामान्य व्यक्ति भी जनता है कि ऐसा करना जन हितार्थ ही है .मेरी स्वयं की जानकारी में एक पिता पुत्र का क़त्ल होने पर पोस्ट मार्टम  के बाद जब उनका शरीर उनके घर लाया गया तो रात होने के बावजूद बहुत जल्दी ही उनके परिजनों की शोकाकुल स्थिति को देखते हुए उनका दाहसंस्कार कर दिया गया जबकि किसी हिन्दू परिवार में रात्रि में दाह संस्कार की परंपरा नहीं है और ऐसा ही एक अन्य हत्या के मामले में भी किया गया .फिर वर्तमान मामला जहाँ सारे देश में शोक की लहर है ,स्थिति कभी भी बिगड़ सकती है ऐसे में सरकार का यह कदम विवाद का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए .
              मैं सरकार की पक्षधर नहीं हूँ और न ही किसी भी दोषी का मैंने कभी साथ दिया है और न कभी दूँगी किन्तु न ही चाहूंगी कि विरोध मात्र विरोध के बिंदु पर अटक कर रह जाये .विरोध हमेशा सही तथ्यों पर आधारित हो तभी मान्यता प्राप्त कर सकता है
           शालिनी कौशिक
                    [कौशल ]


शनिवार, 29 दिसंबर 2012

भारत सरकार को देश व्यवस्थित करना होगा .

 छोटे से छोटा घर हो या बड़े से बड़ा राष्ट्र समुचित व्यवस्था के बिना अराजकता व् बिखराहट से भरा नज़र आता  है .व्यवस्था  महत्वपूर्ण स्थान रखती है किसी  घर को सफल परिवार बनाने में और किसी देश को विकास की राह पर चलाने में .ये व्यवस्था जिस नियम पर आधारित हो अपने काम सुचारू ढंग से करती है उसे कानून कहते हैं .कानून के बारे में कहा गया है -

''law is nothing but commonsense .''

अर्थात कानून सामान्य समझ से अतिरिक्त और कुछ नहीं है .ये एक सामान्य समझ ही तो है कि घर में माँ-बाप का हुक्म चलता है और माँ से भी ज्यादा पिता का ,माँ स्वयं पिता के हुक्म के आधीन काम करती है .ऐसा भी नहीं है कि इसमें कोई गलत बात है .घर की व्यवस्था बनाये रखने को ये एक सामान्य समझ के अनुपालन में किया जाता है क्योंकि सभी का हुक्म चलना घर की नाव में छेद कर सकता है और उसकी नैय्या डुबो सकता है .ऐसे ही देश के सञ्चालन का अधिकार कहें या दायित्व संविधान को सौंपा गया है .देश में संविधान को सर्वोच्च कानून का दर्ज दिया गया है और इसके संरक्षण का दायित्व सर्वोच्च  न्यायालय को सौंपा गया है .

संविधान के अनुच्छेद १४१ में कहा गया है -
''उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित विधि भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर सभी न्यायालयों पर आबद्ध्कर होगी .''
    और इसका स्पष्ट तात्पर्य यह है कि भारत क्षेत्र स्थित समस्त न्यायालय इसके निर्णयों को मानने के लिए बाध्य हैं परन्तु उच्चतम न्यायालय स्वयं अपने निर्णयों से बाध्य नहीं है और इन्हें उलट सकता है .
   साथ ही ,अनुच्छेद १४४ कहता है -
  ''कि भारत के राज्यक्षेत्र के सभी सिविल और न्यायिक प्राधिकारी उच्चतम न्यायालय की सहायता में कार्य करेंगे .''

डॉ.दिनेश कुमार बनाम मोतीलाल मेडिकल कॉलेज ,इलाहाबाद [१९९०]४ एस.सी.सी.६२७ के प्रकरण में अभिनिर्धारित किया गया है कि उच्चतम न्यायालय के निर्णय को अनदेखा और उसकी अवज्ञा नहीं करनी चाहिए अपितु अत्यन्त सतर्कता  के साथ उसका अनुपालन किया जाना चाहिए .''
यहाँ संविधान के इन अनुच्छेदों का उल्लेख करना  इसलिए आवश्यक हुआ क्योंकि ये मात्र अनुच्छेद ही बनकर रह गए  हैं .उच्चतम न्यायालय के निर्णय मात्र मार्गदर्शक बनकर रह गए हैं अनुसरण में इनका कोई अस्तित्व दृष्टिगोचर नहीं होता .
  एक देश जहाँ पर्याप्त कानून है व्यवस्था कराने वाले लगभग सभी स्तम्भ है वहां कानून व्यवस्था कहीं दिखाई नहीं देती .अभी हाल ही में दिल्ली गैंगरेप में प्रयुक्त बस में काले शीशों के इस्तेमाल की बात सामने आई जबकि उच्चतम न्यायालय अपने हाल के ही एक निर्णय में वाहनों में काले शीशों को प्रतिबंधित  कर चुका  है -

SC orders complete ban on tinted car glasses, sets May 4 as deadline

 

The private chartered bus in which the paramedic student was gangraped on December 16 

 और ये हाल तो वहां के है जहाँ उच्चतम न्यायालय एकमात्र स्थापित  खंडपीठ के रूप में कार्य करता है .देश में अन्य जगहों पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों के हश्र का स्वतः अंदाजा लगाया जा सकता है .गाड़ियों पर काले शीशे ज्यों के त्यों लगे हैं और उन्हें हटाने के सम्बन्ध में कोई कार्यवाही अनुच्छेद १४४ के अनुपालन में नहीं की जा रही है .

  सार्वजानिक स्थलों पर धूम्रपान की २ अक्टूबर २००८ से मनाही है और स्वयं कानून का पालन कराने की जिम्मेदारी जिन्हें सौंपी गयी है वे ही उसका उल्लंघन कर रहे हैं .दहेज़ लेना व् देना दोनों अपराध है और दोनों काम हो रहे हैं .सार्वजानिक स्थलों पर कूड़ा आदि डालने का निषेध है और खुलेआम सार्वजानिक स्थलों को गन्दा किया जाता है और ऐसा करने पर किसी के मन में कोई खौफ नहीं है .बलात्कार के वर्तमान मामले को देखते हुए फाँसी की मांग इस अपराध के अपराधियों के लिए की गयी हालाँकि अब ''निर्भया ''की मृत्यु हो जाने के कारण अपराध बलात्कार के साथ हत्या में भी तब्दील हो गया है ऐसे में वे स्वयं ही फाँसी के करीब पहुँच गए हैं किन्तु पहले भी जो अपराध उन्होंने  किया था उसमे आजीवन कारावास या दस वर्ष के कठोर कारावास का प्रावधान है किन्तु उनके बुलंद हौसले ही बता रहे थे कि उन्हें कानून का कोई खौफ नहीं है .

आखिर ऐसा क्यूं है कि कानून की सुलभता वाले इस देश में कानून का खौफ किसी के दिलो दिमाग पर नहीं है कारण केवल एक है -कानून बनाने वाले व् कानून का पालन करने वाले अपने कर्तव्य से विमुख हो चुके हैं .न्याय बिक रहा है और वकील व् जज दोनों ही बहुत अधिक संख्या में ''दलाल '' की भूमिका में आ चुके हैं .हर जगह सेंध लगा चुका भ्रष्टाचार कानून के क्षेत्र में गहरी पैंठ बना चुका है .पद बिक रहे हैं या फिर अपने चहेतों में रेवड़ियों की तरह से बांटे जा रहे हैं.शरीफ में डर और अपराधियों में जीत के हौसले बुलंद हो रहे हैं .जिस मामले को लेकर दिल्ली दहली हुई है वैसे ही मामले उसी समय में जम्मू-कश्मीर  ,मणिपुर ,उत्तर प्रदेश .पश्चिमी बंगाल लगभग सभी राज्यों में हो रहे हैं और किसी को भी कानून का कोई खौफ नज़र नहीं आ रहा है  .
   ऐसे में यदि स्थिति पर काबू पाना है तो सर्वप्रथम व्यवस्था में सुधार लाना होगा कानून का शासन कायम करना होगा और यह तभी संभव  है जब भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया जाये .योग्यता को आगे बढ़ने के समुचित अवसर दिया जाएँ ,आरक्षण प्रमोशन में ही क्या हर क्षेत्र में समाप्त किया जाये जिसमे योग्यता है वह अपनी योग्यता के दम पर आगे बढे अब देश को स्वतंत्र हुए ६५ वर्ष से ऊपर हो चुके हैं अब किसी को आगे बढ़ने के लिए इस बैसाखी की  ज़रुरत नहीं है .युवा वर्ग देश की नैय्या के खेवनहार हैं और वर्तमान मामले को लेकर युवाओं की जागरूकता ने सरकार को ये दिखा दिया है कि अब अब अन्याय नहीं सहा जायेगा .युवाओं की उग्रता और भटकाव दोनों ही ये बता रहे हैं कि व्यवस्था डगमगा रही है और यदि इस व्यवस्था को सुचारू ढंग से चलाना है तो ये सब कुछ भारत सरकार को करना ही होगा क्योंकि कहा भी है -

''दबी आवाज़ को गर ढंग से उभारा न गया ,
  सूने आँगन को गर ढंग से बुहारा न गया ,
 ए!सियासत के सरपरस्तों जरा गौर से सुन लो ,
  जलजला आने को है गर उनको पुकारा न गया .''
                     शालिनी कौशिक
                       [कौशल ]

 

रविवार, 23 दिसंबर 2012

नारी महज एक शरीर नहीं

 Indian_girl : Indian young womanIndian_girl : Indian young woman with sari vector  Stock Photo
महिला सशक्तिकरण का दौर चल रहा है .महिलाएं सशक्त हो रही हैं .सभी क्षेत्रों में महिलाएं अपना परचम लहरा रही हैं .२०१२ की शुरुआत ज्योतिषियों के आकलन ''शुक्र ग्रह का प्रभुत्व रहेगा ''फलस्वरूप महिलाएं ,जो कि शुक्र ग्रह का प्रतिनिधित्व करती हैं ,प्रभावशाली होंगी .सारे विश्व में दिखाई भी दिया कहीं महिला पहली बार राष्ट्रपति हो रही थी तो कहीं प्रधानमंत्री बन रही थी .अरब जैसे देश से पहली बार महिला एथलीट ओलम्पिक में हिस्सा ले रही थी .सुनीता विलियम्स के रूप में महिला दूसरी बार अन्तरिक्ष में जा रही थी और पता नहीं क्या क्या .चारों ओर महिलाओं की सफ़लता  के गुणगान गाये जा रहे थे  कि एकाएक ढोल बजते बजते थम गए ,,पैर ख़ुशी में नाचते नाचते रुक गए ,आँखें फटी की फटी रह गयी और कान के परदे सुनने में सक्षम होते हुए भी बहरे होने का ही मन कर गया जब वास्तविकता से दो चार होना पड़ा और वास्तविकता यही थी कि महिला होना ,लड़की होना एक अभिशाप है .सही लगी अपने बड़ों की ,समाज की बातें जो लड़की के पैदा होने  पर  की जाती हैं .सही लगी वो हरकत जिसका अंजाम कन्या भ्रूण हत्या होता है .जिस जिंदगी को इस दुष्ट दुनिया में जीने से पहले ही घोट दिया जाये जिस पंछी के पर उड़ने से पहले ही काट दिया जाएँ उसकी तमन्ना   भी कौन करेगा ,वह इस दुनिया में आने की ख्वाहिश ही क्यों करेगा ?
      दिल्ली में फिजियोथेरेपिस्ट मासूम छात्रा के साथ जिस बर्बरता से बलात्कार  की घटना को अंजाम दिया गया उससे शरीर में एक सिहरन सी पैदा हो गयी .ये ऐसा मामला था जो सुर्ख़ियों में आ गया और इसलिए इसके लिए जनता जनार्दन उठ खड़ी हुई ,वही जनता जो एक घंटे तक सड़क पर सहायता को पुकारती  उस मासूम की मदद को आगे न बढ़ सकी ,वही जनता जो रोज ये घटनाएँ अपने आस पास देखती है किन्तु अनदेखा कर आगे बढ़ जाती है .ये जनता के ही हाल हैं जो एक भुगत भोगी कहती है कि ''गली में उसे दो आदमियों ने कुछ गलत कहा और वे उसके जानकर ,उसके गहरे हमदर्द  ऊपर उसकी आवाज को सुनकर भी पहचान कर भी खिड़की बंद कर अन्दर बैठ गए .''ये जनता ही है जो कि एक आदमी जो गरीब तबके का है उसकी बेटी को अमीर तबके के लोगों द्वारा छेड़खानी किये जाने पर पुलिस में रिपोर्ट लिखाने से रोकती है और सुलह करने का दबाव बनाती है .ये जनता ही है जो कि एक ५५ वर्ष की महिला को एक २५ साल के लड़के से जो कि प्रत्यक्ष रूप में एक चोर व् अनाचारी है ,पिटते देखती है न उसकी सहायतार्थ आगे आती है  और न ही  गवाही को तैयार होती है क्योंकि वह महिला अकेली बेसहारा है किसी गलत काम में किसी का साथ नहीं देती .ये जनता आज एक महिला के लिए इंसाफ की मांग कर रही है जबकि महिला को सताने वाली भी जनता ही है और ऐसा नहीं कि जनता में सिर्फ पुरुष ही हैं महिलाएं भी हैं और महिला होकर महिला पर तंज कसने में आगे भी  महिलाएं ही हैं .
    महिलाओं में करुणा और दया होती है सुना भी है और महसूस भी किया है किन्तु ईर्ष्या का जो ज्वालामुखी महिला में नारी में होता है वह भी देखा है ,नहीं बढ़ते  देख सकती  किसी अन्य  महिला को अपने से आगे और इसलिए उसकी राहों में कांटे भी बो सकती है और शरीर में अपने और उसके आग भी लगा सकती है .स्वयं इस पुरुष सत्तात्मक समाज के अत्याचार झेलने के बावजूद उसे कमी नज़र आती है महिला में ही ,कि यदि फलां लड़की के साथ कोई गलत हरकत हुई है तो दोष उसी का होगा और इसलिए आज तक पुरुष वर्चस्व बना हुआ है .क्यों ताकना पड़ता है महिलाओं को सहायता के लिए पुरुष के मुख की ओर और क्यों एक लड़की स्वयं २०-२५ साल की होते हुए भी ४-५ साल के लड़के के साथ कहीं जाकर सुरक्षित महसूस करती है .प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती ,दिल्ली गैंगरेप घटनाक्रम के समय लड़की के साथ लड़का भी था ,उससे बड़ा भी था कहाँ बचा पाया उसे अपने ही वर्ग के पुरुष रुपी दरिंदों से .
   
ऐसे में यदि महिलाओं को स्वयं की स्थिति सुदृढ़ करनी है तो सबसे पहले अपने दिमाग से ये नितांत शरीर पर आधारित इज्ज़त जैसी व्यर्थ की बातें निकालनी  होंगी जिसे शिकार समझ पुरुष अपने शरीर का इस्तेमाल हथियार की तरह करता है और इस तरह सारे में ये धारणा बलवती करता है कि पीड़ित नारी का शरीर दूषित हो गया है जबकि दूषित है वह मनोवृति जो महज शरीर से किसी व्यक्ति का आकलन करती है .नारी महज एक शरीर नहीं है और यह मनोवृति नारी को स्वयं बनानी होगी .गलत काम जो पुरुष करता है उसकी मनोवृति गलत उसका शरीर दूषित ये धारणा ही सबको अपनानी होगी .नारी को नारी का साथ देने को ,उसके साथ हुए अन्याय  अत्याचार  का बदला लेने को एकजुट होना होगा ,प्रत्येक नारी को ,दूसरी नारी को जो आज झेलना पड रहा है उसे अपना भी कल सोच उस स्थिति का दमन करने को सबल बनना पड़ेगा .बलात्कार जैसी घटनाएँ नारी को तोड़ने के लिए या उसके परिजनों पर कलंक लगाने के लिए की जाती हैं इसे मात्र एक अपराध के दायरे में लाना होगा और अपनी इज्ज़त सम्मान के लिए नारी को शरीर का सहारा छोड़ना होगा ..

    कवि रैदास कह गए है -
''मन चंगा तो कठौते में गंगा .''
     तो जिसका मन पवित्र है उसका शरीर दूषित हो ही नही सकता .ये मात्र एक अपराध है और अपराधी को कानून से सजा दिलाने के लिए महिलाओं को स्वयं को मजबूत करना होगा तभी महिला सशक्तिकरण वास्तव में हो सकता है .यदि महिलाएं ऐसे नहीं कर सकती तो वह कभी आन्दोलन करने वाली ,तो कभी मूक दर्शक बन तमाशा देखने वाली जनता की जामत में ही शामिल हो सकती हैं इससे बढ़कर कुछ नहीं .अब महिलाओं को इस स्थिति पर स्वयं ही विचार करना होगा .
           शालिनी कौशिक
            [कौशल ]

शनिवार, 22 दिसंबर 2012

भारतीय भूमि के रत्न चौधरी चरण सिंह



कोई जीना ही जिंदगी समझा ,
और फ़साना बन गया कोई .
अपनी हस्ती मिटाकर ए-अंजुम ,
अपनी हस्ती बना गया कोई .

 सुलक्षणा  'अंजुम' द्वारा कही गयी उपरोक्त पंक्तियाँ अक्षरशः सही प्रतीत होती हैं परम पूजनीय ,किसानों के मसीहा ,दलितों के देवता ,चौधरी चरण सिंह जी पर .२३ दिसंबर १९०२ को  किसान परिवार में जन्मे  चौधरी साहब इस प्रकार आकाश में नक्षत्र की भांति दमकेंगें   ये शायद किसी को पता नहीं था किन्तु ये चौधरी साहब के कर्म व् भाग्य की विशेषता थी कि वे एक साधारण किसान रहने के स्थान पर देश के किसानों की आवाज़ बने .
    आज देश की राजनीति जातियों के घेरे में सिमट कर रह गयी है और भारत जैसा देश जहाँ हिन्दू व् मुस्लिम धर्मों में ही कई जातियां हैं वहां अन्य धर्मों की जातियों का तो हिसाब लगाना ही कठिन है और फिर अगर हम ये सोचें कि हम हिन्दू न होकर पहले ब्राह्मण हैं ,विषय हैं ,जैन हैं ,सैनी हैं ,गूजर हैं ,जाट हैं तो क्या हम प्रगति कर सकते हैं ?इस जातिगत राजनीति और धर्म सम्प्रदायों पर आधारित राजनीति ने चौधरी चरण सिंह के किसान मजदूर तथा गाँव की कमर तोड़ दी है .चौधरी साहब जातिवाद के घोर विरोधी थे .वे इसके विरोध में किसी भी सीमा तक जा सकते थे ,यह उनके सन १९६७ के मुख्यमंत्रित्व काल के समय जारीआदेश से प्रमाणित होता है .उन्होंने शासकीय आदेश पारित किया कि''जो संस्थाएं किसी जाति विशेष के नाम पर चल रही हैं ,उनका शासकीय अनुदान बंद कर दिया जायेगा .''नतीजतन इस आदेश के तत्काल बाद ही कॉलेजों के नाम के आगे से जाति सूचक शब्द हटा दिए गए.
                   आज भारतीय राजनीति जोड़ तोड़ की नीति पर चल रही है वे इसके सख्त विरोधी थे उन्होंने अपनी बात कहने में कभी लाग लपेट से काम नहीं लिया .उनकी बढती लोकप्रियता देख उनके विरोधी बुरी तरह घबरा गए थे और उनके खिलाफ जातिवादी होने ,कभी हरिजन विरोधी होने ,कभी मुस्लिम विरोधी होने आदि का आरोप लगाने लगे थे ,किन्तु चौधरी साहब को न विचलित होना था न हुए .उन्होंने शोषित पीड़ित तबकों तथा किसानों की भलाई के लिए संघर्ष जारी रखा .उनके इसी संघर्ष का प्रतिफल है कि आज लगभग सभी राजनीतिक दल किसानों ,पिछड़ों व् दलितों को न केवल साथ लेकर चलने की बात करते हैं बल्कि उनके साथ होने में गर्व महसूस करते हैं .
               चौधरी साहब ग्राम्य विकास के लिए कुटीर एवं लघु उद्योगों  को अत्यंत महत्वपूर्ण मानते थे और अर्थव्यवस्था  के विकेंद्रीकरण की बात कहते थे .सन १९८२ में लिखे अपने एक लेख में उन्होंने स्पष्ट रूप में लिखा था -
   ''गरीबी से बचकर समृद्धि की ओर बढ़ने का एक मात्र मार्ग गाँव तथा खेतों से होकर गुजरता है .''

       उन्हें गाँव किसानों व् कमजोर वर्गों से अटूट प्रेम था .इसी कारण उन्हें ''दलितों का मसीहा ''भी कहा गया .उनकी सबसे बड़ी चिंता ये थी कि लोगों में व्याप्त गरीबी को किस प्रकार दूर किया जाये .दरअसल डॉ.राम मनोहर लोहिया के बाद चौधरी साहब देश की राजनीति में अकेले  ऐसे नेता थे जिन्होंने पिछड़ी जातियों में राजनीति में हिस्सेदारी का एहसास जगाया .उन्हें सत्ता के नए शक्ति केंद्र के रूप में उभारा .उनके मन में तो इनके लिए केवल एक ही भावना विराजमान थी और वह केवल यूँ थी -
     ''अभी तक सो रहे हैं जो उन्हें आवाज़ तो दे दूँ ,
बिलखते बादलों को मैं कड़कती गाज़ तो दे दूँ .
जनम भर जो गए जोते ,जनम भर जो गए पीसे ,
उन्हें मैं तख़्त तो दे दूँ,उन्हें मैं ताज तो दे दूँ .''

जुलाई १९७९ में प्रधानमंत्री का पद ग्रहण करने के बाद चौधरी साहब ने कहा था -
  ''इस देश के राजनेताओं को यद रखना चाहिए कि ......[उनके लिए]इससे अधिक देशभक्तिपूर्ण उद्देश्य और नहीं हो सकता कि वे यह सुनिश्चित करें कि कोई भी बच्चा भूखे पेट नहीं सोयेगा ,किसी भी परिवार को अपने अगले दिन की रोटी की चिंता नहीं होगी तथा कुपोषण के कारण किसी भी भारतीय के भविष्य और उसकी क्षमताओं के विकास को अवरुद्ध नहीं होने दिया जायेगा .''

      राज्य सभा की भूतपूर्व उपसभापति नजमा हेपतुल्लाह के अनुसार -
''तारिख जब अपना सफ़र शुरू करती है तो किसी ऐसे इन्सान को अपने लिए चुन लेती है जिसमे वक़्त से आँख मिलाने की जुर्रत व् हिम्मत हो .हिंदुस्तान की तारीख़ को ये फख्र हासिल है कि उसने यहाँ ऐसे इंसानों  को जन्म दिया जिन्होंने अपने हौसलों और इरादों से वक़्त की मुश्किल धार को मोड़ दिया .चौधरी चरण सिंह एक ऐसे ही हिम्मती इन्सान थे .उन्होंने खेतों व् खलिहानों से अपनी जिंदगी शुरू की और उसे तमाम हिंदुस्तान की जिंदगी बना दिया .''

      हालाँकि चौधरी साहब के बारे में मेरा जो भी ज्ञान है वह किताबी और सुना सुनाया है ,किन्तु फिर भी एक अद्भुत प्रेरणा है जो मुझे उनके सम्बन्ध में लिखने के लिए प्रेरित करती है .मैं कानून की छात्रा रही हूँ और जब मुझे ये पता लगा कि उत्तर प्रदेश में ज़मींदारी उन्मूलन व् भूमि सूधार के जनक पूजनीय चरण सिंह जी ही थे तो मैं उनसे प्रभावित हुए बगैर नहीं रह सकी .प्राचीन काल में ज़मींदारों द्वारा किये गए अत्याचारों से मजदूर वर्ग को बचाना चौधरी साहब का प्रशंसनीय कार्य था .
  वास्तव में चौधरी साहब आज भी हम लोगों के बीच में ही हैं ,अपने कार्यों द्वारा ,अपनी प्रेरणा द्वारा और जन जन में जगाई चेतना द्वारा .उनकी महक आज भी खेतों की मिटटी में,फसलों में व् भारत के कण कण में समायी है आज २३ दिसंबर २०१२ को चौधरी साहब की ११० वीं जयंती के अवसर पर पदमा शर्मा की ये पंक्तियाँ ही उन्हें समर्पित करने का मन करता है और मन इन पंक्तियों के साथ चौधरी साहब को शत शत नमन करता है-
      ''जन्म तो उन्ही का है जो काल से न हारते ,
       चुनौती मान जन्म को हैं कर्म से संवारते .''
          शालिनी कौशिक
              [कौशल ]

बुधवार, 19 दिसंबर 2012

फाँसी :पूर्ण समाधान नहीं

 Four arrested in Delhi gang-rape case, search on for two more (© PTI)
 दिल्ली ''भारत का दिल ''आज वहशी दरिंदों का ''बिल'' बनती नज़र आ रही है .महिलाओं के लिए यहाँ रहना शायद आरा मशीन में लकड़ी या चारे की तरह रहना हो गया है कि हर हाल में कटना ही कटना है .दिल ही क्या दहला मुट्ठियाँ व् दांत भी भिंच गए हैं रविवार रात का दरिंदगी की घटना पर ,हर ओर से यही आवाजें उठ रही हैं कि दरिंदों को फाँसी की सजा होनी चाहिए क्योंकि अभी तक ''भारतीय दंड सहिंता की धारा ३७६ [२] बलात्संग के लिए कठोर कारावास जिसकी अवधि दस वर्ष से कम न होगी किन्तु जो आजीवन कारावास तक हो सकेगी ,दंड व् जुर्माने का प्रावधान करती है और वर्तमान बिगडती हुई परिस्थितियों में ये सभी को कम नज़र आने लगी है और ऐसे में जहाँ सारा विश्व फाँसी को खत्म करने की ओर बढ़ रहा है वहां भारत में बढ़ता ये मामले भारतीयों को फाँसी के पक्ष में कर रहे हैं .
    दिल्ली में चलती बस में फिजियोथेरेपिस्ट के साथ घटी इस दरिंदगी की घटना ने दोनों सदनों को भी हिला दिया .भाजपा की सुषमा स्वराज ,नजमा हेपतुल्लाह ,शिव सेना के संजय राउत ,आसाम गण परिषद् के वीरेंद्र कुमार वैश्य ,सपा के चौधरी मुन्नवर सलीम ने बलात्कार के दोषियों के लिए मौत की सजा की पैरवी कर डाली किन्तु क्या इन चंद दोषियों को फाँसी की सजा देने से हम बलात्कार जैसे पाप का अंत कर सकेंगें ?शायद नहीं .आज तक बहुत से हत्या के दोषियों को फाँसी दी गयी किन्तु क्या इससे  हत्या का अपराध बंद हुआ ?नहीं हुआ न और ऐसे होगा भी नहीं .गीतकार व् मनोनीत सदस्य जावेद अख्तर ने दोषियों को फाँसी की सजा पर असहमति जताते हुए कहा ''कि सिर्फ गुस्सा दिखाने से काम नहीं चलेगा .प्रशासनिक कदम उठाने के साथ ही सामाजिक स्तर पर भी पहल करनी होगी .''और मनोनीत सदस्य अशोक गांगुली ने कहा ''कि ऐसे मामलों के दोषियों को ऐसी सजा मिले जो कि बाकी के लिए नजीर बन सके .''
        ये दोनों वक्तव्य ही विचारणीय हैं क्योंकि फाँसी से हम एक अपराधी का अंत कर सकते हैं सम्पूर्ण अपराध का नहीं .हमें स्वयं में हिम्मत लानी होगी कि ऐसी घटनाओं को नज़रअंदाज न करते हुए न केवल अपने बचाव के लिए बल्कि दूसरे किसी के भी बचाव के लिए कंधे से कन्धा मिलकर खड़े हों .ये सोचना हमारा काम नहीं है कि जिसके साथ घटना हो रही है शायद उसका भी कोई दोष हो .हमें केवल यह देखना है कि जो घट रहा है यदि वह अपराध है तो हमें उसे रोकना है और यदि इस सबके बावजूद भी कोई घटना दुर्भाग्य से घट जाती है
तो पीड़ित को समाज से बहिष्कृत न करते हुए उसके समाज में पुनर्वास में योगदान देना है और अपराधी को एकजुट हो कानून के समक्ष प्रस्तुत करना है ताकि वह अपने किये हुए अपराध का दंड भुगत सके .सिर्फ कोरी बयान बाजी और आन्दोलन इस समस्या का समाधान नहीं हैं बल्कि हमारी अपराध के सच्चे विरोध में ही इस समस्या का हल छुपा है .चश्मदीद गवाह जो कि सब जगह होते हैं किन्तु लगभग हर जगह अपने कर्तव्य से पीछे हट जाते हैं किसी भी मामले को सही निर्णय  तक पहुंचा सकते हैं और ऐसी घटनाओं में हमें अपनी ऐसी भूमिका के निर्वहन को आगे बढ़ना होगा क्योंकि ये एक सत्य ही है कि ज़रूरी नहीं कि हमेशा कोई दूसरा ही ऐसी घटना का शिकार हो कल इसके शिकार हम या हमारा भी कोई हो सकता है इसलिए सच्चे मन से न्याय की राह पर आगे बढ़ना होगा .
    याद रखिये फाँसी निबटा देती है अपराधी को अपराध को नहीं .वह अपराधी को पश्चाताप का अवसर नहीं देती हालाँकि हर अपराधी पश्चाताप की ओर अग्रसर भी नहीं होता किन्तु एक सम्भावना तो रहती ही है और दूसरी बात जो विभत्स तरीका वे अपराध के लिए अपना ते हैं फाँसी उसका एक अंश भी दंड उन्हें नहीं देती .आजीवन कारावास उन्हें पश्चाताप की ओर भी अग्रसर कर सकता है और यही वह दंड है जो तिल तिल कर अपने अपराध का दंड भी उन्हें भुगतने को विवश करता है .
                     शालिनी कौशिक
                          [कौशल ]

मंगलवार, 18 दिसंबर 2012

आगे बढ़कर हाथ मिला ....

पाकिस्तान के रहमान मालिक आये और भारत में नयी आग लगा गए .पुराना  काम है पाकिस्तानी नेताओं का यहाँ आकर आग लगाने का ऐसे में जो मन में उद्गार भरे थे कुछ यूँ प्रकट  हो गए.
 

आ रहे हैं तेरे दर पर ,आगे बढ़कर हाथ मिला .
दिल मिले भले न हमसे ,आगे बढ़कर हाथ मिला .


 घर तेरे आकर भले हम खून रिश्तों का करें ,
भूल जा तू ये नज़ारे ,आगे बढ़कर हाथ मिला .

जाहिरा तुझसे गले मिल भीतर चलायें हम छुरियां ,
क्या करेगा देखकर ये,आगे बढ़कर हाथ मिला .

हम सदा से ही निभाते दोस्त बनकर दुश्मनी ,
तू मगर है दोस्त अपना,आगे बढ़कर हाथ मिला .

घर तेरा गिरने के दुःख में आंसू  मगरमच्छी बहें,
पर दुखी न दिल हमारा,आगे बढ़कर हाथ मिला .

आग की लपटों से घिरकर तेरे अरमां यूँ  जलें ,
मिल गयी ठंडक हमें ,अब आगे बढ़कर हाथ मिला .


 जिंदगी में तेरी हमने क्या न किया ''शालिनी '',
भूल शहादत को अपनी, आगे बढ़कर हाथ मिला .
                      शालिनी कौशिक
                                 [कौशल ]


रविवार, 9 दिसंबर 2012

भारत पाक एकीकरण -नहीं कभी नहीं

''भारत पाक का एकीकरण कश्मीर समस्या का एकमात्र हल -एम्.काटजू ''
    सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश से ऐसी बयानबाजी की उम्मीद शायद नहीं की जा सकती किन्तु ये शब्द सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू के ही हैं जो उन्होंने दक्षिण एशिया मीडिया आयोग के भारतीय चैप्टर की ओर से आयोजित संगोष्ठी के संबोधन में कहे .
                      भारत पाक का विभाजन ब्रिटिश हुकूमत की ''बाँटो और राज करो ''की नीति के तहत हुआ किन्तु कश्मीर राज्य कोई समस्या था ही नहीं इसे समस्या बनाया पाकिस्तान ने .कश्मीर के महाराजा हरीसिंह की तटस्थ नीति की अवहेलना करते हुए पाकिस्तान का कश्मीर को सैनिकों द्वारा हड़पने की योजना बनाना इसे समस्या के रूप में जन्म देना था . शेख अब्दुल्लाह ने पाकिस्तान से बचाव हेतु भारत से मदद मांगी और इस तरह से भारत को इस मामले में दखल देना पड़ा और तब भारत सरकार ने मदद के नाम पर कश्मीर को भारत में विलय की शर्त रखी जिसे महाराजा हरीसिंह ने मान लिया .ऐसे में एक स्वतंत्र राज्य ने अपनी इच्छा से भारत में विलय स्वीकार कर लिया था और भारतीय सेना भी पाकिस्तानी सेना को धूल चटाने वाली थी तब संयुक्त राष्ट्र में ये मामला भारत सरकार द्वारा उपस्थित करना इसे आज तक समस्या बनाये है क्योंकि अमेरिकी प्रभुत्व के अधीन संचालित संयुक्त राष्ट्र संघ अपनी सही भूमिका का निर्वाह नहीं कर रहा है जिसके चार्टर के अनुच्छेद २[४] में सदस्य राज्यों द्वारा एक दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता तथा स्वतंत्रता में हस्तक्षेप न करने का सिद्धांत है .इसलिए ऐसे में कश्मीर समस्या को सुलझाने हेतु भारत पाक एकीकरण की बात व्यर्थ है क्योंकि पाक ऐसा राष्ट्र है जो अभी तक अविकसित है या यूँ कहें कि बर्बाद है तो गलत नहीं होगा और चूंकि एक बर्बाद व्यक्ति या राष्ट्र दूसरे व्यक्ति या राष्ट्र की बर्बादी ही सोचता है ऐसे में पाकिस्तान से किसी सद्भावना की आशा व्यर्थ है .भारत के लौह पुरुष सरदार पटेल ने कहा भी था ,''कि यदि भारत पाक का विभाजन न हुआ होता तो भारत सरकार में हर मंत्रालय में एक पाकिस्तान होता .''उनका तात्पर्य भी पाकिस्तान की ईर्ष्या- द्वेष की नीति से था और कितना सही था ये हम भी महसूस कर सकते हैं .
     मीडिया में निरंतर प्रकाशित समाचारों के अनुसार भारत में मुसलमान अल्पसंख्यक हैं तथापि इनकी श्रृद्धा पाकिस्तान में ही है जबकि वहां भारतीय मुसलमानों को ''काफ़िर ''कहा जाता है .कुछ लोगों की ''आँखों देखी और कानो सुनी ''कहें तो भारत-पाक  क्रिकेट इसका जीता जागता सबूत है .यदि भारत पाक को हरा देता है तो पाक में रह रहे हिंदूओं की मुसीबत आ जाती है और यदि पाक भारत को हरा देता है तो भारत में रह रहे मुसलमाओं की जश्न की घडी आ जाती है .पूर्व न्यायाधीश एम् .काटजू जिसे ''दिमाग में भूसा ''की संज्ञा देते हैं उसे भारतीय जनता का एक बड़ा वर्ग धर्म के प्रति कट्टरता का नाम देती है .लोगों का मानना है कि अपने धर्म का व्यक्ति भले ही अपराध में संलिप्त हो ,निंदनीय चरित्र का हो तब भी ये अन्य  धर्म के शरीफ ,ईमानदार उम्मीदवार की तुलना में ''इस्लाम खतरे में है ''सुन उसे ही वोट देते हैं .
    ऐसे में जब लोगों के दिल ही न मिलते हों तो देश  का मिलन किसी एक समस्या का समाधान न होकर अनेकों नई समस्याओं को जन्म देने वाला होगा .
                     शालिनी कौशिक
                         [कौशल ]

बुधवार, 5 दिसंबर 2012

शोध -माननीय कुलाधिपति जी पहले अवलोकन तो किया होता .

५ दिसंबर २०१२ दैनिक जागरण का मुख पृष्ठ चौधरी चरण सिंह विश्वविध्यालय के २४ वें दीक्षांत समारोह की अध्यक्षता कर रहे माननीय कुलाधिपति /उत्तर प्रदेश के राज्यपाल बी.एल.जोशी के कथनों को प्रमुखता से प्रकाशित कर रहा था .एक ओर जहाँ माननीय राज्यपाल महोदय ने युवाओं को दहेज़ जैसी कुप्रथाओं के खिलाफ आगे आने का आह्वान कर अपनी संवेदनशीलता का परिचय दिया वहीँ उन्होंने शोध के सम्बन्ध में ''....लेकिन  तमाम विश्वविद्यालयों  में एक भी रिसर्च ऐसी नहीं देखने को मिल रही जिसका हम राष्ट्रीय या वैश्विक स्तर पर गौरव के साथ उल्लेख कर सकें .''कह अपने नितान्त असंवेदनशील होने का परिचय दिया है .
                   न्याय के सम्बन्ध में एक महत्वपूर्ण कथन है ''कि भले ही सौ गुनाहगार छूट जाएँ किन्तु एक निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए .''मैंने शोधार्थियों  के वर्तमान शोध में से केवल एक के शोध का अवलोकन किया है और उसके आधार पर मैं कह सकती हूँ कि माननीय कुलाधिपति महोदय का ये कथन उन शोधार्थियों के ह्रदय को गहरे तक आघात पहुँचाने वाला है जिन्होंने अपनी दिन रात की मेहनत से ये उपाधि प्राप्त की है .और जिस शोध का मैं यहाँ जिक्र कर रही हूँ उसके आधार पर मैं ये दावे के साथ  कह सकती हूँ कि पी एच.डी.को लेकर जो सारे में ये फैला रहता है कि ये धन दौलत के बल पर हासिल कर ली जाती है यह पूर्ण रूप से सत्य नहीं है बल्कि कुछ शोधार्थी हैं जो अपनी स्वयं की मेहनत के बलबूते इस उपाधि को धारण करते हैं न कि दौलत से खरीदकर .डॉ . शिखा कौशिक ने इस वर्ष चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय से ''हिंदी की महिला उपन्यासकारों  के उपन्यासों में स्त्री-विमर्श ''विषय पर पी एच.डी.की उपाधि प्राप्त की है और यदि कुलाधिपति महोदय इस शोध का अवलोकन करते तो शायद उनके मुखारविंद से ये कथन नहीं सुनाई देते .
           ६ अध्यायों में विस्तार से ,हिंदी उपन्यास में चित्रित परंपरागत नारी जीवन ,नारी जीवन की त्रासदी और विड्म्बनाएँ   ,सुधारवादी आन्दोलन और नारी उत्थान ,समाज सुधार संस्थाओं का योगदान ,महिला उपन्यासकारों के उपन्यासों में चित्रित नारी की आर्थिक स्वाधीनता तथा घर बाहर की समस्या ,महिला उपन्यासकारों के उपन्यासों में चित्रित परिवार-संसद का विघटन ,विवाह संस्था से विद्रोह ,महिला उपन्यासकारों के उपन्यासों में राजनैतिक चेतना ;महिलाओं को तैंतीस  प्रतिशत आरक्षण ,महिला उपन्यासकरों के उपन्यासों में चित्रित कुछ अतिवादी और अराजकतावादी स्थितियां ,सामाजिक संबंधों में दरार और विश्रंखलता ,स्वछंद जीवन की प्रेरणा से पाशव जीवन  की ओर प्रवाह ,मुस्लिम नारी समाज की भिन्न स्थिति का संत्रास आदि आदि -स्त्री विमर्श का जो शोध डॉ.शिखा कौशिक जी ने विभिन्न उपन्यासों ,पत्र-पत्रिकाओं के सहयोग से प्रस्तुत किया है वह सम्पूर्ण राष्ट्र में नारी के लिए गौरव का विषय है .संभव है कि अन्य और शोधार्थियों के शोध भी इस क्षेत्र में सराहना के हक़दार हों ,इसलिए ऐसे में सभी शोधों को एक तराजू में तौलना सर्वथा गलत है और इस सम्बन्ध में तभी कोई वक्तव्य दिया जाना  चाहिए जब इस दिशा में खुली आँखों से कार्य किया गया हो अर्थात  सम्बंधित शोधों का अवलोकन किया गया हो.ऐसे में मेरा कहना तो केवल यही है -
   ''कैंची से चिरागों की लौ काटने वालों ,
सूरज की तपिश को रोक नहीं सकते .
तुम फूल को चुटकी से मसल सकते हो ,
पर फूल की खुशबू समेट नहीं सकते .''
                  शालिनी कौशिक
                         [कौशल ]

 

रविवार, 2 दिसंबर 2012

दहेज़ :इकलौती पुत्री की आग की सेज

दहेज़ :इकलौती पुत्री की आग की सेज


  
 एक ऐसा जीवन जिसमे निरंतर कंटीले पथ पर चलना और वो भी नंगे पैर सोचिये कितना कठिन होगा पर बेटी ऐसे ही जीवन के साथ इस धरती पर आती है .बहुत कम ही माँ-बाप के मुख ऐसे होते होंगे जो ''बेटी पैदा हुई है ,या लक्ष्मी घर आई है ''सुनकर खिल उठते हों .
                 'पैदा हुई है बेटी खबर माँ-बाप ने सुनी ,
                उम्मीदों का बवंडर उसी पल में थम गया .''

बचपन से लेकर बड़े हों तक बेटी को अपना घर शायद ही कभी अपना लगता हो क्योंकि बात बात में उसे ''पराया धन ''व् ''दूसरे  घर जाएगी तो क्या ऐसे लच्छन [लक्षण ]लेकर जाएगी ''जैसी उक्तियों से संबोधित कर उसके उत्साह को ठंडा कर दिया जाता है .ऐसा नहीं है कि उसे माँ-बाप के घर में खुशियाँ नहीं मिलती ,मिलती हैं ,बहुत मिलती हैं किन्तु ''पराया धन '' या ''माँ-बाप पर बौझ '' ऐसे कटाक्ष हैं जो उसके कोमल मन को तार तार कर देते  हैं .ऐसे में जिंदगी गुज़ारते गुज़ारते जब एक बेटी और विशेष रूप से इकलौती बेटी का ससुराल में पदार्पण होता है तब उसके जीवन में और अधिकांशतया  इकलौती पुत्री के जीवन में उस दौर की शुरुआत होती है जिसे हम अग्नि-परीक्षा कह सकते हैं .
               एक तो पहले ही बेटे के परिवार वाले बेटे पर जन्म से लेकर उसके विवाह तक पर किया गया खर्च बेटी वाले से वसूलना चाहते हैं उस पर यदि बेटी इकलौती हो तब तो उनकी यही सोच हो जाती है कि वे अपना पेट तक काटकर उन्हें दे दें .इकलौती बेटी को बहू बनाने  वाले एक परिवार के  सामने जब बेटी के पिता के पास किसी ज़मीन के ६ लाख रूपए आये तो उनके लालची मन को पहले तो ये हुआ कि ये  अपनी बेटी को स्वयं देगा और जब उन्होंने कुछ समय देखा कि बेटी को उसमे से कुछ नहीं दिया तो कुछ समय में ही उन्होंने अपनी बहू को परेशान करना शुरू कर दिया.हद तो यह कि बहू के लिए अपने बेटे से कहा ''कि इसे एक बच्चा गोद में व् एक पेट में डालकर इसके बाप के घर भेज दे .''उनके मन कि यदि कहूं तो यही थी कि बेटी का होना इतना बड़ा अपराध था जो उसके मायके वालों ने किया था कि अब बेटी की शादी के बाद वे पिता ,माँ व् भाई बस बेटी के ससुराल की ख़ुशी ही देख सकते थे और वह भी अपना सर्वस्व अर्पण करके.
     एक मामले में सात सात भाइयों की अकेली बहन को दहेज़ की मांग के कारण बेटे के पास न भेजकर सास ने  अपनी ही सेवा में रखा जबकि सास कि ऐसी कोई स्थिति  नहीं थी कि उसे सेवा करवाने की आवश्यकता हो.ऐसा नहीं कि इकलौती बेटी के साथ अन्याय केवल इसी हद तक सीमित रहता हो बेटे वालों की भूख बार बार शांत करने के बावजूद बेटी के विवाह में १२ लाख रूपए जेवर और विवाह के बाद बेटी की ख़ुशी के लिए फ्लैट देने के बावजूद इकलौती बेटी को सोने का अंडा देने वाली मुर्गी समझा जाता है और उच्च शिक्षित होते हुए भी उसके माँ-बाप ससुराल वालों के आगे लाचार से फिरते हैं और उन्हें बेटी के साथ दरिंदगी का पूरा अवसर देते हैं और ये दरिंदगी इतनी हद तक भी बढ़ जाती है कि या तो उसे मौत के घाट उतार दिया जाता है या वह स्वयं ही मौत को गले लगा लेती है क्योंकि एक गुनाह तो उसके माँ-बाप का है कि उन्होंने बेटी पैदा कि और दूसरा गुनाह जो कि सबसे बड़ा है कि वह ही वह बेटी है.
                 इस तरह माँ-बाप के घर नाजुक कली से फूल बनकर पली-बढ़ी इकलौती बेटी जिसे इकलौती होने के कारण अतुलनीय स्नेह प्राप्त होता है ससुराल में आकर घोर यातना को सहना पड़ता है .हमारा दहेज़ कानून दहेज़ के लेन-देन को अपराध घोषित करता है किन्तु न तो वह दहेज़ का लेना रोक सकता है न ही देना क्योंकि हमारी सामाजिक परम्पराएँ हमारे कानूनों पर आज भी हावी हैं .स्वयं की बेटी को दहेज़ की बलिवेदी पर चढाने वाले माँ-बाप भी अपने बेटे के विवाह में दहेज़ के लिए झोले लटकाए घूमते हैं .जिस तरह दहेज़ के भूखे भेड़िये निंदा के पात्र हैं उसी तरह सामाजिक बहिष्कार के भागी हैं दहेज़ के दानी जो इनके मुहं पर दहेज़ का खून लगाते हैं और अपनी बेटी के लिए आग की सेज सजाते हैं .
                शालिनी कौशिक
                    [कौशल]

                   
     

बुधवार, 28 नवंबर 2012

आत्महत्या -परिजनों की हत्या

आत्महत्या -परिजनों की हत्या 
  
Suicide : Image of guy cutting veins with a sharp dagger attempting suicide against black backgroundMurder : Blood covered knife, still dripping, in the hands of a murderer, with blood spatter on the brick wall.     आज आत्महत्या के आंकड़ों में दिन-प्रतिदिन वृद्धि हो रही है .कभी भविष्य को लेकर निराशा ,तो कभी पारिवारिक कलह ,कभी क़र्ज़ चुकाने में असफलता तो कभी कैरियर में इच्छित प्राप्त न होना ,कभी कुछ तो कभी कुछ कारण असंख्य युवक-युवतियों ,गृहस्थों ,किशोर किशोरियों को आत्म हत्या के लिए विवश कर रहे हैं और हाल ये है कि आत्महत्या ही उन्हें करने वालों को समस्या के एक मात्र हल के रूप में दिखाई दे रही है ,शायद उनकी सोच यही रहती है कि इस तरह वे अपनी परेशानियों से अपने परिजनों को मुक्ति दे रहे हैं किन्तु क्या कभी इस ओर कदम बढाने वालों ने सोचा है कि स्वयं आत्महत्या की ओर कदम बढ़ाकर  वे अपने परिजनों की हत्या ही कर रहे हैं ?
                 आत्महत्या एक कायरता कही जाती है किन्तु इसे करने वाले शायद अपने को बिलकुल बेचारा मानकर इसे अपनी बहादुरी के रूप में गले लगाते हैं .वे तो यदि उनकी सोच से देखा जाये तो स्वयं को अपनी परेशानियों से मुक्त तो करते ही हैं साथ ही अपने से जुडी अपने परेशानियों से अपने परिजनों को भी मुक्ति दे देते हैं क्योंकि मृत्यु के बाद उन्हें हमारे वेद-पुराणों के अनुसार क्या क्या भुगतना पड़ता है उसके बारे में न तो हम जानते हैं न जानना ही चाहते हैं और उनकी मृत्यु उनके परिजनों को क्या क्या भुगतने को विवश कर देती है इसे शायद ये कदम उठाने से पहले वे जानते हुए भी नहीं जानना चाहते किन्तु हम जानते हैं कि इस तरह की मृत्यु उनके परिजनों को क्या क्या भुगतने को विवश करती है .सबसे पहले तो समाज में एक दोषी की स्थिति उनकी हो जाती है आश्चर्य इसी बात का होता है कि जिनके साथ ऐसे में सहानुभूति होनी चाहिए उन्हें उनकी पीठ पीछे आलोचना का शिकार होना पड़ता है .कोई भी वास्तविक स्थिति को नहीं जानता और एक ढर्रे पर ही चलते हुए परिजनों को दोषी ठहरा  देता है ढर्रा मतलब ये कि यदि किसी युवक ने आत्महत्या की है तो उसका कोई प्रेमप्रसंग था और उसके परिजन उसका विरोध कर रहे होंगे ?यदि कोई किशोर मरता है तो उसे घर वालों ने डांट दिया इसलिए मर गया ,भले ही इन आत्महत्याओं के पीछे कुछ और वजह रही हो किन्तु आम तौर पर लोग पुँराने ढर्रे पर ही चलते हैं और परिजनों को अपराधी मान लेते  हैं और एक धारणा ही बना लेते हैं कि इनके परिवार के व्यक्ति ने ऐसा कृत्या किया और ये रोक न सके .परिजनों की ऐसी स्थिति को दृष्टि में रखते हुए डॉ.शिखा कौशिक ''नूतन''जी ने सही कहा है -
  ''अपनी ख़ुशी से ख़ुदकुशी करके वो मर गया ,
  दुनिया की नज़र में हमें बदनाम कर गया .''

और शायद दूसरों पर ऐसा दोषारोपण करने वाले उनकी विवशता को तभी समझ पाते हैं जब दुर्भाग्य से अनहोनी उनके लिए होनी बन जाती है .दूसरे बहुत कम लोग ही ऐसे होते हैं जो इसे -
       ''होई  है सोई जो राम रची राखा ''
कह स्वीकार कर लेते हैं और जिंदगी के साथ आगे बढ़ जाते हैं किन्तु अधिकांश जहाँ तक देखने में आया है बंद घडी की सुइयों की भांति ठिठक जाते हैं और अपने भूतकाल में खो जाते हैं .कहते हैं कि आत्महत्या करने वालों की सोचने समझने की शक्ति विलुप्त हो जाती है वैसे ही जैसे -
  ''विनाश काले विपरीत बुद्धि ''
और ऐसा लगता भी है क्योंकि यदि सोचने समझने की शक्ति उनमे रहती ,उन्हें अपने परिवार के लिए अपने महत्व का ,अपने अस्तित्व का अहसास होता तो वे कदापि ऐसा कदम नहीं उठाते ,वर्तमान के प्रति भय व् निराशावाद उन्हें ऐसे कुत्सित कृत्य की ओर धकेल देता है जिसके कारण वे स्वयं की मृत्यु द्वारा अपने परिजनों को जिन्दा लाश बनाकर इस दुष्ट संसार में जूझने  को छोड़ जाते हैं और समय के दुर्दांत गिद्ध उनके परिजनों का मांस नोचकर कैसे खाते हैं इस विषय में वे ये कदम उठाने से पहले सोच भी नही पाते हैं .शायद ऐसे में परिजनों की आत्मा यही कहती होगी -
''गर चाहते हो जिंदगी जिए हम ,
  पहले चलो इस राह पर तुम .''

              शालिनी कौशिक
                    [कौशल ]
 

मंगलवार, 27 नवंबर 2012

जिंदगी की हैसियत मौत की दासी की है .

   
बात न ये दिल्लगी की ,न खलिश की है ,
जिंदगी की हैसियत मौत की दासी की है .


न कुछ लेकर आये हम ,न कुछ लेकर जायेंगें ,
फिर भी जमा खर्च में देह ज़ाया  की है .


पैदा किया किसी ने रहे साथ किसी के ,
रूहानी संबंधों की डोर हमसे बंधी है .


नाते नहीं होते हैं कभी पहले बाद में ,
खोया इन्हें तो रोने में आँखें तबाह की हैं.


मौत के मुहं में समाती रोज़ दुनिया देखते ,
सोचते इस पर फ़तेह  हमने हासिल की है .


जिंदगी गले लगा कर मौत से भागें सभी ,
मौके -बेमौके ''शालिनी''ने भी कोशिश ये की है .
                       शालिनी कौशिक
                                 [कौशल ]




शनिवार, 24 नवंबर 2012

नारी के अकेलेपन से पुरुष का अकेलापन ज्यादा घातक

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अकेलापन एक ज़हर के सामान होता है किन्तु इसे जितना गहरा ज़हर नारी के लिए कहा जाता है उतना गहरा पुरुष के लिए नहीं कहा जाता जबकि जिंदगी  का अकेलापन दोनों के लिए ही बराबर ज़हर का काम करता हैनारी  जहाँ तक घर के बाहर की बात है आज भी लगभग पुरुष वर्ग पर आश्रित है कोई भी लड़की यदि घर से बाहर जाएगी तो उसके साथ आम तौर पर कोई न कोई ज़रूर साथ होगा भले ही वह तीन-चार साल का लड़का ही हो इससे उसकी सुरक्षा की उसके घर के लोगों में और स्वयं भी मन में सुरक्षा की गारंटी होती है और इस तरह से यदि देखा जाये तो नारी के लिए पुरुषों के कारण भी अकेलापन घातक है क्योंकि पुरुष वर्ग नारी को स्वतंत्रता से रहते नहीं देख सकता और यह तो वह सहन ही नहीं कर सकता कि एक नारी पुरुष के सहारे के बगैर कैसे आराम से रह रही है इसलिए वह नारी के लिए अकेलेपन को एक डर का रूप दे देता  है और यदि पुरुषों के लिए अकेलेपन के ज़हर की हम बात करें तो ये नारी के अकेलेपन से ज्यादा खतरनाक है न केवल स्वयं उस पुरुष के लिए बल्कि सम्पूर्ण समाज के लिए क्योंकि ये तो सभी जानते हैं कि ''खाली दिमाग शैतान का घर होता है ''ऐसे में समाज में यदि अटल बिहारी जी ,अब्दुल कलाम जी जैसे अपवाद छोड़ दें तो कितने ही पुरुष कुसंगति से घिरे गलत कामों में लिप्त नज़र आते हैं .घर के लिए कहा जाता है कि ''नारी हीन घर भूतों का डेरा होता है ''तो ये गलत भी नहीं है क्योंकि घर को जिस साज संभल की सुरुचि की ज़रुरत होती है वह केवल नारी मन में ही पाई जाती है .पुरुषों  में अहंकार की भावना के चलते वे कभी अपनी परेशानी का उल्लेख करते नज़र नहीं आते किन्तु जब नारी का किसी की जिंदगी या घर में अभाव होता है तो उसकी जिंदगी या घर पर उसका प्रभाव साफ नज़र आता है नारी को यदि देखा जाये तो हमेशा  पुरुषों की सहयोगी  के रूप में ही नज़र आती  है उसे पुरुष की सफलता खलती नहीं बल्कि उसके चेहरे  पर अपने से सम्बंधित  पुरुष की सफलता एक नयी चमक ला देती है किन्तु पुरुष अपने से सम्बंधित नारी को जब स्वयं सफलता के शिखर पर चढ़ता देखता है तो उसके अहम् को चोट पहुँचती है और वह या तो उसके लिए कांटे बोने लगता है या स्वयं अवसाद में डूब जाता है.
     एक नारी फिर भी घर के बाहर के काम आराम से संपन्न कर सकती है यदि उसे पुरुष वर्ग के गलत रवैय्ये का कोई डर नहीं हो किन्तु एक पुरुष घर की साज संभाल  एक नारी की तरह कभी नहीं कर सकता क्योंकि ये गुण नारी को भगवान ने उसकी प्रकृति में ही दिया है .इसलिए पुरुष वर्ग को अपने अकेलेपन की ज्यादा चिंता करनी चाहिए न कि नारी के अकेलेपन की क्योंकि वह पुरुष वर्ग के अनुचित दखल न होने पर सुकून की साँस ले सकती है.
       शालिनी कौशिक
                [कौशल ]

शुक्रवार, 23 नवंबर 2012

माँ को कैसे दूं श्रद्धांजली ,

माँ तुझे सलाम


वो चेहरा जो
        शक्ति था मेरी ,
वो आवाज़ जो
      थी भरती ऊर्जा मुझमें ,
वो ऊँगली जो
     बढ़ी थी थाम आगे मैं ,

वो कदम जो
    साथ रहते थे हरदम,
वो आँखें जो
   दिखाती रोशनी मुझको ,
वो चेहरा
   ख़ुशी में मेरी हँसता था ,
वो चेहरा
   दुखों में मेरे रोता था ,
वो आवाज़
   सही बातें  ही बतलाती ,
वो आवाज़
   गलत करने पर धमकाती ,

वो ऊँगली
   बढाती कर्तव्य-पथ पर ,
वो ऊँगली
  भटकने से थी बचाती ,
वो कदम
   निष्कंटक राह बनाते ,
वो कदम
   साथ मेरे बढ़ते जाते ,
वो आँखें
   सदा थी नेह बरसाती ,
वो आँखें
   सदा हित ही मेरा चाहती ,
मेरे जीवन के हर पहलू
   संवारें जिसने बढ़ चढ़कर ,
चुनौती झेलने का गुर
     सिखाया उससे खुद लड़कर ,
संभलना जीवन में हरदम
     उन्होंने मुझको सिखलाया ,
सभी के काम तुम आना
    मदद कर खुद था दिखलाया ,

वो मेरे सुख थे जो सारे
   सभी से नाता गया है छूट ,
वो मेरी बगिया की माली
   जननी गयी हैं मुझसे रूठ ,
गुणों की खान माँ को मैं
    भला कैसे दूं श्रद्धांजली ,
ह्रदय की वेदना में बंध
    कलम आगे न अब चली .
           शालिनी कौशिक
                [कौशल ]

बुधवार, 21 नवंबर 2012

कसाब को फाँसी :अफसोसजनक भी सराहनीय भी

Kasab’s journey to the gallows


संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत सहित ३९ देशों ने मृत्युदंड समाप्त करने वाले प्रस्ताव के विरोध में मतदान किया है और इसके ठीक एक दिन पश्चात् भारत ने अपने मंतव्य ''कानूनी मामलों के बारे में फैसला लेने का अधिकार ''के प्रति कटिबद्ध होने का सन्देश सम्पूर्ण विश्व को दे दिया है .अजमल आमिर कसाब को फाँसी दे भारत ने आतंकवाद के प्रति अपनी प्रतिरोधक शक्ति का परिचय दिया है और यह सही भी है क्योंकि सम्पूर्ण देशवासियों के लिए सुरक्षा का अहसास आतंकवाद का मुकाबला ऐसे मजबूत संकल्प द्वारा ही दिया जा सकता है अफ़सोस है तो केवल यही कि जहाँ सभ्यता निरंतर विकास की ओर बढ़ रही है वहीँ हमारी युवा शक्ति भटक रही है .
                       कसाब को हम पाकिस्तानी कहकर पृथक देश की युवा शक्ति नहीं कह सकते .भले ही डलहौजी की ''फूट डालो शासन करो'' की रणनीति का शिकार बन हमारे देश के दो टुकड़े हुए हों किन्तु भारत -पाक एक हैं ,एक ही पिता ''हिंदुस्तान '' की संतान ,जिनमे भले ही मतभेद हों किन्तु मनभेद कभी नहीं हो सकता .कसाब व् उस जैसे कितने ही युवा भटकी मानसिकता के परिचायक हैं .धार्मिक उन्माद में डूबे ये युवा दहशत गर्दी फैला रहे हैं क्यों नहीं समझते अपने धर्म के गूढ तत्व को ,जिसमे सभी से प्रेम करने की शिक्षा दी जाती है ,अन्याय अत्याचार भले ही स्वयं के साथ हो या किसी और के साथ उसका दृढ़ता से मुकाबला करने की शिक्षा दी जाती है न कि स्वयं दहशत फैला दूसरों के साथ अन्याय करने की ,और यही नहीं कि ये स्वयं भटक रहे हैं बल्कि इन्हें भटकाया जा रहा है और इनके माध्यम से अपने दिमागी फितूर को शांत करने वाले इनके आका बनकर बैठे लोग सुरक्षित शानो-शौकत की जिंदगी जी रहे हैं और फाँसी का शिकार मानसिक उलझन में डूबे हमारे ये युवा हो रहे हैं .
                अफ़सोस होता है युवा शक्ति के ऐसे इस्तेमाल और विनाश पर .हम बिलकुल नहीं चाहते युवा शक्ति का ऐसा अंत किन्तु तभी जब युवा अपनी शक्ति का प्रयोग सकारात्मक कार्यों में करें .फाँसी जैसी सजा ह्रदय विदारक है किन्तु जब युवा शक्ति यूँ भटक जाये और जिंदगी निगलने को दरिंदगी पर उतर आये तो भारत का यह कदम सही ही कहा जायेगा .इस तरह भटकी हुई युवा शक्ति के लिए मेरा तो बस यही सन्देश है-


''मुख्तलिफ  ख्यालात भले रखते हों मुल्क से बढ़कर न खुद  को समझें हम,
बेहतरी हो जिसमे अवाम की अपनी ऐसे क़दमों को बेहतर  समझें हम.

है ये चाहत तरक्की की राहें आप और हम मिलके पार करें ,
जो सुकूँ साथ मिलके चलने में इस हकीक़त को ज़रा समझें हम .

कभी हम एक साथ रहते थे ,रहते हैं आज जुदा थोड़े से ,
अपनी आपस की गलतफहमी को थोड़ी जज़्बाती  भूल  समझें हम .
                                   
देखकर आंगन में खड़ी दीवारें आयेंगें तोड़ने हमें दुश्मन ,
ऐसे दुश्मन की गहरी चालों को अपने हक में कभी न  समझें हम .

न कभी अपने हैं न अपने कभी हो सकते ,
पडोसी मुल्कों की फितरत को खुलके समझें हम .

कहे ये ''शालिनी'' मिल  बैठ मसले  सुलझा लें ,
अपने अपनों की मोहब्बत को अगर समझें हम .

         शालिनी कौशिक 
                  [ कौशल ]

मंगलवार, 20 नवंबर 2012

ऐसे नहीं होगा अपराध का सफाया


१५ नवम्बर २०१२ उत्तर प्रदेश सरकार ने यहाँ की महिलाओं के लिए एक राहत भरे दिवस के रूप में स्थापित किया यहाँ वूमेन पावर हेल्पलाइन 1090 की शुरुआत कर. इस सेवा के सूत्रधार लखनऊ रेंज के पुलिस उप महानिरीक्षक नवनीत सिकेरा  का कहना है कि  वूमेन पावर लाइन उत्तर प्रदेश पुलिस की एक ऐसी सेवा है जिसका सिद्धांत एक राज्य एक नंबर है .महिलाओं के लिए यह सीधी सेवा है इसमें कोई पुरुष शिकायत दर्ज नहीं करा सकेगा और खास बात ये है कि शिकायत सुनने के लिए महिला पुलिस अधिकारी हैं .ये हेल्प लाइन महिलाओं को जहाँ तक अनुमान है अपराध से छुटकारा दिलाने में कुछ हद तक कामयाब अवश्य रहेगी किन्तु पूरी तरह से मददगर साबित होगी ये कल्पना तक असंभव है और इसका प्रमाण हमारे समाचार पत्र तो देते ही हैं हमारे आस पास की बहुत से घटनाएँ भी इसका पुख्ता साक्ष्य हमें दे जाती हैं 
 समाचार पत्र तो ऐसी घटनाओं से नित्य भरे हैं जिनमे महिलाओं को अपराध से रु-ब-रु होना पड़ता है .कानून व्यवस्था को सुचारू ढंग से चलाने हेतु जो थाने प्रशासन द्वारा स्थापित किये जाते हैं उनमे महिलाओं के साथ किये गए दुर्व्यवहार की घटना के लिए यदि हम असंख्य घटनाओं को नज़रंदाज़ भी कर दें तो नित्य टाल-मटोल जो थानों में फरियादियों के साथ की जाती है उसे भुलाना संभव प्रतीत नहीं होता .

                      १६ नवम्बर को शामली में थाने में ही महिला अपने गले पर फांसी का फंदा लगाने के चिन्ह सहित पहुंची किन्तु रिपोर्ट नहीं लिखने के नाम वहां उसे निराश ही किया गया क्या ये केवल इसलिए कि वह फांसी के फंदे का निशान लेकर जीवित ही थाने पहुँच गयी ?क्या इस तरह रिपोर्ट नहीं लिखे जाने से प्रदेश अपराध मुक्त की श्रेणी में आ जायगा ?क्या इस तरह यहाँ की महिलाएं सुरक्षित महसूस कर सकेंगी.?जबकि अपराध किये जाते समय अपराधी को स्वयं पकड़ कर भी पुलिस में देने पर पुलिस दबंगों के प्रभाव में आकर उन्हें खुलेआम घूमने की छूट  देती है .कांधला [शामली] में एक महिला के यहाँ जो कि अकेली रहती है के यहाँ शाम के सात बजे एक चोर घुस आया और उसने टेलीविज़न देखते हुए उसपर लाठी से प्रहार किया जिसका उस महिला ने जमकर मुकाबला किया और उसे मोहल्ले के लोगों के साथ पुलिस के हवाले  कर दिया .अधिक चोट लगने पर वह अपने इलाज के लिए बाहर चली गयी और लौट कर जब आई तो देखती है कि पुलिस ने उसे छोड़ दिया है क्या यही है वह सुरक्षा जो प्रशासन महिलाओं को दे रहा है है और जब इतना सहस दिखने पर इतने खुलेआम ये जिम्मेदार पुलिस निभा रही है तो हेल्प लाइन के माध्यम पर कैसे भरोसा किया जा सकता है ?सरकार यदि महिलाओं  को वास्तव में सुरक्षा देना चाहती है तो पहले ज़मीनी स्तर पर अपने प्रशासनिक  अमले को दुरुस्त करे यूँ रिपोर्ट न लिखने और कुछ दबंगों के प्रभाव में आकर यदि पुलिस अपराध का सफाया करती रही तो एक दिन जनता का विश्वास इस व्यवस्था से उठ जायेगा और फिर वह दिन दूर नहीं जब लोग कानून हाथ में लेने आरम्भ कर देंगे और शायद वह स्थिति किसी के लिए भी शुभ नहीं होगी न सरकार के लिए और न ही जनता के लिए इसलिए समय रहते सरकार को इस तरह की घटनाओं से निबटने के लिए कुशल रणनीति बनानी ही होगी .
           शालिनी कौशिक
                 [कौशल ]



सोमवार, 19 नवंबर 2012

इंदिरा प्रियदर्शिनी :भारत का ध्रुवतारा

इंदिरा प्रियदर्शिनी :भारत का ध्रुवतारा 

जब ये शीर्षक मेरे मन में आया तो मन का एक कोना जो सम्पूर्ण विश्व में पुरुष सत्ता के अस्तित्व को महसूस करता है कह उठा कि यह उक्ति  तो किसी पुरुष विभूति को ही प्राप्त हो सकती है  किन्तु तभी आँखों के समक्ष प्रस्तुत हुआ वह व्यक्तित्व जिसने समस्त  विश्व में पुरुष वर्चस्व को अपनी दूरदर्शिता व् सूक्ष्म सूझ बूझ से चुनौती दे सिर झुकाने को विवश किया है .वंश बेल को बढ़ाने ,कुल का नाम रोशन करने आदि न जाने कितने ही अरमानों को पूरा करने के लिए पुत्र की ही कामना की जाती है किन्तु इंदिरा जी ऐसी पुत्री साबित हुई जिनसे न केवल एक परिवार बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्र गौरवान्वित अनुभव करता है  और  इसी कारण मेरा मन उन्हें ध्रुवतारा की उपाधि से नवाज़ने का हो गया और मैंने इस पोस्ट का ये शीर्षक बना दिया क्योंकि जैसे संसार के आकाश पर ध्रुवतारा सदा चमकता रहेगा वैसे ही इंदिरा प्रियदर्शिनी  ऐसा  ध्रुवतारा थी जिनकी यशोगाथा से हमारा भारतीय आकाश सदैव दैदीप्यमान  रहेगा।
       १९ नवम्बर १९१७ को इलाहाबाद के आनंद भवन में जन्म लेने वाली इंदिरा जी के लिए श्रीमती सरोजनी नायडू जी ने एक तार भेजकर कहा था -''वह भारत की नई आत्मा है .''
       गुरुदेव रविन्द्र नाथ टैगोर ने उनकी शिक्षा प्राप्ति के पश्चात् शांति निकेतन से विदाई के समय नेहरु जी को पत्र में लिखा था -''हमने भारी मन से इंदिरा को  विदा  किया है .वह इस स्थान की शोभा थी  .मैंने उसे निकट से देखा है  और आपने जिस प्रकार उसका लालन पालन किया है उसकी प्रशंसा किये बिना नहीं रहा जा सकता .''   सन १९६२ में चीन ने विश्वासघात करके भारत  पर आक्रमण किया था तब देश  के कर्णधारों की स्वर्णदान की पुकार पर वह प्रथम भारतीय महिला थी जिन्होंने अपने समस्त पैतृक  आभूषणों को देश की बलिवेदी पर चढ़ा दिया था इन आभूषणों में न जाने कितनी ही जीवन की मधुरिम स्मृतियाँ  जुडी हुई थी और इन्हें संजोये इंदिरा जी कभी कभी प्रसन्न हो उठती थी .पाकिस्तान युद्ध के समय भी वे सैनिकों के उत्साहवर्धन हेतु युद्ध के अंतिम मोर्चों तक निर्भीक होकर गयी .
आज देश अग्नि -५ के संरक्षण  में अपने को सुरक्षित महसूस कर रहा है इसकी नीव में भी इंदिरा जी की भूमिका को हम सच्चे भारतीय ही महसूस कर सकते हैं .भूतपूर्व राष्ट्रपति और भारत में मिसाइल कार्यक्रम  के जनक डॉ.ऐ.पी.जे अब्दुल कलाम बताते हैं -''१९८३ में केबिनेट ने ४०० करोड़ की लगत वाला एकीकृत मिसाइल कार्यक्रम स्वीकृत किया .इसके बाद १९८४ में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी डी.आर.डी एल .लैब  हैदराबाद में आई .हम उन्हें प्रैजन्टेशन दे रहे थे.सामने विश्व का मैप टंगा था .इंदिरा जी ने बीच में प्रेजेंटेशन रोक दिया और कहा -''कलाम !पूरब की तरफ का यह स्थान देखो .उन्होंने एक जगह पर हाथ रखा ,यहाँ तक पहुँचने वाली मिसाइल कब बना सकते हैं ?"जिस स्थान पर उन्होंने हाथ रखा था वह भारतीय सीमा से ५००० किलोमीटर दूर था .
    इस तरह की इंदिरा जी की देश प्रेम से ओत-प्रोत घटनाओं से हमारा इतिहास भरा पड़ा है और हम आज देश की सरजमीं पर उनके प्रयत्नों से किये गए सुधारों को स्वयं अनुभव करते है,उनके खून की एक एक बूँद हमारे देश को नित नई ऊँचाइयों पर पहुंचा रही है और आगे भी पहुंचती रहेगी.
                  आज का ये दिन हमारे देश के लिए पूजनीय दिवस है और इस दिन हम सभी  इंदिरा जी को श्रृद्धा  पूर्वक  नमन करते है .
              शालिनी कौशिक
           [कौशल ]

रविवार, 18 नवंबर 2012

तो प्रस्तुत है शिखा कौशिक जी की प्रस्तुति : नादानों मैं हूँ ' भगत सिंह ' दिल में रख लेना याद मेरी ,

भारत और पाकिस्तान कभी एक थे और एक आम हिन्दुस्तानी के दिल में आज भी वे एक ही स्थान रखते हैं किन्तु सियासी गलियां और बुद्धिजीवी समाज के क्या कहने वह जब देखो इन्हें बाँटने में ही लगा रहता है .भगत सिंह  जिन्हें कम से कम हिंदुस्तान में किसी पहचान की आवश्यकता नहीं और जिनकी कद्रदान हिन्दुस्तानी अवाम  अंतिम सांसों तक रहेगी किन्तु पाकिस्तान की  सरकार शायद इस  शहादत  को नज़रंदाज़ करने में जुटी है और भुला  रही है इसकी महत्ता को जिसके कारण आज दोनों देशों की अवाम खुली हवा में साँस ले रही है .अभी 2 नवम्बर को मैंने डॉ शिखा कौशिक जी के ब्लॉग विचारों का चबूतरा पर जो प्रस्तुति इस  सम्बन्ध में देखी उससे मैं अन्दर तक भावविभोर हो गयी आप सभी के  अवलोकनार्थ उसे यहाँ प्रस्तुत कर रही  हूँ कृपया ध्यान दें और सरकार का ध्यान भी इस ओर दिलाएं ताकि सरकार पाकिस्तान सरकार से इस सम्बन्ध में सही कदम उठाने को कहे .
                                   शालिनी कौशिक 
 तो प्रस्तुत है शिखा कौशिक जी की  प्रस्तुति :

नादानों मैं हूँ ' भगत सिंह ' दिल में रख लेना याद मेरी ,

शुक्रवार, 2 नवम्बर 2012

नादानों मैं हूँ ' भगत सिंह ' दिल में रख लेना याद मेरी ,



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[पाकिस्तान के लाहौर में हाफिज सईद के नेतृत्व वाले जमात उद दावा और दूसरे कट्टरपंथी संगठनों के दबाव के आगे झुकते हुए लाहौर जिला प्रशासन ने अपने ही एक चौक शामदन चौक का नाम शहीद भगत सिंह के नाम पर रखने की योजना ठंडे बस्ते में डाल दी है । इससे शहीद के परिजन क्षुब्ध है। 

गुरुवार को होशियारपुर के कचहरी चौक पर स्थित अपने निवास पर शहीद भगत सिंह की भतीजी भूपिंदर कौर व नाती एडवोकेट सुखविंदर जीत सिंह संघा ने कहा कि शहीद किसी भी जाति व धर्म से ऊंचा स्थान रखते हैं, ऐसे में लाहौर के शामदन चौक जिसे सिटी सेंटर चौक के नाम से भी जाना जाता है, का नाम स्वयं लाहौर के जिला प्रशासन ने ही 31 अगस्त को शहीद-ए-आजम भगत सिंह रख, वहां पर उनकी मूर्ति व उनकी लिखी कविता को पत्थर पर उकेर कर लगाने की बात कह पूरे संसार में एक सदभावना के तौर पर मिसाल कायम की थी। अब कट्टरपंथियों के आगे जिस तरह लाहौर जिला प्रशासन व वहां की सरकार अपने वायदे से मुकर रही है, उससे शहीद के परिजनों को ठेस पहुंची है।

लाहौर के सौंदर्यीकरण के लिए बनाए गए समिति दिलकश लाहौर के सदस्य एजाज अनवर ने कहा कि चौक का नाम बदलने का फैसला कुछ समय के लिए टाल दिया गया है। भुपिंदर कौर व सुखविंदरजीत सिंह ने प्रधानमंत्री से अपील की कि वह इस्लामाबाद स्थित भारतीय उच्चयोग से बात कर इस मामले का हल करें।]
इससे शर्मनाक कुछ नहीं हो सकता  है .शहीद  -ए-आज़म  के नाम  पर  एक  चौराहे  के नाम रखने तक में पाकिस्तान  में आपत्ति  की जा  रही है .जिस युवक ने   देश की आज़ादी के खातिर प्राणों का उत्सर्ग करने तक में देर  नहीं की उसके  नाम पर एक चौराहे का नाम रखने तक में इतनी देर ....क्या  कहती  होगी  शहीद भगत  सिंह  की आत्मा ?यही  लिखने का प्रयास किया है -

आज़ादी  की खातिर हँसकर फाँसी को गले लगाया था ,
हिन्दुस्तानी  होने का बस अपना फ़र्ज़ निभाया था .

तब नहीं बँटा था मुल्क मेरा  भारत -पाकिस्तान में ,
थी दिल्ली की गलियां अपनी ; अपना लाहौर चौराहा था .

पंजाब-सिंध में फर्क कहाँ ?आज़ादी का था हमें जूनून ,
अंग्रेजी  अत्याचारों से कब पीछे कदम हटाया था ?

आज़ाद मुल्क हो हम सबका; क्या ढाका,दिल्ली,रावलपिंडी !
इस मुल्क के हिस्से होंगे तीन ,कब सोच के खून बहाया था !

नादानों मैं हूँ ' भगत सिंह ' दिल में रख लेना याद मेरी ,
'रंग दे बसंती ' जिसने अपना चोला कहकर रंगवाया था .

बांटी तुमने नदियाँ -ज़मीन  ,मुझको हरगिज़ न देना बाँट  ,
कुछ शर्म  करो खुद पर बन्दों ! बस इतना  कहने आया  था !!!

जय  हिन्द !
शिखा  कौशिक  'नूतन '


शनिवार, 17 नवंबर 2012

बचपन को हम कहाँ ले जा रहे हैं ?


बचपन को हम कहाँ ले जा रहे हैं ?

एक फ़िल्मी गाना इस ओर  हम सभी का ध्यान आकर्षित करने हेतु  पर्याप्त है -
''बच्चे मन के सच्चे सारे जग की आँख के तारे ,ये वो नन्हें फूल हैं जो भगवान  को लगते प्यारे ,''

लेकिन शायद हम ये नहीं मानते क्योंकि आज जो कुछ भी हम बच्चों को दे रहे हैं वह कहीं से भी ये साबित नहीं करता एक ओर सरकार बालश्रम रोकने हेतु प्रयत्नशील है तो दूसरी ओर हम बच्चों को चोरी छिपे इसमें झोंकने में जुटे हैं.आप स्वयं आये दिन देखते हैं कि बाज़ारों में दुकानों पर ईमानदारी के नाम पर बच्चों को ही नौकर लगाने में दुकानदार तरजीह देते हैं .सड़कों पर ठेलियां ठेलते ,कबाड़ का सामान खरीदने के लिए आवाज़ लगते बच्चे ही नज़र आते हैं .



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 बच्चे अपने योन शोषण की शिकायत नहीं कर सकते इस लिए बच्चों का योन शोषण तेज़ी से बढ़ रहा है .अभी हाल में ही स्कूल बस ड्राइवर द्वारा नॉएडा में एक बच्ची के साथ ऐसे घटना प्रकाश में आई है और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तो आये दिन समाचार पत्र इन घटनाओं से भरे पड़े हैं .  


Vice-Principal held for beating students

इसके  साथ ही एक और दुखद  पहलू है जो बच्चों  को लेकर हमारे असंवेदनशील होने का परिचायक है और वह है विद्या के मंदिरों में बच्चों के साथ अमानवीय व्यवहार और वह भी बच्चों के लिए भगवान् का दर्जा रखने वाले शिक्षकों द्वारा .कितने ही स्कूलों से बच्चों के साथ ऐसी घटनाएँ प्रकाश में  आती रहती हैं कि एक बार को तो ये प्रतीत होता है कि ये वास्तव में बच्चें हैं या कोई अपराधी जिनके साथ शिक्षक ऐसा व्यवहार कर रहे हैं जिसे करने की इजाजत कानून अपराधियों के साथ भी नहीं देता .माँ बाप अपने बच्चों को विद्यालयों में पढने भेजते हैं किन्तु वहां इन मासूमों को  पीट कर क्या ये शिक्षक अपने कार्य के साथ न्याय कर रहे हैं .ज्यादा पिटाई बच्चों को ढीठ बनाती  है क्या वे यह नहीं जानते ?
 बचपन हमारे देश की अमूल्य निधि है और ये हम सभी का कर्तव्य है कि हम इसकी राहें  प्रशस्त करें न कि इसके लिए  आगे बढ़ने के रास्ते बंद .
                                          शालिनी कौशिक
                                               [कौशल ]

बेटी की...... मां ?

बेटी का जन्म पर चाहे आज से सदियों पुरानी बात हो या अभी हाल-फ़िलहाल की ,कोई ही चेहरा होता होगा जो ख़ुशी में सराबोर नज़र आता होगा ,लगभग...