गुरुवार, 28 नवंबर 2013

कितना बदल गया इंसान ..........


कितना बदल गया इंसान ..........

पड़ोस में आंटी की सुबह सुबह चीखने की आवाज़ सुनाई दी ....
''अजी उठो ,क्या हो गया आपको ,अरे कोई तो सुनो ,देखियो क्या हो गया इन्हें ...'' हालाँकि हमारा घर उनसे कुछ दूर है किन्तु सुबह के समय कोलाहल के कम होने के कारण उनकी आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी ,मैंने ऊपर से आयी अपनी बहन से कहा कि ''आंटी ज़ोर ज़ोर से चिल्ला रही हैं लगता है कि अंकल को कुछ हो गया है ,वैसे भी वे बीमार रहते हैं ''वह ये सुनकर एकदम भाग ली और उसके साथ मैं भी घर को थोडा सा बंदकर भागी ,वहाँ जाकर देखा तो उनके घर के बराबर में आने वाले एक घर से दो युवक उनकी सहायता के लिए आ गए थे किन्तु अंकल को जब डाक्टर को दिखाया तो वे हार्ट-अटैक के कारण ये दुनिया छोड़ चुके थे किन्तु आंटी के बच्चे दूर बाहर रहते हैं और उनके आने में समय लगता इसलिए उन्हें यही कहा गया कि अंकल बेहोश हैं .उनके पास उनके घर का कोई आ जाये तब तक के लिए मैं भी वहीँ रुक गयी .बात बात में मैंने उनसे पूछा कि आंटी ये सामने वाली आंटी क्या आजकल यहाँ नहीं हैं ?मेरा प्रश्न सुनकर उनकी आँख भर आयी और वे कहने लगी कि यहीं हैं और देखलो आयी नहीं .मैं भी आश्चर्य मैं पड़ गयी कि आखिर कोई इतना मतलबी कैसे हो सकता है ?आंटी जिस तरह से चिल्ला रही थी उससे कोई भी इंसान यहाँ आकर उनकी मदद कर सकता था और उस पर वह, जिसके हाथ टूटने पर कितने ही दिन अपनी बेटी को भेजकर उन्होंने खाना बनवाया था,वह ऐसा करे तो इंसानियत से भरोसा तो उठता ही है .
आज मतलब इतना हावी है कि हर जगह आदमी ये देखकर मदद को आगे बढ़ रहा है कि मेरा यहाँ से क्या मतलब हल हो सकता है यदि कोई मतलब हल होता है तो वह पत्थर भी ढो लेगा और यदि मतलब हल न होता हो तो सुपरिचितों से भी अनजानों जैसा व्यवहार करने में संकोच नहीं करेगा.ऐसा नहीं है कि ये कोई आज की बात है ये पिछले काफी वर्षों से चल रहा है .एक लड़की जो हमसे पिछली कक्षाओं की किताबें ले लेती थी वह जब उसे किताब लेनी होती थी तो जब जब हमारे सामने से गुज़रती चाहे एक दिन में दस बार तो मुस्कुराकर ,सर झुकाकर नमस्ते करती थी और जब किताब ले लेती थी तब सामने से ऐसे निकल जाती थी जैसे हमें जानती ही न हो .
यही नहीं मतलब आदमी को कितना विनम्र बनाता है इसका बहुत सुन्दर उदाहरण ये है कि आपसे ३०-४० साल बड़ा आदमी भी आपको ''बेटी नमस्ते ''कहता है भले ही उसे आपके पिता से काम हो ,
मतलब आज १० -१० साल के बच्चों में नज़र आने लगा है जब उन्हें कुछ चाहिए हो तो मुस्कुराना शुरू और नहीं तो ऐसे देखते हैं जैसे हमने उनका सब कुछ लूट लिया हो .
आज मतलब की इस दुनिया पर बस यही कहा जा सकता है -
''देख तेरे संसार की हालत
क्या हो गयी भगवान,
कितना बदल गया इंसान .''



शालिनी कौशिक
[कौशल ]

मंगलवार, 26 नवंबर 2013

एक और नौकर अपनी गरीबी की भेंट चढ़ गया .

आरुषि मर्डर केस: नूपुर और राजेश तलवार को उम्र कैदarushi_hemraj_tree_noida
कहने के लिए देश की सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री किन्तु जो कहना चाहिए वह कोई नहीं कहता जो कि वास्तव में शर्मनाक भी है और दुखद भी क्योंकि ये पहला मामला होगा जिसमे माँ-बाप ने अपनी बेटी को मारा और उसके बाद अपने अपराध को स्वीकार नहीं किया ,आमतौर पर जिन मामलों में ऑनर किलिंग होती है वहाँ अपनी संतान को मारने के बाद व्यथित माँ-बाप स्वयं अपने अपराध को स्वीकार लेते हैं किन्तु यहाँ मामला उल्टा ही है ,यहाँ न केवल अपराध को अलग रूप देने की कोशिश की गयी बल्कि कानून को भी धोखा देने के लिए भरसक प्रयत्न किये गए .
आरुषि हेमराज की हत्या मामले को कोई अलग रूप देने की तो आवश्यकता ही नहीं थी एक सामान्य घटना को देखते हुए फ़ौरन ही ये मान लिया गया कि हेमराज से उसके अवैध ताल्लुकात थे और राजेश तलवार ने ये देखा और अचानक व् गम्भीर प्रकोपन के अधीन हेमराज व् आरुषि की हत्या की किन्तु समझ में ये नहीं आता कि जो बात सब समझ चुके हैं वह बात राजेश और नुपुर किससे छिपा रहे हैं ?
एक नौकर की स्थिति यहाँ बहुत ख़राब है इसका ताज़ा मामला डॉ.जागृति ने दिखा ही दिया है और सभी देखते भी हैं कि जिस घर में नौकर हैं वहाँ कोई भी गलत काम हो दोष उन्ही के मत्थे मढ दिया जाता है भले ही वह काम घर के ही किसी सदस्य ने किया हो .आरुषि केस में भी पहले घर के अन्य नौकर दोषी माने गए थे किन्तु हेमराज की लाश घर में मिलते ही स्थिति पलट गयी ,इस सम्बन्ध में अगर संवेदनशील सोच लिए अगर कुछ दिखा है तो वह अमर उजाला का २६ नवम्बर का सम्पादकीय है -
तलवार दंपति कोई पेशेवर हत्यारे नहीं हैं, लेकिन उन्होंने जो कुछ किया, उसकी सभ्य समाज में कोई जगह नहीं है।
[हमारे समय की सबसे बड़ी ′मर्डर मिस्ट्री′ माने जा रहे आरुषि-हेमराज हत्याकांड पर सीबीआई की विशेष अदालत का फैसला स्तब्ध करने वाला है। अभियोजन के तौर-तरीकों और लंबी कानूनी प्रक्रिया पर भले ही सवाल उठाए जाएं, मगर अदालत ने आखिरकार आरुषि के माता-पिता डॉ नुपूर और राजेश तलवार को ही उसकी और घरेलू नौकर हेमराज की हत्या का दोषी पाया है। असल में 16 मई, 2008 की जिस रात इस दोहरे हत्याकांड को अंजाम दिया गया था, उसके बाद से परिस्थितिजन्य साक्ष्य तलवार दंपति की ओर ही इशारा कर रहे थे। अभियोजन का यह तर्क अपने आपमें काफी मजबूत था कि जिस फ्लैट में चार लोग हों और दो की हत्या हो जाए और बचे दो को कुछ पता ही नहीं चले, यह कैसे संभव है! निश्चित रूप से इस मामले में सीबीआई की भूमिका भी शुरू से सवालों के घेरे में रही, जिसने एक समय इस मामले को बंद करने तक का फैसला ले लिया था। मगर यह भी नहीं भूलना चाहिए कि तलवार दंपति ने भी अपने स्तर पर हर तरह के कानूनी दांव-पेच आजमाने में कोई कसर नहीं छोड़ी; स्थिति यहां तक भी आई कि सर्वोच्च अदालत को उन्हें कई बार फटकार तक लगानी पड़ी। उनके व्यवहार से ऐसा लग रहा था, मानो वह इस मामले को लंबा खींचना चाहते हैं। तलवार दंपति वाकई कोई पेशेवर हत्यारे नहीं हैं, लेकिन उन्होंने जो कुछ किया, उसकी सभ्य समाज में कोई जगह नहीं है। यह मामला कहीं न कहीं उस जीवनशैली पर भी सवालिया निशान है, जहां वर्जनाएं तेजी से टूट रही हैं। हैरत की बात है कि दोषी ठहराए जाने के बावजूद तलवार परिवार का व्यवहार पीड़ितों जैसा है। जबकि जरूरत उन तीन नौकरों के बारे में भी सोचने की है, जिन्हें एक समय हत्यारा करार दिया गया था। क्या इस पर विचार नहीं होना चाहिए कि उन्हें और उनके परिजनों को जो यातनाएं झेलनी पड़ीं, उसकी भरपाई कैसे होगी? और फिर हेमराज के परिजनों पर जो बीत रही है, उसका क्या? इस फैसले से तलवार दंपति का असंतुष्ट होना स्वाभाविक है, मगर उनके लिए ऊपरी अदालतों के दरवाजे खुले हुए हैं, जहां उनके वकील जाने का ऐलान कर ही चुके हैं। नुपूर और राजेश तलवार को भारतीय न्याय व्यवस्था पर भरोसा रखना चाहिए।][अमर उजाला से साभार ]
राजेश व् नुपुर दोनों को अदालत ने दोषी माना और उन्हें उम्रकैद की सजा दी हालाँकि वे इससे कहीं अधिक सजा के हक़दार थे क्योंकि जो कुछ भी वे कर रहे थे वह कहीं से भी अचानक उपजी परिस्थिति का परिणाम नहीं था बल्कि सोची समझी साजिश थी किन्तु इन सबमे अगर कहीं उपेक्षा हो रही है तो वह है हेमराज की हत्या की .मात्र इसलिए कि उसकी हत्या इनके घर में हुई और इनकी लड़की आरुषि के साथ हुई ,ये मान लेना कि हेमराज के उससे गलत सम्बन्ध थे ,एक पुरातन सोच है ,क्यूँ नहीं सोचा जा रहा है ये कि हेमराज और आरुषि डॉ .राजेश तलवार के सम्बन्ध में ज़रूर कुछ ऐसा जान गए थे जो उनके अनुसार उन्हें नहीं जानना चाहिए था और ये हत्या उसी अनधिकृत जानकारी प्राप्त करने का परिणाम रही हो क्योंकि आरुषि की हत्या का यदि ऑनर किलिंग कारण है और राजेश तलवार व् नुपुर तलवार ने ही वह हत्या की है तो अब इसमें कुछ छिपा सकते ही नहीं हैं क्योंकि लगभग सारी दुनिया इस बारे में जान चुकी है और यदि उसकी हत्या उन्होंने नहीं की है और अदालत इस बारे में गलत समझ रही है तो वे ही बताएं कि हेमराज की लाश क्यूँ छिपाई ?आरुषि की अस्थियां जल्दी में क्यूँ विसर्जित की ?आरुषि के अंगों की सफाई क्यूँ की?दोनों कमरों के बीच की स्थिति में क्यूँ परिवर्तन किया ?और भी बहुत कुछ ऐसा है जो इन दोनों को संदेह के घेरे में लाता है और अब तो अदालत भी इन्हें ही दोषी मान चुकी है किन्तु अफ़सोस केवल ये है कि गरीब आदमी जो कि यहाँ हेमराज था मार डाला गया और हमेशा की तरह बदनाम मौत मारा गया उसका पक्ष न किसी ने रखा और न किसी ने इसकी ज़रुरत ही समझी और हमेशा के लिए एक और नौकर अपनी गरीबी की भेंट चढ़ गया .
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

सोमवार, 25 नवंबर 2013

भ्रष्टाचार का वास्तविक दोषी कौन ?

२० मार्च २०११ का हिंदुस्तान देखिये क्या कहता है-
करप्शन कप का जारी खेल,पैसे की है रेलमपेल,
कलमाड़ी के चौके तो ए-राजा के छक्के,सब हैं हक्के-बक्के,
बना कर गोल्ड नीरा यादव हो गयी क्लीन-बोल्ड,
नीरा राडिया की फील्डिंग,और वर्मा-भनोट की इनिंग,
सी.बी.आई ने लपके कुछ कैच,
हसन अली मैन ऑफ़ द मैच ,
आदर्श वालों की बैटिंग,
बक अप जीतना है वर्ल्ड करप्शन कप.
हांग-कांग स्थित पोलटिकल एंड इकोनोमिक रिस्क कंसल्टेंसी का खुलासा भ्रष्टाचार में भारत चौथे नंबर पर और स्थानीय स्तर के नेता राष्ट्रिय स्तर के नेताओं के मुकाबले अधिक भ्रष्ट .
२४ मार्च २०११ के हिंदुस्तान के नक्कारखाने शीर्षक के अंतर्गत राजेंद्र धोद्परकर लिखते हैं''यहूदी की लड़की''नाटक का प्रख्यात संवाद है ,
''तुम्हारा गम गम है हमारा गम कहानी ,
तुम्हारा खून खून है,हमारा खून पानी.''
अमेरिका के राष्ट्रपति थिओडोर रूजवेल्ट का एक वाक्य है  ,जो उन्होंने निकारागुआ के तानाशाह सोमोजा के बारे में कहा था कि''यह सही है कि वह है लेकिन वह हमारा है [छूटे हुए शब्द का अंदाज़ा आप खुद लगा लें]ये दोनों वाक्य भारतीय राजनीति के सूत्र वाक्य हैं.''
भारतीय  राजनीति  भ्रष्टाचार  के  दल  दल  में  फंसी  है  .भारतीय  राजनीति  ही  क्या  कहें हर  क्षेत्र  भ्रष्टाचार की गहरे को छू रहा है .सबसे पहले नगर पालिकाओं में भ्रष्टाचार जहाँ मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने   तक के लिए ऊपर से पैसे देने पड़ते हैं ताकि वह ठीक समय से मिल जाये.दुकानों पर जाओ तो खाने के सामान में पौष्टिक तत्व कम और कंकड़ पत्थर ज्यादा मिलते हैं.सब्जी मंडी जाओ तो  चमकदार अपनी और आकृष्ट करने वाली सब्जियों में रासायनिक तत्वों की महक ज्यादा आती है.दूध में दूध कम  पानी ज्यादा मिलता है.विद्यालयों में जाओ तो पढाई ,प्रवेश के नाम पर लूट खसोट ज्यादा दिखती है .प्रतियोगी परीक्षा देने जाओ तो अभ्यर्थी के ज्ञान से ज्यादा महत्व उसके माँ-बाप की कमाई रखती है .न्याय के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाओ तो स्वयं सुप्रीम कोर्ट के अनुसार ३० अप्रैल  हिंदुस्तान में प्रकाशित वक्तव्य-''भ्रष्टाचार से सुप्रीम कोर्ट आहत शीर्षक के अंतर्गत-दूसरों को क्या कहें जब हम खुद शीशे के घर में बैठे हैं .हमारी बिरादरी के लोग ऐसे मुकदमों का फैसला करते हैं जिनसे  वे खुद लाभान्वित होते हैं.साथ ही नौकरशाहों के लिए भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा-इनमे यह जबरदस्त आपसी समझ है-,''तू मेरी कमर खुजा मैं तेरी खुजाऊं.'' विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में लेख आदि छपवाने में पहचान लेखक की आलेखन क्षमता से ज्यादा वजन रखती है.हालात ये हैं कि नदीम नैय्यर कहते हैं-
''उम्मीदों पर ओस गिरा दी जाती है,
चूल्हे की आग बुझा दी जाती है ,
पहले हमको खाक बनाया जाता है,
फिर चुपके से खाक उड़ा दी जाती है.''
आज भारत में भ्रष्टाचार एक अहम् मुद्दा है और जहाँ देखो वहां भ्रष्टाचार पर हमले हो रहे हैं और तब भी रक्तबीज की तरह भ्रष्टाचार का राक्षस फैलता जा रहा है .जिसे देखो वह भ्रष्टाचार के खिलाफ गला फाड़ रहा है और ऐसा लगता है कि उस गला फाड़ने वाले को ही भ्रष्टाचार से सबसे ज्यादा तकलीफ है .राज्य के लोग केंद्र को कोस रहे हैं और केंद्र सारा ठीकरा राज्य के सर फोड़ रहा है.हरेक राजनीतिक दल,सामाजिक गुट व्यापारी वर्ग आदि के लिए दुसरे का भ्रष्टाचार भ्रष्टाचार है और अपना खुद का भ्रष्टाचार मजबूरी है.इस सन्दर्भ में सबसे चौन्काऊँ व् नाटकीय टिपण्णी कर्नाटक के पूर्व मुख्या मंत्री एच.डी. कुमारस्वामी ने की है .उनका मानना है-''कि यदि महात्मा गाँधी भी होते तो आज भ्रष्टाचार के जल से निकलने का रास्ता नहीं दूंढ पाते और वह भी भ्रष्टाचार के जरिये बैंक में  धन इकठ्ठा करते या राजनीति छोड़ देते.''
आज राजनीतिक क्षेत्र में तो लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ उठ खड़े हुए हैं किन्तु यह तो भ्रष्टाचार का मात्र एक क्षेत्र है और सर्वाधिक महत्व यह इसलिए रखता है क्योंकि यदि इस क्षेत्र में किसी की अच्छी पहचान है तो उसके अपने कम चुटकियों में हो जाते हैं किन्तु यदि हम पूर्ण रूप से विचार करें तो भ्रष्टाचार के सम्पूर्ण स्वरुप पर विचार करना होगा और इसको हटाने के लिए एकजुट होकर ठोस प्रयास करना होगा.वसीम बरेलवी ने कहा है-
''वैसे तो एक आंसू ही बहाकर मुझे ले जाये ,
वैसे कोई तूफान मुझे हिला नहीं सकता.
उसूलों पे अगर आंच आये टकराना ज़रूरी है,
जिंदा हैं तो जिंदा नज़र आना ज़रूरी है.''
आज भ्रष्टाचार मिटाने को अन्ना खड़े हो रहे हैं ,बाबा रामदेव आगे बढ़ रहे हैं साथ इनके करोड़ों हाथ जुड़ रहे हैं किन्तु सर्वाधिक महत्वपूर्ण है सम्पूर्ण जन समाज का उठ खड़े होना जिसने अपना मतलब पूरा करने को हर क्षेत्र में स्वयं को दबाना ज़रूरी समझा .कैसे भी हो अपना भविष्य संवारने का स्वप्न देखा .भ्रष्टाचार  में स्वयं में कोई बुरे नहीं है ये तो जनता का भय व् स्वार्थ है जो इसे बढ़ने का समय व् स्थान दे रहा है .स्वयं देखें कि एक मच्छर जो आपके आस-पास उड़ता है आप या तो उससे डरकर मच्छरदानी का सहारा लेते हैं या कोइल जला कर अपने पास से दूर भगा देता हैं किन्तु ये मच्छर से मुक्ति नहीं होती मुक्ति के लिए प्रशासन द्वारा फोगिंग कराये जाने पर ही पूर्ण राहत दिखाई देती है.मतलब सम्पूर्ण सफाया.हमारे क्षेत्र का ही उदहारण लें-विभिन्न सफाई कर्मी जो घरों से गंदगी ढोकर लाते हैं कहीं भी चाहे वह सुन्दर स्वच्छ इलाका हो या भरी जन समूह का इलाका गंदगी डालना शुरू कर देता हैं और लोग उनसे सम्बन्ध न बिगड़ जाएँ ,वे उनके घर कम करना बंद न कर दें इस डर से उनसे कुछ नहीं कहते,क्योंकि वे मात्र अपना हित देखते हैं और इस स्वहित देखने की नीति ने ही भ्रष्टाचार को बढाया है .और इस लिए मेरी नज़र में भ्रष्ट्राचार का वास्तविक दोषी और कोई नहीं सम्पूर्ण जनसमूह है .आप ही बताइए कि वही सी.बी.आई.जिसने आरुशी केस बंद कर दिया था आखिर न्यायालय का आदेश आने पर कैसे क्लोज़र रिपोर्ट ले आयी?जिस लोकपाल बिल पर सरकार आगे बढ़ने को तैयार नहीं होती थी कैसे जनता के एकजुट होने पर समिति बना आगे की कार्यवाही को तैयार हो गयी?क्यों मुज़फ्फरनगर की कचहरी में मास्टर विजय सिंह दबंग लोगों के भूमि हथियाने के खिलाफ १४-१५ साल से धरने पर बैठे है और उनकी एक नहीं सुनी जाती ?कारण है अन्ना के साथ जन समूह का जुड़ना और मास्टर विजय सिंह के साथ जन समूह का अभाव.
बेस मेयेरसेन  ने कहा है-
''भ्रष्टाचार के अपराध का हमेशा ही एक और गुनाहगार होता है और वह है हमारी उदासीनता.''
और हम यही अपनाते हैं,और इस तरह हम इस आचरण के सबसे बड़े दोषी हैं.हर जगह या हर गलत काम के खिलाफ हमें अन्ना या बाबा रामदेव नहीं मिलेंगे हमें स्वयं ही इस दिशा में मजबूती से आगे बढ़ना होगा.हम लोग यह मानते हैं कि ये हमारे बस का काम नहीं है ,आर्थर एश के शब्दों में -
''सफलता सफ़र है मंजिल नहीं,काम करना अक्सर नतीजे से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है.''
हमें'' जैसे भी हो अपना काम हो ''की नीति  से हटना होगाताभी हम भ्रष्टाचार की आग में पानी डाल पाएंगे,अन्यथा तो हम ही वह घी हैं जो इस आग को भड़का रहे हैं .आज राठोड ,कलमाड़ी पिट रहे हैं कोई मनोज शर्मा व् कोई उत्सव शर्मा बनकर इनपर हमले कर रहे हैं और यही जनाक्रोश है जो इसे जड़ से उखड कर फैंकेगा.हम ही हैं जो इसे बढ़ाने के दोषी हैं और हम ही हैं जो इसे आइना दिखा सकते हैं,माधव मधुकर के शब्दों में -
''दोष किसका है इसे बाद में तय कर लेंगे,
पहले इस नाव को तूफां से बचाया जाये.
ऐब औरों के गिनाने में महारत है जिसे,
ऐसे हर शख्स को आइना दिखाया जाये.
पी सकें आके जहाँ मन के मुताबिक प्यासे,
आओ मयखाना कोई ऐसा बनाया जाये.
मिल सके धूप हर आँगन को बराबर जिससे,
ऐसा सूरज कोई धरती पे उगाया जाये.
जल्द मंजिल पे पहुंचना है तो लाजिम है यही,
अपने क़दमों को जरा तेज़ बढाया जाये.''
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

गुरुवार, 21 नवंबर 2013

प्रतिबन्ध की लाइन में मोदी राहुल व् भंसाली

प्रतिबन्ध की लाइन में मोदी राहुल व् भंसाली
"I am not here to make you emotional, but to wipe your tears," said BJP PM candidate Narendra Modi at a rally in Jhansi on Oct 25. That was directly aimed at Congress AICC vice-president Rahul Gandhi, who recently made an emotional speech saying, " Sanjay Leela Bhansali2.jpg
आज मोदी की खुनी पंजा टिप्पणी पर चुनाव आयोग ने उन्हें आगे से सतर्क रहने को कहा ,इससे पहले राहुल गांधी को मुज़फ्फरनगर दंगों के सम्बन्ध में यहाँ के युवकों से आई.एस.आई.के संपर्क की बात पर उन्हें भी चुनाव आयोग ने चेताया था .इधर भंसाली की रामलीला को लेकर कभी प्रतिबन्ध लगाये जाते हैं तो कभी नाम बदलवाया जाता है .सवाल ये उठता है कि ये सब कदम जब ये लोग अपना मनचाहा कर चुके होते हैं तभी क्यूँ उठाये जाते हैं ?क्यूँ चुनाव आयोग स्वयं संज्ञान नहीं लेता उच्चतम न्यायालय की तरह ?क्यूँ सेंसर बोर्ड को नहीं दिखता गलत शीर्षक व् भ्रमित करने के इरादे ?इसी कारण जो इन्हें करना होता है वे ये कर चुके होते हैं और इन आयोगों की कार्यप्रणाली भी ऐसी ही दृष्टिगोचर होती है जो इन्हें ये करने की आज़ादी देती है क्या इसके दुष्परिणाम जो जनता को भुगतने होते हैं वे उसी को दिखने चाहिए ?फिर इनके अस्तित्व का उद्देश्य ही क्या रह जाता है ?
रोज़ रोज़ की ऐसी हरकतों से परेशानी जनता को ही झेलनी पड़ रही है ,कहीं दंगे तो कहीं आगजनी ,कहीं तोड़-फोड़ तो कहीं जाम किन्तु कानून व्यवस्था गायब .इन कार्यों द्वारा इन्हें जो प्रचार चाहिए होता है ये ले लेते हैं और रही सजा की बात तो यहाँ को कड़ाई नहीं की जाती ,आखिर इतना ढीलापन क्यूँ है यहाँ ?रोज़ मोदी अनर्गल प्रलाप किये जा रहे हैं हाँ राहुल गांधी द्वारा ज़रूर चुनाव आयोग की चेतावनी को गम्भीरता से लेते हुए अपने भाषणों में सावधानी बरती जा रही है किन्तु मोदी द्वारा नहीं और आगे भी वे कितना देश के कानून का सम्मान करते हैं ये दिख ही जायेगा और इधर भंसाली ने सारे में रामलीला का अपनी फ़िल्म को प्रचार दिला ही लिया है .अब चाहे कुछ भी किया जाये ये सब चर्चा में हैं और इन्हें यही करना था किन्तु देश की व्यवस्था यदि ऐसे में बिगड़े तो इनके लिए मात्र चेतावनी क्या सही सजा है या देश को झुलसने से बचाने का सही उपाय ?
ऐसे में ऐसे नेताओं पर कम से कम कुछ समय तक चुनाव प्रचार न करने का और फ़िल्म वालों पर कुछ समय तक फ़िल्म न बनाने का प्रतिबन्ध तो लगना ही चाहिए ताकि ये कम से कम एक बार तो सोचें और देश के कानून का यूँ मखौल न उड़ायें जैसे अपने ऐसे कृत्यों द्वारा ये महानुभाव उड़ाते हैं .
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

बुधवार, 20 नवंबर 2013

मोदी जैसे नेता तो गली गली की खाक......

"I am not here to make you emotional, but to wipe your tears," said BJP PM candidate Narendra Modi at a rally in Jhansi on Oct 25. That was directly aimed at Congress AICC vice-president Rahul Gandhi, who recently made an emotional speech saying, "

सुषमा स्वराज कहती हैं -''मैं हमेशा से शालीन भाषा के पक्ष में रही हूँ .हम किसी के दुश्मन नहीं हैं कि अमर्यादित भाषा प्रयोग में लाएं .हमारा विरोध नीतियों और विचारधारा के स्तर पर है .ऐसे में हमें मर्यादित भाषा का ही इस्तेमाल करना चाहिए .''

और आश्चर्य है कि ऐसी सही सोच रखने वाली सुषमा जी जिस पार्टी से सम्बध्द हैं उसी पार्टी ने जिन नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया है उन्ही ने मर्यादित भाषा की सारी सीमायें लाँघ दी हैं.व्यक्तिगत आक्षेप की जिस राजनीती पर मोदी उतर आये हैं वह राजनीति का स्तर निरंतर नीचे ही गिरा रहा है .सोनिया गांधी और राहुल गांधी पर व्यक्तिगत आक्षेप कर वे यह समझ रहे हैं कि अपने लिए प्रधानमन्त्री की सीट सुरक्षित कर लेंगे जबकि उनसे पहले ये प्रयास भाजपा के ही प्रमोद महाजन ने भी किया था उन्होंने शिष्ट भाषण की सारी सीमायें ही लाँघ दी थी किन्तु तब खैर ये थी कि वे भाजपा के प्रधानमन्त्री पद के उम्मीदवार नहीं थे .
अटल बिहारी वाजपेयी जी जैसे सुलझे हुए नेतृत्व में रह चुकी यह पार्टी जानती होगी कि कैसे संसदीय व् मर्यादित भाषा के इस्तेमाल के द्वारा अपने विरोधियों को भी अपना प्रशंसक बनाया जाता है .सत्ता की होड़ में लगे सभी दलों का अपना अपना स्थान बनाने की अपनी अपनी शैली होती है और सभी विरोधी दलों को उनके सिद्धांतों ,नीतियों की खुली आलोचना कर उसे जनता के समक्ष बेनकाब करते हैं किन्तु भाजपा के ये नए उम्मीदवार इस कसौटी पर कहीं भी खरे नहीं उतरते और न ही स्वयं भाजपा क्योंकि इस पार्टी में एक प्रदेश से आये व्यक्ति को बरसों बरस से दल की सेवा कर रहे अनुभवी ,योग्य ,कर्मठ नेताओं के ऊपर बिठा दिया जाता है और वह केवल इस दम पर कि वे चारों तरफ से अपना पलड़ा मजबूत कर आगे बढ़ रहे हैं बिलकुल वैसे ही जैसे पुराने राजा -महाराजाओं में कोई भी अपनी ताकत के बलपर राजा को जेल में डाल देता था और स्वयं राजा बन जाता था ठीक वैसे ही भाजपा की ओर से कब से प्रधानमंत्री बनने का सपना पाले बैठे आडवाणी जी ,भाजपा के अत्यंत योग्य सुषमा स्वराज जी ,अरुण जेटली जी एक ओर बिठा दिए जाते हैं और मोदी जैसे तलवार के दम पर आगे बढ़ जाते हैं .
आज भाजपाई भारत रत्न के विवाद के बढ़ने पर कॉंग्रेस को चित करने के लिए अटल जी के लिए भारत रत्न की बात करते हैं अरे पहले अपने दल में तो उन्हें रत्न का दर्जा दीजिये ,इस तरह उन्हें नकारकर तो ये दल स्वयं को और उन्हें हंसी का पात्र ही बना रहा है स्वयं अपने घर में जिसकी कद्र न हो उसे बाहर का कुछ नहीं भाता और अटल जी के साथ ये पार्टी वही व्यवहार कर रही है जो आज इस दल की मुख्य पंक्ति करती है .भारतीय जनता में आज बुजुर्गों के साथ इसी तरह का उपेक्षा पूर्ण व्यवहार का प्रयोग में लाया जाता है और सभी देख रहे हैं कि कैसे आज भाजपा ने अटल जी को एक तरफ फैंक दिया है ये तो मात्र कॉंग्रेस के खिलाफ आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति है जो वे याद किये जा रहे हैं

आडवाणी जी ये समझ रहे हैं और इसलिए अपने को ऐसे हाल से बचाने के लिए विरोध के बावजूद ऊपर से भले ही ''नमो -नमो ''का उच्चारण कर रहे हैं किन्तु अंदर से जाप मरो-मरो का ही कर रहे हैं और यही कारण है कि मोदी की तुलना ओबामा से करते हैं खुद से क्यूँ नहीं करते ?जानते हैं कि मोदी ''देशी भेष में अमरीकन दिल ''लिए फिरते हैं और जैसे कि सभी जानते हैं कि
''इश्क़ व् मुश्क़ छिपाये नहीं छिपते ''
वैसे ही मोदी का अमरीका प्रेम भी कहाँ छिपने वाला है जब तब वहाँ के वीज़ा मिलने की ख़बरें आज की पेड़ न्यूज़ द्वारा निकलवाते रहते हैं इसलिए आडवाणी जी ओबामा से ही मोदी की तुलना में भलाई समझते हैं और इस तरह अपने दोनों हाथ तेल में और सिर कढ़ाई में रखते हैं कि अगर मोदी बाईचांस प्रधानमंत्री बन गए तो ओबामा से तुलना का श्रेय और नहीं बने तो मैंने तो पहले ही विरोध किया था और फिर आज प्रचार की जिस बुलंदी पर अन्य भाजपाइयों के मुकाबले मोदी हैं कोई भी अन्य भाजपाई ''आ बैल मुझे मार ''कह मोदी से क्यूँ भिड़ेगा ?
स्थानीय क्षेत्रों में भी वह व्यक्ति जो पुलिस वालों से बदतमीजी से ,असभ्यता से बातचीत कर लेता है वह बहुत बड़ा नेता माना जाता है क्योंकि आमतौर पर लोग पुलिस वालों के साथ चापलूसी ,खुशामदी रवैया अपनाते हैं किन्तु उनकी बहादुरी वहाँ नज़र आती है जब पुलिस वाले उनसे अपना काम निकालने के लिए उन्हें अपनी व् कानून की ताकत दिखाते हैं और तब वे बड़े बड़े बोल बोलने वाले पुलिस वालों के जूते साफ करते नज़र आते हैं ,वही स्थिति यहाँ नज़र आ रही है .यहाँ स्थानीय नेता की भूमिका में नरेंद्र मोदी हैं और पुलिस की भूमिका में राहुल व् सोनिया गांधी ,जनता पर अपना प्रभाव दिखाने को ,देश की किसी भी समस्या के बारे में जानकारी न रखने वाले ,किसी भी स्थिति का सही सामान्य ज्ञान न रखने वाले मोदी मात्र राहुल सोनिया के विरोध के दम पर ही अपने झंडे गाड़ने की कोशिश में भाजपा की कथित सभ्य ,देश की संस्कृति का सम्मान करने की छवि का रोज अपमान करते जा रहे हैं और अपमान कर रहे हैं भारतीय संविधान का जिसने १९५० में ही देश को गणतंत्र घोषित किया और सम्राट परम्परा का अंत किया .
समझ नहीं आता कि ऐसे में भाजपा को नेताओं की ऐसे क्या कमी पड़ गयी है जो मोदी जी जैसे अशिष्ट ,असभ्य और अल्पज्ञ व्यक्ति को अपना २०१४ के नेतृत्व सौंप दिया जबकि उनके जैसे नेता तो भारत की हर गली में खाक छानते फिरते हैं .

शालिनी कौशिक
[ कौशल ]

मंगलवार, 19 नवंबर 2013

जन्मदिन ये मुबारक हो '' इंदिरा'' की जनता को ,

 
अदा रखती थी मुख्तलिफ ,इरादे नेक रखती थी ,
वतन की खातिर मिटने को सदा तैयार रहती थी .
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मोम की गुड़िया की जैसी ,वे नेता वानर दल की थी ,,
मुल्क पर कुर्बां होने का वो जज़बा दिल में रखती थी .
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पाक की खातिर नामर्दी झेली जो हिन्द ने अपने ,
वे उसका बदला लेने को मर्द बन जाया करती थी .
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मदद से सेना की जिसने कराये पाक के टुकड़े ,
शेरनी ऐसी वे नारी यहाँ कहलाया करती थी .
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बना है पञ्च-अग्नि आज छुपी है पीछे जो ताकत ,
उसी से चीन की रूहें तभी से कांपा करती थी .
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जहाँ दोयम दर्जा नारी निकल न सकती घूंघट से ,
वहीँ पर ये आगे बढ़कर हुकुम मनवाया करती थी .
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कान जो सुन न सकते थे औरतों के मुहं से कुछ बोल ,
वो इनके भाषण सुनने को दौड़कर आया करती थी .
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न चाहती थी जो बेटी का कभी भी जन्म घर में हो ,
मिले ऐसी बेटी उनको वो रब से माँगा करती थी .
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जन्मदिन ये मुबारक हो उसी इंदिरा की जनता को ,
जिसे वे जान से ज्यादा हमेशा चाहा करती थी .
शालिनी कौशिक 
[कौशल ]

शनिवार, 16 नवंबर 2013

उचित समय पर उचित निर्णय -हार्दिक धन्यवाद् भारत सरकार

उचित समय पर उचित निर्णय -हार्दिक धन्यवाद् भारत सरकार
Bharat Ratna
Bharat Ratna.jpg
AWARD INFORMATION
TYPECivilian
CategoryNational
DescriptionAn image of the Sun along with the words "Bharat Ratna", inscribed inDevanagari script, on a peepal leaf
Instituted1954
Last awarded2013
Total awarded43
Awarded byGovernment of India
RibbonIND Bharat Ratna BAR.png
First awardee(s)Sarvepalli RadhakrishnanSir C.V. RamanC. Rajagopalachari
Last awardee(s)Sachin Tendulkar,Prof. CNR Rao

रोटी ,आटा ,नमक ,प्याज़ ,नरेंद्र मोदी की बढ़ती असभ्यता ,राहुल गांधी का बढ़ता प्रभाव ,केजरीवाल के बढ़ते किलोमीटर और शीला दीक्षित के प्रति लोगों का सम्मान ,महंगाई का घेरा ,मंगल पर भारत का फेरा सब एक तरफ रखा रह गया तब जब एक खबर कानों में पड़ी ऐसी पड़ी कि सब मैल छंट गया और सब कुछ सही सही सुनाई देने लगा और वह ख़ुशी थी इस खबर के रूप में -
Sachin first sportsperson to win country's highest civilian honour ...
''सचिन को भारत रत्न का मिलना हर भारतीय के लिए वह ख़ुशी है जो भारत सरकार ने सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न की घोषणा कर सचिन से ज्यादा उनके करोड़ों प्रशंसकों को दी है .सचिन के लिए भारत सरकार कहती है -
सचिन तेंदुलकर निस्‍संदेह असधारण क्रिकेटर हैं। वे दुनिया भर के करोड़ों लोगों के प्रेरणास्रोत हैं। 24 साल के करियर के दौरान 16 वर्ष की उम्र से ही वे दुनिया भर में खेले और देश का नाम रोशन किया। क्रिकेट में उनका योगदान अतुलनीय है। 

- भारत सरकार

sachin


किन्तु सचिन के प्रशंसक उसके लिए अपने मनोभाव केवल अपनी प्रतिक्रियायों से ही व्यक्त कर सकते हैं .सचिन जिन्होंने अपने प्रशंसकों को खुले हाथों से अपना बल्ला चलाकर जो विश्वास ,जीत का एहसास दिया है उसका प्रतिफल कोई भी भारतीय कभी भी नहीं दे सकता किन्तु भारत सरकार ने भारत रत्न से नवाज़ने की घोषणा कर उनके करोड़ों प्रशंसकों के दिलों को जीत लिया है और इसे दिलों को जीतना ही कहा जायेगा क्योंकि हर दिल आज न केवल भारतीय का बल्कि सम्पूर्ण विश्व का दिल आज क्रिकेट से संन्यास की घडी में सचिन के ही साथ है और चाहता है कि चाहे कैसे भी हो क्रिकेट के इस भगवान को अपनी ओर से कोई न कोई तोहफा अवश्य दे ऐसा तोहफा जो अविस्मरणीय बन जाये और ऐसे में हर दिल की नब्ज़ को पकड़कर भारत सरकार ने ये साबित कर दिया है कि ''भारत एक सच्चा लोकतंत्र है और यहाँ जनता की ,जनता के द्वारा व् जनता के लिए ही सरकार बनी है .''सचिन को भारत रत्न हर भारतीय की ओर से सर्वश्रेष्ठ उपहार कहा जा सकता है . और कहा जा सकता है कि
''हज़ार बर्फ गिरें ,लाख आंधियां उठें ,
वो फूल खिलकर ही रहेंगे जो खिलने वाले हैं .''
इसलिए सचिन को बधाई के साथ साथ वर्त्तमान भारत सरकार को उचित समय पर उचित निर्णय हेतु हार्दिक धन्यवाद् .
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

गुरुवार, 14 नवंबर 2013

सियासत-सेवा न रहकर खेल और व्यापार हो गयी .

सियासत आज सिर पर सवार हो गयी ,
सेवा न रहकर खेल और व्यापार हो गयी .
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मगरमच्छ आज हम सबके मसीहा हैं बने फिरते,
मुर्शिद की हाँ में हाँ से ही मोहब्बत हो गयी .
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बेबस है अब रिआया फातिहा पढ़ रही है ,
सियासी ईद पर वो शहीद हो गयी .
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फसाद अपने घर में खुद बढ़के कर रहे हैं ,
अवाम इनके हाथों की शमशीर हो गयी .
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शह दे रहे गलत की शहद भरी छुरी से ,
शहज़ादा देख शाइस्तगी काफूर हो गयी .
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दायजा बनी दानिश अब इनकी महफ़िलों में ,
मेहनत की रोटी इनकी रखैल हो गयी .
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कहते हैं पहरेदारी हम कर रहे वतन की ,
जम्हूरियत जनाज़े में यूँ तब्दील हो गयी .
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करते हैं गलेबाजी ,लगाते कहकहे हैं ,
तकलीफ हमारी इन्हें रूह अफ़ज़ा हो गयी .
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गवाही दे रही हैं इस मुल्क में हवाएं ,
मौज़ूदगी से इनकी ज़हरीली हो गयी .
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गुमराह करें हमको गिर्दाब में ये घेरे ,
इनसे ही गुफ्तगू हमारी मौत हो गयी .
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''शालिनी''कर रही है गिरदावरी इन्हीं की ,
शिकार बनाना ही जिनकी फितरत हो गयी .
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शालिनी कौशिक
[कौशल ]
शब्दार्थ -रूह अफ़ज़ा-प्राणवर्धक ,मुर्शिद-धूर्त आदमी ,फातिहा -मरने पर फातिहा पढ़ना ,दायजा-दहेज़ ,दानिश-अक्ल,गिरदावरी-घूम घूम कर जाँच करना ,गिर्दाब-भंवर ,गलेबाजी-बढ़-चढ़कर बाते करना .

बुधवार, 13 नवंबर 2013

विवाह-पैसे से अधिक प्यार की दरकार .


देवोत्थान एकादशी आ गयी बजने लगे बैंड बाजे ,चारों ओर बहुत पहले से ही शादी ब्याह के इस मुहूर्त की शोभा होने लगती है ,चहल-पहल बढ़ने लगती है ओर इससे भी बहुत पहले होने लगता है लड़के वालों के घर का नव-निर्माण बिलकुल ऐसे ही जैसे कि उन्हें वास्तव में इसी दिन की तलाश थी कि कब हमारे घर की लक्ष्मी आये औऱ हमारे घर की शोभा बढे .
आरम्भ में तो ऐसा ही लगता है कि लड़के वाले बहु के आगमन की तैयारियां यही सब सोच कर करते हैं और जिस घर में रह रहे होते हैं चैन से आराम से ,सुकून से ,जिसमे उन्हें कोई परेशानी नहीं होती बल्कि एक ऐसा घर होता है वह उनके लिए जो कि आस-पास के सभी घरों से हर मायने में बेहतर होता है और तो और ऐसा कि उसके सामने अन्य कोई घर कबाड़े के अलावा कुछ नहीं होता किन्तु लड़के की शादी तय होते ही लड़के वाले उस घर में नए नए परिवर्तन करने लगते हैं न केवल रंगाई -पुताई अपितु फर्श से लेकर दीवार तक खिड़की से लेकर घर की चौखट तक वे पलट डालते हैं ,लगता था कि वास्तव में कितना उत्साह होता है बहु लाने का ,किन्तु जब असलियत मालूम हुई तो पैरों तले जमीन ही खिसक गयी क्योंकि ये उत्साह यहाँ लड़के को तो जीवनसाथी पाने का तो होता ही है उससे भी कहीं ज्यादा उसे और उसके परिजनों को होता है एक ऐसे दहेज़ का जिसके लिए वे बचपन से लेकर आज तक अपने लड़के को पढ़ाते आये थे ,उसकी ज़रूरतों को पूरा करते आये थे ,कुल मिलाकर उनका निवेश अब चार गुना होकर मिलने का समय आ जाता है और यही कारण है लड़के वालों का घर में बहुत से नव-परिवर्तन कराने का ,जिनके लिए सारा धन वे लड़की वालों से लेने वाले हैं .
आज लोगों ने इस सम्बन्ध को इतना निम्न स्तर प्रदान कर दिया है कि कहीं भी शादी -ब्याह के सुअवसर पर दोनों पक्ष के लोगों में मेल-मिलाप की ख़ुशी नहीं दिखाई देती अपितु दिखाई देता है कोरा आडम्बर और एक दुसरे को पैसे में नीचा दिखाने की भावना जिसने इस सुन्दर अवसर को निकृष्ट स्वरुप प्रदान कर दिया है .
कौन समझाए कि ये अवसर दो लोगों के ही मेल-मिलाप का नहीं अपितु दो परिवारों दो संस्कृतियों के मेल का अवसर है और लड़का हो या लड़की दोनों के लिए एक नव जीवन की शुरुआत है जिसमे उन्हें सभी का प्यार व् सहयोग आवश्यक है न कि दिखावा और नीच-ऊंच की भावना .अगर इस सम्बन्ध को एक मीठा एहसास देना है तो इसमें प्यार भरें ,विश्वास भरें न कि पैसे और कुटिलता फिर देखिये ये मधुरता की मिसाल अवश्य कायम करेगा .


शालिनी कौशिक
[कौशल ]

रविवार, 10 नवंबर 2013

चुनावी हथकंडा -एक लघु कथा .


चुनावी हथकंडा -एक लघु कथा .
कांग्रेस ने देश को खोखला कर दियाः मोदी 
मम्मी-मम्मी देखो आंटी क्या कह रही हैं ?श्रुति को यूँ चीखते हुए देख मीना तेज़ी से अपना हाथ लिखने से रोककर बोली ,''क्या हुआ श्रुति !अब क्या कह दिया अरुणा आंटी ने ,मम्मी कल तक तो फिर भी बर्दाश्त की जद में था ,जब वे यह कहती थी कि मेरा एडमिशन स्कूल में उन्होंने कराया ,पापा को एक्सीडेंट से बचाया ,भैया को प्रमोशन दिलाया और आपको नॉमिनेट कराया ,पर आज तो वे जो कह रही हैं वह तो बर्दाशत की हद पार कर रहा है ,श्रुति मुंह फुलाते हुए बोली ,पर आज क्या कह दिया अरुणा ने बता तो ,मम्मी ,आज तो आंटी ये कह रही हैं ,''कि हमारा घर उन्हीं का है ,जो आपने और पापा ने उनके अपनों का क़त्ल कराकर ''खुनी पंजे व् जालिम हाथ ''से हासिल किया था .''
''कोई बात नहीं बेटा कहने दे ,देश में संविधान ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी है और जब देश में प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार कुछ भी ऊट-पटाँग बोल सकता है तो फिर वे क्यूँ नहीं ?वे भी तो कॉलोनी में चैयरमैन पद की प्रत्याशी हैं .''
''अच्छा मम्मी ,ये आंटी का चुनावी हथकंडा है ,फिर कोई बात नही ,ये कहकर श्रुति खेलने चल दी और मम्मी अपना आलेख पूरा करने .
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

शनिवार, 9 नवंबर 2013

आजकल की सास

आजकल की सास

आजकल की सास बहू को पार लगा देगी ,
बेटे की नैया की पतवार डुबा देगी .
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समधी बोला समधिन सुनले काम न आवे बिटिया को ,
समधिन बोले घर तो खुद ही खूब चला लेगी .
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समधिन बोले सुन लो समधी माल तो लूंगी खरा खरा ,
कमी अगर की लेशमात्र भी आग लगा देगी .
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बेटा बोला घरवाली को साथ मैं अपने रखूँगा ,
देख ये तेवर पूरे घर को सिर पे उठा लेगी .
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रोटी दो ही मिलेंगी तुझको दाल मिलेगी चमचा भर ,
बस इतना दे सारे दिनभर नाच नचा लेगी .
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बेटे की न बने बहू से रोटी गले से उतर रही ,
दोनों खुश दिख जाएँ अगर तकरार करा देगी .
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बहू अगर न करने वाली कमी गायेगी सारे में ,
करे अगर वो सास की खातिर नाक चढ़ा लेगी .
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नाकाबिल हो तो सिर फोड़े काबिल हो तो सिर खाये ,
ऐसी बनी कि हर हालत में उसे चबा लेगी .
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कहे ''शालिनी ''सास शब्द में घमंड क्रोध यूँ भरा पड़ा ,
कितनी भी माँ कोशिश करले उसे दबा लेगी .
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

बुधवार, 6 नवंबर 2013

कॉंग्रेस का नहीं सही का समर्थन तो करो .

कॉंग्रेस का नहीं सही का समर्थन तो करो .
एक कहावत है शायद सभी ने सुनी होगी -
''देर आयद दुरुस्त आयद ''
और चुनाव पूर्व सर्वेक्षण के मामले में कॉंग्रेस द्वारा इस पर रोक लगाये जाने का प्रस्ताव रखना एक ऐसा ही काम है किन्तु हमारे यहाँ एक परिपाटी बन गयी है कि जिसका विरोध करना है उसका विरोध ही करना है भले ही वह सही बात पर भी हो किन्तु देखा जाये तो ये एक गलत परंपरा है क्योंकि यदि हम सभी इन सर्वेक्षणों की गहराई में जाएँ तो ये आम भारतीय जनता का सही व् पूर्ण प्रतिनिधित्व नहीं करते जिसके लिए आज हम सभी लड़ रहे हैं .हम सभी चाहते हैं कि सत्ता में वह दल हो जिसे हमारा पूर्ण समर्थन हो किन्तु अपने इस मत के लिए हम आज सही बात पर बोलने वाली कॉंग्रेस को ये कहकर कि उसे अपनी हार का डर है इसलिए वह इन पर रोक लगाने की बात कर रही है जबकि ये कहकर हम स्वयं सत्य से मुंह मोड़ रहे हैं .हम सभी जानते हैं कि इन सर्वेक्षणों में सम्बंधित क्षेत्र के पूरे/आधे तो क्या चौथाई प्रतिनिधियों का मत भी सम्मिलित नहीं होता .यदि इसमें चुनाव में बहती हवा का २५% भी शामिल हो तो इस पर विचार किया जा सकता है किन्तु ये भी तब जब भारत की जनता पूर्ण साक्षर हो .एक ऐसे देश में जहाँ जनता में अशिक्षा का अंधकार फैला है वहाँ इस तरह के सर्वेक्षण,मात्र १ या २ प्रतिशत का मत लिए जाने का सर्वेक्षण इतने जोर-शोर से प्रचारित किये जाते हैं जिससे समस्त वोटरों पर एक ऐसा हौव्वा बैठता है कि वे उसी तरह जैसे ''आसमान गिर रहा है ,आसमान गिर रहा है ''कहानी में लोग फंस गए थे ,फंस जाते हैं और ''पानी में रहकर मगरमच्छ से बैर क्यूँ करे ''सोचकर झूठी जीतने वाली पार्टी को वोट देने चल देते हैं .अगर अगर ऐसी जीत की चाह रखने वाले दलों का हम समर्थन करते हैं तो हम क्या हुए ?क्या हम सच्चाई का समर्थन करने वाले हुए ?मैं नहीं कहती कि कॉंग्रेस का समर्थन करो या भाजपा का किन्तु अपने दिमाग का समर्थन तो करो जो ये कहता है कि इस वक्त कॉंग्रेस सही कह रही है भले ही अपने भविष्य़ के मद्देनज़र कह रही हो या देश के भविष्य़ के मद्देनज़र और कहा भी गया है कि
'' सुबह का भूला यदि शाम को घर लौट आये तो उसे भूला नहीं कहते ''
फिर हम क्यूँ ये भूल कर रहे हैं कॉंग्रेस सही कह रही है ये मानने से हम उसका नहीं बल्कि देश में सही कदम का समर्थन कर सकते हैं और अन्य दलों के साथ ही सपा का समर्थन भी यही साबित करता है .
More parties support ban on opinion polls
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

''शालिनी''के दीप हजारों काम यही कर जायेंगे -दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं

30 Best and Beautiful Diwali Greeting card Designs and backgrounds

वसुंधरा के हर कोने को जगमग आज बनायेंगे ,
जाति-धर्म का भेद-भूलकर मिलकर दीप जलाएंगे .
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पूजन मात्र आराधन से मात विराजें कभी नहीं ,
होत कृपा जब गृहलक्ष्मी को हम सम्मान दिलायेंगें .
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आतिशबाजी छोड़-छोड़कर बुरी शक्तियां नहीं मरें ,
करें प्रण अब बुरे भाव को दिल से दूर भगायेंगे .
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चौदह बरस के बिछड़े भाई आज के दिन ही गले मिले ,
गले लगाकर आज अयोध्या भारत देश बनायेंगे .
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सफल दीवाली तभी हमारी शिक्षित हो हर एक बच्चा ,
छाप अंगूठे का दिलद्दर घर घर से दूर हटायेंगे .
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भ्रष्टाचार ने मारा धक्का मुहं खोले महंगाई खड़ी ,
स्वार्थ को तजकर मितव्ययिता से इसको धूल चटाएंगे .
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उल्लू पर बैठी लक्ष्मी से अंधी दौलत हमें मिले ,
अंधी भक्ति मिटाके अपनी गरुड़ पे माँ को लायेंगे .
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बेरोजगारी निर्धनता ने युवा पीढ़ी भटकाई है ,
स्वदेशी को सही भाव दे इन्हें इधर ले आयेंगे .
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मंगलमय है तभी दीवाली खुशियाँ बिखरें चारों ओर ,
''शालिनी''के दीप हजारों काम यही कर जायेंगे .
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शालिनी कौशिक
[कौशल ]

बेटी की...... मां ?

बेटी का जन्म पर चाहे आज से सदियों पुरानी बात हो या अभी हाल-फ़िलहाल की ,कोई ही चेहरा होता होगा जो ख़ुशी में सराबोर नज़र आता होगा ,लगभग...