सियासत-सेवा न रहकर खेल और व्यापार हो गयी .

सियासत आज सिर पर सवार हो गयी ,
सेवा न रहकर खेल और व्यापार हो गयी .
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मगरमच्छ आज हम सबके मसीहा हैं बने फिरते,
मुर्शिद की हाँ में हाँ से ही मोहब्बत हो गयी .
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बेबस है अब रिआया फातिहा पढ़ रही है ,
सियासी ईद पर वो शहीद हो गयी .
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फसाद अपने घर में खुद बढ़के कर रहे हैं ,
अवाम इनके हाथों की शमशीर हो गयी .
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शह दे रहे गलत की शहद भरी छुरी से ,
शहज़ादा देख शाइस्तगी काफूर हो गयी .
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दायजा बनी दानिश अब इनकी महफ़िलों में ,
मेहनत की रोटी इनकी रखैल हो गयी .
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कहते हैं पहरेदारी हम कर रहे वतन की ,
जम्हूरियत जनाज़े में यूँ तब्दील हो गयी .
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करते हैं गलेबाजी ,लगाते कहकहे हैं ,
तकलीफ हमारी इन्हें रूह अफ़ज़ा हो गयी .
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गवाही दे रही हैं इस मुल्क में हवाएं ,
मौज़ूदगी से इनकी ज़हरीली हो गयी .
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गुमराह करें हमको गिर्दाब में ये घेरे ,
इनसे ही गुफ्तगू हमारी मौत हो गयी .
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''शालिनी''कर रही है गिरदावरी इन्हीं की ,
शिकार बनाना ही जिनकी फितरत हो गयी .
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शालिनी कौशिक
[कौशल ]
शब्दार्थ -रूह अफ़ज़ा-प्राणवर्धक ,मुर्शिद-धूर्त आदमी ,फातिहा -मरने पर फातिहा पढ़ना ,दायजा-दहेज़ ,दानिश-अक्ल,गिरदावरी-घूम घूम कर जाँच करना ,गिर्दाब-भंवर ,गलेबाजी-बढ़-चढ़कर बाते करना .

टिप्पणियाँ

बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी.बेह्तरीन अभिव्यक्ति!शुभकामनायें.
आपका ब्लॉग देखा मैने और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.
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