शनिवार, 30 मार्च 2013

जया प्रदा भारतीय राजनीति में वीरांगना

जया प्रदा भारतीय राजनीति में वीरांगना

Jayaprada.jpg   
Ek Mulaqat is a talk show on India’s public broadcaster – Doordarshan News. It is hosted by the journalist Manoj Tibrewal Aakash. The show currently runs on Saturdays 2130 hrs with repeat Sundays 2330 hrs Indian time.[1][2]
Several Indian Cabinet Ministers, Members of Indian Parliament, industrialists and Bollywood personalities have featured in this programme. These include Ambika Soni, Jyotiraditya Scindia, Naveen Jindal, Vilasrao Deshmukh, Deepika Padukone, Javed Akhtar, Mohinder Amarnath, and Dr. S.Y. Quraishi.
In August 2010, on the show, noted Bollywood actress Deepika Padukone praised the young Indian Member of Parliament, Rahul Gandhi as a “classical role model” for youth and expressed the hope that he leads India as prime minister one day.

 इसे कहते हैं बहादुरी जो राजनीति जैसी स्वार्थी जगह पर रहते हुए जयाप्रदा जी रखती हैं .हमने नहीं देखा किसी भी राजनीतिज्ञ को सीधे बात करते . ये ही तो खासियत होती है राजनीतिज्ञों की, जो कि सभी को नज़र भी आती है .यहाँ रहने वाले अपने दल की, अपने साथियों की बढ़ चढ़ कर प्रशंसा करते हैं किन्तु किसी भी रसूख वाले राजनीतिज्ञ या शख्सियत की बुराई नहीं करते उनसे अपने या किसी और के मतभेदों को दबा देते हैं या बल्कि इसे उनका व्यक्तिगत मामला कहकर छोड़ देते हैं किन्तु जया प्रदा इनसे बिलकुल  इतर लगी .
       २३ मार्च २०१३ की रात दूरदर्शन पर न्यूज़ चैनल पर मैं जैसे ही जयाप्रदा जी का साक्षात्कार देखने लगी कि वहां से हटने का मन ही नहीं हुआ क्योंकि ''मनोज टिबरेवाल आकाश  जी''जिस कुशलता से उनका साक्षात्कार ले रहे थे जया जी उससे बिल्कुल अलग एक भावुक व् सच्चे इन्सान की तरह अपने विचार सपा ,मुलायम सिंह जी ,आज़म खान जी व् अमिताभ जी के बारे में व्यक्त कर रही थी .जया जी ने साफ कहा कि वे मुलायम जी को पिता समान मानती हैं किन्तु सपा में महिलाओं की कोई इज्ज़त नहीं है क्योंकि जया प्रदा जी का अपमान करने वाले आज़म खान जी पर कोई कार्यवाही नहीं हुई .
    जया जी ने अमिताभ जी को भी आड़े हाथों लिया उन्होंने कहा कि अमर सिंह जी ने अमिताभ जी के बुरे वक़्त में उनका बहुत साथ दिया और अमिताभ जी ने उन्हें बड़े भाई का दर्जा  किन्तु जब अमर सिंह जी बीमार हुए कोई उनके साथ नहीं था .वे वेंटिलेटर पर थे आई.सी.यू में उनके साथ खड़ा होने वाला कोई नहीं था .
   मनोज टिबरेवाल जी के ये पूछने पर कि वे कौनसी पार्टी अब ज्वाइन करेंगी पर उनका कहना था कि जो भी करूंगी अमर सिंह जी के साथ व् सलाह से करूंगी और ये पूछने पर कि क्या फिर रामपुर से लड़ेंगी तो उन्होंने जिस बहादुरी के साथ इसका जवाब दिया वह मन बाग बाग कर गया क्योंकि वे स्पष्ट शब्दों में कह रही थी कि
''जिस पार्टी को मैं ज्वाइन करूंगी यदि उसने मुझे वहां का टिकट दिया तो मैं ज़रूर रामपुर से ही लडूंगी .''
          अब तक हमने ऐसा कोई साक्षात्कार नहीं देखा था अब तक के सभी में अपनी तारीफों के बड़े बड़े पुल बांधे जाते थे किन्तु ये पहली बार हुआ है कि जया प्रदा जी ने अमर सिंह जी के सहयोग को अपने कार्यों से ज्यादा महत्व दिया और आज़म खान जी जैसे दबंग के खिलाफ खुल कर मुहं खोल और साथ ही सपा का यह चेहरा भी सबके सामने रख दिया कि इस पार्टी में महिलाओं का कोई सम्मान नहीं है और ये बात एक ऐसी महिला कहिये, नेत्री कहिये ,ने कही है जो इस पार्टी की कर्मठ कार्यकर्ता रही हैं सांसद रही है .
    आप भी इस साक्षात्कार  को इस लिंक पर जाकर देख सकते हैं
      

Manoj Tibrewal Aakash interviewed Film Actress & MP Jaya Prada for Ek Mulaqat (Promo)


  
                                       शालिनी कौशिक
                                                    [कौशल]
            

गुरुवार, 28 मार्च 2013

मोदी संस्कृति:न भारतीय न भाजपाई .


मोदी संस्कृति:न भारतीय न भाजपाई .



Indian_culture : indian flag with map of india Stock Photo
''तरन्नुम,तरन्नुम,तरन्नुम,तरन्नुम ,
है गुमसुम,है गुमसुम,है गुमसुम,है गुमसुम,
ये लोगों का लश्कर कहाँ जा रहा है ,
जहन्नुम,जहन्नुम,जहन्नुम,जहन्नुम.''  
 आज सारा देश होली के रंगों में सराबोर है और जिसे देखो इसे पूर्ण रूप से भारतीय सभ्यता संस्कृति के अनुसार मनाये जाने की बात कह रहा है किन्तु भारतीय सभ्यता संस्कृति की जो धज्जियाँ हमारे कुछ माननीय नेतागण को लेकर उड़ाई जा रही हैं उस और सभी इस बात को कहते हैं कि ''जो जैसा करेगा वैसा भरेगा ,''अर्थात ये हमारे नेतागणों के कुकृत्य ही हैं जिनके कारण आज उनके साथ इस तरह के बर्ताव को अंजाम दिया जा रहा है .जनता तो इस बात को कह सकती है किन्तु जब हमारे नेतागण ''जो कि उसी मंडली के सदस्य हैं ''वे ऐसा कहते हैं तो क्या हमें  हमें विचार नहीं करना चाहिए कि ये ऐसा कहने के कैसे अधिकारी हो सकते हैं किन्तु ऐसा नहीं है हम भी उनके साथ जुड़कर उसी असभ्यता पर उतर आते हैं और भुला देते हैं उस संस्कृति को जिसके गुणगान सारा विश्व करता है और जिसके कारण सभी जगह इस संस्कृति की पूजा की जाती है .
     भारतीय सभ्यता संस्कृति विश्व में हमारी पहचान है ,भारतीयों की सबसे बड़ी संपत्ति है .विश्व की कितनी ही संस्कृतियाँ भारत में आई और सभी को भारत और भारतीयों ने ''अतिथि देवो भवः''कहकर आत्मसात कर लिया और सर्वाधिक महत्वपूर्ण यह रहा कि भारतीय संस्कृति तब भी जीवन्त रही.हम भारतीयों ने अपने मित्रों के साथ साथ शत्रुओं को भी गले लगाया और उन्हें प्रेम का पथ पढाया .बड़ों को आदर देना ,छोटों से स्नेह करना हमारी संस्कृति सिखाती है .न केवल भारतीय समाज बल्कि भारतीय राजनीति भी इसी सभ्यता को अपनाती रही जहाँ अपने विरोधियों की भी मुक्त कंठ से प्रशंसा की जाती थी .पंडित जवाहर लाल नेहरु जी जो कौंग्रेस के थे उन्होंने भाजपा के अटल बिहारी वाजपयी जी की मुक्त कंठ से प्रशंसा करते हुए कहा था कि ''ये युवक राजनीति में बहुत आगे जायेगा .''सोनिया गाँधी जी जो कौंग्रेस की अध्यक्ष है और भाजपा के लिए आलोचना का सबसे बड़ा मुद्दा वे तक मोदी जी की तारीफ करती हैं और उनके प्रधानमंत्री  बनने की आशा करती हैं .



Sonia Gandhi takes credit for Modi’s victory in Gujarat, says he should become the PM 

 ये भारतीय संस्कृति ही है कि आपसी मतभेदों की प्रचुरता होने पर भी भूतपूर्व भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी जी  वर्तमान कौंग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी जी को अपने बेटे की शादी में आमंत्रित करते हैं

The Times Of India

सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव जी भाजपा के भूतपूर्व अध्यक्ष लाल कृष्ण अडवाणी जी के बारे में अपने बेटे और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश जी से कहते  हैं -

''......अडवाणी जी  कभी झूठ नहीं बोलते ''

  Samajwadi Party supremo Mulayam's high praise for Advani has BJP divided

 Mulayam Singh and LK Advani

 ये भारतीय संस्कृति है जो उन्हें ऐसा करने को प्रेरित करती है .ये भारतीय संस्कृति है जो संसद का सत्र आरम्भ होने पर सभी दलों के नेताओं को एक दूसरे के अभिवादन करने को प्रेरित करती है जो सिखाती है कि आपसी मतभेद कभी भी हमारे आपसी शिष्टाचार से ऊपर नहीं होने चाहियें .

भारत एक विकासशील देश है और यहाँ के नागरिकों का विकसित राष्ट्रों की चकाचौंध की ओर आकर्षित होना एक सामान्य बात है किन्तु विदेशियों का भारत की ओर आकृष्ट होना मात्र इसे बाजार समझकर नहीं बल्कि इसकी संस्कृति ही वह चुम्बक है जो विदेशियों को अपनी ओर खींचती है और उन्हें अपने ही रंग में रंग देती है .सेवा सत्कार परोपकार की महत्ता ने मेरी टेरेसा को मदर टेरेसा बनाकर भारत में ही बसा लिया .''पूरब और पश्चिम'' फिल्म का यह गाना भारतीय संस्कृति की महिमा को कुछ यूँ व्यक्त करता है -

''इतनी ममता नदियों को भी जहाँ माता कहके बुलाते हैं ,
इतना आदर इन्सान तो क्या पत्थर भी पूजे जाते हैं ..''

 किन्तु आज स्थिति पलटती जा रही है .जैसे कि 'पूरब और पश्चिम' से 'फिर भी दिल है हिंदुस्तानी 'में हुआ परिवर्तन -
   ''पूरब और पश्चिम''में कहा जाता है -
 ''होठों पे सच्चाई रहती है ,जहाँ दिल में सफाई रहती है ,
 हम उस देश के वासी हैं जिस देश में गंगा बहती है .''

 और फिर भी दिल है हिंदुस्तानी  में हुआ परिवर्तन -
''हम लोगों कोसमझ सको तो समझो दिलबर जानी ,
जितना भी तुम समझोगे उतनी होगी हैरानी ,
थोड़ी हममे सच्चाई है ,थोड़ी बेईमानी  ,
उलटी सीधी जैसी भी है अपनी यही कहानी....''

 पहले भी राजनीति  में छींटाकशी होती थी किन्तु वह नीतियों सिद्धांतों तक सीमित थी .पहले भी राजनीतिज्ञों की बुराइयाँ होती रही हैं किन्तु जो स्वरुप आज राजनीतिक दलों,मीडिया व् जनता ने लिया है वह निंदनीय है .बुराई की जा रही है किन्तु बहुत सोच-समझकर .आज शराफत की हंसी उड़ाई जा रही है और दबंगई गुंडागर्दी की मसाज की जा रही है .

भारत में सत्तापक्ष हमेशा से आलोचना का शिकार रहा है और भारत ही क्या समस्त विश्व में यही हाल है किन्तु भारत में ये हाल ज्यादा ख़राब यूँ है क्योंकि यहाँ आरम्भ से लेकर अब तक वर्चस्व एक ही दल का है और वह है ''कॉंग्रेस '' 

कॉंग्रेस जिस नेतृत्व के बलबूते ये मुकाम हासिल किये है वह ''खिसयानी बिल्ली खम्बा नोचे''बने दलों व् इनके समर्थकों की आँख की किरकिरी बना हुआ है .साथ ही किरकिरी बनता है वह नेता जिसका झुकाव व् श्रृद्धा इस परिवार के लिए होती है .

From left, Indian Prime Minister Manmohan Singh, Congress party president Sonia Gandhi and Congress party general secretary Rahul Gandhi wave to party supporters during a public rally, in New Delhi, India , Sunday, Nov. 4, 2012.

सोनिया गाँधी- राहुल गाँधी आज इस परिवार के सदस्य हैं और डॉ. मनमोहन सिंह -देश के प्रधानमंत्री इस दल के सदस्य और इस परिवार से गहराई से जुड़े हैं ,ईमानदारी से जुड़े हैं तो न तो किसी को इन सबकी देश के विकास के  प्रति एकनिष्ठ भक्ति ,मेहनत दिखती है और न ही देश से इनका प्यार का जज्बा ,हर एक को दिखती है मात्र वह लोकप्रियता और प्यार जो जनता के मन में इनके लिए है नहीं दीखता वह बलिदान जो इस श्रृद्धा ,विश्वास की नींव है और जिसे ये अपने  चेहरे पर शराफत का पेंट लगाकर भी हासिल नहीं कर सकते .
      भाजपा के प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी  के लिए जबरदस्ती फेविकोल से चिपकने की कोशिश करने में जुटे नरेन्द्र मोदी जी को कौंग्रेस का भविष्य अधर में डालने वाले सीताराम केसरी व् राजीव गाँधी जी की आतंकवादी हादसे में हुई मृत्यु की सद्भावना में प्रधानमंत्री बने पी.वी.नरसिम्हाराव जी में इस परिवार के प्रति निष्ठां में कुछ कमी दिखी तो वे उनकी कुछ तारीफ कर गए नहीं तो ये कम न्होंने कभी सीखा ही नहीं और वे ही वे महान शख्सियत हैं जो आज स्वयं और अपने अंध समर्थकों के जरिये भारतीय राजनीति की परम्पराएँ तोड़ने में लगे हैं . 

राहुल गाँधी जी को यह कहकर की उन्हें देश में कहीं नौकरी भी नहीं मिलेगी कह वे उन्हें कोई चोट नहीं पहुंचाते क्योंकि उन्हें किसी नौकरी की कोई आवश्यकता ही नहीं है वे अपने में देश सँभालने की योग्यता रखते हैं और बेकार में गाल बजाते नहीं फिरते किन्तु इस माध्यम से वे या ज़रूर साबित करते हैं की राजनीति में जहाँ शिक्षा कोई योग्यता नही है वहां लगभग ८०%राजनीतिज्ञ जो यहाँ अपनी पूरी रसोई बना रहे हैं देश में चपरासी बनने की हैसियत भी नही रखते .

शशि थरूर की पत्नी की तुलना ५० करोर की गर्ल फ्रैंड से करना और अपनी पत्नी यशोदा बेन को शादी कर सारी उम्र गाँव में छोड़कर वे नारी शक्ति का अपमान करते हैं और वह भारतीय जनता के पुरोधा बनने को आगे आना चाहते हैं किन्तु भारतीय जनता में से कोई भी आगे आ उनके इन कृत्यों की निंदा नहीं करता .क्या उनकी अपने देशवासियों के प्रति कोई जवाबदेही नहीं है ?क्या ऐसे कृत्यों को वे जायज़ ठहरा सकते हैं ?

narendra Modi labels Shashi Tharoor's wife a 'Rs 50 crore girlfriend'

Shashi Sunanda  

 और उधर शशि थरूर एक सच्चे भारतीय होने का फ़र्ज़ निभाते हुए व्हार्टन मुद्दे पर उनका साथ देते हैं तब भी  मोदी जी के समर्थक शशि थरूर की गाड़ी के शीशे तोड़ देते हैं .
      २७ साल तक पश्चिमी बंगाल पर शासन करने वाले ज्योति बासु जी तक भारत में कभी प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी  के लिए इस तरह कभी प्रचारित नही किये गए जिस तरह मात्र  तीन  जीत पर नरेन्द्र मोदी जी का नाम उछाला जा रहा है और उनका समर्थन करने के लिए कौंग्रेस के सुसभ्य सुसंस्कृत नातों का अपमान किया जा रहा है जबकि भाजपा में स्वयं उनके नाम को लेकर कोई दिलचस्पी नहीं है और न ही उनके द्वारा अपनाये जा रहे इन हथकंडों को लेकर क्योंकि भाजपा के वरिष्ठ व् कद्दावर  नेता गण जानते हैं कि राष्ट्रीय राजनीति में एक क्षेत्रीय नेता की कोई महत्ता नहीं है और राष्ट्रीय चुनाव की हवा को उस तरह के मोड़ नहीं दिए जा सकते जैसे मोड़ एक राज्य की राजनीति में दिए जाते हैं और जो मोड़ मोदी जी अपने राज्य की सत्ता हासिल करने के लिए आज तक देते आये हैं .

 ये प्रधानमंत्री डॉ..मनमोहन सिंह जी ,यू.पी.ए.अध्यक्ष सोनिया गाँधी जी और कौंग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी जी ही हैं जो विरोधी दलों के निरंतर अपमानजनक भाषा के प्रयोग किये जाने पर भी विरोधी पक्ष को कोई आंच नहीं आ रही है जबकि सभी जानते हैं कि  अभी हाल में ही माननीय बाल ठाकरे जी के सम्बन्ध में विवादस्पद टिप्पणी करने के कारण  दो लड़कियां आफत का शिकार हुई बसपा प्रमुख मायावती जी पर अपमानजनक टिप्पणी दैनिक जागरण के कार्यालय को तोड़ फोड़ के रूप में झेलनी पड़ी और ममता बेनर्जी का कार्टून बनाना कार्टूनिस्ट को जेल ले गया .

इसका सीधा साफ मतलब ये है कि आज भारत में कुछ राजनेता और जनता में उनके समर्थक भारतीय सभ्यता संस्कृति के अपमान द्वारा अपना स्थान बनाने में लगे हैं जबकि सभ्यता  संस्कृति इस ओर ध्यान न दे उन्हें बढ़ने के लिए ही प्रेरित कर रही हैं जबकि उनको भी अब इसी ओर कदम बढ़ने होंगे ताकि ऐसी परवर्तियों पर अंकुश लगाया जा सके क्योंकि ईंट  का जवाब हमेशा पत्थर होता है फूल नहीं .महात्मा गाँधी के ''एक गाल पर चांटे के जवाब में दूसरा गाल आगे करने ''का प्रेरक वचन आज की परिस्थितयों में लागू नहीं होता .आज लागू होता है तो बस यही-
     ''दुनिया के लात मारो  दुनिया सलाम करे ,
      कभी नमस्ते जी तो कभी राम राम करे ,
    दुनिया के बाप हो तुम दुनिया तुम्हारी  है .
            शालिनी कौशिक 
                [कौशल ]
 

 

 

 

 









रविवार, 24 मार्च 2013

होली की शुभकामनायें तभी जब होली ऐसे मनाएं



 
·            कल जब मैं बाज़ार से घर लौट रही थी तो देखा कि स्कूलों से बच्चे रंगे हुए लौट रहे हैं और वे खुश भी थे जबकि मैं उनकी यूनीफ़ॉर्म के रंग जाने के कारण ये सोच रही थी कि जब ये घर पहुंचेंगे तो इनकी मम्मी ज़रूर इन पर गुस्सा होंगी .बड़े होने पर हमारे मन में ऐसे ही भाव आ जाते हैं जबकि किसी भी त्यौहार का पूरा आनंद   बच्चे ही लेते हैं क्योंकि वे बिलकुल निश्छल भाव से भरे होते हैं और हमारे मन चिंताओं से ग्रसित हो जाते हैं किन्तु ये बड़ों का ही काम है कि वे बच्चों में ऐसी भावनाएं भरें जिससे बच्चे अच्छे ढंग से होली मनाएं.हमें चाहिए कि हम उनसे कहें कि होली आत्मीयता का त्यौहार है इसमें हम सभी को मिलजुल कर आपस में ही त्यौहार मानना चाहिए और कोशिश करनी चाहिए की हमारे काम से किसी के दिल को चोट न पहुंचे.ये कह कर कि "बुरा न मानो  होली है "कहने से गलत काम को सही नहीं किया जा सकता इसलिए कोशिश करो कि हम सबको ख़ुशी पहुंचाएं .किसी उदास चेहरे पर मुस्कुराहट  लाना हमारा त्यौहार मनाने का प्रमुख लक्ष्य होना चाहिए.फिर इस त्यौहार पर हम आज कुछ गलत वस्तुओं का प्रयोग कर दूसरों को परेशान करने की कोशिश करते हैं यह  भी एक गलत बात है त्यौहार पर हमें केवल प्राकृतिक रंगों से खेलना चाहिए.हम निम्न प्रकार रंग तैयार भी कर सकते हैं-
·        पिसे हुए लाल चन्दन के पाउडर को लाल रंग के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं.
·         हल्दी को पीले रंग के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं.
·         मेहँदी पाउडर को हरे रंग के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं.
·         गुडहल के फूलों को धूप में सुखाकर लाल रंग तैयार कर सकते हैं.
साथ ही रंग छुड़ाने के लिए भी आप इन तरकीबों का इस्तेमाल कर सकते हैं-
  • जहाँ रंग लगा हो उस स्थान पर खीरे की फांक रगड़ कर रंग छुड़ा सकते हैं.
  • नीम्बूँ के रस में चीनी मिलकर व् कच्चे पपीते के गूदे को रगड़ कर भी रंग छुड़ाया जा सकता है.
इस पर्व से जुडी सबसे प्रमुख कथा भक्त प्रह्लाद की है जिसमे उन्हें मारने   के लिए होलिका उन्हें लेकर अग्नि में बैठी  और भगवन भोलेनाथ द्वारा दिया गया दुशाला ओढ़ लिया किन्तु भक्त प्रह्लाद इश्वर  के सच्चे भक्त थे दुशाला उन पर आ गया और होलिका जल कर भस्म हो गयी इसी याद में हर वर्ष होलिका दहन किया जाता है और दुश्प्रवर्तियों   के शमन की कामना की जाती है.
आज आवश्यकता इसी बात की है कि  हम इस त्यौहार के मानाने  के कारण  पर ध्यान दें न कि  इसके ढंग पर .और आपस में भाईचारे को बढ़ाने  का काम करें न कि नई दुश्मनिया बढाने  का.जो ढंग इस वक़्त इस त्यौहार को मनाने का चल रहा है वह सही नहीं है.हम देखते हैं कि  रंग लगने के बाद सभी एक जैसे हो जाते हैं कोई बड़ा छोटा नहीं रह जाता .कोई अमीर  गरीब नहीं रह जाता तो हमारी भी कोशिश सभ्यता के दायरे में रहते हुए आपसी  प्रेम को बढाने की होनी चाहिए.मैं सोचती हूँ कि  मेरा यह लेख इस दिशा में आपको ज़रूर प्रेरित करेगा.मैं आपको अंत में साधक गुरुशरण के शब्दों में होली मनाने के उत्तम ढंग बताते हुए होली की शुभकामनायें प्रेषित करती हूँ.
"आओ खेलें ज्ञान की होली,
राग द्वेष भुलाएँ,
समता स्नेह  बढ़ा के दिल में
प्रेम का रंग लगायें."
     
            शालिनी कौशिक
                  [कौशल ]

शनिवार, 23 मार्च 2013

शख्सियत होने की सजा भुगत रहे संजय दत्त :बस अब और नहीं .

शख्सियत होने की सजा भुगत रहे संजय दत्त :बस अब और नहीं .
   1993 Mumbai Bomb Blast Case: Sanjay Dutt will file appeal against the conviction
जमील मानवी के शब्दों में -
''तेरी हथेली पर रखा हुआ चिराग हूँ मैं ,
तेरी ख़ुशी है कि जलने दे या बुझा दे मुझे.''
शख्सियत होना और एक चिराग होना एक ही बात है. हर कोई चाहता है कि मैं एक कामयाब इन्सान बनूँ और अपने खानदान का चश्म-ओ-चिराग और दोनों ही स्थितियां ऐसी हैं जिसमे ऐसी चाह रखने वाला ऐसा जलता है जैसे दिया और ये चाहत उसे भीतर तक भस्म कर डालती है भले ही बाहर से वह कितना ही रोशन दिखाई दे भीतर से वह खत्म हो चुका होता है .कुछ ऐसी ही विडम्बना से भरा है संजय दत्त का जीवन .
      साल १९९२ अयोध्या कांड मुंबई के लिए तो भयावह साबित हुआ ही साथ ही दुखदायी कर गया सुनील दत्त का जीवन और भी ,जो कि पहले से ही संजय दत्त की जीवन शैली से आजिज था .अपनी माँ नर्गिस की असमय मृत्यु से संजय दत्त इतने भावुक हुए कि नशेबाज हो गए और बाद में अपने पिता की मदद की प्रवर्ति के कारण कानून तोड़ने वाले और ये बहुत भारी पड़ा सुनील दत्त पर लगातार मिलती धमकियाँ सुनील दत्त को तो नहीं डरा सकी किन्तु ३३ वर्षीय यह युवा अपनी दो बहनों और अपनी पत्नी व् बच्ची के कारण  डर गया और उसने कानून को अपने हाथ में लेने का मन बना लिया किसी भी तरफ से सुरक्षा की गारंटी न मिलना भी इसकी एक मुख्य वजह रहा और इसी डर के कारण  सनम फिल्म के निर्माता हनीफ और  समीर  हिंगोरा की मदद से एक एके -५६ रायफल और एक पिस्टल रख ली लेकिन नहीं जानते थे कि इन्हें रखकर वे अपने परिवार की सुरक्षा तो क्या करेंगे उलटे उनके दिल का दर्द ही बन जायेंगे.
      लगभग १८ महीने जेल में बिता चुके संजय के लिए २००६ में टाडा अदालत ने स्वयं कहा था -''संजय एक आतंकवादी नहीं है और उन्होंने अपने घर में गैर कानूनी रायफल अपनी हिफाजत के लिए रखी थी ''इसके बाद से उन पर टाडा के आरोप ख़त्म कर दिए गए और उन्हें आर्म्स एक्ट के तहत ६ साल की सजा सुनाई गयी और अब २१ मार्च को जो घटाकर ५ साल कर दी गयी जो १८ महीने जेल में काटने के कारण साढ़े तीन साल रह गयी है .
   यह सही है कि संजय दत्त का अपराध माफ़ी योग्य नहीं है इस तरह यदि हर आदमी हथियारों को अपने घर में स्थान दे अपनी हिफाजत का स्वयं इंतजाम करने लगा तो कानून व्यवस्था डगमगा जाएगी किन्तु संजय दत्त एक आम इन्सान नहीं है एक शख्सियत हैं और इस हैसियत के नाम पर उन्हें क्या मिला मात्र दर्द और असुरक्षा का भाव .जहाँ उन जैसी शख्सियत की सुरक्षा की गुहार का यह अंजाम होता है वहां आम आदमी कैसे अपनी सुरक्षा का भरोसा कर सकता है ?
    एक आदमी जो कि आम है फिर भी स्वतंत्र है क्योंकि वह यदि हथियार रखता है तो किस को पता नहीं चलता पता केवल तभी चलता है जब वह उससे किसी वारदात को अंजाम देता है और बहुत सी बार किसी और का लाइसेंस किसी और के काम भी आ  जाता है अर्थात पिस्टल किसी की और प्रयोग किसी और ने की चाहे लूट कर चाहे चोरी से किन्तु यहाँ तो ऐसा कुछ हुआ ही नही यहाँ तो ऐसा कोई साक्ष्य नही कि संजय दत्त ने उन हथियारों से कोई गलत काम किया हो या उनके हथियार का कोई गलत इस्तेमाल हुआ हो और फिर सुप्रीम कोर्ट तो पहले ही उन्हें अच्छे चाल-चलन के आधार पर जमानत  दे चुकी  है .
   संजय दत्त के अपराध में सजा में माफ़ी नहीं दी जाती किन्तु सजा में विलम्ब को तो सुप्रीम कोर्ट पहले ही न्याय मान चुकी है .टी.व्.वाथेसरन  बनाम तमिलनाडु राज्य ए.आई.आर.१९८३ सु.को.३६१ में उच्चतम न्यायलय ने कहा -''कि जहाँ अभियुक्त  का मृत्यु दंड दो वर्षों से अधिक विलंबित रखा गया हो ,वहां उसके दंड को आजीवन कारावास में बदल दिया जाना उचित है क्योंकि इतनी लम्बी अवधि तक अभियुक्त पर मृत्यु की विभीषिका छाई रहना उसके प्रति अन्याय है तथा इस प्रक्रियात्मक व्यतिक्रम के दुष्प्रभाव के शमन के लिए एकमात्र उपाय मृत्यु दंड को घटाकर आजीवन कारावास में परिवर्तित कर दिया जाता है।''
    उत्तर प्रदेश राज्य बनाम लल्लू ए.आई.आर १९८६ सु.को.५७६ के वाद में यद्यपि अभियुक्त ने ग्राम प्रमुख का सर धड से अलग करके उसकी निर्मम हत्या की थी परन्तु मृत्यु दंडादेश पारित किये जाने के बाद दस वर्ष की लम्बी अवधि बीत जाने के कारण उसके मृत्यु दंड को आजीवन कारावास में बदल दिया गया .
     ऐसे में जब प्रत्येक मामले में सुप्रीम कोर्ट वाद के तथ्यों व् परिस्थियों को सामने रख अपने निर्णय करता है तो आज जब हम दांडिक मामलों में सुधारात्मक  प्रक्रिया को अपनाने की ओर बढ़ रहे हैं ,साथ ही हम गाँधी के देश के रहने वाले हैं जो कहते थे कि ''पाप से घृणा करो पापी से नहीं .''और जब पूर्व न्यायाधीश मारकंडे काटजू भी संजय दत्त को माफ़ी दिए जाने को कह रहे हैं तब संजय का तब से लेकर अब तक का कोई अपराधिक इतिहास न रहना और इस मामले में भी न उनके हाथ न हथियार का खून से रंग होना और उनका अच्छा चाल-चलन उनके लिए माफ़ी का ही विधान करता है .
     संजय दत्त जैसे व्यक्ति को उस जेल की काल कोठरी में भेज जाना सुधार की ओर बढती हुई बहुत सी अन्य जिंदगियों को भी अपराध  की ओर ही धकेल सकता है जो आज वार्ता व् समर्पण के जरिये अपराध की राह छोड़ फिर से जीवन यापन की ओर ही बढ़ रही है .
   ऐसे में यही सही होगा कि संजय दत्त की वह १८ महीने की जेल और सजा मिलने में इतने लम्बे विलम्ब को आधार मानकर उन्हें माफ़ी दे दी जाये और एक जिंदगी जिससे जुडी कई और जिंदगियां जो आज खुशहाली की राह पर कदम बढ़ा रही हैं उनके पांव में बेड़ियाँ न डाली जाएँ .साथ ही ये कहना कि कानून सबके साथ समान होना चाहिए तो ये तो संजय दत्त भी कह सकते हैं हमारी उस प्रतिक्रिया पर जो हम अन्य हथियार उठाये भटके लोगों द्वारा हथियार छोड़ उनके  मुख्यधारा  में  आने पर देते हैं फिर संजय दत्त को उनसे अलग क्यों रखा जा रहा है क्या हम भूल गए है कि यदि सुबह का भटका शाम को घर आ जाये तो उसे भूला नहीं कहते .जब हम अन्य अपराधियों के मुख्यधारा में लौटने का समर्थन करते हैं तो यही हमें संजय दत्त के मामले में भी करना चाहिए और वैसे भी संजय दत्त मात्र आर्म्स एक्ट के दोषी हैं भारतीय दंड सहिंता के नहीं टाडा के नहीं लेकिन हम ऐसा नहीं करेंगे क्योंकि संजय दत्त एक शख्सियत हैं आम आदमी नहीं .के,एन,कौल के अनुसार -
    ''खुद रह गया खुदा  भूल गया ,
     भूलना किसको था क्या भूल गया ,
      याद हैं मुझको तेरी बातें लेकिन ,
     तू ही खुद अपना कहा भूल गया .''

            शालिनी कौशिक
                  [कौशल]

शुक्रवार, 22 मार्च 2013

अमिताभ बच्चन :सामाजिक और फ़िल्मी शानदार शख्सियत

अमिताभ बच्चन :सामाजिक और फ़िल्मी शानदार शख्सियत



 

फुल्ल कमल ,       दूध नवल,
गोद नवल,          पूत नवल,
मोद नवल,          वंश में विभूति नवल,
गेंहू में विनोद नवल,  नवल दृश्य ,
बाल नवल,          नवल दृष्टि ,
लाल नवल ,         जीवन का नव भविष्य ,
दीपक में ज्वाल नवल , जीवन की नवल सृष्टि .
      जानते हैं हरिवंश राय ''बच्चन''जी की इस कविता की सृष्टि किस हस्ती के लिए हुई ,उन्ही के लिए जो न केवल उनके वंश की वरन हमारे भारतवर्ष की विभूति हैं . सितारों की दुनिया बोलीवूड  पर एक लम्बे समय से राज करने वाले अमिताभ जी ने जब हरिवंश राय जी के यहाँ जन्म किया तो एक  कवि ह्रदय से यही उद्गार प्रगट होने थे और हुए किन्तु जैसे कि माँ-बाप को तो अपने सभी बच्चे प्रिय होते हैं किन्तु कितने बच्चे ऐसे होते हैं जो अपने माँ-बाप के सपनों पर खरे उतरें ये सवाल भविष्य के गर्त में ही छिपा रहता है और अमिताभ जी वह विभूति हैं जो अपने माता -पिता के सपनों पर खरे उतरे और न केवल खरे उतरे बल्कि एक बहुत अच्छे पुत्र ,पति ,पिता और सबसे बड़ी बात है कि इन्सान साबित हुए। माता पिता की सेवा को अमिताभ जी ने पूर्ण निष्ठां से निभाया और उन्हें अपने इस कार्य पर कोई घमंड नहीं बल्कि वे कहते हैं -
''हर संतान को यह सब करना चाहिए .मैं ऐसा मानता हूँ और मैंने ऐसा किया इस वजह से कभी कुछ नहीं किया कि आदर्श बनना है या मिसाल रखनी है .''
  आज के युग में ऐसा चरित्र  इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आज भौतिकवाद बढ़ रहा है और बच्चा स्वयं अपने माँ बाप से छुटकारा पाने में अपनी स्वतंत्रता मन रहे हैं ,कुम्भ में छोड़ रहे हैं या वृद्धाश्रमो में भेज रहे हैं .
      एक पति के रूप में उनकी खूबियों को जया जी से बेहतर  कोई नहीं बता सकता .वे कहती हैं -
''अमित जी हर फैसले में अपने परिवार के साथ बेशर्त खड़े हुए ,चाहे वह बाद में मेरी फिल्मों में वापसी हो या बच्चों की जिंदगी .वे बेमिसाल बेटे तो साबित हुए ही पति और पिता के रूप में भी बहुत प्यारे हैं .जब वे अस्पताल में मौत से जूझ रहे थे ,पूरा देश  उनके लिए दुआ कर रहा था तब भी उन्हें मेरी और बच्चों की चिंता थी .''
अमिताभ बच्चन सामाजिक बुराइयों के खिलाफ न केवल लिखते हैं बल्कि उनके खिलाफ खड़े होकर लड़ते भी हैं .और अपने जीवन में भी अपने विचारों को स्थान  देते हैं .जया जी बताती है -
   ''मई  १९७३  में जंजीर रिलीज़  हुई  और तीन साल के बाद 4 जून १९७३ को हम एक दूसरे के हो गए .शादी से पहले ही उन्होंने मेरे घरवालों को बता दिया था कि वे दहेज़ या उपहार स्वीकार नहीं करेंगे और वे उस पर अडिग रहे .''

 आज जहाँ हमारा समाज तलाक जैसी गंभीर समस्या से जूझ रहा है और ऐसे में बोलीवूड जैसी जगह जहाँ रिश्तों के लिए न कोई स्थान है न कोई मर्यादा वहां अमिताभ जी एक ऐसा परिवार लेकर चल रहे हैं जहाँ पूर्ण सामाजिक दायित्वों का निर्वाह किया जाता है .माँ-बाप के प्रति अपने पूरे कर्तव्य निभाए जाते हैं पति पत्नी द्वारा अपने संबंधों को पूर्ण गरिमा और विश्वास के साथ निभाया जाता है और बेटा-बेटी -बहू  के प्रति अपने सभी दायित्व पूर्ण किये जाते हैं और इन संबंधों में जो आपसी प्रेम विश्वास होना चाहिए वह सभी यहाँ देखने में आता है .पति पत्नी के रिश्तों को उन्होंने एक नया मुकाम यहाँ दिलाया है जहाँ आमिर -रीना ,धर्मेन्द्र-प्रकाश कौर-हेमामालिनी ,बोनी-श्रीदेवी जैसे मामले हैं वहां जया जी को सौभाग्यशालिनी ही कहा जायेगा की उन्हें एक महानायक से सीधे सादे इन्सान का प्यार मिला .वे कहती हैं -
''शादीशुदा जिंदगी में रूमानियत हमेशा नहीं रहती ,पर मुहब्बत हमेशा जिंदा रहती है .जब मुझे मलेरिया हुआ ,वह किसी नर्स की तरह बुखार उतरने तक मेरे माथे पर गीली पट्टियाँ रखते रहे ,हमारा दांपत्य जीवन किसी दूसरे दंपत्ति से अलग नहीं रहा .''
बड़ों के प्रति सम्मान उनके संस्कारों में भरा है कहती हैं जया -
''मेरे घर पहुँचने में देरी होने पर अमित जी मेरी माँ से इतने प्यारे ढंग से माफ़ी मांगते थे कि  वे तुरंत नरम पड़ जाती थी .सच कहूं तो दूसरों का ख्याल रखना और आदर देना उनके संस्कारों में शामिल हैं .''
 अपने परिवार को प्रमुखता देना अमिताभ जी का विशेष गुण है और इसलिए वे अपने परिवार में बहुत प्रिय हैं .एक साक्षात्कार में जब अभिषेक बच्चन से पूछा गया -''व्यक्ति,पिता और परिवार के मुखिया के रूप में आप उनका चित्रण कैसे करेंगे ?'' तो वे कहते हैं -''हर रूप में सर्वोत्तम .''

अमिताभ जी जहाँ काम करते हैं पूरे दिल  से करते हैं और इसी का परिणाम है उनके हर काम में सफलता का मिलना .अमिताभ जी के जो मन में आता है वह करते हैं और उसे पूरी शिद्दत से करते हैं कोई कितना भी उन्हें डिगाने की कोशिश करे वे कभी विचलित नहीं होते ''कौन बनेगा करोड़पति ''शो द्वारा टेलीविजन पर उतरने वाले अमिताभ जी ने ये मिसाल पेश की है की कोई भी काम छोटा बड़ा नहीं होता बल्कि वह उसे करने वाले की शख्सियत और मेहनत पर निर्भर है और ये शो उन्होंने तब किया जबकि जया जी इसके खिलाफ थी क्योंकि वे सोचती थी कि इससे अमिताभ जी की विशाल छवि टीवी तक सिकुडकर रह जाएगी .गुजरात जहाँ गोधरा दंगों की काली छाया ने पर्यटन को बहुत नुकसान पहुँचाया था उसे संवारा फिर से अमिताभ जी ने .साइबर संसार में सुपर लाइक अमिताभ जी के लिए हुए  बीबीसी के एक ऑनलाइन सर्वेक्षण में उन्हें ''स्टार ऑफ़ द मिलेनियम  '' के ख़िताब दिया गया .सुपर स्टार की हैसियत पाने के बाद हृषिकेश मुखर्जी अमिताभ बच्चन को ''महाराज'' कहकर बुलाते थे .ऐसे हैं अमिताभ जी कि मन करता है कि कहूं  ,एक बार नहीं बार बार कहूं -
''कुछ लोग वक़्त के सांचों में ढल जाते हैं ,
कुछ लोग वक़्त के सांचों को ही बदल जाते हैं ,
माना कि वक़्त माफ़ नहीं करता किसी को ,
पर क्या कर लोगे उनका जो वक़्त से आगे निकल जाते हैं .''
         सीखिए आज के हीरों बनने चले आज कल के युवाओं कि सच्चा मर्द कैसे बना जाता है .
                                                                 शालिनी कौशिक


रविवार, 17 मार्च 2013

हाय रे .!..मोदी का दिमाग ...................

हाय रे .!..मोदी का दिमाग ...................
News Photo: Chief Ministers Narendra Modi and Shivraj Singh Chauhan…

    नरेन्द्र मोदी ने राहुल गाँधी की ओर संकेत करते  हुए  कहा कि कोई बाहें चढ़ाकर यह कहे कि हमारी सरकार ने  इस एक्ट या उस एक्ट को लागू किया तो इस पर मेरा कहना  है कि ये आपकी सरकार ने नहीं किया है ,ये सब तो संविधान द्वारा दी गयी चीज़ें हैं ,केंद्र में जो भी सरकार होगी जनहित में एक्ट लागू करना उसकी जिम्मेदारी है ...मैं यह पढ़ ही रही थी कि मेरी कामवाली बाई एकदम बोल उठी कि दीदी ये क्या कह गए ये मोदी ?इनमे दिमाग भी है या नहीं .अब भला मैं आपके यहाँ काम करती हूँ तो जो काम मैं करती हूँ वह क्या नहीं कहूँगी कि मैंने किया है ?अब भला आप मुझे इसके पैसे देती हो तो मेरी ये जिम्मेदारी है पर काम जो मैं अच्छे से कर रही हूँ कहूँगी तो हूँ न ....मैं सहमति में सिर हिलाती इससे पहले ही एक साथी वकील बोल उठे बिल्कुल सही कह रही है यशोदा बिल्कुल सही ,...अब मैं केस लड़ता हूँ ,मुझे फीस मिलती है और मैं मेहनत कर उसे जीतता हूँ तो मैं यही तो कहूँगा कि मैंने ये केस लड़ा है और जीता है ,इसमें इन जनाब को दिक्कत क्यूं आ गयी?मैं भी असमंजस में पड़ गयी कि आखिर किसे सही कहूं किसे गलत ?पर तभी मेरा ध्यान ३ मार्च को नई दिल्ली में भाजपा की परिषद् की बैठक में दिए गए उनके भाषण पर गया जिसमे उन्होंने कहा -''कि गुजरात की कमान थामते  वक़्त राज्य लगभग 6700 करोड़ के घाटे में था ,लेकिन सुशासन के चलते अब  ४५०० करोड़ के फायदे में है .''क्या यह कहने का मोदी को कोई अधिकार है जबकि उनके स्वयं के अनुसार इसमें उनकी कोई भूमिका तो मानी ही नहीं जा सकती क्योंकि ये तो संविधान द्वारा दी गयी चीज़ें हैं इसलिए जो जहाँ की सरकार में होगा उसे जनहित में यह सब करना ही होगा किन्तु ये तो मोदी का दिमाग ही कहा जायेगा जिस पर नेहरु गाँधी परिवार की लोकप्रियता दहशत के रूप में हावी है .जिस प्रकार किसी की दहशत आदमी को कुछ और बोलने नहीं देती वैसे ही इस परिवार की दहशत वह भी आतंकी नहीं बल्कि जनता में लोकप्रियता की दहशत मोदी को बस राहुल-सोनिया का नाम ही रटने को मजबूर करती रहती है .
       एक तरफ स्वामी विवेकानंद को गुरु मानने वाले ,एक तरफ ''कानून नहीं काम ज़रूरी ''कहने वाले मोदी ''मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक''की तरह राहुल-सोनिया पथ पर ही दौड़ लगाते रहते हैं .हमारे नीतिशास्त्रों में कहा गया है कि ,''एक चुप सौ को हरावे ''और भारत के होते हुए मोदी इस बात को नहीं जानते और अनाप-शनाप कुछ भी बोलते रहते हैं जबकि सोनिया गाँधी ने विदेशी होते हुए भारत की बहू बन जिस सादगी से यहाँ के संस्कार अपनाएं हैं वे तारीफ के काबिल हैं .वे व्यक्तिगत आक्षेप होने के बावजूद अपने कार्य करती हैं और जनहित में जुटी रहती हैं .व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति न तो वे करती हैं और न ही राहुल गाँधी .स्वामी विवेकानंद का मोदी केवल नाम लेते हैं किन्तु वह लकीर जो सोनिया गाँधी -राहुल गाँधी ने प्रधानमंत्री पद से स्वयं को अलग कर खींची है उससे बड़ी लकीर खींचने की काबिलियत न मोदी में है और न ही उनकी पार्टी में ,जिसका महिमा-मंडन मोदी जोर-शोर से करते हैं कि भाजपा में लक्ष्य को अहमियत दी जाती है ,व्यक्ति या नेता को नहीं ,यही पार्टी है वह जिसमे पी.एम्.इन वेटिंग भी होते हैं ,यही वह पार्टी है जिसमे प्रधानमंत्री पद सँभालने वाले एकमात्र सद्भावी नेता को उनके घर बिठा दिया जाता है और यही वे मोदी हैं जिनके बारे में प्रसिद्ध  पत्रकार कुलदीप नैयर लिखते हैं -''मोदी ने गुजरात को झांसा दिया है .उन्होंने यह साबित करने की कोशिश की है कि गुजरात के लोग भारत के बाकी लोगों से अलग हैं .अगर पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश  सिंह बादल ने ऐसा किया होता तो सारा देश उनके खिलाफ यह कहते हुए खड़ा हो जाता कि सिख आतंकवाद  को उकसा रहे हैं .''गोधरा के कलंक से घिरे मोदी जब यह कहते हैं ,''कि गुजरात में बोलने से डरती है कॉंग्रेस  ...''तो लगता है कि सही करती है कॉंग्रेस ,आखिर कई मुखौटे रखने वाले इस व्यक्ति की दहशत तो माननी ही चाहिए .
      मधुमेह की बीमारी से जहाँ सारा विश्व आक्रांत है और मीठी मीठी बातों को जहाँ चोर की भाषा कहा जाता है वहां के ज्ञान भंडार में सोनिया के भाषण को ''फीका ''कह मोदी स्वयं उसका महत्व बढ़ा देते हैं .इस तरह बात बात में राहुल-सोनिया का जिक्र कर मोदी अपनी दिमागी अपरिपक्वता का परिचय तो देते ही हैं साथ ही प्रधानमंत्री पद के लिए बढती लालसा का भी जिसकी आकांक्षा में ,समाचार पत्रों के अनुसार वे ''गुजरात की चुनावी यात्रा में खुद को ऐसे पेश कर रहे थे जैसे मुख्यमंत्री नहीं बल्कि प्रधानमंत्री की कुर्सी के लिए लड़ रहे हों .''और ये हाल तो तब हैं जब न तो पार्टी अध्यक्ष और न ही पार्टी के नया वरिष्ठ नेता उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार मान रहे हों .
    अंत में ,मोदी का दिमाग वाकई मानना होगा क्योंकि वे कहते हैं कि ''पञ्च साल एक सरकार चले और पञ्च साल कोई और सरकार ,इस मामले में गुजरात ने लोकतंत्र की नयी परिभाषा पेश की है ,जबकि यह परिभाषा तो पश्चिमी बंगाल बहुत पहले ही पेश कर चुका है किन्तु क्या किया जाये ?आज मोदी का प्रचार कुलदीप नैयर जी के अनुसार उछालकर भाजपा यह देखना चाहती है कि उनकी गैर -धर्मनिरपेक्ष छवि सामान्य हिन्दू लोगों को आकर्षित करेगी या नहीं और यही वजह मोदी का दिमाग ख़राब इस कदर ख़राब कर रही है कि उनकी बाते सुन राहुल गाँधी-सोनिया गाँधी या कॉंग्रेस यही कहते होंगे-
''हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम ,
वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होती .''
       शालिनी कौशिक
        [कौशल]

शुक्रवार, 15 मार्च 2013

मृत शरीर को प्रणाम :सम्मान या दिखावा

मृत शरीर को प्रणाम :सम्मान या दिखावा
Wallpaper last tribute of respect, jackson \ 's funeral, vmi, may 15, 1863


अरस्तू के अनुसार -''मनुष्य एक सामाजिक प्राणी  है समाज जिससे हम जुड़े हैं वहां रोज़ हमें नए तमाशों के दर्शन होते हैं .तमाशा ही कहूँगी मैं इन कार्यों को जिनकी आये दिन समाज में बढ़ोतरी हो रही है .एक शरीर ,जिसमे प्राण नहीं अर्थात जिसमे से आत्मा निकल कर अपने परमधाम को चली गयी ,को मृत कहा जाता है और यही शरीर जिसमे से आत्मा निकल कर चली गयी बड़ी संख्या में लोगों द्वारा उस आत्मा के ही कारण अंतिम प्रणाम किये जाने को अंतिम दर्शन हेतु रखा जाता है जबकि आत्मा के जाने के बाद शरीर मात्र एक त्यागा हुआ वस्त्र रह जाता है .आत्मा के शरीर त्यागने के बाद जल्दी से जल्दी अंतिम संस्कार की क्रिया को अंजाम दिया जाता है क्योंकि जैसे जैसे देरी होती है शरीर का खून पानी बनता है और वह फूलना  शुरू हो जाता है साथ ही उसमे से दुर्गन्ध निकालनी आरम्भ हो जाती है ..अंतिम संस्कार का अधिकार हमारे वेद पुराणों के अनुसार ज्येष्ठ पुत्र को दिया गया है जिसे कभी कभी संयोग या सुविधा की दृष्टि से कोई और भी अंजाम दे देता है और अंतिम संस्कार करने वाले की वहां उपस्थिति को ऐसी स्थिति को देखते हुए अनिवार्यता कह सकते हैं किन्तु परिवहन क्रांति /संचार क्रांति का एक व्यापक प्रभाव यहाँ भी पड़ा है अब बहुत दूर दूर बैठे नातेदारों की प्रतीक्षा भी अंतिम संस्कार में देरी कराती है और संचार क्रांति के कारण जिन जिन को सूचना दी जाती है उन सभी की उपस्थिति की अपेक्षा भी की जाती है न केवल उनके अंतिम दर्शन के भाव को देखते हुए बल्कि अपने यहाँ आदमियों की भीड़ को बढ़ाने के लिए भी जिसमे विशेष स्थान गाड़ियों का है क्योंकि आज गाड़ियाँ इतनी ज्यादा हो गयी हैं कि आज हर कोई बसों की असुविधा को देखते हुए इनका ही इस्तेमाल कर रहा है .और परिणाम यह है कि जो कार्य उस वक़्त शीघ्रता शीघ्र संपन्न होना चाहिए उस ओर विलम्ब प्रक्रिया बढती ही जाती है .
अभी हाल में ही हमारे पड़ोस में  एक बुजुर्ग जिनकी आयु लगभग ८७ वर्ष थी ,का दिन में लगभग ३ बजे निधन हो गया अब बुजुर्ग थे तो अच्छा खासा खानदान लिए बैठे थे तमाम परिवारी जन पास ही मौजूद थे अंतिम क्रिया जिसे करनी थी उस बेटे के घर पर ही उन्होंने अपने प्राण त्यागे थे किन्तु दो बेटे जो और हैं उनमे से एक बेटा व् एक बेटी उस दिन नहीं पहुँच पाए इसलिए अंतिम क्रिया अगले दिन के लिए टाल दी गयी .अब जहाँ तक भावुकता की बात की जाये तो ऐसे उदहारण भी हैं जिसमे मृत शरीर को उनके परिजनों ने लम्बे समय तक अपने पास ही रखा उनका अंतिम संस्कार करने की वे हिम्मत ही नहीं जुटा पाए और ऐसे भाव ही अधिकांश लोग रखते हैं और इसलिए ही कहते हैं कि बेटे बेटी को अंतिम दर्शन का अधिकार है उनसे यह अधिकार नहीं छीना जाना चाहिए और इसलिए यह प्रतीक्षा गलत नहीं है किन्तु मैं पूछती हूँ कि ये अंतिम दर्शन कहा ही क्यूं जाता है ?क्या हमारे बड़ों का जो अंश हममे है और उनके प्रति जो श्रृद्धा व् जो सम्मान हममे है क्या वह बस यहीं ख़त्म हो जाता है ?क्या इस तरह हम यहाँ उन्हें वास्तव में अपने से बिल्कुल अलग नहीं कर देते  हैं ?उनके विचारों को सम्मान देकर उन्हें याद रखकर जो ख़ुशी हम उन्हें जीते जी दे सकते हैं क्या उसका लेशमात्र भी इस दिखावे में है ?
    शरीर से जब प्राण निकल जाते हैं तो वह मात्र देह होती है जो जितनी जल्दी हो सके जिन तत्वों से मिलकर बनी है उनमे मिल जानी चाहिए अन्यथा विलम्ब द्वारा हम उस शरीर की दुर्गति ही करते हैं जिसके अंतिम दर्शनों के नाम पर हम उसका सम्मान करने को एकत्रित होते हैं .आज परिवहन व् संचार क्रांति ने ये संभव कर दिया है तो हम ऐसे मौकों पर दूर-दराज के नाते रिश्तेदारों को भी इस कार्य में जोड़ लेते हैं .ऐसे में  यदि देखा जाये तो महाराजा दशरथ के अंतिम संस्कार भी चौदह वर्ष बाद ही किया जाना चाहिए था क्योंकि उनके दो पुत्र उनके पास नहीं थे और उन्हें भी तो अपने पिता के अंतिम दर्शन का अधिकार था किन्तु तब न तो परिवहन के इतने सुलभ साधन थे और न ही सूचना के लिए हर हाथ में मोबाइल ,तो भगवान राम व् अनुज लक्ष्मण को इस अधिकार से वंचित रहना पड़ा और जहाँ तक मृत शरीर को अंतिम प्रणाम कर हम मृतात्मा के प्रति अपना सम्मान प्रदर्शित करते हैं तो यह मात्र प्रदर्शन है क्योंकि आत्मा कभी नहीं मरती .श्रीमद्भागवत गीता के अध्याय २ के श्लोक २० में कहा गया है -
''न जायते म्रियते वा कदाचि-
    न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः .
अजो नित्यः शाश्वतो$यं  पुराणों
    न हन्यते हन्यमाने शरीरे .२०.''

[यह आत्मा किसी काल में भी न तो जन्मता है और न मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला ही है ;क्योंकि यह अजन्मा ,नित्य ,सनातन और पुरातन है ;शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता .]
इस प्रकार भले ही शरीर रूप में कोई हमारा हमसे अलग हो गया हो किन्तु हमसे वह आत्मा रूप में कभी अलग नहीं होता और न ही हम ऐसा मान सकते हैं इसलिए ऐसे में जिस आपा-धापी में अंतिम दर्शन के नाम पर हम अंतिम संस्कार के लिए जाने में भीड़ बढ़ाते हैं वह महज एक दिखावा है और कुछ नहीं .कविवर गोपाल दास ''नीरज''ने भी कहा है -
''किसके रोने से कौन रुका है कभी यहाँ ,
जाने को ही सब आयें हैं सब जायेंगे .
चलने की तैयारी ही तो बस जीवन है ,
कुछ सुबह गए कुछ डेरा शाम उठाएंगे .''
  शालिनी कौशिक
      [कौशल]

बुधवार, 13 मार्च 2013

''शालिनी''करवाए रु-ब-रु नर को उसका अक्स दिखाकर .

 

आज करूँ आगाज़ नया ये अपने ज़िक्र को चलो छुपाकर ,
कदर तुम्हारी नारी मन में कितनी है ये तुम्हें बताकर .


 जिम्मेदारी समझे अपनी सहयोगी बन काम करे ,
साथ खड़ी है नारी उसके उससे आगे कदम बढाकर .



 बीच राह में साथ छोड़कर नहीं निभाता है रिश्तों को ,
अपने दम पर खड़ी वो होती ऐसे सारे गम भुलाकर .


 कैद में रखना ,पीड़ित करना ये न केवल तुम जानो ,
जैसे को तैसा दिखलाया है नारी ने हुक्म चलाकर .


 धीर-वीर-गंभीर पुरुष का हर नारी सम्मान करे ,
आदर पाओ इन्हीं गुणों को अपने जीवन में अपनाकर .


 जो बोओगे वो काटोगे इस जीवन का सार यही ,
नारी से भी वही मिलेगा जो तुम दोगे साथ निभाकर .


 जीवन रथ के नर और नारी पहिये हैं दो मान यही ,
''शालिनी''करवाए रु-ब-रु नर को उसका अक्स दिखाकर .
            
           शालिनी कौशिक
  [WOMAN ABOUT MAN]


आज तक पुरुष ही महिला के सम्बन्ध में अपने विचार अभिव्यक्त करता रहा है और इस समबन्ध में ब्लॉग जगत में बहुत से ब्लॉग हैं जैसे भारतीय नारी ,नारी आदि .८ मार्च २०१३ से मैंने भी एक सामूहिक ब्लॉग की शुरुआत की है जिसका नाम है ''  [WOMAN ABOUT MAN] '' .यहाँ आप सभी महिला ब्लोगर्स आकर पुरुषों के सम्बन्ध में अपने सकारात्मक ,नकारात्मक जो भी विचार हों और उनसे जुड़े जो खट्टे -मीठे अनुभव हों सम्पूर्ण ब्लॉग जगत से साझा कर सकती है .यदि आप मेरे इस ब्लॉग से जुड़ने की आकांक्षी हैं तो मेरे इस  इ मेल पर मेल करें - kaushik_shalini@hotmail.com

सोमवार, 11 मार्च 2013

तवलीन सिंह की रोटी बंद होने वाली है

तवलीन सिंह की रोटी बंद होने वाली है

तवलीन सिंह की रोटी बंद होने वाली है .क्यूं ?पड़ गए न आश्चर्य में ,जबकि ये आश्चर्य नहीं सत्य है .नेहरु गाँधी परिवार की अनर्गल आलोचना तवलीन को रोटी दिलाती है किन्तु ये आलोचना तभी तो मान्य है जब यह परिवार सत्ता में हो और वर्तमान में कॉंग्रेस नेतृत्व की विफलता और विपक्ष की निरंतर साजिशों ने लगभग इस सरकार के लिए बाहर जाने का  रास्ता तैयार कर दिया है .
            नेहरु गाँधी परिवार जनता में अपनी लोकप्रियता और सत्ता में लम्बी उपस्थिति के कारण आलोचना के घेरे में आता ही रहता है .यह आलोचना यदि सकारात्मक हो तो विवाद या निंदा का न होकर विचार का विषय होगी किन्तु यह अधिकांशतया अनर्गल प्रलाप पर ही आधारित रहती है .मृणाल पांडे  जैसी वरिष्ठ पत्रकार भी इस परिवार के राहुल गाँधी की आलोचना करती हैं किन्तु उनके सही क़दमों की तारीफ भी करती हैं  किन्तु तवलीन सिंह बेसिर-पैर की बाते ही ज्यादा लिखती हैं .महीने में लगभग ५ आलेख उनके हमारे सामने आते हैं और इनमे तभी कुछ विभिन्नता होती है जब कोई विशेष या उत्तेजनात्मक घटना घटित हो जाये नहीं तो उनकी कलम नेहरु गाँधी परिवार से इतर लिखने को मना कर देती है ऐसा हमें लगता है.अगले लोकसभा चुनाव में राहुल गाँधी -नरेन्द्र मोदी का सीधा मुकाबला प्रचारित किया जा रहा है .ऐसे में राहुल गाँधी द्वारा स्वयं को प्रधानमंत्री पद की दौड़ से बेदखल करना तवलीन की नज़रों में कोंग्रेसियों से बेवफाई है 'ये वे कह रही हैं किन्तु लगता है कि ये वे खुद से बेवफाई मानकर चल रही हैं क्योंकि यदि वे स्वयं को इस दौड़ में शामिल रखते हैं तो उनकी कलम को कुछ और भी लिखने का अवसर मिलेगा अनर्गल जो उन्हें और झूठ को पसंद करने वाले बहुत सो को पसंद भी आयेगा जिन्हें सच्चाई से कुछ लेना देना नहीं केवल इस परिवार और राहुल गाँधी की बारे से लेना देना है जबकि इस देश की समस्याओं का इस परिवार से कोई लेना देना नहीं है यह परिवार सत्ता में हो या न हो समस्याएं बनी रहनी हैं क्योंकि ये हमारी पैदा करी हुई हैं .भ्रष्टाचार हमारे द्वारा पोषित ,नेता हमारे द्वारा चयनित फिर इन्हें दोष क्यों देना जबकि हम भी स्वयं अपना काम निकालने वालों में हैं .अब यदि राहुल गाँधी स्वयं को इस दौड़ में शामिल कहते हैं तो तवलीन जी इसे ''तानाशाही ''कहेंगी क्योंकि उन्हें तो कैसे भी हो इनकी बुराई करनी है और अपनी रोटी चलानी है .
  मैं पूछती हूँ क्या गलती है राहुल गाँधी के निर्णय में ?इंदिरा जी की मृत्यु के बाद राजनीति में लगभग नौसीखिए राजीव गाँधी जी को प्रधानमंत्री बना दिया गया और यही नादानी थी उनकी जो उन्हें ''बोफोर्स ''जैसे कांड के घेरे में ले गयी .पंचायती राज ,मतदान की उम्र घटाना ,देश में कंप्यूटर  के लिए किये गए उनके सभी कार्य आज कहीं नहीं गिने जाते ,ये व्यर्थ  की आलोचना करने वाले केवल बोफोर्स और क्वात्रोच्ची ही गाते रहते हैं  ऐसे में यदि राहुल गाँधी पहले संगठन से जुड़कर राजनीति में परिपक्व होकर ही उसमे आगे बढ़ना चाहते हैं तो उनकी आलोचना क्यूं जबकि ऐसे में ही जब विपक्षी भाजपा के नेता संगठन के लिए कार्य करते हैं तो उनकी सराहना में चाँद तारे तक तोड़ कर लाये जाते हैं .राहुल जी के इस निर्णय की आलोचना वही पत्रकार कर सकते हैं जो पत्रकारिता क्या है नहीं जानते ,देश के इस चौथे स्तम्भ की क्या महत्ता है नहीं जानते.
   राहुल स्वयं को पैराशूट से उतारे गए कहते हैं ,सही है ,वे जानते हैं कि उन्हें यहाँ विरासत की जगह मिली है किन्तु पहले की परम्पराओं को तोड़कर वे सामान्य कार्य कर्ता  की तरह कार्य कर यदि सफलता की सीढियां चढ़ना चाहते हैं तो ये तो देश के हित में है क्योंकि इस तरह वे पार्टी में गलत तत्वों को स्वयं परखकर पार्टी से अलग  कर सकते हैं और देशहित  में देश की सबसे बड़ी पार्टी की कार्यप्रणाली में सुधार ला सकते हैं उनके इस कदम की तो सराहना की जानी चाहिए क्योंकि ऐसा वे तब कर रहे हैं जब उन्हें अपनी पार्टी में सर्व स्वीकार्यता मिली हुई है .न कि नरेन्द्र मोदी की तरह जो स्वयं को मोमबत्ती के मोम से प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी में  चिपकाने की चेष्टा कर रहे हैं जबकि स्वयं उनकी पार्टी बीजेपी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह जी गाजियाबाद में एक जनसभा में कहते हैं -
''कि पी.एम्.कौन होगा इसका फैसला संसदीय बोर्ड करेगा .''
 स्वामी विवेकानंद के भारत को जगत गुरु बनाने के सपने को हकीकत में पलटने की बात कहने वाले नरेन्द्र मोदी इतना तक तो जानते नहीं कि जब स्वामी विवेकानंद के गुरु ने उनसे एक लकीर को बिना मिटाए छोटी करने को कहा था तो उन्होंने क्या किया था ,उन्होंने उससे  बड़ी लकीर खींच दी थी जबकि यहाँ वे अपने विरोधियों को मिटाने  की कोशिश में लगे हैं जो उनके स्वामी विवेकानंद की शिक्षा से विपरीत कार्य है और यही उन्होंने गुजरात में किया .कल तक गुजरात ,गुजरात के राग अलापने वाले आज प्रधानमन्त्री बनने के सपने देख रहे हैं अच्छी बात है हर भारतीय को ये सपना देखने का हक़ है किन्तु पहले अपनी पार्टी में तो अपनी स्वीकार्यता ले आयें गठबंधन में तो बाद की और देश में तो सबसे बाद की है .पहले अपने ऊपर से क्षेत्रीय नेता का ठप्पा तो हटा लें राहुल गाँधी की तरह राष्ट्रीय नेता तो बनना बहुत बाद की बात है .आज तक उनकी पार्टी तक तो कौंग्रेस की तरह देश में सर्व स्वीकार्य  हुई नहीं .
    कथित गुजरात विकास के अभिमान से भरे नरेन्द्र मोदी जी के लिए तो यही एक सदमे के समान  हो सकता है कि उनके गुजरात विकास को माकपा नेता प्रकाश करात जी द्वारा नकार दिया गया है जो कहते हैं -
    ''देश विकास के गुजरात मॉडल को कभी स्वीकार नहीं कर सकता क्योंकि इसमें आम लोगों ,दलितों और आदिवासियों की कीमत पर केवल बड़े आद्योगिक घरानों को ही तरजीह मिली है .''
     और जो अपने प्रचार के लिए वे फोटो में मुसलमानों की पसंद के रूप में स्वयं को प्रचारित करते हैं उसे सिरे से नकार रहे हैं देवबंदी विद्वान उलेमा मदनी जी -जो कहते हैं -
''गुजरात दंगों के जख्मों को गैरतमंद इन्सान कभी नहीं भुला सकता .......मोदी का यह कहना कि विकास हो तो मतदाता सभी गलतियों को माफ़ कर देते हैं ...को मदनी ने महज मजाक करार दिया .''
     
देश के प्रधानमंत्री को ''नाईट वाचमेन''कहकर मजाक उड़ाना  प्रधानमंत्री की शख्सियत के लिए कोई मजाक नहीं किन्तु एक नाईट वाचमेन के लिए ज़रूर दुखदायक है जो अपनी रात की नींद का बलिदान दे क्षेत्र के निवासियों को चैन की नींद देता है  .
 तवलीन जी राहुल गाँधी के पैराशूट कहने की हंसी उड़ाती हैं और मोदी जी को राजनीतिक बिसात के लिए सुनामी करार देती हैं क्या नहीं जानती या अंजान बनने की कोशिश कर रही हैं तो उन्हें समझ लेना चाहिए कि पैराशूट तो फिर भी संकट में फंसे लोगों को बचाता है किन्तु सुनामी ज़मीन पर बसे जीवन को उजाड़ कर समुन्द्र में ही ले जाती है जहाँ केवल और केवल मौत का गहरा अँधेरा है क्या उनके मोदी जी ऐसे ही हैं इसका खुलासा भी उन्हें करना होगा .
    और फिर बहुत आजकल नमो नमो हो रही है जबकि ये कलियुग है और नमो यानी भगवान का ध्यान किन्तु सभी जानते हैं ''भगवान के घर देर है अंधेर नहीं ''किन्तु कोई नहीं जानता कितनी और रागा  का प्रभाव सबको पता है .संगीत सम्राट तानसेन इसी के प्रभाव से वर्षा करा देते थे अब इनमे से किसका उच्चारण होना चाहिए ये भारतीय जानता स्वयं तय कर सकती हैऔर वे रॉकेट जो तवलीन जी अपनी पूरी ताकत लगा छोड़ रही हैं उनका हश्र वे स्वयं देखेंगी इस शेर से-
     ''न होगा उसपे मसाइल की बारिशों का असर ,
     जो तजरबों की कड़ी धूप का जला होगा .''
       शालिनी कौशिक
          [कौशल ]

शनिवार, 9 मार्च 2013

मासूम बच्चियों के प्रति यौन अपराध के लिए आधुनिक महिलाएं कितनी जिम्मेदार? रत्ती भर भी नहीं .

मासूम बच्चियों के प्रति यौन अपराध के लिए आधुनिक महिलाएं कितनी जिम्मेदार? रत्ती भर भी नहीं .

''आंधी ने तिनका तिनका नशेमन का कर दिया ,
पलभर में एक परिंदे की मेहनत बिखर गयी .''
फखरुल आलम का यह शेर उजागर कर गया मेरे मन में उन हालातों को जिनमे गलत कुछ भी हो जिम्मेदार नारी को ठहराया जाता है जिसका सम्पूर्ण जीवन अपने परिवार के लिए त्याग और समर्पण पर आधारित रहता है .किसी भी सराहनीय काम का श्रेय लेने के नाम पर जब सम्पूर्ण समाज विशेष रूप से पुरुष वर्चस्ववादी समाज आगे बढ़ सीना तान कर खड़ा हो जाता है तो समाज में घटती अशोभनीय इन वारदातों का ठीकरा नारी के सिर क्यों फोड़ते हैं ?जबकि मासूम बच्चियां जिस यौन दुर्व्यवहार की शिकार हो रही हैं उसका कर्ता-धर्ता तो पुरुष ही है .
   आधुनिक महिलाएं आज निरंतर प्रगति पथ पर आगे बढ़ रही हैं और ये बात पुरुष सत्तात्मक समाज को फूटी आँख भी नहीं सुहाती और इसलिए सबसे अधिक उसकी वेशभूषा को ही निशाना बनाया जाता है .सबसे ज्यादा आलोचना उसके वस्त्र चयन को लेकर ही होती है .जैसे कि एक पुराने फ़िल्मी गाने में कहा गया-
''पहले तो था चोला बुरका,
   फिर कट कट के वो हुआ कुरता ,
      चोले की अब चोली है बनी
          चोली के आगे क्या होगा ?
ये फैशन यूँ ही बढ़ता गया ,
   और कपडा तन से घटता गया ,
       तो फिर उसके बाद ......''

यौन दुर्व्यवहार के लिए कपड़ों को दोषी ठहराया जा रहा है .यह धारणा भी बलवती की जा रही है कि यदि दो लड़कियां साथ जा रही हैं और उनमे से एक पूरी तरह से ढकी-छिपी हो और दूसरी आधुनिक वस्त्रों में हो तो वह आधुनिक वस्त्रों वाली ही छेड़खानी का शिकार होती है और यदि इसी धारणा पर  विश्वास किया जाये तो दिल्ली गैंगरेप कांड तो होना ही नहीं चाहिए था  क्योंकि उसमे दामिनी के भाई के अनुसार वह लम्बे गर्म ओवरकोट में थी .
    ऐसे में मासूम बच्चियों के साथ यौन दुर्व्यवहार के लिए महिलाओं के आधुनिक होने को यदि उत्तरदायी ठहराने की कोशिश की जाती है तो ये सरासर नाइंसाफी होगी समस्त नारी समुदाय के साथ, क्योंकि बच्चियों के मामले में पहले तो ये मासूम न तो कपड़ों के सम्बन्ध में कोई समझ रखती हैं और न ही यह जानती हैं कि जो व्यवहार उनके साथ किया जा रहा है वह एक गंभीर अपराध है .हम स्वयं देखते हैं कि बच्चे कैसे भी कहीं घूम फिर लेते हैं और खेलते रहते हैं वे अगर इन दुनियावी  बातों में फसेंगे तो बचपन शब्द के मायने ही क्या रह जायेंगे जो जिंदगी के औपचारिक अनौपचारिक तथ्यों से अंजान रहता है और एक शांत खुशहाल समय गुजारता है .
   ऐसे में ये सोचना कि बच्चे ये देखेंगे या महसूस करेंगे कि उनकी वेशभूषा अश्लील है या उत्तेजनात्मक ,मात्र कोरी कल्पना है साथ ही उनके बारे में सोचते हुए उनकी माँ ये सोचेगी कि मेरा बच्चा इस तरह अभद्र लग रहा है और हर वक्त घर में भी उसके कपड़ों को देखती रहेगी तो असम्भव ही कहा जायगा क्योंकि जो बच्चे इसका शिकार हो रहे हैं वे इतने छोटे हैं कि उनके बारे में उनके बड़े ये कल्पना भी नहीं कर सकते कि उनके साथ कोई ऐसा करने की सोच भी सकता है .इतनी छोटी बच्चियों के शरीर भले ही कपड़ों से ढके हो या न ढके हों कभी भी उनकी यौन प्रताड़ना का कारण नहीं होते ,उनकी यौन प्रताड़ना का एकमात्र कारण है ''उनकी मासूमियत ,जिसके कारण वे न तो उस व्यवहार को जान पाते हैं और न ही किसी को उसके बारे में बता पाने की स्थिति में होते हैं .जैसे कि मोबिन धीरज लिखते हैं -
''मुहं से निकले तो ज़माने को पता चलता है ,
घुट के रह जाये जो आवाज कोई क्या जाने .''
बिल्कुल यही कारण है कि वहशी दरिन्दे को अपनी हवस बुझाने के लिए इन बच्चियों के शरीर के रूप में एक महिला का शरीर मिलता है और उसका शिकार वह बच्ची न तो उसका प्रतिरोध ही कर सकती है और न ही उसका अपराध दुनिया के सामने उजागर .

   इसके साथ ही आधुनिक महिलाओं पर यह जिम्मेदारी डाली जा रही है तो ये नितान्त अनुचित है क्योंकि यह कृत्य इन बच्चियों के साथ या तो घर के किसी सदस्य द्वारा ,या स्कूल के किसी कर्मचारी या शिक्षक द्वारा ,या किसी पडौसी द्वारा किया जाता है और ऐसे में ये कहना कि वह उसकी वेशभूषा देख उसके साथ ऐसा कर गया ,पूर्ण रूप से गलत है यहाँ महिलाओं की आधुनिकता का तनिक भी प्रभाव नहीं कहा जा सकता .
    मासूम बच्चियों के प्रति यौन दुर्व्यवहार का पूर्ण रूप से जिम्मेदार हमारा समाज और उसकी सामंतवादी सोच है ,जिसमे पुरुषों के लिए किसी संस्कार की कोई आवश्यकता नहीं समझी जाती ,उनके लिए किसी नैतिक शिक्षा को ज़रूरी नहीं माना  जाता . यह सब इसी सोच का दुष्परिणाम है .ऐसे में समाज में जो थोड़ी बहुत नैतिकता बची है वह नारी समुदाय की शक्ति के फलस्वरूप है और यदि नारी को इसी तरह से दबाने की कोशिशें जारी रही तो वह भी नहीं बचेंगी और तब क्या हल होगा उनकी सहज कल्पना की जा सकती है .इसलिए नारी पर इस तरह से दोषारोपण करने वालो को ''नवाज़ देवबंदी''के इस शेर को ध्यान में रखना होगा -
''समंदर के किसी भी पार रहना ,
    मगर तूफान से होशियार रहना ,
        लगाओ तुम मेरी कीमत लगाओ
             मगर बिकने को भी तैयार रहना .''

शालिनी कौशिक
    [कौशल ]

बुधवार, 6 मार्च 2013

प्रथम पुरुस्कृत निबन्ध -प्रतियोगिता दर्पण /मई/२००६ यदि महिलाएं संसार पर शासन करतीं -अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस

 प्रथम पुरुस्कृत निबन्ध -प्रतियोगिता दर्पण /मई/२००६
 यदि महिलाएं संसार पर शासन करतीं
यदि महिलाएं संसार पर शासन करतीं
८ मार्च अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर मई २००६ में प्रथम घोषित अपना एक निबन्ध आपसे साझा कर रही हूँ .
इतिहास साक्षी है कि जब भी नारी को समाज व् राष्ट्र ने अपनी योग्यता दिखाने  का अवसर और अधिकार दिया तब तब नारी ने अपने को नेतृत्व  की कसौटी पर खरा साबित किया है .विश्व में महिलाओं की योग्यता का एक भरा पूरा इतिहास है .भारतीय महिलाओं द्वारा विश्व में अपनी योग्यता का कीर्तिमान नेतृत्व के क्षेत्र में स्थापित किया गया है .
      कर्नाटक प्रदेश के एक छोटे से राज्य कित्तूर के राजा मल्ल्सर्जा की पत्नी रानी चेनम्मा थी .१८१६ ईस्वी  में  मल्लसर्जा का असामयिक निधन होने पर और फिर उसके बाद पुत्र रुद्र्सर्जा के उत्तराधिकारी होने पर श्री भगवान को प्यारे हो जाने पर अंग्रेजों ने कित्तूर को हड़पने का प्रयास किया .पुत्र की मृत्यु के बाद रानी चेनम्मा ने अपना कर्तव्य समझकर राज्य की बागडोर संभाली और अंग्रेजों के साथ प्रथम युद्ध में नेतृत्व विहीन अंग्रेजी सेना पर विजय प्राप्त की .
             इंदौर के राजघराने में एक आदर्श हिन्दू कुलवधू की तरह रहने वाली अहिल्या बाई होल्कर भगवद्भक्त व् धार्मिक किस्म की महिला थी .दुर्भाग्य से मात्र २९ वर्ष की आयु में उनके पति खंडेराव की अचानक मृत्यु हो गयी .पति की मृत्यु से व्यथित होकर उन्होंने भी आत्मदाह करना चाहा  पर सास-ससुर ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया .मल्हार राव ने उन्हें उन्हें सारे अधिकार सौंप दिए .अहिल्याबाई ने अपनी कुशलता व् साहस से इंदौर का शासन प्रबंध संभाल लिया .पुत्र मालेराव की संरक्षिका बनकर कर्मठता से राज्य व्यवस्थाओं का सञ्चालन करने लगी .पुत्र की मृत्यु के पश्चात् भी वे विचलित नहीं हुई और राज्य के शासन को सुचारू रूप से चलाती रही और इंदौर राज्य पर १७६६ से १७९५ तक शासन किया उन्होंने भीलों के विद्रोह को दबाया.काशी  ,मथुरा और अयोध्या के जन्मस्थलों को मुक्त करने के लिए बहुत प्रयास किये .उन्होंने काशी विश्वनाथ मंदिर के खंडहरों के पास एक नया मंदिर भी बनवाया .
        झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई तथा खूब लड़ी मर्दानी के रूप में इतिहास में प्रसिद्ध रानी लक्ष्मीबाई गंगाधर राव की पत्नी थी .उनकी मृत्यु पर वह झाँसी की शासिका बनी .गंगाधर राव के निस्संतान होने के कारण रानी ने दामोदर राव को अपना उतराधिकारी बनाया ,परन्तु अंग्रेजों ने इसे नहीं माना और 'व्यपगत सिद्धांत ' के तहत लॉर्ड डलहौजी ने झाँसी को हड़पना चाहा रानी ने चतुरता से इस कठिन परिस्थिति का सामना किया और १८५७ में हुए विद्रोह से पूर्व ही किले पर अपना कब्ज़ा पुनर्बहाल किया .उन्होंने जीते जी अंग्रेजों की गुलामी स्वीकार नहीं की और अपनी व् राज्य की आजादी के लिए संघर्ष किया .जनरल ह्यूरोज़ ने अपने दुर्जेय शत्रु के बारे में कहा था कि,''यहाँ वह औरत सोई हुई है ,जो विद्रोहियों में एकमात्र मर्द थी .''
   महिलाओं का इतिहास न केवल सत्ता के नेतृत्व में स्वर्णिम रहा है अपितु महिलाओं ने सत्ता को कुशल नेतृत्व दिए जाने में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है .
     शिवाजी की माता जीजाबाई का नाम विश्व में ऐसी ही माताओं [महिलाओं]में स्थान पाता है .शादी के कुछ वर्षों के पश्चात् पति शाहजी द्वारा छोड़े जाने पर उन्होंने बालक शिवाजी का पालन पोषण किया ,उन्हें हिन्दू धर्म तथा शास्त्रों की शिक्षा दी .वे उन्हें रामायण और महाभारत की कहानियां सुनाया करती थी .उन्होंने शिवाजी को अपने गौरवशाली अतीत का परिचय दिया .उन्होंने विश्व के समक्ष मातृत्व का श्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत किया और शिवाजी का राज्याभिषेक किया .
    गौंडवाना के शासक संग्राम शाह के बेटे की पत्नी रानी दुर्गावती ने पति की मृत्यु के बाद शासन सत्ता संभाली और अपने अल्पवयस्क  पुत्र वीर नारायण को गद्दी पर बिठाकर उसकी संरक्षिका बनकर कुशलता पूर्वक शासन किया और साहस का परिचय दिया .
     बीजापुर के भूतपूर्व सुल्तान की पत्नी तथा अहमदनगर के सुल्तान बुरहान की बहन चांदबीबी एक योग्य महिला थी वह मृतक सुल्तान के पुत्र बहादुर की बुआ लगती थी .वह अपने भतीजे के पक्ष में थी .बीजापुर का शासन उन्होंने आदिलशाह के वयस्क  होने तक भली-भांति संभाला था .अहमदनगर में वे सुल्तान बहादुर के पक्ष में थी .वजीर से अनबन हो जाने पर वह स्वयं सुल्तान बहादुर के साथसतारा के किले में कैद हो गयी .इस फूट का लाभ उठाते हुए अकबर ने गुजरात के सूबेदार शाहजादे मुराद और अब्दुर्रहीम खान-खाना के नेतृत्व में आक्रमण करने भेजा .चांदबीबी  ने दुर्ग की रक्षा करने में अद्भुत साहस का परिचय दिया और १५९६ ईस्वी  में समझौता कर लिया .बहादुर को जो अल्पवयस्क  था अहमदनगर का सुल्तान मान लिया गया .
        इस प्रकार भारत का प्राचीन इतिहास सत्ता में रजिया सुल्तान ,ताराबाई ,सावित्रीबाई आदि महिलाओं की शौर्यगाथाओं से भरा हुआ है .ये उदाहरण तो ऐसे हैं जिन्होंने रुढियों से दबे भारतीय समाज में महिला शक्ति की चिंगारी पैदा की थी और सम्पूर्ण विश्व के समक्ष अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया था ,किन्तु आज जब प्रतिस्पर्धा का युग है तब भी महिलाओं ने अपनी इस चिंगारी को बुझने ही नहीं दिया है अपितु इसके प्रज्ज्वलित रहने में घी डालने का काम किया है .
                                          
आधुनिक युग में विश्व के कई देश महिलाओं के नेतृत्व में प्रगति की ओर अग्रसर हैं .विश्व में प्रथम महिला प्रधानमंत्री के गौरव श्रीलंका की श्रीमाओ भंडारनायके ने प्राप्त किया था .मारियो एस्तेला ने  अर्जेंटीना की राष्ट्रपति के रूप में विश्व की प्रथम महिला राष्ट्रपति के रूप में स्थान पाया था और अब कई देश ऐसे हैं जो महिला नेतृत्व में प्रगति की ओर बढ़ रहे हैं .भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ,श्रीलंका की राष्ट्रपति चन्द्रिका कुमारतुंग ,पाक प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो ,म्यांमार की आंग सान सू की ,ब्रिटेन की मार्गरेट थैचर आदि कितनी ही महिलाओं ने सत्ता में अपनी श्रेष्ठता साबित की .यह महिला नेतृत्व ही है जो बांग्लादेश जैसे कट्टरपंथी  देश में भी महिला नेतृत्व में सुरक्षित महसूस करने की प्रवृति  उत्पन्न करता है .वहां सत्ता खालिदा जिया और शेख हसीना वाजेद के हाथों में ही पलटती रहती है .यह सत्ता में महिलाओं की योग्यता ही है जो अमेरिका के राष्ट्रपति को अपनी कैबिनेट में विदेश मंत्री जैसा महत्वपूर्ण पद महिलाओं को प्रदान कराती है .मेडलिन अल्ब्राईट और कौंडोलीज़ा  राइस  ने अमरीकी विदेश मंत्री के पद को सुशोभित ही नहीं किया अपितु उसे विश्व में एक नई पहचान भी दिलाई है .
           महिलाओं के नेतृत्व की सफलता पर पुरुष प्रधान इस विश्व में महिलाओं की योग्यता पर अनेकों प्रश्न खड़े कर महिलाओं की योग्यता को दरकिनार करने की कोशिश की जाती है .उनके बारे में कहा जाता है कि वह कमजोर है .पुरुषों की अपेक्षा कम शक्तिशाली है .पुरुषों के मुकाबले कम दिमाग रखती है .वह भावुक होती है और तुरंत निर्णय पर पहुँचने में अक्षम होती है .
           यदि इन्ही आरोपों के मद्देनज़र महिलाओं की ताकत के परिप्रेक्ष्य में देखा जाये तो यह आरोप कहीं से भी गले के नीचे नहीं उतरता .भारत की सबसे शक्तिशाली प्रधानमंत्री की उपाधि अब तक केवल श्रीमती इंदिरा गाँधी को प्राप्त है जिन्होंने कठोर सैनिक कार्यवाही द्वारा पाकिस्तानी आक्रमण की सम्भावना हमेशा के लिए समाप्त की .वे भारत जैसे विकासशील राष्ट्र में एक मजबूत प्रधानमंत्री साबित हुई .जिनकी मजबूती की मिसाल आज भी भारतीय सेना और जनता के मुख पर है .अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर की आतंकवादी कार्यवाही के मद्देनज़र इंदिरा गाँधी ही थी जिन्होंने राजनीतिक महत्वाकांक्षा से ऊपर उठकर देश हित को देखा और वहां सेना भेजकर आतंकवादी कार्यवाही पर रोक लगाई .
Indira GandhiMamata BanerjeeSheila DikshitJayalalithaa Vasundhara Raje
प्रथम आई.पी.एस.महिला किरण बेदी तो कुशल प्रशासन के क्षेत्र में एक मिथक बन चुकी है बड़े से बड़े दुर्दांत गुंडे उनके नाममात्र से कांपते थे .अपनी प्रशासनिक क्षमता के बल पर वह आज तक संयुक्त राष्ट्र संघ की पुलिस विभाग के शीर्ष पद पर विराजमान है .
             राजनीति के क्षेत्र में दिमाग से आशय कूटनीति से होता है और पाकिस्तान से अलगकर स्वतंत्र बांग्लादेश का निर्माण कराना श्रीमती इंदिरा गाँधी की कूटनीतिक सफलता ही थी .ऐसे ही किसी भी राष्ट्र के लिए विदेश मामले सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं क्योंकि राष्ट्र को अन्य राष्ट्रों के प्रति विभिन्न नीतियाँ अपनाकर राष्ट्रहित देखना पड़ता है .ऐसे में कौडोलिज़ा राईस को जॉर्ज बुश द्वारा अपना विदेश मंत्री बनाना महिला के दिमाग की क्षमता पर उठे सब सवालों को दरकिनार करने हेतु पर्याप्त है .
       यह महिला शक्ति ही है जिसका बखान हमारे धार्मिक ग्रंथों में भी अति सुन्दर शब्दों में किया गया है .देवी सप्तशती की कथा के अनुसार देवताओं को भी महिषासुर ,चंड-मुंड ,शुम्भ-निशुम्भ आदि राक्षसों से रक्षा हेतु देवी दुर्गा की शरण में जाना पड़ा था और उन्होंने ही राक्षसों का वध कर देवताओं को भयमुक्त राज्य प्रदान किया था .
   भावुकता को स्त्री की कमजोरी कहना एक पत्थर ह्रदय पुरुष का ही काम है .भावुकता तो वह गुण है जो स्त्री को जगत जननी के रूप में प्रतिष्ठापित किये है .दूसरों के दुःख दर्द को समझना और महसूस करना ही भावुकता है और आज के कठोर हो चले संसार में नारी का यही गुण है जो नारी को सत्ता दिलाने और सत्ता में उसकी सफलता को सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त है .
       आज संसार महिलाओं की योग्यता को पहचान चुका है और इसी का प्रभाव है जो यूरोप ,एशिया ,अमरीका ,अफ्रीका आदि सभी स्थानों पर महिला नेतृत्व की स्थापना हो रही है .संसार में आज तक कितने ही पुरुषों ने तानाशाह के रूप में शासन कर जनता से बर्बरतापूर्वक व्यवहार  किया है और ऐसे शासकों द्वारा प्रगति के सम्बन्ध में भी कोई विशेष प्रयास नहीं किये गए .आज समय महिलाओं के साथ है और सम्पूर्ण विश्व के वासी अपने घावों पर मरहम लगाने हेतु महिला नेतृत्व को स्वीकार कर रहे हैं .विश्व की सबसे छोटी इकाई परिवार है और परिवार के सभी सदस्यों की सफल जीवन की सूत्रधार महिला ही होती है ,किन्तु ऐसा नहीं कि वह केवल परिवार तक सीमित होती है या केवल एक परिवार को ही सफल कर सकती है .विश्व में महिलाओं ने अपनी योग्यता द्वारा यह साबित कर दिया है कि भले ही वह छोटे से परिवार से जुडी हो या विश्व रुपी विस्तृत परिवार से ,दोनों से सम्बद्ध हो अपने परिवार को सफलता की ओर अग्रसर करने में सक्षम है .नेपोलियन बोनापार्ट ने नारी में निहित इन्ही संभावनाओं को लक्ष्य करके कहा था ,''मुझे एक योग्य माता दो ,मैं तुमको एक योग्य राष्ट्र दूंगा .''और आज यह बात विश्व में अपना एक महत्वपूर्ण स्थान बना चुकी है और देखते ही देखते जर्मनी में एंजेला मर्केल को पहली महिला चांसलर व् लाइबेरिया की राष्ट्रपति के रूप में चुनी गयी एलन जोन्सन सरलीफ अफ्रीका की पहली चुनी महिला राष्ट्राध्यक्ष के रूप में विश्व में सम्मान पा रही हैं और विश्व इनकी योग्यता को स्वीकार कर रहा है .
    ये तो रही २००६ में मेरे निबन्ध की बात किन्तु आज यह स्थिति और भी प्रशंसनीय हो चुकी है .भारत में श्रीमती .प्रतिभा देवी सिंह पाटिल प्रथम महिला राष्ट्रपति और मीरा कुमार प्रथम महिला लोकसभा अध्यक्ष के रूप में महिलाओं का सर ऊँचा कर चुकी है आज सभी क्षेत्रों में महिलाएं नाम कमा रही हैं और आने वाला समय भी इनका ही रहने वाला है यह स्थापित कर रही हैं .मेरा तो यही कहना है -
  तू अगर चाहे झुकेगा आसमां भी सामने ,
      दुनिया तेरे आगे झुककर सलाम करेगी .
           जो आज न पहचान सके तेरी काबिलियत
                कल उनकी पीढियां तक इस्तेकबाल करेंगी .
                      शालिनी कौशिक
                              [कौशल]


समीक्षा - "ये तो मोहब्बत नहीं" - समीक्षक शालिनी कौशिक

समीक्षा -  '' ये तो मोहब्बत नहीं ''-समीक्षक शालिनी कौशिक उत्कर्ष प्रकाशन ,मेरठ द्वारा प्रकाशित डॉ.शिखा कौशिक 'नूतन...