शनिवार, 9 मार्च 2013

मासूम बच्चियों के प्रति यौन अपराध के लिए आधुनिक महिलाएं कितनी जिम्मेदार? रत्ती भर भी नहीं .

मासूम बच्चियों के प्रति यौन अपराध के लिए आधुनिक महिलाएं कितनी जिम्मेदार? रत्ती भर भी नहीं .

''आंधी ने तिनका तिनका नशेमन का कर दिया ,
पलभर में एक परिंदे की मेहनत बिखर गयी .''
फखरुल आलम का यह शेर उजागर कर गया मेरे मन में उन हालातों को जिनमे गलत कुछ भी हो जिम्मेदार नारी को ठहराया जाता है जिसका सम्पूर्ण जीवन अपने परिवार के लिए त्याग और समर्पण पर आधारित रहता है .किसी भी सराहनीय काम का श्रेय लेने के नाम पर जब सम्पूर्ण समाज विशेष रूप से पुरुष वर्चस्ववादी समाज आगे बढ़ सीना तान कर खड़ा हो जाता है तो समाज में घटती अशोभनीय इन वारदातों का ठीकरा नारी के सिर क्यों फोड़ते हैं ?जबकि मासूम बच्चियां जिस यौन दुर्व्यवहार की शिकार हो रही हैं उसका कर्ता-धर्ता तो पुरुष ही है .
   आधुनिक महिलाएं आज निरंतर प्रगति पथ पर आगे बढ़ रही हैं और ये बात पुरुष सत्तात्मक समाज को फूटी आँख भी नहीं सुहाती और इसलिए सबसे अधिक उसकी वेशभूषा को ही निशाना बनाया जाता है .सबसे ज्यादा आलोचना उसके वस्त्र चयन को लेकर ही होती है .जैसे कि एक पुराने फ़िल्मी गाने में कहा गया-
''पहले तो था चोला बुरका,
   फिर कट कट के वो हुआ कुरता ,
      चोले की अब चोली है बनी
          चोली के आगे क्या होगा ?
ये फैशन यूँ ही बढ़ता गया ,
   और कपडा तन से घटता गया ,
       तो फिर उसके बाद ......''

यौन दुर्व्यवहार के लिए कपड़ों को दोषी ठहराया जा रहा है .यह धारणा भी बलवती की जा रही है कि यदि दो लड़कियां साथ जा रही हैं और उनमे से एक पूरी तरह से ढकी-छिपी हो और दूसरी आधुनिक वस्त्रों में हो तो वह आधुनिक वस्त्रों वाली ही छेड़खानी का शिकार होती है और यदि इसी धारणा पर  विश्वास किया जाये तो दिल्ली गैंगरेप कांड तो होना ही नहीं चाहिए था  क्योंकि उसमे दामिनी के भाई के अनुसार वह लम्बे गर्म ओवरकोट में थी .
    ऐसे में मासूम बच्चियों के साथ यौन दुर्व्यवहार के लिए महिलाओं के आधुनिक होने को यदि उत्तरदायी ठहराने की कोशिश की जाती है तो ये सरासर नाइंसाफी होगी समस्त नारी समुदाय के साथ, क्योंकि बच्चियों के मामले में पहले तो ये मासूम न तो कपड़ों के सम्बन्ध में कोई समझ रखती हैं और न ही यह जानती हैं कि जो व्यवहार उनके साथ किया जा रहा है वह एक गंभीर अपराध है .हम स्वयं देखते हैं कि बच्चे कैसे भी कहीं घूम फिर लेते हैं और खेलते रहते हैं वे अगर इन दुनियावी  बातों में फसेंगे तो बचपन शब्द के मायने ही क्या रह जायेंगे जो जिंदगी के औपचारिक अनौपचारिक तथ्यों से अंजान रहता है और एक शांत खुशहाल समय गुजारता है .
   ऐसे में ये सोचना कि बच्चे ये देखेंगे या महसूस करेंगे कि उनकी वेशभूषा अश्लील है या उत्तेजनात्मक ,मात्र कोरी कल्पना है साथ ही उनके बारे में सोचते हुए उनकी माँ ये सोचेगी कि मेरा बच्चा इस तरह अभद्र लग रहा है और हर वक्त घर में भी उसके कपड़ों को देखती रहेगी तो असम्भव ही कहा जायगा क्योंकि जो बच्चे इसका शिकार हो रहे हैं वे इतने छोटे हैं कि उनके बारे में उनके बड़े ये कल्पना भी नहीं कर सकते कि उनके साथ कोई ऐसा करने की सोच भी सकता है .इतनी छोटी बच्चियों के शरीर भले ही कपड़ों से ढके हो या न ढके हों कभी भी उनकी यौन प्रताड़ना का कारण नहीं होते ,उनकी यौन प्रताड़ना का एकमात्र कारण है ''उनकी मासूमियत ,जिसके कारण वे न तो उस व्यवहार को जान पाते हैं और न ही किसी को उसके बारे में बता पाने की स्थिति में होते हैं .जैसे कि मोबिन धीरज लिखते हैं -
''मुहं से निकले तो ज़माने को पता चलता है ,
घुट के रह जाये जो आवाज कोई क्या जाने .''
बिल्कुल यही कारण है कि वहशी दरिन्दे को अपनी हवस बुझाने के लिए इन बच्चियों के शरीर के रूप में एक महिला का शरीर मिलता है और उसका शिकार वह बच्ची न तो उसका प्रतिरोध ही कर सकती है और न ही उसका अपराध दुनिया के सामने उजागर .

   इसके साथ ही आधुनिक महिलाओं पर यह जिम्मेदारी डाली जा रही है तो ये नितान्त अनुचित है क्योंकि यह कृत्य इन बच्चियों के साथ या तो घर के किसी सदस्य द्वारा ,या स्कूल के किसी कर्मचारी या शिक्षक द्वारा ,या किसी पडौसी द्वारा किया जाता है और ऐसे में ये कहना कि वह उसकी वेशभूषा देख उसके साथ ऐसा कर गया ,पूर्ण रूप से गलत है यहाँ महिलाओं की आधुनिकता का तनिक भी प्रभाव नहीं कहा जा सकता .
    मासूम बच्चियों के प्रति यौन दुर्व्यवहार का पूर्ण रूप से जिम्मेदार हमारा समाज और उसकी सामंतवादी सोच है ,जिसमे पुरुषों के लिए किसी संस्कार की कोई आवश्यकता नहीं समझी जाती ,उनके लिए किसी नैतिक शिक्षा को ज़रूरी नहीं माना  जाता . यह सब इसी सोच का दुष्परिणाम है .ऐसे में समाज में जो थोड़ी बहुत नैतिकता बची है वह नारी समुदाय की शक्ति के फलस्वरूप है और यदि नारी को इसी तरह से दबाने की कोशिशें जारी रही तो वह भी नहीं बचेंगी और तब क्या हल होगा उनकी सहज कल्पना की जा सकती है .इसलिए नारी पर इस तरह से दोषारोपण करने वालो को ''नवाज़ देवबंदी''के इस शेर को ध्यान में रखना होगा -
''समंदर के किसी भी पार रहना ,
    मगर तूफान से होशियार रहना ,
        लगाओ तुम मेरी कीमत लगाओ
             मगर बिकने को भी तैयार रहना .''

शालिनी कौशिक
    [कौशल ]

13 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

गहन आलेख..दृष्टि स्पष्ट रहे..पथ पर बनी रहे..

Aziz Jaunpuri ने कहा…

sundar soch ,behatareen nazariya

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

Nice post.

सलाह : भारतीय नारी पश्चिम का अन्धानुकरण न करे.
नई तालीम दिलाने वाले मां-बाप अपनी औलाद के लिए ऊंचे ओहदे का ख़याल तो रखते हैं लेकिन उसके किरदार का क्या होगा ?
इसे वे भुला देते हैं।

Rajendra Kumar ने कहा…

सार्थक आलेख,इस अपराध के लिए दुष्ट प्रकृति वाले पुरुष समाज ही जिम्मेवार हैं.आपको महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएँ!

पूरण खण्डेलवाल ने कहा…

परिवारों से मिलकर समाज बनता है और परिवार नारी और पुरुष से मिलकर बनता है i परिवार किसी भी बच्चे की पहली पाठशाला है और माँ और पिता उस बच्चे के प्रथम गुरु होते हैं और बच्चों के चरित्र निर्माण की जिम्मेदारी सर्वप्रथम उन्ही की होती है जिसमें कहीं ना कहीं चूक हो रही है जिसके कारण ही आज समाज में इस तरह की घटनाएं सामने आ रही है ! एक दूसरे को दोष देने के बजाय सबको अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी और बच्चों के चरित्र निर्माण की तरफ ध्यान देना होगा जिसमें पुरुषों की जिम्मेदारी अधिक है लेकिन औरत भी अपनी जिम्मेदारियों से बच नहीं सकती ! रही बात पहनावे आदि की तो हो सकता इससे थोडा बहुत फर्क पड़ता हो लेकिन सबसे ज्यादा दोष चरित्रहीनता का है !

Neetu Singhal ने कहा…

माली आवत देखि के, कलियाँ करें पुकार ।
फूली फूली चुन लई काल हमारी बार ।।
----- ।। संत कबीर ।। -----

Aziz Jaunpuri ने कहा…

aap ki bat me dam hai Shalini Ji

Kalipad "Prasad" ने कहा…

आपका विश्लेषात्मक लेख तर्क संगत है.
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shyam gupta ने कहा…

मासूम बच्चियों के प्रति यौन दुर्व्यवहार का पूर्ण रूप से जिम्मेदार हमारा समाज और उसकी सामंतवादी सोच है ,जिसमे पुरुषों के लिए किसी संस्कार की कोई आवश्यकता नहीं समझी जाती ,उनके लिए किसी नैतिक शिक्षा को ज़रूरी नहीं माना जाता .
---शालिनी जी ...
-----पहले तो यह किसने व किस समाज में कहा गया है कि पुरुषों के लिए संस्कार या नैतिकता की जरूरत नहीं है.... तमाम नैतिकताएं पुरुषों व स्त्रियों दोनों के लिए ही हैं..
----पूरण जी ने बहुत सही कहा कि दोनों को ही अपना दायित्व निभाना चाहिए और निश्चय ही आज दोनों ही अपने दायित्व नहीं निभा रहे उसी का यह परिणाम है ..आचरण शुचिता तो मनुष्य मात्र के लिए है इसमें स्त्री या पुरुष की कोई बात नहीं ..
--- जहां तक कपड़ों की बात है तो यह सिर्फ शत-प्रतिशत सामयिकी आत्यंतिक प्रभाव ही नहीं है ...यह पुरुष की मानसिकता को दीर्घगामी प्रभाव से प्रदूषित करते है जिसके दूरस्थ व अन्यस्थ प्रभाव अवश्य ही होते हैं....आवश्यकता नहीं है कि बलात्कार सिर्फ कम कपडे पहनने वालों पर ही हो ...

shyam gupta ने कहा…

हमारा समाज .... में स्त्री-पुरुष सभी आते हैं ..सभी वर्ग के ....आप हम भी अलग नहीं हैं ...

रश्मि शर्मा ने कहा…

ये मानसि‍कता की बात है...;कपड़ों से कुछ नहीं होता...सटीक आलेख

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

bahut hee sahee baat kahee aapne jo hamari soch ko jhakjhor detee hai aur vivash kartee hai ye sochne pe ki kya hum modern world mein reh rahey hain yaa paashan yug mein???????

Yashwant Mathur ने कहा…


दिनांक 13/03/2013 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत है .
धन्यवाद!

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