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शहंशाही मर्दों की ,क़ुबूल की है कुदरत ने ,

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तखल्लुस कह नहीं सकते ,तखैयुल कर नहीं सकते , तकब्बुर में घिरे ऐसे ,तकल्लुफ कर नहीं सकते . ………………………………………………………………. मुसन्निफ़ बनने की सुनकर ,बेगम मुस्कुराती हैं , मुसद्दस लिखने में मुश्किल हमें भी खूब आती है , महफ़िलें सुन मेरी ग़ज़लें ,मुसाफिरी पर जाती हैं , मसर्रत देख हाल-ए-दिल ,मुख्तलिफ ही हो जाती है . मुकद्दर में है जो लिखा,पलट हम कर नहीं सकते , यूँ खाली पेट फिर-फिर कर तखल्लुस कह नहीं सकते . ………………………………………………………………………. ज़बान पर अवाम की ,मेरे अशआर चढ़ जाएँ , मुक़र्रर हर मुखम्मस पर ,सुने जो मुहं से कह जाये , मुखालिफ भी हमें सुनने ,भरे उल्फत चले आयें , उलाहना न देकर बेगम ,हमारी कायल हो जाएँ . नक़ल से ऐसी काबिलियत हैं खुद में भर नहीं सकते , यूँ सारी रात जग-जगकर तखैयुल कर नहीं सकते . …………………………………………………………….. शहंशाही मर्दों की ,क़ुबूल की है कुदरत ने , सल्तनत कायम रखने की भरी हिम्मत हुकूमत ने , हुकुम की मेरे अनदेखी ,कभी न की हकीकत ने , बनाया है मुझे राजा ,यहाँ मेरी तबीयत ने . तरबियत ऐसी कि मूंछे नीची कर नहीं सकते , तकब्बुर में घिरे ऐसे कभी भ...

बेटी के भाग्य में प्रभु कांटे ही भर गया .

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  पैदा हुई है बेटी खबर माँ-बाप ने सुनी , खुशियों का बवंडर पल भर में थम गया . चाहत थी बेटा आकर इस वंश को बढ़ाये , रखवाई का ही काम उल्टा सिर पे पड़ गया . बेटा जने जो माता ये है पिता का पौरुष , बेटी जनम का पत्थर माँ के सिर पे बंध गया . गर्मी चढ़ी थी आकर घर में सभी सिरों पर , बेडा गर्क ही जैसे उनके कुल का हो गया . गर्दिश के दिन थे आये ऐसे उमड़-घुमड़ कर , बेटी का गर्द माँ को गर्दाबाद कर गया . बेठी है मायके में ले बेटी को है रोटी , झेला जो माँ ने मुझको भी वो सहना पड़ गया . न मायका है अपना ससुराल भी न अपनी , बेटी के भाग्य में प्रभु कांटे ही भर गया . न करता कदर कोई ,न इच्छा है किसी की , बेटी का आना माँ को ही लो महंगा पड़ गया . सदियाँ गुजर गयी हैं ज़माना बदल गया , बेटी का सुख रुढियों की बलि चढ़ गया .  सच्चाई ये जहाँ की देखे है ''शालिनी '' बेटी न जन्म ले यहाँ कहना ही पड़ गया .       शालिनी कौशिक            [कौशल] शब्दार्थ-गर्दाबाद-उजाड़ ,विनाश 

एक की लाठी सत्य अहिंसा एक मूर्ति सादगी की,

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एक की लाठी सत्य अहिंसा एक मूर्ति सादगी की, दोनों ने ही अलख जगाई देश की खातिर मरने की . .......................................................................... जेल में जाते बापू बढ़कर सहते मार अहिंसा में , आखिर में आवाज़ बुलंद की कुछ करने या मरने की . ............................................................................. लाल बहादुर सेनानी थे गाँधी जी से थे प्रेरित , देश प्रेम में छोड़ के शिक्षा थामी डोर आज़ादी की . ................................................................................... सत्य अहिंसा की लाठी ले फिरंगियों को भगा दिया , बापू ने अपनी लाठी से नीव जमाई भारत की . ........................................................................... आज़ादी के लिए लड़े वे देश का नव निर्माण किया , सर्व सम्मति से ही संभाली कुर्सी प्रधानमंत्री की . ................................................................... मिटे गुलामी देश की अपने बढ़ें सभी मिलकर आगे , स्व-प्रयत्नों से दी है बढ़कर साँस हमें ...

बेटी मेरी तेरी दुश्मन ,तेरी माँ है कभी नहीं ,

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बेटी मेरी तेरी दुश्मन ,तेरी माँ है कभी नहीं , तुझको खो दूँ ऐसी इच्छा ,मेरी न है कभी नहीं . ...................................................................... नौ महीने कोख में रखा ,सपने देखे रोज़ नए , तुझको लेकर मेरे मन में ,भेद नहीं है कभी नहीं . .................................................................. माँ बनने पर पूर्ण शख्सियत ,होती है हर नारी की , बेटे या बेटी को लेकर ,पैदा प्रश्न है कभी नहीं . ....................................................................... माँ के मन की कोमलता ही ,बेटी से उसको जोड़े , नन्ही-नन्ही अठखेली से ,मुहं मोड़ा है कभी नहीं . ......................................................................... सबकी नफरत झेल के बेटी ,लड़ने को तैयार हूँ, पर सब खो देने का साहस ,मुझमे न है कभी नहीं . .................................................................... कुल का दीप जलाने को ,बेटा ही सबकी चाहत , बड़े-बुज़ुर्गों  की आँखों का ,तू तारा है कभी नहीं . .........................................................

मायूसियाँ इन्सान को रहने नहीं देती,

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मायूसियाँ इन्सान को रहने नहीं देती, बनके ज़हर जो जिंदगी जीने नहीं देती. जी लेता है इन्सान गर्दिशी हज़ार पल, एक पल भी हमको साँस ये लेने नहीं देती. भूली हुई यादों के सहारे रहें गर हम, ये जिंदगी राहत से गुजरने नहीं देती. जीने के लिए चाहियें दो प्यार भरे दिल, दीवार बनके ये उन्हें मिलने नहीं देती. बैठे हैं इंतजार में वो मौत के अगर, आगोश में लेती उन्हें बचने नहीं देती.                       शालिनी कौशिक 

.......मर्दों के यूँ न कटें पर .

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फिरते थे आरज़ू में कभी तेरी दर-बदर , अब आ पड़ी मियां की जूती मियां के सर . ............................................................. लगती थी तुम गुलाब हमको यूँ दरअसल , करते ही निकाह तुमसे काँटों से भरा घर . ........................................................ पहले हमारे फाके निभाने के थे वादे , अब मेरी जान खाकर तुम पेट रही भर . ............................................................... कहती थी मेरे अपनों को अपना तुम समझोगी , अब उनको मार ताने घर से किया बेघर . ................................................................. पहले तो सिर को ढककर पैर बड़ों के छूती , अब फिरती हो मुंह खोले न रहा कोई डर . ............................................................... माँ देती है औलाद को तहज़ीब की दौलत , मक्कारी से तुमने ही उनको किया है तर . ................................................................... औरत के बिना सूना घर कहते तो सभी हैं , औरत ने ही बिगाड़े दुनिया में कितने नर . .......................................................... माँ-पिता,बहन...

कोमल देह की मलिका ,ख्वाबों की कामिनी है ,

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कोमल देह की मलिका ,ख्वाबों की कामिनी है , ख्वाहिश से भरे दिल की ,माधुरी मानिनी है . .............................................................. नज़रें जो देती उसको ,हैं मान महनीय का , देती है उन्हें आदर ,ऐसी कामायनी है . .......................................................... कायरता भले मर्दों को ,आकर यहाँ जकड़ ले , देती है बढ़के संबल ,साहस की रागिनी है . ................................................................... कायम मिजाज़ रखती ,किस्मत से नहीं रूकती , दफनाती मुसीबत को ,दमकती दामिनी है . .................................................................... जीवन के हर सफ़र में ,चलती है संग-संग में , गागर में भरती सागर ,ये दिल से ''शालिनी'' है . ............................................................................ शब्दार्थ -महनीय-पूजनीय /मान्य ,कामायनी -श्रृद्धा ,कायम मिजाज़ -स्थिर चित्त ,शालिनी -गृहस्वामिनी . शालिनी कौशिक [कौशल ]

चिंता - चिता सम मानव की खातिर ,

 मिटा देती है जीवन का        समस्त अस्तित्व चिंताएं , ये आ जाती हरेक मन में      बिना हम सबके बुलाये , सुकून का कोई भी पल      ये हम पर रहने न देती , तड़पने की टीस भरकर       ये हमको तोहफे हैं देती , नहीं बच सकते हम इनसे     नहीं कर सकते इनको दूर , ये तोड़ें स्वाभिमान सबका     ये सबकी खुशियां करती दूर , कही जाती है ये चिंता      चिता सम मानव की खातिर , घिरा जैसे कोई इनसे          हुआ शमशान में हाज़िर . शालिनी कौशिक        [कौशल ]

हम सबके प्यारे''रिश्ते''

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कभी हमारे मन भाते हैं, कभी हैं इनसे दिल जलते, कभी हमें ख़ुशी दे जाते हैं, कभी हैं इनसे गम मिलते, कभी निभाना मुश्किल इनको, कभी हैं इनसे दिन चलते, कभी तोड़ देते ये दिल को, कभी होंठ इनसे हिलते, कभी ये लेते कीमत खुद की, कभी ये खुद ही हैं लुटते, कभी जोड़ लेते ये जग को, कभी रोशनी से कटते, कभी चमक दे जाते मुख पर, कभी हैं इनसे हम छिपते, कभी हमारे दुःख हैं बांटते, कभी यही हैं दुःख देते, इतने पर भी हर जीवन के प्राणों में ये हैं बसते, और नहीं कोई नाम है इनका हम सबके प्यारे''रिश्ते'' ....................................................................... शालिनी  कौशिक http://shalinikaushik2.blogspot.com

प्रथम पाठशाला -प्रथम शिक्षक !

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सोच कारण निर्माण की कारण विध्वंस की सकारात्मक है निर्माण करेगी , नकारात्मक है करेगी विध्वंस , सोच का बनना संस्कार पर निर्भर , संस्कार मिलें परिवार से , परिवार के संस्कार बोये माँ का प्यार कहते हैं सभी जानें हैं सभी इसीलिए परिवार प्रथम पाठशाला माँ प्रथम शिक्षक ! ................................. शालिनी कौशिक [कौशल ]

ये प्रेम जगा है .

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  ज़रुरत पड़ी तो चले आये मिलने न फ़ुरसत थी पहले न चाहत थी जानें हैं किस हाल में मेरे अपने वहां पर खिसकने लगी जब से पैरों की धरती उडी सिर के ऊपर से सारी छतें ही हड़पकर हकों को ये दूजे के बैठे झपटने लगे इनसे भी अब कोई किया जो इन्होने वो मिलने लगा है तो अपनों की खातिर ये प्रेम जगा है . ........................................ शालिनी कौशिक [कौशल ]

कल्पना /यथार्थ

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उड़ता है मन  कल्पनाओं के  रोज़ नए लोक में , पाता है नित नयी  ऊंचाइयां  तैरकर के सोचता  पाउँगा इच्छित सभी,  पूरी आकांक्षाएं  होंगी मेरी अभी , तभी लगे हैं ठोकरें  यथार्थ से जो पाँव में  टुकड़े टुकड़े हो ह्रदय  घिरता जाये शोक में . ............. शालिनी कौशिक  [कौशल ]