गुरुवार, 25 सितंबर 2014

चिंता - चिता सम मानव की खातिर ,

 मिटा देती है जीवन का
       समस्त अस्तित्व चिंताएं ,
ये आ जाती हरेक मन में
     बिना हम सबके बुलाये ,
सुकून का कोई भी पल
     ये हम पर रहने न देती ,
तड़पने की टीस भरकर
      ये हमको तोहफे हैं देती ,
नहीं बच सकते हम इनसे
    नहीं कर सकते इनको दूर ,
ये तोड़ें स्वाभिमान सबका
    ये सबकी खुशियां करती दूर ,
कही जाती है ये चिंता
     चिता सम मानव की खातिर ,
घिरा जैसे कोई इनसे
         हुआ शमशान में हाज़िर .

शालिनी कौशिक
       [कौशल ]

7 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (27-09-2014) को "अहसास--शब्दों की लडी में" (चर्चा मंच 1749) पर भी होगी।
--
चर्चा मंच के सभी पाठकों को
शारदेय नवरात्रों की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

देवदत्त प्रसून ने कहा…

सच खा है आप ने !

देवदत्त प्रसून ने कहा…

सच खा है आप ने !

कालीपद "प्रसाद" ने कहा…

चिता तो मुर्दे को जलाता है और चिंता जिन्दा आदमी को !
नवरात्रि की हार्दीक शुभकामनाएं !
शुम्भ निशुम्भ बध -भाग ४

Lekhika 'Pari M Shlok' ने कहा…

Sunder prastutikaran ...badhaayi !!

Lekhika 'Pari M Shlok' ने कहा…

Bahut sunder prastuti....

संजय भास्‍कर ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

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