गुरुवार, 31 अक्तूबर 2013

मोदी नाग बन बैठे हमें काट खाने को

मोदी नाग बन बैठे हमें काट खाने को .

जिन्हें हमने गले का हार समझा था गले को सजाने को ,
वही नाग बन बैठे हैं हमें काट खाने को .
''पटेल होते पहले पी.एम्. तो देश की तस्वीर कुछ और होती ''मोदी के ये वचन भारतवर्ष में वीरता ,शहादत और जनता की सरकार को नकारने की जो राष्ट्रद्रोही छवि होनी चाहिए को प्रत्यक्ष करने को पर्याप्त हैं .सर्वप्रथम तो मोदी का प्रधानमंत्री के समक्ष अशोभनीय आचरण उस पर ट्विटर का इस्तेमाल कर सरेआम उनकी अवमानना का प्रयास और लाल किले की प्रतिकृति पर खड़े हो कर स्वयं को भारतीय गणतंत्र का प्रधानमंत्री दिखाने का प्रयास न केवल संविधान द्वारा सृजित राष्ट्र्व्यवस्था का अपमान है बल्कि एक ऐसा कुत्सित कार्य है जिसे भारत में राष्ट्रद्रोह घोषित किया जाना चाहिए अन्यथा न केवल मोदी बल्कि उनकी ही तरह कोई भी सड़क चलता सरकार की बराबरी करने लगेगा और इस तरह भारत राष्ट्र की छवि को सारे विश्व में धक्का पहुंचेगा .
आज जब न पटेल हैं और न नेहरू तब इस तरह की बातें उछालकर मोदी जनभावनाओं के साथ खिलवाड़ के लिए प्रयासरत हैं और यह सोचकर कि ''बदनाम भी हुए तो क्या ,नाम तो हुआ ''अनाप-शनाप कुछ भी बोलने में लगे हैं .
भारत के विकास और उत्थान में नेहरू जी के योगदान को नकारना बिलकुल वैसे ही है जैसे अपने जीवन में सूरज के अस्तित्व को नकारना और उनका जनता के दिलों में स्थान ही ऐसा है जिसे मोदी जैसे नेता भले ही लाख सर पटके करोड़ों रूपए खर्चे .पर पा नहीं सकते और ऐसे ही सरदार पटेल का भी भारतीय जनता ह्रदय की गहराइयों से सम्मान करती है और देश में उनके योगदान के आगे नतमस्तक है .
चाय बेचने से लेकर गुजरात के मुख्यमंत्री बनने तक का सफ़र तय करने वाले मोदी आज गुजरात से निकलकर भारत की जनता को बेवकूफ बनाने निकले हैं और अंग्रेजों की नीति ''बांटों और राज करो ''का पालन करते हुए भारतीय जनता की पटेल व् नेहरू के प्रति भावनाओं को बांटकर भारतीय सत्ता के लिए अपनी राह बनाने में जूट हैं ,भूल गए हैं कि नेहरू जब प्रभावी थे तो पटेल भी कोई अस्तित्व हीं नहीं थे और नेहरू के प्रधानमंत्री बनने में जिसका सबसे बड़ा हाथ था वे भी गुजरात के ही थे ,जिन्हें नेहरू में अपना ही अक्स दिखाई दिया था और जिन्होंने कहा था -
''जवाहर लाल मेरा उत्तराधिकारी होगा .उसका कहना है कि मेरी जबान नहीं समझता और वह ऐसी भाषा बोलता है ,जो मेरे लिए विदेशी है ,यह बात ठीक भी हो सकती है लेकिन दो दिलों के मिलाप में भाषा बाधा नहीं बन सकती .मैं इतना जानता हूँ कि जब मैं नहीं रहूँगा तो वह मेरी भाषा बोलेगा .''
ये शब्द राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी के थे जिन्हें मोदी शायद अपने गुजरात से पहले जोड़कर देख सकेंगे इसलिए उनके शब्दों का तो उनके लिए महत्व होना ही चाहिए और ऐसा नहीं है कि नेहरू को पी.एम्.बनाकर देश ने उनपर कोई एहसान किया हो बल्कि नेहरू वह विभूति थे जो देश में ऐसे पद स्वीकार कर स्वयं को बंधन में बांधते हैं .नेहरु का योगदान इस देश में इतना है कि मोदी की उस बारे में सोचते सोचते भी शायद सारी उम्र कम पड़ जाये और इसलिए वे उसी तरह त्याज्य हैं जैसे सत्य के आगे असत्य .
लाहौर में पवित्र सलिला रावी के पुनीत तट पर १९२९ में अखिल भारतीय कॉंग्रेस के अधिवेशन में पंडित नेहरू को सर्वसम्मति से प्रथम बार अध्यक्ष बनाया गया और उन्हीं की अध्यक्षता में भारतवर्ष की स्वतंत्रता का प्रस्ताव पास हुआ [और यह सब तब जब देश स्वतंत्र कब होगा पता नहीं था ,कोई पद मिलेगा ,ऐसी कोई महत्वाकांक्षा नहीं थी .]
अवध के किसानों के लिए हुए आंदोलन में वे पहली बार जेल गए .नमक सत्याग्रह में जेल गए .उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन में जेल गए ६ महीने की सजा मिली .कलकत्ता में अंग्रेजी राज के विरुद्ध भाषण देने पर फिर जेल यात्रा .सन १९३९ में द्वित्य विश्व युद्ध में भारत को सम्मिलित राष्ट्र घोषित किये जेन पर नेहरू द्वारा कटु आलोचना किये जाने पर जनता का उनसे स्वर मिलाना अंग्रेजों को रास नहीं आया और उन्होंने उन्हें पुनः चार वर्ष का कारावास का दंड दे दिया ,फिर ४२ का आंदोलन ,१५ जून को नेहरू छोड़े गए यह उनकी नौवीं जेल यात्रा थी आते ही उन्होंने आज़ाद हिन्द फ़ौज के सिपाहियों को छुड़ाने का महान प्रयत्न किया ,सरकार को उन्हें छोड़ना पड़ा क्योंकि नेहरू और जनता में कोई भेद नहीं था .अंग्रेजों ने घबराकर २ सितम्बर १९४६ को भारत में एक अंतरिम सरकार की स्थापना की जिसमे पंडित नेहरू को प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया [और वह भी तब जबकि अंग्रेजों का शासन था और अंग्रेजों को नेहरू भारतीय जनता के सशक्त प्रतिनिधि दिखाई देते थे और भारतीय जनता किसी भी कीमत पर ब्रिटिश अंकुश के अधीन नहीं रहना चाहती थी ,तब नेहरू ही वे सशक्त प्रतिनिधि थे जिन्हें जनता ने अपना माना और और अपने सिर आँखों पर बैठाया .]
और यह भी कि जनता उन्हें प्यार करती थी उनका सम्मान करती थी क्योंकि वे कहा करते थे -
''मुझे इसकी कतई चिंता नहीं है कि मेरे बाद दुसरे लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे .मेरे लिए तो बस इतना ही काफी है कि मैंने अपने को अपनी ताकत और क्षमता को भारत की सेवा में खपा दिया .''
और भारतीय जनता ने ये न केवल उनके विचारों में बल्कि उनके कार्यों में भी महसूस किया .देश के लिए उन्होंने अपना न केवल आनंद भवन दिया बल्कि अपने स्वास्थ्य को भी जनकार्यों में ही समर्पित कर दिया स्वयं मात्र दो घंटे सोकर जनता के चैन से सोने के लिए अवसर प्रदान करने के लिए भरसक चेष्टाएँ की और उनमे सफल भी हुए .नेहरू वे नहीं थे जो आज के नेता हैं वे सुसम्पन्न होते हुए जनता के दुःख दर्द को महसूस कर पाये .प्रसिद्द फ़िल्मी गीत ''दे दी हमें आज़ादी ....में उनकी सेवा के बारे में संक्षेप में ही विस्तार से उनके दिल को खोल कर रखा गया है -
''जब जब तेरा बिगुल बजा .....
फूलों की सेज़ छोड़कर दौड़े जवाहर लाल ''
अपने प्राण त्यागते हुए भी नेहरू के ह्रदय में हिंदुस्तान विराजमान था .उन्होंने २७ मई १९६४ को २ बजे कहा था -
''अगर मेरे बाद कुछ लोग मेरे बारे में सोचें तो मैं चाहूंगा कि वे कहें -वह एक ऐसा आदमी था ,जो अपने पूरे दिल और दिमाग से हिन्दुस्तानियों से मुहब्बत करता था और हिंदुस्तानी भी उसकी कमियों को भुलाकर उसको बेहद अनहद मुहब्बत करते थे .''
उनके महा प्रयाण के पश्चात् उनकी इच्छाओं के अनुरूप उनकी अस्थियां उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक बिखेर दी गयी .कवि भारत भूषण ने कहा -
''सिमटे तो ऐसे सिमटे तुम ,बंधे गुलाब की पाँखुरियों से ,
बिखरे तो ऐसे बिखरे तुम ,खेत खेत की फसल हो गए .''
इस गुलाब को ,खेत खेत की फसल के अस्तित्व को नकार आज मोदी पुनः भारत -पाक बंटवारे का वीभत्स दृश्य उपस्थित करने में जुटे हैं ताकि किसी भी तरह प्रधानमंत्री की कुर्सी हासिल कर सके .ये श्रीराम के अनुयायी हैं उन्हीं श्रीराम के जो दूसरे की तपस्या से अर्जित किसी सीधी को लेना चोरी मानते हैं .सरदार पटेल की विरासत के बहाने उनके प्रति लोगों का उनके प्रति जो प्यार व् सम्मान है उसे लेने में जुटे मोदी क्या आज किसी चोर से अलग कहे जायेंगे ?आज जो वे कर रहे हैं वह देश को साफ तौर पर बाँटने का प्रयास है और इसी का परिणाम है जो आज देश में कभी मुजफ्फर नगर में दंगे भड़क रहे हैं तो कभी बिहार में आतंकवादी हमले हो रहे हैं प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी देश की विभूतियों के प्रति गलत शब्दों के इस्तेमाल से भी नहीं चूक रहे हैं और इस तरह दिखा रहे हैं अपनी ललक जो उन्हें अपने लालच की पूर्ति के लिए किसी भी हद तक गिरने को मजबूर करती है .उनके बारे में तो श्याम बिहारी गुप्त के शब्दों में बस यही कह सकते हैं -
''आचरण ने शब्दों के अर्थ बदल दिए ,
फिर ऐसा हुआ कि अँधेरा बाँटने लगे दिए .''
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

सोमवार, 28 अक्तूबर 2013

बिहार आतंकवादी हमला :फायदा एकमात्र भाजपा को .

बिहार आतंकवादी हमला :फायदा एकमात्र भाजपा को .

.यूँ तो यहाँ बिहार में जो हुआ आतंकवाद के कारण हुआ किन्तु आतंकवादी घटनाओं के पीछे भी एक सच छुपा है और वह यह है कि इन्हें कोई देश में मिलकर ही अंजाम दिलवाता है और ऐसा क्यूँ है कि भाजपा का जबसे नितीश से अलगाव हुआ है तभी से बिहार भाजपा के लिए खतरनाक हो गया है और जब भी भाजपा वहाँ कदम रखती है तभी वहाँ कुछ न कुछ आतंकवादी घटना घट जाती है .
नितीश कुमार वहाँ शासन कर रहे हैं और ये स्वाभाविक है कि वहाँ कोई भी ऐसी घटना होगी तो उसमे उनकी सरकार की लापरवाही ही कही जायेगी और भाजपा और नितीश के सम्बन्ध अभी हाल ही में मोदी के कारण अलगाव पथ पर अग्रसर हुए हैं ऐसे में नितीश को लेकर भाजपा की रैलियों पर हमलों को लेकर टिपण्णी किया जाना एक तरह से सम्भाव्य है किन्तु सही नहीं क्योंकि कोई भी मुख्यमंत्री ये नहीं चाहेगा कि उसके राज्य में शासन व्यवस्था पर ऐसा कलंक लगे जो आगे उसके सत्ता में आने के सभी रास्ते बंद कर दे और कांग्रेस को तो ऐसे में घसीटा जाना एक आदत सी बन गयी है और जैसे कि पंजाबी में एक कहावत है कि -
''वादड़िया सुजा दड़िया जप शरीरा नाल .''
तो ये तो वह आदत है जो कि शरीर के साथ ही जायेगी क्योंकि कांग्रेस आरम्भ से इस देश पर शासन कर रही है और सत्ता का विरोध होता ही है किन्तु एक तथ्य यह भी है कि कांग्रेस ने देश के लिए बहुत कुछ खोया भी है आजतक इसके बड़े बड़े नेता आतंकवाद का शिकार हुए हैं ऐसे तथ्य अन्य दलों के साथ कम ही हैं क्योंकि वे जनता में इतने लोकप्रिय नही हैं कि आतंकवादियों की हिट लिस्ट में उन्हें स्थान मिले और इसका अगर लाभ कांग्रेस को मिला है तो उसने इंदिरा गांधी ,राजीव गांधी जैसे भारत रत्नों को खोया भी है इसलिए आतंकवाद की किसी भी घटना के लिए कांग्रेस को दोषी कहा जाना नितान्त गलत कार्य है .
सिर्फ यही नहीं कि भारत ने आतंकवादी घटना में अपने बड़े नेताओं को खोया है बल्कि श्रीलंका ,पाकिस्तान और विश्व के बहुत से देशों ने अपने बड़े नेताओं को ऐसी घटनाओं का शिकार बनते देखा है ऐसे में ये आश्चर्य की ही बात है कि बार बार आतंकवादी हमले भाजपा के कथित फायर ब्रांड नेताओं पर होते हैं और वे खरोंच तक का शिकार नहीं होते .आखिर आतंकवादी इनसे मात कैसे खा जाते हैं ?ये तथ्य तो इन्हें सभी के साथ साझा करना ही चाहिए क्योंकि आज न केवल ये बल्कि सभी सत्ता के भूखे हैं -
''भ्रष्ट राजनीति हुई ,चौपट हुआ समाज ,
हर वानर को चाहिए किष्किन्धा का राज .''
तो फिर ये ही क्यूँ बचे ये हक़ तो सभी को मिलना चाहिए और देश प्रेमी व् राष्ट्रवादी इस पार्टी को अपना यह कर्त्तव्य पूरी श्रृद्धा से निभाना चाहिए .और अगर ये यह नहीं कर पते हैं तो कानून में जब भी किसी क़त्ल में कातिल न मिल रहा हो तो उसे ढूंढने के लिए उस व्यक्ति पर ही शक किया जाता है जिसे उस क़त्ल से सर्वाधिक फायदा होता है और यहाँ इस हमले का एकमात्र फायदा भाजपा को ही हो रहा है जनता की सहानुभूति बटोरने को लेकर तो शक की ऊँगली किधर जायेगी आप स्वयं आकलन कर सकते हैं .
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

नौजवानो की नहीं तवलीन जी की निराशा को समझिये .

नौजवानो की नहीं तवलीन जी की निराशा को समझिये .

सोमवार २८ अक्टूबर २०१३ अमर उजाला का सम्पादकीय पृष्ठ नजरिया तवलीन सिंह का ''नौजवानों की निराशा को समझिये ''और कुछ तो समझ में आया नहीं ,आया तो बस इतना कि तवलीन सिंह जी निराश हैं और अपनी इस निराशा को नौजवानों के मत्थे मढ़ना चाह रही हैं .
तवलीन जी कहती हैं कि ''राहुल गांधी के भाषण मैंने पिछले सप्ताह ध्यान से सुने .इसलिए कि उनके राजस्थान दौरे से तीन दिन पहले मैं कानपूर गयी थी नरेंद्र मोदी की उत्तर प्रदेश में पहली आम सभा देखने .विशाल जलसा था ,जैसे जनता का सैलाब उमड़ आया हो और घंटों तक वह चमचमाती धूप में इंतज़ार करती रही मोदी का .इतने लोग आये थे उनको सुनने और मोदी जब मंच पर पहुंचे तो इतना जोश दिखाया कि अपना भाषण मोदी ने यह कहकर शुरू किया कि कानपूर की जनता ने उनको जीत लिया .''......
उनके भाषण या भीड़ का तवलीन जी पर क्या असर हुआ इसकी झलक तो स्वयं उनके इस आलेख में ही मिल जाती है -''वे कहती हैं इसके बाद मोदी ने तकरीबन अपना सारा भाषण विकास से जुड़े मुद्दों पर दिया और लोगों के सामने एक नए भारत ,एक नए सपने का रंग दिखाने की कोशिश की .मोदी के कई भाषण मैंने देखे सुने हैं किन्तु मेरी राय में उनका यह भाषण सबसे अच्छा था.....कितना अच्छा था इसका एक छोटा सा प्रभाव ...स्वयं उनके शब्दों में .....इसलिए देखना चाहती थी कि इसके जवाब में क्या कहेंगे राहुल गांधी और कॉंग्रेस के अघोषित प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी .राजस्थान का उनका दौरा शुरू होते ही बैठ गयी मैं टीवी के आगे ..... ...इसका साफ़ मतलब क्या है यही कि तवलीन जी नहीं जुटा पायी वह साहस जो उन्हें जुटाना चाहिए था .टीवी के आगे बैठने से क्या प्रत्यक्ष का सही आकलन वे कर सकती थी ?राहुल गांधी की सभा का अगर उन्हें सही आकलन करना था तो एक सही रिपोर्टर की भांति उन्हें उनकी भी सभा में ही जाना चाहिए था ,किन्तु उनमे यह साहस ही नही था क्योंकि इतने लम्बे राजनीतिक करियर वाले मोदी जी का सबसे अच्छा भाषण यदि कानपूर वाला हो सकता है तो इससे ही उनकी राजनीतिक सफलता का आकलन किया जा सकता है और बढ़ा चढ़ा कर उन्हें देश की राजनीती में धूमकेतु का स्थान दिलाने की सोचना एक अलग बात है और स्थान उन्हें मिलना एक अलग बात जो कि स्वयं उनके दल वाले लोग ही नहीं चाहते .
तवलीन जी कि जितने भी आलेख मैंने पढ़े हैं उनमे देश की अन्य समस्याओं से उनका सरोकार कुछ कम ही लगता है अधिकांश रूप से उनकी व्यक्तिगत डाह ही दृष्टिगोचर होती है जो कि उन्हें गांधी फैमली से है और इसलिए जो भी इस परिवार के खिलाफ में सामने आता है वे उसके कंधे पर बन्दूक रखकर चलाने लगती हैं .
राहुल गांधी ने अगर अपनी दादी व् पिता की हत्या का जिक्र सभा में कर दिया तो इसमें इतने बबाल खड़े करने की तो कोई बात नहीं है बल्कि ये तो वह दर्द है जो जब भी उन्हें अपने अपनी आँखों के सामने दिखेंगे उनके दिल से निकलेगा ही ,हाँ ये ज़रूर है कि इस तरह के बयान विपक्षी दलों में खलबली मचाने को काफी हैं क्योंकि अगर राहुल गांधी की ऐसे बातों से भारतीय जनता की सोयी हुई आत्मा जाग गयी तो विपक्षियों के लिए अपनी जमानत तक बचाना मुश्किल हो जायेगा .ये सब शायद तवलीन जी जानती हैं किन्तु मानना नहीं चाहती .इस तरह के वे बहुत से आलेख लिख चुकी हैं और उन्हें चाहिए कि अपनी लेखन क्षमता का सही इस्तेमाल करें और आलोचना करने के लिए सही सोच का इस्तेमाल करें क्योंकि वे लोकतंत्र के जिस स्तम्भ से ताल्लुक रखती हैं उसका जनता को जागरूक करने में महत्वपूर्ण दायित्व है और सही की तारीफ और गलत की आलोचना से वे अपने इस कर्त्तव्य का सही तरह निर्वाह कर सकती हैं .
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

शनिवार, 26 अक्तूबर 2013

नारी की सशक्तता यहाँ देखो /इनमे देखो .

 

नारी की सशक्तता यहाँ देखो /इनमे देखो .


मैंने बहुत पहले एक आलेख लिखा था-

Maa DurgaMaa DurgaMaa Durga

ये सर्वमान्य तथ्य है कि महिला शक्ति का स्वरुप है और वह अपनों के लिए जान की बाज़ी  लगा भी देती है और दुश्मन की जान ले भी लेती है.नारी को अबला कहा जाता है .कोई कोई तो इसे बला भी कहता है  किन्तु यदि सकारात्मक रूप से विचार करें तो नारी इस स्रष्टि की वह रचना है जो शक्ति का साक्षात् अवतार है.धेर्य ,सहनशीलता की प्रतिमा है.जिसने माँ दुर्गा के रूप में अवतार ले देवताओं को त्रास देने वाले राक्षसों का संहार किया तो माता सीता के रूप में अवतार ले भगवान राम के इस लोक में आगमन के उद्देश्य को  साकार किया और पग-पग पर बाधाओं से निबटने में छाया रूप  उनकी सहायता की.भगवान विष्णु को अमृत देवताओं को ही देने के लिए और भगवान् भोलेनाथ  को भस्मासुर से बचाने के लिए नारी के ही रूप में आना पड़ा और मोहिनी स्वरुप धारण कर उन्हें विपदा से छुड़ाना पड़ा.
हमारे संस्कृत ग्रंथों में कहा गया है -
"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते,रमन्ते तत्र देवता."
प्राचीन काल  का इतिहास नारी की गौरवमयी  कीर्ति से भरा पड़ा है.महिलाओं ने समय समय पर अपने साहस पूर्ण कार्यों से दुश्मनों के दांत खट्टे किये हैं.प्राचीन काल में स्त्रियों का पद परिवार में अत्यंत महत्वपूर्ण था.गृहस्थी का कोई भी कार्य उनकी सम्मति के बिना नहीं किया जा सकता था.न केवल धर्म व् समाज बल्कि रण क्षेत्र में भी नारी अपने पति का सहयोग करती थी.देवासुर संग्राम  में कैकयी ने अपने अद्वित्य रण कौशल से महाराज दशरथ को चकित किया था.
गंधार के राजा रवेल की पुत्री विश्पला ने सेनापति का दायित्व स्वयं पर लेकर युद्ध किया .वह वीरता से लड़ी पर तंग कट गयी ,जब ऐसे अवस्था में घर पहुंची तो पिता को दुखी देख बोली -"यह रोने का समय नहीं,आप मेरा इलाज कराइये मेरा पैर ठीक कराइये जिससे मैं फिर से ठीक कड़ी हो सकूं तो फिर मैं वापस शत्रुओसे  सामना करूंगी ."अश्विनी कुमारों ने उसका पैर ठीक किया और लोहे का पैर जोड़ कर उसको वापस खड़ा किया -
" आयसी जंघा विश्पलाये अदध्यनतम  ".[रिग्वेद्य  १/ ११६]
इसके बाद विश्पला ने पुनः     युद्ध किया और शत्रु को पराजित किया.
महाराजा  रितध्वज    की पत्नी      मदालसा ने अपने पुत्रों को समाज में जागरण के लिए सन्यासी बनाने का निश्चय किया .महाराजा   रितध्वज के आग्रह पर अपने आठवे पुत्र अलर्क को योग्य शासक बनाया.व् उचित समय पर पति सहित वन को प्रस्थान कर गयी.जाते समय एक यंत्र अलर्क को दिया व् संकट के समय खोलने का निर्देश दिया.कुछ दिनों बाद जब अलर्क के बड़े भाई ने उसे राजपाट सौंपने का निर्देश दिया तब अलर्क ने वह यंत्र खोला जिसमे सन्देश लिखा था-"संसार के सभी ईश्वर अस्थिर हैं तू शरीर मात्र नहीं है ,इससे ऊपर उठ."और उसने बड़े भाई को राज्य सौंप देने का निश्चय किया.सुबाहु इससे अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्हें ही राज्य करते रहने का आदेश दिया.राजा  अलर्क को राज ऋषि की पदवी मिली .यह मदालसा की ही तेजस्विता थी जिसने ८ ऋषि तुल्य पुत्र समाज को दिए.
तमलुक [बंगाल] की रहने वाली मातंगिनी हाजरा ने ९ अगस्त १९४२ इसवी में भारत छोडो आन्दोलन में भाग लिया और आन्दोलन में प्रदर्शन के दौरान वे ७३ वर्ष की उम्र में अंग्रेजों की गोलियों का शिकार हुई और मौत के मुह में समाई .
असम के दारांग जिले में गौह्पुर   गाँव की १४ वर्षीया बालिका कनक लता बरुआ ने १९४२ इसवी के भारत छोडो आन्दोलन में भाग लिया .अपने गाँव में निकले जुलूस का नेतृत्व इस बालिका ने किया तथा थाने पर तिरंगा झंडा फहराने के लिए आगे बढ़ी पर वहां के गद्दार थानेदार ने उस पर गोली चला दी जिससे वहीँ उसका प्राणांत हो गया.
इस तरह की नारी वीरता भरी कहानियों से इतिहास भरा पड़ा है.और किसी भी वीरता,धैर्य        ज्ञान      की तुलना नहीं की जा सकती.किन्तु इस सबके बावजूद नारी को अबला  बेचारी  कहा जाता है.अब यदि हम कुछ और उदाहरण  देखें तो हम यही पाएंगे कि नारी यदि कहीं झुकी है तो अपनों के लिए झुकी है न कि अपने लिए .उसने यदि दुःख सहकर भी अपने चेहरे पर शिकन तक नहीं आने दी है तो वह अपने प्रियजन    के दुःख दूर करने के लिए.
कस्तूरबा गाँधी,जिन्होंने दक्षिण अफ्रीका में घूमकर महिलाओं में सत्याग्रह का शंख फूंका .चंपारण ,भारत छोडो आन्दोलन में जिनका योगदान अविस्मर्णीय रहा ,ने भी पतिव्रत धर्म के पालन के लिए कपडे धोये,बर्तन मांजे और   ऐसे ऐसे कार्य किये जिन्हें कोई सामान्य भारतीय नारी सोचना भी पसंद नहीं करेगी.
महाराजा जनक की पुत्री ,रघुवंश की कुलवधू,राम प्रिय जानकी सीता ने पतिव्रत धर्म के पालन के लिए वनवास में रहना स्वीकार किया.
हमारे अपने ही क्षेत्र की  एक कन्या मात्र इस कारण से जैन साध्वी के रूप में दीक्षित हो गयी कि उसकी बड़ी बहन के साथ उसके ससुराल वालों ने अच्छा व्यव्हार नहीं किया और एक कन्या इसलिए जैन साध्वी बन गयी कि उसकी प्रिय सहेली साध्वी बन गयी थी.
स्त्रियों का प्रेम, बलिदान ,सर्वस्व समर्पण ही उनके लिए विष बना है.गोस्वामी तुलसीदास जी नारी को कहते हैं-
"ढोल गंवार शुद्रपशु नारी,
ये सब ताड़न के अधिकारी. "
वे एक समय पत्नी  प्रेम में इतने पागल थे कि सांप को रस्सी समझ उस पर चढ़कर पत्नी  के मायके के कमरे में पहुँच गए थे.ऐसे में उनको उनकी पत्नी  का ही उपदेश था जिसने उन्हें विश्व वन्दनीय बना दिया था-
"अस्थि चर्ममय देह मम तामे ऐसी प्रीती,
ऐसी जो श्रीराम में होत न तो भाव भीती."
इस तरह नारी को अपशब्दों के प्रयोग द्वारा    जो उसकी महिमा को नकारना चाहते हैं वे झूठे गुरुर में जी रहे हैं और अपनी आँखों के समक्ष उपस्थित सच को झुठलाना चाहते हैं .आज नारी निरंतर प्रगति पथ पर आगे बढ़ रही है .भावुकता सहनशीलता जैसे गुणों को स्वयं से अलग न करते हुए वह पुरुषों के झूठे दर्प के आईने को चकनाचूर कर रही है .अंत में नईम अख्तर के शब्दों में आज की नारी पुरुषों से यही कहेगी-
"तू किसी और से न हारेगा,
तुझको तेरा गुरुर मारेगा .
तुझको    दस्तार जिसने बख्शी है,
तेरा सर भी वही उतारेगा ."

आज मैं उसी कड़ी में अपने विचारों को आगे रख रही हूँ और बता रही हूँ नारी के ऐसे वर्ग के बारे में जो सशक्त है सबल है और केवल इसलिए क्योंकि वह भावुकता जैसी कमजोरी से कोसों दूर है .बहुत दिन पहले मेरे पापा ने मुझे बताया कि वे एक कमीशन में गए थे वहां पर जाट समुदाय की एक बुजुर्ग महिला ने उन्हें बताया कि -''बाबूजी !हम जाट औरतें अपना कार्य स्वयं देखती हैं और अपने पुरुषों पर आश्रित नहीं हैं .अन्य समुदायों म एजैसे आज भी औरतें आदमियों का हर काम में मुंह देखती हैं और उनके लिए ही भगवान के आगे झुकी रहती हैं हम्मे ऐसा नहीं है और इसलिए हममे न करवा चौथ होती है और न ही रक्षा बंधन .हम खुद पर ही ज्यादा विश्वास करती हैं और अपने आदमियों को अपने मालिक का दर्जा नहीं देती ''और ये हम सभी देखते भी हैं जाट औरतें जाट आदमियों के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर चलती हैं और खेती हो या नौकरी हर काम में अपना दबदबा रखती हैं .
ऐसे ही जैन समुदाय है जिसमे हमारे क्षेत्र में अधिकांश सर्राफ हैं और इनकी औरतें इनमे आदमियों से पूरी बराबरी करती हैं और अतिश्योक्ति न होगी अगर यह कहा जाये कि आदमियों को अपनी मुट्ठी में रखती हैं .ये धन का ,जेवर का लेनदेन आदि सभी कार्यों में बराबर का सहयोग व् हिस्सा रखती हैं और इनके परिवार में कोई भी फैसला हो इनकी जानकारी व् साझेदारी के बगैर नहीं लिया जा सकता .
बहुत अभिमान करते हैं हम अपने उच्च वर्ग या माध्यम वर्ग से सम्बंधित होने पर किन्तु यदि सच्चाई से बात की जाये तो सबसे अधिक सबल नारी निम्न वर्ग की ही कही जाएगी और इसका प्रत्यक्ष उदाहरण आप सभी स्वयं देख सकते हैं .सुबह सवेरे हम जैसे ही अपने घर के बाहर देखते हैं तो पाते हैं कि बहुत सी नारियों का झुण्ड चला जा रहा है जो कमीज-पेटीकोट पहने होती हैं और उनके हाथों में हंसिया -खुरपी आदि औजार होते हैं दिन भर वे इन औजारों से खेतों में मेहनत करती हैं और शाम को फिर ऐसे ही बतियाते हुए लौटती हैं जैसे सुबह काम पर जाते हुए बतिया रही थी .यही नहीं कहने को अनपढ़ कही जाने वाले ये महिलाएं किसी से सशक्ति करण की मांग नहीं करती और देश के लिए अपने घर परिवार के लिए एक मुखिया की हैसियत में ही काम करती हैं और अपना दबदबा सभी के दिमाग पर बनाये रखती हैं ये वे हैं जो भरे पूरे आदमियों के परिवारों में होते हुए भी अपने जानवरों को स्वयं हांककर घर कुशलता से ले आती हैं और इस तरह पुरुष की ताकत को दरकिनारकर एक तरफ रख देती हैं 

.
 

.कारण केवल एक है ये अपने वर्चस्व की राह में और कार्य के बीच में भावुकता को आड़े नहीं आने देती और पूर्ण व्यावसायिक होकर अपने कर्मक्षेत्र पर आगे बढती हैं और ये कभी किसी के आगे नारी की कमजोरी का रोना नहीं रोती क्योंकि ये वे हैं जो भारतीय नारी को इस विश्व में कर्मशील प्राणी का सम्मान दिलाती हैं .ये केवल यही कहती हैं -
''कोमल है कमजोर नहीं तू ,
शक्ति का नाम ही नारी है .''


शालिनी कौशिक
[कौशल ]
 

गुरुवार, 24 अक्तूबर 2013

गागर में भरती सागर ,ये दिल से ''शालिनी'' है .

दफनाती मुसीबत को ,दमकती दामिनी है .

कोमल देह की मलिका ,ख्वाबों की कामिनी है ,

ख्वाहिश से भरे दिल की ,माधुरी मानिनी है .
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नज़रें जो देती उसको ,हैं मान महनीय का ,
देती है उन्हें आदर ,ऐसी कामायनी है .
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कायरता भले मर्दों को ,आकर यहाँ जकड़ ले ,
देती है बढ़के संबल ,साहस की रागिनी है .
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कायम मिजाज़ रखती ,किस्मत से नहीं रूकती ,
दफनाती मुसीबत को ,दमकती दामिनी है .
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जीवन के हर सफ़र में ,चलती है संग-संग में ,
गागर में भरती सागर ,ये दिल से ''शालिनी'' है .
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शब्दार्थ -महनीय-पूजनीय /मान्य ,कामायनी -श्रृद्धा ,कायम मिजाज़ -स्थिर चित्त ,शालिनी -गृहस्वामिनी .

शालिनी कौशिक

[कौशल ]

बुधवार, 23 अक्तूबर 2013

यहाँ नारी का आदर नहीं हो सकता


अभी अभी रामायण में लव-कुश रामायण देखी मन विह्वल हो गया और आंसू से भीग गए अपने नयन किन्तु नहीं झुठला सकता वह सत्य जो सीता माता माँ वसुंधरा की गोद में जाते हुए कहती हैं -
''माँ ! मुझे अपनी गोद में ले लो ,इस धरती पर परीक्षा देते देते मैं थक गयी हूँ ,यहाँ नारी का आदर नहीं हो सकता .''
एक सत्य जो न केवल माता सीता ने बल्कि यहाँ जन्म लेने वाली हर नारी ने भुगता है .एक परीक्षा जो नारी को कदम कदम पर देनी पड़ती है किन्तु कोई भी परीक्षा उसे खरा साबित नहीं करती बल्कि उसके लिए आगे का मार्ग और अधिक कठिन कर देती है .
माता सीता ने जो अपराध नहीं किया उसका दंड उन्हें भुगतना पड़ा .लंकाधिपति रावन उनका हरण कर ले गया और उन्हें ढूँढने में भगवान राम को और रावन का वध करने में जो समय उन्हें लगा वे उस समय में वहां रहने के लिए बाध्य थी इसलिए ऐसे में उन्हें वहां रहने के लिए कलंकित करना पहले ही गलत कृत्य था और राजधर्म के नाम पर माता सीता का त्याग तो पूर्णतया गलत कृत्य ,क्योंकि यूँ तो माता सीता तो देवी थी इसलिए उनका त्याग तो वैसे भी असहनीय ही रहा किन्तु इस कार्य ने एक गलत परंपरा की नीव रखी क्योंकि इस कार्य ने समाज के ठेकेदारों को एक मान्य उदाहरण दे दिया जबकि यदि कोई नारी स्वयं की मर्जी से ही कहीं गयी हो तब ही इस श्रेणी में आती है ,वह महिला जो बलात हरण कर ले जाई गयी है यदि दुर्भाग्य वश उसके साथ कुछ गलत घट भी जाये तो उसका त्याग वर्जित होना चाहिए .]
किन्तु ऐसा कहाँ है औरत का एक रात कहीं और किसी के साथ रुक जाना उसकी जिंदगी के लिए विनाशकारी हो जाता है और पुरुष शादी विवाह करके बच्चे होने के बाद भी बहुत सी बार घर-बार छोड़कर भाग जाता है बरसों बरस गायब रहता है तब उसके साथ तो कोई परीक्षा का विधान नहीं है .
जो सीता ने भोगा वही अहिल्या ने भी भोगा ,इंद्र ने वेश पलटकर उनके साथ सम्भोग किया और ऋषि गौतम ने उन्हें पत्थर बनने का श्राप दे दिया ,अब यदि इस प्रसंग को हमारे समाज के परिप्रेक्ष्य में देखें तो ऐसा श्राप तो नहीं दिया जाता बल्कि शक की बिना पर सीधे मौत के घाट उतार दिया जाता है .प्रेम विवाह हो या हमारे देश की संस्कृति के अनुसार किया गया विवाह कहीं भी ऐसी घटनाएँ होने से बची हुई नहीं हैं .नारी हर जगह शोषित की ही श्रेणी में हैं .उसके लिए आदर कहीं भी नहीं है .
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

सोमवार, 21 अक्तूबर 2013

करवा चौथ पर लें कसम

करवा चौथ पर लें कसम
ORIGIN AND SIGNIFICANCETRADITION OF GIFTING
दहेज़ के मामले एक कलंक हैं हमारे समाज पर और खास तौर पर तब जब ये उस देश में हों जहाँ करवा चौथ जैसे त्योहारों द्वारा पति पत्नी के जन्म जन्म का रिश्ता जोड़ा जाता हो और ये दिखाते हैं कि आपस में जन्म-जन्म का रिश्ता जोड़ते हुए भी लोग अपने स्वार्थ को नहीं त्याग पाते और इसी का परिणाम है दहेज़ हत्या और दहेज़ के मामलों में पूरे परिवार का घसीटा जाना और जहाँ तक ये हैं कि पूरा परिवार फंसाया जाता है तो ये सही है क्योंकि जिम्मेदार तो पूरा परिवार होता है बहुत से घरों में देखा गया है कि जरा जरा सी बात पर पति पत्नी के बीच में कलह करायी जाती है और समाज में अपने झूठे अहम् को बड़ा रखने के लिए बहू पर अपने घर अर्थात मायके से रोज़ कुछ न कुछ लाने का दबाव दाल जाता है तो ऐसे में यदि दहेज़ हत्या होती है तो पूरे परिवार को प्रतिवादी बनाया जाना ज़रूरी होता है और अधिकांश मामलों में ये ही होता है इसलिए इस समबन्ध में बहुत ज्यादा विचार विमर्श की बात नहीं है यह तो कदाचित ही होता है कि लड़की वाले लड़के वालों को गलत फंसा दें पर ऐसे में भी सबसे बड़ी जिम्मेदारी तो पति की ही होती है क्योंकि अपना सब कुछ छोड़कर उसकी पत्नी आई भी तो उसी के लिए होती है .और यदि उसे पति के घर में प्रताड़ना झेलनी पड़ती है तो सजा का सबसे पहले हक़दार पति ही होता है .
आज एकल परिवारों का चलन बढ़ा है और ऐसे में परिवार के अन्य सदस्यों का अन्य परिवार में दखल कम हुआ है ऐसे में उच्चतम न्यायालय के फैसले के मद्देनज़र जिम्मेदार पारिवारिक सदस्यों को ही मुकदमे में प्रतिवादी के तौर पर सम्मिलित करना चाहिए ताकि कहीं भी कोई त्रुटि ऐसे अपराध के जिम्मेदारों को बचने का अवसर न दे क्योंकि एक की भी मुक्ति औरों की मुक्ति का रास्ता खोल सकती है और बहुत सी जगह हमदर्द को भी जेल के अन्दर कर सकती है .

शालिनी कौशिक
[कौशल ]

शनिवार, 19 अक्तूबर 2013

हुकूमत पाक की सुन ले ,समय रहते संभल जा तू .

सन्दर्भ -
सीमा पर रात भर फायरिंगpak firingजम्मू। पाकिस्तान से लगने वाला भारत का सीमावर्ती इलाका शांत होने का नाम नहीं ले रहा। शुक्रवार पूरी रात पाकिस्तान की ओर से भारत की 14 सीमा चौकियों पर गोलाबारी की गई। इस गोलाबारी से बीएसएफ के दो जवान घायल हुए हैं। कुछ गांवों को भी नुकसान पहुंचा है।
हुकूमत पाक की सुन ले ,समय रहते संभल जा तू .
सामना हिन्द से न हो ,दहल जाए न तेरा खूं !
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सफाया तेरा कर देंगे, अगर अपनी पर आ जाएँ ,
पलट कर देख पन्नों को ,बसी होगी उनमे खुशबू !
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न करते वार हम पहले ,नहीं करते हम मुंहजोरी,
मगर करते हैं खात्मा ,कायर न समझना तू !
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तुम्हारी नीयत पर पाकिस्तान ,सदा शक रहता है हमको ,
न झेलेंगें मगर अब हम ,हदों को तोड़ आया तू !
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भरा है आज गुस्से से ,''शालिनी''के संग भारत ,
मिलेगा हर करनी का फल ,न बख्शा जायेगा अब तू !
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शालिनी कौशिक
[कौशल ]

गुरुवार, 17 अक्तूबर 2013

झंझट की जड़ -घूंघट



आज सुबह की ही बात है मेरे घर के सामने दो महिलाएं एक टेलर की दुकान पर आई .सभी तरह से वे सास-बहू ही लग रही थी .उनमे से एक का मुंह तो खुला हुआ था और एक का घूंघट इतना अधिक लम्बा था कि उसके लिए टेलर की दुकान पर चढ़ना भी असंभव सा ही था किन्तु वह वहां चढ़ गयी और टेलर को उसकी सास उसका नाप भी दिलाने लगी तभी मुझे विद्या बालन का एक विज्ञापन स्लोगन याद आया -''वैसे तो आपको बहू का घूंघट तक उठाना गवारा नहीं .''ये स्लोगन न केवल उनके विज्ञापन में बल्कि समस्त भारत में प्रयोग किया जा सकता है क्योंकि लगभग सारे में ही नारी की यही स्थिति है जब तक उसके सास ससुर जीवित रहते हैं वह घर में बगैर घूंघट रह नहीं सकती भले ही घूंघट उसके लिए दुर्घटना या मृत्यु का ही कारण न बन जाये .
घूंघट नई नवेली बहू की शान कहा जाता है शर्म कहा जाता है और इसके ही कारण लगभग हम भारतीयों की मानसिकता में ये नई बहू के लिए ज़रूरी हो गया है .आश्चर्य तो तब हुआ जब हमारे यहाँ एक अध्यापक महोदय जो कि स्वयं कहीं बाहर से आकर बसे हैं और उनकी स्वयं की धर्मपत्नी जो कि सिर तक नहीं ढकती अपनी पुत्रवधू की घूंघट में रहने की अनिवार्यता रखते हैं और चलिए ये तो फिर भी केवल सिर ढकने की ही गुलामी है वहां क्या कर लें जहाँ बहू को अपने ज़रूरी कार्यों के लिए भी घर से बाहर आने की अनुमति नहीं और पति महोदय ही अपनी पत्नी के सारे कार्यों को निभाते फिरते हैं यदि उनकी पत्नी के कपडे सिलने हों तो वे पुराने कपडे ला नए सिलवा ले जाते हैं और चूड़ी कंगन के लिए पुरानी चूड़ी कंगन लाकर नाप से नई ले जाते हैं .
अब भला ऐसे में विद्या बालन शौचालय घर में भले ही बनवा दे किन्तु सारे झंझट की जड़ घूंघट को उतरवाना उनके बस में नहीं .
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

बुधवार, 16 अक्तूबर 2013

भोपाल से अहमदाबाद आते-आते मिट गई दूरियां!-कितनी सबने देखी

भोपाल से अहमदाबाद आते-आते मिट गई दूरियां!-कितनी सबने देखी
Gujarat Chief Minister and BJP PM Candidate Narendra Modi with senior BJP leader LK Advani
भाजपा में आजकल बहुत जोश है और बहुत शान से ये मोदी के झंडे तले २०१४ के चुनाव जीतने की होड़ में लगे हैं किन्तु बड़ा अफ़सोस होता है कि भगवन राम के नाम को लेकर सत्ता हासिल करने वाले और आगे सत्ता हासिल करने के ख्वाब देखने वाले उनके जीवन से रत्ती मात्र भी प्रेरणा ग्रहण नहीं करना चाहते .
राम जिन्होंने अपने पिता द्वारा स्वयं युवराज पद पर अभिषिक्त किये जाने पर भी कद ऐतराज अभिव्यक्त किया था वहीँ यहाँ मोदी ने भाजपा के पितामह माने जाने वाले ''श्री लाल कृष्ण आडवानी ''जी को ही इस भूमिका में खड़ा कर दिया कि वे उनकी ताजपोशी का विरोध करें जबकि यहाँ मोदी का कर्तव्य एक आम भारतीय भली भांति जान सकता है और आकलन कर सकता है मोदी के लालच का .
आडवानी जी हमारी राजनीति के पुराने जानकार हैं और जानते हैं कि मोदी की स्वीकार्यता गुजरात के बाहर नहीं है और इसी कारण उन्होंने इनकी ताजपोशी का विरोध किया किन्तु ये मोदी हैं जिन्होंने अपनी हठधर्मिता के आगे उन्हें टिकने नहीं दिया और चक्रव्यूह की रचना कर उन्हें ही सारे में सत्ता लोभी घोषित करा दिया और बाद में स्वयं को सद्भावना रखने वाले बनकर उन्हें मनाने के प्रयास किये और सबके देखते देखते वे अपने इस कार्य में सफल भी हुए .आज आडवानी जी उनकी सभाओं में दिखाई दे रहे हैं और सारे में नमो-नमो का उच्चारण कर रहे हैं .सारे देश में एक आवाज़ गूँज रही है कि भाजपा एकजुट हो गयी है २०१४ चुनावों के लिए .और कहा जा रहा है कि भोपाल से अहमदाबाद आते आते घट गयी दूरियां जो कि कितनी घटी हैं सभी ऊपर के फोटो में देख सकते हैं .हमें तो आडवानी जी के मन की बात मोदी जी के लिए बस यही सुनाई देती है -
''आज माना कि इक्तदार में हो ,हुक्मरानी के तुम खुमार में हो ,
ये भी मुमकिन कि वक़्त ले करवट ,पाँव ऊपर हों सर तगार में हो.''
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

सोमवार, 14 अक्तूबर 2013

ऐसी आस्था किस काम की

ऐसी आस्था किस काम की
MP govt recommended the State Election Commission to suspend Datia's Collector, Superintendent of Police, Sub Divisional Magistrate, Sub Divisional Officer of Police and entire staff of Sevdha police station, over stampede near Ratangarh temple.
फिर से एक बार आस्था पर असावधानी भारी पड़ी और भगवान के दर पर पहुंचकर भक्तों को मौत के मुहं में सामना पड़ा .यूँ तो भगवान के दर पर मौत बहुत पुण्यों का फल मानी जाती है किन्तु ये केवल ऊपरी बाते हैं अंदुरनी बात ये है कि इस तरह से अनायास मृत्यु की गोद में समाना मृतक के परिजनों को शोक के अथाह सागर में डुबो देता है .प्रशासन की लापरवाही सभी को दिखती है किन्तु ये क्या नहीं दिखती जो वास्तव में दिखनी चाहिए .....
हर जगह श्रृद्धालुओं की इतनी अधिक संख्या ............इस पर रोक न तो जनता स्वयं लगाती है और न ही इनपर रोक किसी और द्वारा लगायी जा सकती है क्योंकि ये आस्था का विषय है और जो भी ऐसे में रोक लगता है उसे अनर्गल आलोचना भी झेलनी होती है और वोटो का अकाल भी .फिर सबसे बड़ा हथियार तो इन्हें हमारे संविधान ने ही दे दिया है देश में कहीं भी भ्रमण की स्वतंत्रता .
आज आवश्यकता इस बात कि है कि ऐसी धार्मिक आस्थाओं पर प्रशासनिक अंकुश लगाया जाये क्योंकि ये न केवल धर्म का मजाक उड़ा रही हैं बल्कि धर्म के नाम पर प्रशासन के लिए नई नई मुश्किलें खड़ी कर रही हैं आज ऐसी ही आस्थाएं उच्चतम न्यायालय को भी ऐसे मामलों में दखल देने को विवश कर रही हैं जिनमे उसके समय के बर्बाद करने का खामियाजा हम सभी को भुगतना पड़ रहा है .गंगा -यमुना के जल को स्वच्छ किये जाने के लिए आज उच्चतम न्यायालय निर्देश दे रहा है जबकि ये हम सभी को दिखता है कि हम किस कदर अन्धविश्वास के अधीन हों अपनी पवित्र नदियों को गंदगी के हवाले कर रहे हैं .
आज जहाँ देखो श्रद्धालुओं की भीड़ है और ये भीड़ अब अंकुश के दायरे में लानी ही होगी तभी ऐसी घटनाओं पर रोक लगायी जा सकेगी और इसके लिए सभी राजनीतिक दलों को सच्चे मन से एकजुट हो कार्यवाही करनी होगी .भारत की बढती जनसँख्या और उसकी भक्ति आज इस तरह की बंदिश के अधीन किये जाने पर ही ऐसी भगदड़ से बच पायेगी .
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

शनिवार, 12 अक्तूबर 2013

अखिल जगत में राम नारी का इसलिए अभिमान हैं .

मर्यादा से बंधे हुए वे पुरुषोत्तम भगवान हैं ,
दशरथ जी के राजदुलारे मनभावन श्रीराम हैं .

मात सुमित्रा कैकयी का वे कौशल्या सम मान करें ,
भरत शत्रुघ्न लखन लाल को ये प्रभु का वरदान हैं .

पालन करें पितु वचन का ब्रह्म ऋषि के साथ चले ,
करते वध हैं राक्षसों का रखते यज्ञ का ध्यान हैं .

ब्रह्म ऋषि की आज्ञा मानी धनुष यज्ञ में भाग लिया ,
सीता से नाता जोड़ें वे रखते क्षत्रिय मान हैं .

वचन पिता ने दिए मात को पूरा उनको राम करें ,
राज-पाट से श्रेष्ठ ह्रदय में तब वन का स्थान है .

लखन सिया के संग संग वन में ऋषियों के उपदेश सुनें,
रक्षा करते सभी जनों की करते नहीं गुमान हैं .

न्याय दिलाएं मित्र को अपने बालिवध का काज करें ,
मित्रता का समस्त विश्व में सर्वश्रेष्ठ प्रमाण हैं .

सिया हरण का सबक सिखाने रावन का संहार करें ,
अखिल जगत में राम नारी का इसलिए अभिमान हैं .

शालिनी कौशिक
[कौशल ]

मीरा कुमार जी को हटाया क्यों नहीं सुषमा जी ?

विपक्षी दलों ने जब से भाजपा के राष्ट्रपति पद के दलित उम्मीदवार श्री रामनाथ कोविंद के सामने दलित उम्मीदवार के ही रूप में मीरा कुमार जी...