झंझट की जड़ -घूंघट



आज सुबह की ही बात है मेरे घर के सामने दो महिलाएं एक टेलर की दुकान पर आई .सभी तरह से वे सास-बहू ही लग रही थी .उनमे से एक का मुंह तो खुला हुआ था और एक का घूंघट इतना अधिक लम्बा था कि उसके लिए टेलर की दुकान पर चढ़ना भी असंभव सा ही था किन्तु वह वहां चढ़ गयी और टेलर को उसकी सास उसका नाप भी दिलाने लगी तभी मुझे विद्या बालन का एक विज्ञापन स्लोगन याद आया -''वैसे तो आपको बहू का घूंघट तक उठाना गवारा नहीं .''ये स्लोगन न केवल उनके विज्ञापन में बल्कि समस्त भारत में प्रयोग किया जा सकता है क्योंकि लगभग सारे में ही नारी की यही स्थिति है जब तक उसके सास ससुर जीवित रहते हैं वह घर में बगैर घूंघट रह नहीं सकती भले ही घूंघट उसके लिए दुर्घटना या मृत्यु का ही कारण न बन जाये .
घूंघट नई नवेली बहू की शान कहा जाता है शर्म कहा जाता है और इसके ही कारण लगभग हम भारतीयों की मानसिकता में ये नई बहू के लिए ज़रूरी हो गया है .आश्चर्य तो तब हुआ जब हमारे यहाँ एक अध्यापक महोदय जो कि स्वयं कहीं बाहर से आकर बसे हैं और उनकी स्वयं की धर्मपत्नी जो कि सिर तक नहीं ढकती अपनी पुत्रवधू की घूंघट में रहने की अनिवार्यता रखते हैं और चलिए ये तो फिर भी केवल सिर ढकने की ही गुलामी है वहां क्या कर लें जहाँ बहू को अपने ज़रूरी कार्यों के लिए भी घर से बाहर आने की अनुमति नहीं और पति महोदय ही अपनी पत्नी के सारे कार्यों को निभाते फिरते हैं यदि उनकी पत्नी के कपडे सिलने हों तो वे पुराने कपडे ला नए सिलवा ले जाते हैं और चूड़ी कंगन के लिए पुरानी चूड़ी कंगन लाकर नाप से नई ले जाते हैं .
अब भला ऐसे में विद्या बालन शौचालय घर में भले ही बनवा दे किन्तु सारे झंझट की जड़ घूंघट को उतरवाना उनके बस में नहीं .
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

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