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ऐसी आस्था किस काम की
ऐसी आस्था किस काम की

फिर से एक बार आस्था पर असावधानी भारी पड़ी और भगवान के दर पर पहुंचकर भक्तों को मौत के मुहं में सामना पड़ा .यूँ तो भगवान के दर पर मौत बहुत पुण्यों का फल मानी जाती है किन्तु ये केवल ऊपरी बाते हैं अंदुरनी बात ये है कि इस तरह से अनायास मृत्यु की गोद में समाना मृतक के परिजनों को शोक के अथाह सागर में डुबो देता है .प्रशासन की लापरवाही सभी को दिखती है किन्तु ये क्या नहीं दिखती जो वास्तव में दिखनी चाहिए .....
हर जगह श्रृद्धालुओं की इतनी अधिक संख्या ............इस पर रोक न तो जनता स्वयं लगाती है और न ही इनपर रोक किसी और द्वारा लगायी जा सकती है क्योंकि ये आस्था का विषय है और जो भी ऐसे में रोक लगता है उसे अनर्गल आलोचना भी झेलनी होती है और वोटो का अकाल भी .फिर सबसे बड़ा हथियार तो इन्हें हमारे संविधान ने ही दे दिया है देश में कहीं भी भ्रमण की स्वतंत्रता .
आज आवश्यकता इस बात कि है कि ऐसी धार्मिक आस्थाओं पर प्रशासनिक अंकुश लगाया जाये क्योंकि ये न केवल धर्म का मजाक उड़ा रही हैं बल्कि धर्म के नाम पर प्रशासन के लिए नई नई मुश्किलें खड़ी कर रही हैं आज ऐसी ही आस्थाएं उच्चतम न्यायालय को भी ऐसे मामलों में दखल देने को विवश कर रही हैं जिनमे उसके समय के बर्बाद करने का खामियाजा हम सभी को भुगतना पड़ रहा है .गंगा -यमुना के जल को स्वच्छ किये जाने के लिए आज उच्चतम न्यायालय निर्देश दे रहा है जबकि ये हम सभी को दिखता है कि हम किस कदर अन्धविश्वास के अधीन हों अपनी पवित्र नदियों को गंदगी के हवाले कर रहे हैं .
आज जहाँ देखो श्रद्धालुओं की भीड़ है और ये भीड़ अब अंकुश के दायरे में लानी ही होगी तभी ऐसी घटनाओं पर रोक लगायी जा सकेगी और इसके लिए सभी राजनीतिक दलों को सच्चे मन से एकजुट हो कार्यवाही करनी होगी .भारत की बढती जनसँख्या और उसकी भक्ति आज इस तरह की बंदिश के अधीन किये जाने पर ही ऐसी भगदड़ से बच पायेगी .
शालिनी कौशिक
[कौशल ]
टिप्पणियाँ
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का उपयोग किसी पत्रिका में किया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
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अभी अभी महिषासुर बध (भाग -१ )!
बंदिश तो शायद आयद न हो पाए लेकिन जन शिक्षण ज़रूरी है। क्या गंगा में नहाने से पाप कटते हैं। ये सवाल जगद्गुरुकृपालु महराज जी से काशी की विद्वत परिषद् ने पूछा था -उनका उत्तर इस प्राकर था -
एक बोतल में पेशाब (मूत्र )भरके ,ढक्कन लगाके उसे गंगा में एक माह पड़ा रहने दो। क्या अब यह पवित्र हो जायेगी। भाव यहाँ यह है जब तक अन्दर की गंदगी (विकार )दूर नहीं होंगें बाहर के कर्म काण्ड से शरीर की यात्रा से कुछ होने वाला नहीं है। फिर चाहे वह कुम्भ स्नान हो या कांवड़ियों का रेला।
एक बोतल में पेशाब (मूत्र )भरके ,ढक्कन लगाके उसे गंगा में एक माह पड़ा रहने दो। क्या अब यह पवित्र हो जायेगी। भाव यहाँ यह है जब तक अन्दर की गंदगी (विकार )दूर नहीं होंगें बाहर के कर्म काण्ड से शरीर की यात्रा से कुछ होने वाला नहीं है। फिर चाहे वह कुम्भ स्नान हो या कांवड़ियों का रेला।
ऐसी आस्था किस काम की
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