सोमवार, 28 अक्तूबर 2013

नौजवानो की नहीं तवलीन जी की निराशा को समझिये .

नौजवानो की नहीं तवलीन जी की निराशा को समझिये .

सोमवार २८ अक्टूबर २०१३ अमर उजाला का सम्पादकीय पृष्ठ नजरिया तवलीन सिंह का ''नौजवानों की निराशा को समझिये ''और कुछ तो समझ में आया नहीं ,आया तो बस इतना कि तवलीन सिंह जी निराश हैं और अपनी इस निराशा को नौजवानों के मत्थे मढ़ना चाह रही हैं .
तवलीन जी कहती हैं कि ''राहुल गांधी के भाषण मैंने पिछले सप्ताह ध्यान से सुने .इसलिए कि उनके राजस्थान दौरे से तीन दिन पहले मैं कानपूर गयी थी नरेंद्र मोदी की उत्तर प्रदेश में पहली आम सभा देखने .विशाल जलसा था ,जैसे जनता का सैलाब उमड़ आया हो और घंटों तक वह चमचमाती धूप में इंतज़ार करती रही मोदी का .इतने लोग आये थे उनको सुनने और मोदी जब मंच पर पहुंचे तो इतना जोश दिखाया कि अपना भाषण मोदी ने यह कहकर शुरू किया कि कानपूर की जनता ने उनको जीत लिया .''......
उनके भाषण या भीड़ का तवलीन जी पर क्या असर हुआ इसकी झलक तो स्वयं उनके इस आलेख में ही मिल जाती है -''वे कहती हैं इसके बाद मोदी ने तकरीबन अपना सारा भाषण विकास से जुड़े मुद्दों पर दिया और लोगों के सामने एक नए भारत ,एक नए सपने का रंग दिखाने की कोशिश की .मोदी के कई भाषण मैंने देखे सुने हैं किन्तु मेरी राय में उनका यह भाषण सबसे अच्छा था.....कितना अच्छा था इसका एक छोटा सा प्रभाव ...स्वयं उनके शब्दों में .....इसलिए देखना चाहती थी कि इसके जवाब में क्या कहेंगे राहुल गांधी और कॉंग्रेस के अघोषित प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी .राजस्थान का उनका दौरा शुरू होते ही बैठ गयी मैं टीवी के आगे ..... ...इसका साफ़ मतलब क्या है यही कि तवलीन जी नहीं जुटा पायी वह साहस जो उन्हें जुटाना चाहिए था .टीवी के आगे बैठने से क्या प्रत्यक्ष का सही आकलन वे कर सकती थी ?राहुल गांधी की सभा का अगर उन्हें सही आकलन करना था तो एक सही रिपोर्टर की भांति उन्हें उनकी भी सभा में ही जाना चाहिए था ,किन्तु उनमे यह साहस ही नही था क्योंकि इतने लम्बे राजनीतिक करियर वाले मोदी जी का सबसे अच्छा भाषण यदि कानपूर वाला हो सकता है तो इससे ही उनकी राजनीतिक सफलता का आकलन किया जा सकता है और बढ़ा चढ़ा कर उन्हें देश की राजनीती में धूमकेतु का स्थान दिलाने की सोचना एक अलग बात है और स्थान उन्हें मिलना एक अलग बात जो कि स्वयं उनके दल वाले लोग ही नहीं चाहते .
तवलीन जी कि जितने भी आलेख मैंने पढ़े हैं उनमे देश की अन्य समस्याओं से उनका सरोकार कुछ कम ही लगता है अधिकांश रूप से उनकी व्यक्तिगत डाह ही दृष्टिगोचर होती है जो कि उन्हें गांधी फैमली से है और इसलिए जो भी इस परिवार के खिलाफ में सामने आता है वे उसके कंधे पर बन्दूक रखकर चलाने लगती हैं .
राहुल गांधी ने अगर अपनी दादी व् पिता की हत्या का जिक्र सभा में कर दिया तो इसमें इतने बबाल खड़े करने की तो कोई बात नहीं है बल्कि ये तो वह दर्द है जो जब भी उन्हें अपने अपनी आँखों के सामने दिखेंगे उनके दिल से निकलेगा ही ,हाँ ये ज़रूर है कि इस तरह के बयान विपक्षी दलों में खलबली मचाने को काफी हैं क्योंकि अगर राहुल गांधी की ऐसे बातों से भारतीय जनता की सोयी हुई आत्मा जाग गयी तो विपक्षियों के लिए अपनी जमानत तक बचाना मुश्किल हो जायेगा .ये सब शायद तवलीन जी जानती हैं किन्तु मानना नहीं चाहती .इस तरह के वे बहुत से आलेख लिख चुकी हैं और उन्हें चाहिए कि अपनी लेखन क्षमता का सही इस्तेमाल करें और आलोचना करने के लिए सही सोच का इस्तेमाल करें क्योंकि वे लोकतंत्र के जिस स्तम्भ से ताल्लुक रखती हैं उसका जनता को जागरूक करने में महत्वपूर्ण दायित्व है और सही की तारीफ और गलत की आलोचना से वे अपने इस कर्त्तव्य का सही तरह निर्वाह कर सकती हैं .
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

5 टिप्‍पणियां:

Rajesh Kumari ने कहा…

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार २९ /१० /१३ को राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच पर की जायेगी आपका वहाँ हार्दिक स्वागत है ।

तुषार राज रस्तोगी ने कहा…

बहुत खूब

shikhakaushik06 ने कहा…

sateek v dhardar .aabhar

पुरुषोत्तम पाण्डेय ने कहा…

मैं हमेशा लवलीन जी के लेखों को भी गंभीरता के साथ पढ़ता रहा हूँ, मुझे हमेशा ऐसा लगा कि वे अपने पूर्वाग्रहों से पीड़ित हैं.अपने मन की खाटास को
कटु शब्दों में नकारात्मक ढंग से पेश करती हैं, लेखक को सच को सच और झूठ को झूद कहने का साहस होना चाहिए.

आशा जोगळेकर ने कहा…

अपने तो कुछ कर नही पा रहे तो पिताौर दादी की हत्या को भुना रहे हैं।

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