मंगलवार, 30 दिसंबर 2014

यही कामना हों प्रफुल्लित आओ मनाएं हर क्षण को HAPPY NEW YEAR -2015



अमरावती सी अर्णवनेमी पुलकित करती है मन मन को ,
अरुणाभ रवि उदित हुए हैं खड़े सभी हैं हम वंदन को .


अलबेली ये शीत लहर है संग तुहिन को लेकर  आये  ,
घिर घिर कर अर्नोद छा रहे कंपित करने सबके तन को.


मिलजुल कर जब किया अलाव  गर्मी आई अर्दली बन ,
अलका बनकर ये शीतलता  छेड़े जाकर कोमल तृण को .


आकंपित हुआ है जीवन फिर भी आतुर उत्सव को ,
यही कामना हों प्रफुल्लित आओ मनाएं हर क्षण को .


पायें उन्नति हर पग चलकर खुशियाँ मिलें झोली भरकर ,
शुभकामना देती ''शालिनी''मंगलकारी हो जन जन को .



शब्दार्थ :अमरावती -स्वर्ग ,इन्द्रनगरी ,अरुणिमा -लालिमा ,अरुणोदय-उषाकाल ,अर्दली -चपरासी ,अर्नोद -बादल ,तुहिन -हिम ,बर्फ ,अर्नवनेमी -पृथ्वी


शालिनी कौशिक
[कौशल]

  

रविवार, 28 दिसंबर 2014

मेहसाना पोलिस व् प्रधानमंत्री मोदी प्रशंसा के हक़दार

new caption

भारत वर्ष में सत्ता सभी ओर हावी है किन्तु कानून आज भी सत्ता से ऊपर है और ये दिखाई दिया है एक बार फिर जब मेहसाना पोलिस ने प्रधानमंत्री की पत्नी जशोदा बेन द्वारा मांगी गयी जानकारी को इसलिए देने से मना कर दिया कि यह जानकारी स्थानीय अन्वेषण ब्यूरो से सम्बंधित है और यह सूचना के अधिकार अधिनियम में छूट प्राप्त है .
   भारत में राजनीतिज्ञ अपनी बात ऊपर रखते है और बड़े से बड़ा अधिकारी भी उनके इस दबाव के सामने नतमस्तक हो जाता है क्योंकि उसकी नौकरी खतरे में पड़ जाती है इसलिए ऐसे में वह अधिकारी और वह राजनीतिज्ञ सम्मान के अधिकारी होते हैं जो अपनी नौकरी की चिंता नहीं करते और कानून के अनुसार ही कार्य करते हैं और वे राजनीतिज्ञ भी जो अपनी बात के काटने पर कानून के आगे अपने अहम को नहीं लाते और इसीलिए किरण बेदी और श्रीमती इंदिरा गांधी दोनों ही सम्मान की अधिकारी हुई थी जब किरण बेदी ने इंदिरा गांधी की गाड़ी के गलत पार्किंग पर उनकी गाड़ी का चालान किया था और इंदिरा गांधी ने भी उन्हें उनके सही काम के लिए शाबासी दी थी ऐसे ही अब मेहसाना पोलिस सम्मान की पात्र है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी जिनकी पत्नी के आवेदन को निरस्त किये जाने पर भी वे अपने अहम बीच में नहीं ला रहे पर यह स्थिति तब है जब प्रधानमंत्री जी द्वारा अपनी पत्नी को पत्नी का दर्जा या कहें कि पत्नी का सम्मान नहीं दिया जाता इसलिए यह प्रश्न अभी भी अनुत्तरित है कि यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी पत्नी को पत्नी का सम्मान देते तब भी क्या यही  मेहसाणा पोलिस यही जवाब देती ,फिलहाल जो भी है मेहसाना पोलिस व् प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सम्मान व् प्रशंसा के हक़दार हैं .
शालिनी कौशिक
    [कौशल ]

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014

कायरता है पुरुष की समझे बहादुरी है ,



झुलसाई ज़िन्दगी ही तेजाब फैंककर ,
दिखलाई हिम्मतें ही तेजाब फैंककर .

अरमान जब हवस के पूरे न हो सके ,
तडपाई  दिल्लगी से तेजाब फैंककर .

ज़ागीर है ये मेरी, मेरा ही दिल जलाये ,
ठुकराई मिल्कियत से तेजाब फैंककर .

मेरी नहीं बनेगी फिर क्यूं बने किसी की,
सिखलाई बेवफाई तेजाब फैंककर .

चेहरा है चाँद तेरा ले दाग भी उसी से ,
दिलवाई निकाई ही तेजाब फैंककर .

 देखा है प्यार मेरा अब नफरतों को देखो ,
झलकाई मर्दानगी तेजाब फैंककर .

 शैतान का दिल टूटे तो आये क़यामत ,
निपटाई हैवानगी तेजाब फैंककर .

 कायरता है पुरुष की समझे बहादुरी है ,
छलकाई बेबसी ही तेजाब फैंककर .

 औरत न चीज़ कोई डर जाएगी न ऐसे ,
घबराई जवानी पर तेजाब फैंककर .

उसकी भी हसरतें हैं ,उसमे भी दिलावरी ,
धमकाई बेसुधी ही तेजाब फैंककर .

 चट्टान की मानिंद ही है रु-ब-रु-वो तेरे ,
गरमाई ''शालिनी'' भी तेजाब फैंककर .

       शालिनी कौशिक
             [कौशल]

 शब्दार्थ  :ज़ागीर -पुरुस्कार स्वरुप राजाओं महाराजाओं द्वारा दी गयी ज़मीन ,मिल्कियत-ज़मींदारी ,निपटाई -झगडा ख़त्म करना ,निकाई-खूबसूरती

मंगलवार, 23 दिसंबर 2014

क्या चौधरी चरण सिंह को बस नमन काफी है ?

पंडित जवाहर लाल नेहरू जी का जन्मदिन आता है और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा जोर -शोर से मनाया जाता है -
''Today we mark the 125th birth anniversary of our first Prime Minister Pandit Jawaharlal Nehru. My tributes to him. We remember Pandit Nehru's efforts during the freedom struggle and his role as the first Prime Minister of India," PM Modi tweeted from Brisbane, where he will attend a G 20 summit.
श्रीमती इंदिरा गांधी जी का जन्मदिन आता है और नरेंद्र मोदी जी द्वारा उतनी ही श्रद्धा से मनाया जाता है

"I join my fellow countrymen & women in remembering our former PM Smt. Indira Gandhi on her birth anniversary. My tributes," tweeted Modi, who is on a visit to Fiji.

जितनी श्रद्धा से वे २५ दिसंबर को पूर्व भाजपाई प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी का जन्मदिन मनाने चले हैं

PM Modi's decision to mark Atal Bihari Vajpayee's birthday as 'Good Governance Day' most suitable: LK Advani


किन्तु इस बीच में चौधरी चरण सिंह को मोदी जी लगता है भूल ही गए  मात्र नमन कर आगे बढ़ गए जबकि अपने चुनाव प्रचार के दौरान वे इधर की जनता को उन्हीं की कसम दिलाकर खम्बों से ,छतों से उतरने को कह रहे थे सही है अभी तो चुनाव यहाँ नहीं हैं और फिर चौधरी साहब को याद करने को तो उनकी समर्थक जनता ही पर्याप्त है -

कोई जीना ही जिंदगी समझा ,
और फ़साना बन गया कोई .
अपनी हस्ती मिटाकर ए-अंजुम ,
अपनी हस्ती बना गया कोई .
सुलक्षणा  'अंजुम' द्वारा कही गयी उपरोक्त पंक्तियाँ अक्षरशः सही प्रतीत होती हैं परम पूजनीय ,किसानों के मसीहा ,दलितों के देवता ,चौधरी चरण सिंह जी पर .२३ दिसंबर १९०२ को  किसान परिवार में जन्मे  चौधरी साहब इस प्रकार आकाश में नक्षत्र की भांति दमकेंगें   ये शायद किसी को पता नहीं था किन्तु ये चौधरी साहब के कर्म व् भाग्य की विशेषता थी कि वे एक साधारण किसान रहने के स्थान पर देश के किसानों की आवाज़ बने .
आज देश की राजनीति जातियों के घेरे में सिमट कर रह गयी है और भारत जैसा देश जहाँ हिन्दू व् मुस्लिम धर्मों में ही कई जातियां हैं वहां अन्य धर्मों की जातियों का तो हिसाब लगाना ही कठिन है और फिर अगर हम ये सोचें कि हम हिन्दू न होकर पहले ब्राह्मण हैं ,विषय हैं ,जैन हैं ,सैनी हैं ,गूजर हैं ,जाट हैं तो क्या हम प्रगति कर सकते हैं ?इस जातिगत राजनीति और धर्म सम्प्रदायों पर आधारित राजनीति ने चौधरी चरण सिंह के किसान मजदूर तथा गाँव की कमर तोड़ दी है .चौधरी साहब जातिवाद के घोर विरोधी थे .वे इसके विरोध में किसी भी सीमा तक जा सकते थे ,यह उनके सन १९६७ के मुख्यमंत्रित्व काल के समय जारीआदेश से प्रमाणित होता है .उन्होंने शासकीय आदेश पारित किया कि''जो संस्थाएं किसी जाति विशेष के नाम पर चल रही हैं ,उनका शासकीय अनुदान बंद कर दिया जायेगा .''नतीजतन इस आदेश के तत्काल बाद ही कॉलेजों के नाम के आगे से जाति सूचक शब्द हटा दिए गए.
आज भारतीय राजनीति जोड़ तोड़ की नीति पर चल रही है वे इसके सख्त विरोधी थे उन्होंने अपनी बात कहने में कभी लाग लपेट से काम नहीं लिया .उनकी बढती लोकप्रियता देख उनके विरोधी बुरी तरह घबरा गए थे और उनके खिलाफ जातिवादी होने ,कभी हरिजन विरोधी होने ,कभी मुस्लिम विरोधी होने आदि का आरोप लगाने लगे थे ,किन्तु चौधरी साहब को न विचलित होना था न हुए .उन्होंने शोषित पीड़ित तबकों तथा किसानों की भलाई के लिए संघर्ष जारी रखा .उनके इसी संघर्ष का प्रतिफल है कि आज लगभग सभी राजनीतिक दल किसानों ,पिछड़ों व् दलितों को न केवल साथ लेकर चलने की बात करते हैं बल्कि उनके साथ होने में गर्व महसूस करते हैं .
चौधरी साहब ग्राम्य विकास के लिए कुटीर एवं लघु उद्योगों  को अत्यंत महत्वपूर्ण मानते थे और अर्थव्यवस्था  के विकेंद्रीकरण की बात कहते थे .सन १९८२ में लिखे अपने एक लेख में उन्होंने स्पष्ट रूप में लिखा था -
''गरीबी से बचकर समृद्धि की ओर बढ़ने का एक मात्र मार्ग गाँव तथा खेतों से होकर गुजरता है .''
उन्हें गाँव किसानों व् कमजोर वर्गों से अटूट प्रेम था .इसी कारण उन्हें ''दलितों का मसीहा ''भी कहा गया .उनकी सबसे बड़ी चिंता ये थी कि लोगों में व्याप्त गरीबी को किस प्रकार दूर किया जाये .दरअसल डॉ.राम मनोहर लोहिया के बाद चौधरी साहब देश की राजनीति में अकेले  ऐसे नेता थे जिन्होंने पिछड़ी जातियों में राजनीति में हिस्सेदारी का एहसास जगाया .उन्हें सत्ता के नए शक्ति केंद्र के रूप में उभारा .उनके मन में तो इनके लिए केवल एक ही भावना विराजमान थी और वह केवल यूँ थी -
''अभी तक सो रहे हैं जो उन्हें आवाज़ तो दे दूँ ,
बिलखते बादलों को मैं कड़कती गाज़ तो दे दूँ .
जनम भर जो गए जोते ,जनम भर जो गए पीसे ,
उन्हें मैं तख़्त तो दे दूँ,उन्हें मैं ताज तो दे दूँ .''
जुलाई १९७९ में प्रधानमंत्री का पद ग्रहण करने के बाद चौधरी साहब ने कहा था -
''इस देश के राजनेताओं को यद रखना चाहिए कि ......[उनके लिए]इससे अधिक देशभक्तिपूर्ण उद्देश्य और नहीं हो सकता कि वे यह सुनिश्चित करें कि कोई भी बच्चा भूखे पेट नहीं सोयेगा ,किसी भी परिवार को अपने अगले दिन की रोटी की चिंता नहीं होगी तथा कुपोषण के कारण किसी भी भारतीय के भविष्य और उसकी क्षमताओं के विकास को अवरुद्ध नहीं होने दिया जायेगा .''
राज्य सभा की भूतपूर्व उपसभापति नजमा हेपतुल्लाह के अनुसार -
''तारिख जब अपना सफ़र शुरू करती है तो किसी ऐसे इन्सान को अपने लिए चुन लेती है जिसमे वक़्त से आँख मिलाने की जुर्रत व् हिम्मत हो .हिंदुस्तान की तारीख़ को ये फख्र हासिल है कि उसने यहाँ ऐसे इंसानों  को जन्म दिया जिन्होंने अपने हौसलों और इरादों से वक़्त की मुश्किल धार को मोड़ दिया .चौधरी चरण सिंह एक ऐसे ही हिम्मती इन्सान थे .उन्होंने खेतों व् खलिहानों से अपनी जिंदगी शुरू की और उसे तमाम हिंदुस्तान की जिंदगी बना दिया .''
हालाँकि चौधरी साहब के बारे में मेरा जो भी ज्ञान है वह किताबी और सुना सुनाया है ,किन्तु फिर भी एक अद्भुत प्रेरणा है जो मुझे उनके सम्बन्ध में लिखने के लिए प्रेरित करती है .मैं कानून की छात्रा रही हूँ और जब मुझे ये पता लगा कि उत्तर प्रदेश में ज़मींदारी उन्मूलन व् भूमि सूधार के जनक पूजनीय चरण सिंह जी ही थे तो मैं उनसे प्रभावित हुए बगैर नहीं रह सकी .प्राचीन काल में ज़मींदारों द्वारा किये गए अत्याचारों से मजदूर वर्ग को बचाना चौधरी साहब का प्रशंसनीय कार्य था .
वास्तव में चौधरी साहब आज भी हम लोगों के बीच में ही हैं ,अपने कार्यों द्वारा ,अपनी प्रेरणा द्वारा और जन जन में जगाई चेतना द्वारा .उनकी महक आज भी खेतों की मिटटी में,फसलों में व् भारत के कण कण में समायी है आज २३ दिसंबर २०१२ को चौधरी साहब की ११० वीं जयंती के अवसर पर पदमा शर्मा की ये पंक्तियाँ ही उन्हें समर्पित करने का मन करता है और मन इन पंक्तियों के साथ चौधरी साहब को शत शत नमन करता है-
''जन्म तो उन्ही का है जो काल से न हारते ,
चुनौती मान जन्म को हैं कर्म से संवारते .''
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

रविवार, 21 दिसंबर 2014

मीडिया दोगला क्यों हैं ?


''जिधर देखता हूँ उधर तू ही तू है ,
   न तेरी सी रंगत न तेरी सी बू है .''
आज हर तरफ मीडिया की ही धूम है .जिधर देखो उधर मीडिया के साथ जुड़ने के लिए लोगों का ताँता लगा हुआ है .मीडिया को वैसे भी हमारे लोकतंत्र में चौथे स्तम्भ का दर्जा प्राप्त है और अभी हाल में संपन्न चुनावों में दिए गए एग्जिट पोल भी मीडिया की सफल भूमिका की तरफदारी करते हुए ही दिखाई देते हैं. युवाओं में एक होड़ सी मची है इससे जुड़ने की उन्हें लगता है कि इससे जुड़ते ही हम एक शक्तिशाली वर्ग से जुड़ जायेंगे और उनकी यह सोच गलत भी नहीं है क्योंकि फिलवक्त ऐसी ही स्थिति नज़र आ रही है मीडिया ही उभर रहा है ,मीडिया ही गिरा रहा है .मीडिया चाहे तो केजरीवाल जनता पर राज करें और न चाहे तो चंदे के लिए उन्हें अपना मफलर तक दांव पे लगाने को मजबूर कर दें .
केजरीवाल ने चंदा जुटाने के लिए दांव पर लगाया मफलर


  ऐसी मजबूत स्थिति वाला यह स्तम्भ अपनी कार्यप्रणाली में दोहरी भूमिका क्यों निभाता है यह समझ से परे है .आज के समाचार पत्रों में दो समाचार मीडिया की इसी कार्यप्रणाली की गवाही दे रहे हैं -
   एक समाचार गुंटूर से है जिसमे किसी लेक्चरर पर तेजाब फेंका गया है और जिसमे केवल शक के आधार पर ही तेजाब फेंकने वाली के रूप में एक छात्रा का नाम भी प्रकाशित कर दिया गया है जबकि जिसने तेजाब फेंका है वह बुर्के में था अभी यह भी पूर्णरूपेण खुलासा नहीं हुआ कि वह आदमी था या औरत क्योंकि किसी ने बुर्के के अंदर झांककर थोड़े ही देखा था .
   और एक समाचार मुज़फ्फरनगर से है जिसमे एक दंपत्ति सड़क पर आकर खुलेआम लड़ा और मामला पुलिस में भी पहुँच गया उन प्रेम विवाह वालों को शादी के चार साल बाद एक बेटे के होने के बावजूद सड़क पर अपने विवाह की धज्जियाँ उड़ाते शर्म नहीं आई  किन्तु सच के पैरोकार इन मीडिया वालों को इतनी शर्म आई कि उनका नाम नहीं दिया जबकि यहाँ सब कुछ खुलेआम था .
    पहले भी मीडिया ऐसा करता आया है और आज भी कर रहा है कर क्यों रहा है यह समझ में नहीं आता कि आखिर जहाँ पर घटना को अंजाम देने वाले पक्षों के नामों के खुलासों पर न्यायालय द्वारा कोई रोक नहीं लगायी गयी है वहां वह नामों का खुलासा क्यों नहीं करता ?और इस तरह से वह गलत तत्वों से डरकर जो रिपोर्टिंग कर रहा है क्या उसे स्वतंत्र व् निर्भीक पत्रकारिता की श्रेणी में स्वयं भी रख सकता है ? गुंटूर वाले मामले में अभी मीडिया द्वारा किसी का भी नाम आरोपी की श्रेणी में लिया जाना गलत है क्योंकि वह मात्र शक है औरवह सही हो भी सकता है और नहीं भी ,और जहाँ सब कुछ खुला है वहां पर नाम आदि छुपाना मीडिया की स्वतंत्र व् निर्भीक पत्रकारिता को शक के घेरे में ले आता है जो कि सही नहीं है मीडिया को अपना रवैया इस सम्बन्ध में सही करना ही होगा और सत्य को सामने लाते हुए मात्र शक को सामने लाने से बचना होगा .
   शालिनी कौशिक
      [कौशल ]

गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

पाकिस्तान आग लगा -भारत बुझाएगा .

Hafiz Saeed, Musharraf blame India for Peshawar carnage
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NEW DELHI: A video has emerged that purportedly shows Lashkar-e-Taiba chief and 26/11 mastermind Hafiz Mohammad Saeed blaming India for the carnage carried out by the Pakistani Taliban in an army-run school in Peshawar on Tuesday. He said it was a conspiracy by Prime Minister Narendra Modi's government against Pakistan. The video also showed Saeed threatening India with "revenge" for the Peshawar massacre. Pervez Musharraf, former Pakistani military dictator and president, has also blamed India for the killing of 132 schoolchildren and 9 teachers in Peshawar on Tuesday.Talking to CNN-IBN, Musharraf said, "Taliban's commander was supported by Afghanistan and India to carry out terrorist attack in Pakistan." 


   '' दूसरों के वास्ते मरना ही जिसका काम है,
     उसके सिर पर देखिये तो क़त्ल का इल्ज़ाम है .''
सारी दुनिया में अपनी भलमनसाहत का डंका बजवाने वाले भारत ने जब अपने घर में ही आकर देखा तो उसे अपना माथा पीट लेना पड़ा क्योंकि उसकी खिड़की के पास खड़ा उसका ही सहोदर भाई उसे कातिल के रूप में दिखा उसके घर पोलिस भेजने की तैयारी में था जबकि जिस मानवता का क़त्ल हुआ था वह स्वयं उस सहोदर भाई ने ही किया था जो अपने किये का ठीकरा अपने हमेशा से उसके अन्याय व् अत्याचार को सहने वाले भाई के सिर पर फोड़ना चाहता था ,यही साबित किया है आज पूर्व पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ़ और भारत पर २६/११ के हमले के मुख्य साजिशकर्ता हाफ़िज़ सईद ने, जिन्होंने हमेशा से पाकिस्तान द्वारा दिए दर्द को सहते हुए भी उसे समझाने को ही कदम उठाये और ऐसा भारत ने तब किया जब वह अपने पर हुए अन्यायों का अत्याचारों का बदला अपने पास मौजूद हथियारों से कभी भी ले सकता था , जबकि उसने पाकिस्तान को हमेशा सीधी लड़ाई में धुल ही चटाई है , जबकि उसने पाकिस्तान   को हमेशा उसके द्वारा किये जा रहे आतंकवादी सभी गतिविधियों का पुख्ता सबूतों के साथ ही इल्ज़ाम लगाया है और सकल विश्व के नेताओं को उन सबूतों पर विश्वास कराया भी है और उन्हें अपने पक्ष में बोलने को मज़बूर भी किया है क्योंकि सभी देश आज आतंकवाद की मार झेल रहे हैं और जब वे सबूत पाकिस्तान के खिलाफ पुख्ता हों मजबूत हों तो उन्हें उसके खिलाफ मुंह खोलना ही होता है भले ही वे पूर्व में पाकिस्तान को अपना एशिया में कदम ज़माने का सबसे मुफीद स्थान मानते आये हों .
   किसी शायर ने कहा है - 
     ''आग ऐसी लगाने से क्या फायदा ,  
     जिसके शोलों को खुद ही बुझाना पड़े .''
आज पाकिस्तान अपने द्वारा लगायी आग में झुलस रहा है और अपने बचाव में ऐसी कुत्सित बयानबाजी पर उतर आया है जिसका परिणाम उसके लिए अपने सबसे करीबी से सभी नाते टूटने के रूप में ही सामने आएगा और जो उसे इस विश्व मंच पर तनहा ही खड़े होने को मजबूर कर सकता है जिसे देखकर कोई भी उस देश और देशवासियों की मदद को आगे बढ़ने की सोच भी नहीं सकता जिस देश का इतिहास और वर्तमान सारे विश्व को खून से लथपथ  कर देने की सोच से ही भरा हो .आज आतंकवाद ने उसके नौनिहालों को निगला है और वह इसके लिए भारत को दोषी ठहराने की कोशिश में जुट गया है जबकि ऐसे में उसे अपने गिरेबान में झांक कर अपने कर्मों का हिसाब करना चाहिए क्योंकि भारत ने वर्षों से इस विश्व में अपने विश्वबंधुत्व की भावना से जो प्रेम भाईचारे की दीवार खड़ी की है वह इतनी मजबूत है कि ऐसी खोखली ईंटों से टूटेगी नहीं हाँ इतना अवश्य हो सकता है कि पाकिस्तानी रहनुमाओं पर जो वहां की जनता का जो जरा बहुत भरोसा है वह भी टूट जाये और वे एक दुसरे से यही कहते नज़र आएं-
''नहीं विश्वास करना इस वतन के रहनुमाओं का ,
 न जाने आज तक कितनों को इन सबने छला होगा .''

    आज इन पाकिस्तानी रहनुमाओं की ये बयानबाजी कोई नयी बात नहीं लग रही है क्योंकि नयी तब लगेगी जब पुरानी उनकी छवि किसी सही बयानबाजी की रही हो इसलिए उनके लिए तो बस यही कहा जा सकता है -
''तुम्हारे हर सितम पर मुस्कुराना हमको आता है ,
 लगाओ आग पानी में बुझाना हमको आता है .''

शालिनी कौशिक 
    [कौशल ]
   

सोमवार, 15 दिसंबर 2014

अधिवक्ताओं से डरो सरकारों .



    पिछले 1 महीने से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अधिवक्तागण हाईकोर्ट बेंच की स्थापना की मांग को लेकर एक बार फिर से संघर्षरत हैं और ऐसा लगता है कि हड़ताल दिनों-दिन बढ़ती जा रही है और सरकार की तरफ से अधिवक्ताओं की हड़ताल को लेकर कोई भी ऐसा कदम नहीं उठाया जा रहा है जिसे देखते हुए कहा जा सके कि सरकार जनता के हित  को लेकर संजीदा है .बार बार इस तरह की हड़ताल और लगातार शनिवार को चली आ रही इसी मांग को लेकर हड़ताल का औचित्य ही अब समझ से बाहर हो गया है क्योंकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश जिस स्थिति में है उसे एक स्वतंत्र राज्य के रूप में होना चाहिए और उसका सभी कुछ अपना होना चाहिए .
     पश्चिमी यू.पी.उत्तर प्रदेश का सबसे समृद्ध क्षेत्र है .चीनी उद्योग ,सूती वस्त्र उद्योग ,वनस्पति घी उद्योग ,चमड़ा उद्योग आदि आदि में अपनी पूरी धाक रखते हुए कृषि क्षेत्र में यह उत्तर प्रदेश सरकार को सर्वाधिक राजस्व प्रदान करता है .इसके साथ ही अपराध के क्षेत्र में भी यह विश्व में अपना दबदबा रखता है .यहाँ का जिला मुजफ्फरनगर तो बीबीसी पर भी अपराध के क्षेत्र में ऊँचा नाम किये है और जिला गाजियाबाद के नाम से तो अभी हाल ही में एक फिल्म का भी निर्माण किया गया है .यही नहीं अपराधों की राजधानी होते हुए भी यह क्षेत्र धन सम्पदा ,भूमि सम्पदा से इतना भरपूर है कि बड़े बड़े औद्योगिक घराने यहाँ अपने उद्योग स्थापित करने को उत्सुक रहते हैं और इसी क्रम में बरेली मंडल के शान्ह्जहापुर में अनिल अम्बानी ग्रुप के रिलायंस पावर ग्रुप की रोज़ा  विद्युत परियोजना में २८ दिसंबर २००९ से उत्पादन शुरू हो गया है .सरकारी नौकरी में लगे अधिकारी भले ही न्याय विभाग से हों या शिक्षा विभाग से या प्रशासनिक विभाग से ''ऊपर की कमाई'' के लिए इसी क्षेत्र में आने को लालायित रहते हैं .इतना सब होने के बावजूद यह क्षेत्र पिछड़े हुए क्षेत्रों में आता है क्योंकि जो स्थिति भारतवर्ष की अंग्रेजों ने की थी वही स्थिति पश्चिमी उत्तर प्रदेश की बाकी उत्तर प्रदेश ने व् हमारे भारतवर्ष ने की है .
         ''सोने की चिड़िया''अगर कभी विस्तृत अर्थों में भारत था तो सूक्ष्म अर्थों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश आज भी है .यहाँ से लेने को तो सभी लालायित रहते हैं किन्तु देने के नाम पर ठेंगा दिखाना एक चलन सा बन गया है .आज पूरा पूर्वी उत्तर प्रदेश पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दम पर फल-फूल रहा है .छात्रों को राज्य सेवा ,शिक्षा में कहीं भी आने के लिए परीक्षा देनी हो तो अपने पैसे व् समय अपव्यय करने के लिए तैयार रहो और चलो इलाहाबाद या लखनऊ .समझौते की गुंजाईश न हो ,मरने मिटने को ,भूखे मरने को तैयार हैं तो चलिए इलाहाबाद ,जहाँ पहले तो बागपत से ६४० किलोमीटर ,मेरठ से ६०७ किलोमीटर ,बिजनोर से ६९२ किलोमीटर ,मुजफ्फरनगर से ६६० किलोमीटर ,सहारनपुर से ७५० किलोमीटर ,गाजियाबाद से ६३० किलोमीटर ,गौतमबुद्ध नगर से ६५० किलोमीटर ,बुलंदशहर से ५६० किलोमीटर की यात्रा कर के धक्के खाकर ,पैसे लुटाकर ,समय बर्बाद कर पहुँचो फिर वहां होटलों में ठहरों ,अपने स्वास्थ्य से लापरवाही बरत नापसंदगी का खाना खाओ ,गंदगी में समय बिताओ और फिर न्याय मिले न मिले ,परीक्षा पास हो या न हो उल्टे पाँव उसी तरह घर लौट आओ .ऐसे में १९७९ से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट खंडपीठ के आन्दोलन कारियों में से आगरा के एक अधिवक्ता अनिल प्रकाश रावत जी द्वारा विधि मंत्रालय से यह जानकारी मांगी जाने पर -''कि क्या पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खंडपीठ स्थापना के लिए कोई प्रस्ताव विचाराधीन है ?''पर केन्द्रीय विधि मंत्रालय के अनुसचिव के.सी.थांग कहते हैं -''जसवंत सिंह आयोग ने १९८५ में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ स्थापित करने की सिफारिश की थी .इसी दौरान उत्तराखंड बनने के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिले उत्तराखंड के अधिकार क्षेत्र में चले गए वहीँ नैनीताल में एक हाईकोर्ट की स्थापना हो गयी है .इस मामले में हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की राय मागी गयी थी .इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश  ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट की किसी शाखा की स्थापना का कोई औचित्य नहीं पाया है .''
         सवाल ये है कि क्या उत्तराखंड बनने से पश्चिमी उत्तर प्रदेश की इलाहाबाद हाईकोर्ट से दूरी घट गयी है ?क्या नैनीताल हाईकोर्ट इधर के मामलों में दखल दे उनमे न्याय प्रदान कर रही है ?और अगर हाईकोर्ट के माननीय  मुख्य न्यायाधीश को इधर खंडपीठ की स्थापना का कोई औचित्य नज़र नहीं आता है तो क्यों?क्या घर से जाने पर यदि किसी को घर बंद करना पड़ता है तो क्या उसके लिए कोई सुरक्षा की व्यवस्था की गयी है ?जबकि यहाँ यू.पी.में तो ये हाल है कि जब भी किसी का घर बंद हो चाहे एक दिन को ही हो चोरी हो जाती है .और क्या अपने क्षेत्र से इलाहाबाद तक के सफ़र के लिए किसी विशेष सुविधा की व्यवस्था की गयी है ?जबकि यहाँ यू.पी. में तो आर.पी.ऍफ़.वाले ही यात्रियों को ट्रेन से धकेल देते हैं .राजेश्वर व् सरोज की घटना अभी एक दिन पूर्व की ही है जिसमे सरोज की जान ही चली गयी .क्या इलाहाबाद में वादकारियों के ठहराने व् खाने के लिए कोई व्यवस्था की गयी है ?जबकि वहां तो रिक्शा वाले ही होटल वालों से कमीशन खाते हैं और यात्रियों को स्वयं वहीँ ले जाते हैं .और क्या मुक़दमे लड़ने के लिए वादकारियों को वाद व्यय दिया जाता है या उनके लिए सुरक्षा का कोई इंतजाम किया जाता है ?जबकि हाल तो ये है कि दीवानी के मुक़दमे आदमी को दिवालिया कर देते हैं और फौजदारी में आदमी कभी कभी अपने परिजनों व् अपनी जान से भी हाथ धो डालता है .पश्चिमी यू.पी .की जनता को इतनी दूरी के न्याय के मामले में या तो अन्याय के आगे सिर झुकाना पड़ता है या फिर घर बार  लुटाकर न्याय की राह पर आगे बढ़ना होता है .
         न्याय हो या शिक्षा का क्षेत्र दोनों में ही यदि हाईकोर्ट व् सरकार अपनी सही भूमिका निभाएं तो बहुत हद तक जन कल्याण भी कर सकती है और न्याय भी .आम आदमी जो कि कानून की प्रक्रिया के कारण ही बहुत सी बार अन्याय  सहकर घर बैठ जाता है और दूरी को देख छात्र परीक्षा देने से पीछे हट जाता है ,दोनों ही आगे बढ़ेंगे यदि हाईकोर्ट ,शिक्षा प्रशासन ,सरकार सही ढंग से कार्य करें .यह हमारा देश है हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था है फिर हमें ही क्यों परेशानी उठानी पड़ती है ?यदि वेस्ट यू.पी.में हाईकोर्ट की खंडपीठ स्थापित की जाती है तब निश्चित रूप से मुक़दमे बढ़ेंगे और इनसे होने वाली आय से जो सरकारी खर्च में इस स्थापना के फलस्वरूप बढ़ोतरी हुई होगी वह तो पूरी होगी ही सरकार की आय में भी बढ़ोतरी होगी और जनता में सरकार के प्रति विश्वास भी बढेगा जो सरकार के स्थायित्व के लिए व् भविष्य में कार्य करने के लिए बहुत आवश्यक है .   शिक्षा परीक्षा की जो प्रतियोगिताएं इलाहाबाद ,लखनऊ में आयोजित की जाती हैं उससे वहां पर छात्रों व् उनके परिजनों की बहुत भीड़ बढती है जिसके लिए प्रशासन को बहुत सतर्कता से कार्य करना होता है उसे यदि  जिले या मंडलों के कॉलेज में बाँट दिया जाये तो सरकार पर इतने इंतजाम का बोझ नहीं पड़ेगा और प्रतिभागियों को भी सुविधा रहेगी .वे आसानी से सुबह को अपने घर से जाकर शाम तक घर पर लौट सकेंगे और इस तरह न उन्हें अपने घर की चिंता होगी और न प्रशासन को व्यवस्था की . किन्तु पूर्व का अर्थात इलाहाबाद व् लखनऊ का राजनीतिक प्रभाव इतना ज्यादा है कि कुछ भी ऐसा नहीं किया जायेगा जिससे पश्चिम की जनता वहां से कटे और उनकी आमदनी पर प्रभाव पड़े भले ही इधर की जनता लुटती पिटती रहे .इसलिए कोई भी प्रयास जो इस दिशा में किया जाता है वह सफल नहीं होता .चाहे केन्द्रीय रेल बजट हो या उत्तर प्रदेश सरकार का बजट हो इधर के लिए ऐसे ही काम किये जाते हैं जो ''ऊंट के मुहं में जीरा'' ही साबित होते हैं .रेल बजट में दिल्ली-सहारनपुर वाया शामली रूट के दोहरीकरण के नाम पर सर्वे का लॉलीपाप ही दिया गया .उत्तर प्रदेश सरकार के बजट में २५९ सेतुओं के निर्माण का प्रावधान है जिसमे से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मात्र 9 सेतु ही हैं .
        आज स्थिति ये है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश को ठगा जा रहा है और ये यहाँ की जनता को ही अब सोचना होगा कि उसे मात्र कुछ भाग लेना है या अपना पूरा अधिकार .कृषि ,उद्योग ,धन आदि सभी संपदाओं से भरपूर इस क्षेत्र को अब छोटे मोटे इन तुच्छ प्रलोभनों का मोह त्यागना होगा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के लिए ही आगे बढ़ना होगा क्योंकि इसके बगैर यहाँ की जनता का कल्याण नहीं होगा और हर मामले में पूर्व को पश्चिम के सिर पर ही बैठाया जाता रहेगा .इसलिए अब तो यहाँ की जनता को भी यहाँ के अधिवक्ताओं के साथ खड़ा होना ही होगा क्योंकि वास्तविकता तो यह है कि आज ये अधिवक्ता जिस लड़ाई को लड़ रहे हैं उससे अंतिमतः फायदा जनता का ही है और जनता को उनके साथ जुड़कर चाहे प्रदेश की सरकार हो या केंद्र की अधिवक्ताओं  के कंधे से कन्धा मिलाकर अधिवक्ताओं के आंदोलन को मजबूती दे कहना होगा -
           ''बहकावों में न आयेंगे ,
               अपनी सरकार बनायेंगे .
           तुम ना समझोगे औचित्य ,
                हम ना तुमको समझायेंगे .
            हम जनता हैं ,हम ताकत हैं ,
               अब तुमको भी दिखलायेंगे .
             छोटी मोटी मांगे न कर ,
              अब राज्य इसे बनवाएँगे .''
     
      शालिनी कौशिक
            [कौशल]
       

    रविवार, 14 दिसंबर 2014

    ये तन्हाई ......संजीदगी सिखाती है.





    ये जिंदगी तन्हाई को साथ लाती है,
       हमें कुछ करने के काबिल बनाती  है.
    सच है मिलना जुलना बहुत ज़रूरी है,
         पर ये तन्हाई ही हमें जीना  सिखाती है.

    यूँ तो तन्हाई भरे शबो-रोज़,
              वीरान कर देते हैं जिंदगी.
    उमरे-रफ्ता में ये तन्हाई ही ,
            अपने गिरेबाँ में झांकना सिखाती है.

    मौतबर शख्स हमें मिलता नहीं,
         ये यकीं हर किसी पर होता नहीं.
    ये तन्हाई की ही सलाहियत है,
         जो सीरत को संजीदगी सिखाती है.
            शालिनी कौशिक 

    शुक्रवार, 12 दिसंबर 2014

    मोदी सरकार :जीने का अधिकार दे मरने का नहीं!



    धारा 309 -भारतीय दंड संहिता ,एक ऐसी धारा जो अपराध सफल होने को दण्डित न करके अपराध की असफलता को दण्डित करती है .यह धारा कहती है-
            '' जो कोई आत्महत्या करने का प्रयत्न करेगा और उस अपराध को करने के लिए कोई कार्य करेगा ,वह सादा कारावास से ,जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से ,या दोनों से दण्डित किया जायेगा .''
      और इस धारा की यही प्रकृति हमेशा से विवादास्पद रही है और इसीलिए उच्चतम न्यायालय ने पी.रथिनम् नागभूषण पटनायिक बनाम भारत संघ ए .आई .आर .१९९४ एस.सी.१८४४  के वाद में दिए गए अपने ऐतिहासिक निर्णय में दंड विधि का मानवीयकरण करते हुए अभिकथन किया है कि-
      ''व्यक्ति को मरने का अधिकार प्राप्त है .''
    इस वाद में दिए गए निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने इसे संविधान के अनुच्छेद २१ के अंतर्गत व्यक्ति को प्राप्त वैयक्तिक स्वतंत्रता का अतिक्रमण मानते हुए इस धारा को दंड विधि से विलोपित किये जाने को कहा .विद्वान न्यायाधीशों ने धारा ३०९ के प्रावधानों को क्रूरतापूर्ण एवं अनुचित बताते हुए कहा कि इसके परिणामस्वरुप व्यक्ति को दोहरा दंड भुगतना पड़ता है .प्रथम तो यह कि वह आत्महत्या करने की यंत्रणा भुगतता है और आत्महत्या करने में असफल रहने पर उसे समाज में अपकीर्ति या बदनामी भुगतनी पड़ती है जो काफी पीड़ादायक होती है .ऐसी स्थिति में आत्महत्या के प्रयत्न में विफलता के लिए व्यक्ति को दण्डित करना उस पर एक और दंड का भार डालना होगा ,जो उचित नहीं है .अतः दंड संहिता की धारा ३०९ के उपबंध संविधान के अनुच्छेद २१ के प्रावधानों के विपरीत होने के कारण शून्य हैं .इस धारा को विलोपित किया जाना न केवल मानवीय आधार पर उचित होगा अपितु समाजशास्त्रीय दृष्टि से भी वांछित है क्योंकि वह व्यक्ति जिसने आत्महत्या करने के प्रयास किया था परन्तु वह इसमें विफल रहा हो ,अपने परिवार के लिए उपयोगी सिद्ध होने के लिए एक बार पुनः उपलब्ध रहता है ,जैसा कि वह पूर्व में था .
       इस निर्णय के आलोक में हम धारा ३०९ को शून्य ठहराते हैं और असंवैधानिक मानते हैं और ऐसे ही निर्णय को दृष्टिगोचर रखते हुए केंद्रीय सरकार विधि आयोग की सिफारिश पर व् १८ राज्यों व् ४ केंद्रशासित क्षेत्र की सहमति पर धारा ३०९ को ख़त्म करने का निर्णय ले रही है किन्तु यदि हम लोकेन्द्र सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य ए.आई .आर.१९९६ एस.सी.९४६ का अवलोकन करते हैं तो अपनी सोच को विस्तृत रूप दे पायेंगें और इस धारा को इस संहिता में स्थान देने का सही मकसद समझ पाएंगे .पी.रथिनम् का निर्णय जहाँ २ न्यायाधीशों की खंडपीठ ने दिया है वहीँ इस केस का निर्णय पांच न्यायाधीशों की खंडपीठ ने दिया है जिससे इस निर्णय की उस निर्णय पर वरीयता व् प्रमुखता स्वयं ही बढ़ जाती है .इस मामले में पांच न्यायाधीशों की खंडपीठ ने विनिश्चित किया -''कि जब कोई व्यक्ति आत्महत्या करता है तब उसे कुछ सुस्पष्ट व्यक्त कार्य करने होते हैं  और उनका उद्गम अनुच्छेद २१ के अंतर्गत ''प्राण के अधिकार ''के संरक्षण में नहीं खोजा जा सकता अथवा उसमे सम्मिलित नहीं किया जा सकता .''प्राण की पवित्रता ''के महत्वपूर्ण पहलु की भी उपेक्षा नहीं की जानी होगी .अनुच्छेद २१ प्राण तथा दैहिक स्वतंत्रता की गारंटी प्रदान करने वाला उपबंध है तथा कल्पना की किसी भी उड़ान से प्राण के संरक्षण में ' में ''प्राण की समाप्ति '' शामिल होने का अर्थ नहीं लगाया जा सकता .किसी व्यक्ति को आत्महत्या करके अपना प्राण समाप्त करना अनुज्ञात करने का जो भी दर्शन हो ,उसमे गारंटी किया हुआ मूल अधिकार के भाग के रूप में ''मरने का अधिकार ''सम्मिलित है ,ऐसा अनुच्छेद २१ का अर्थान्व्यन करना हमारे लिए कठिन है .अनुच्छेद २१ में निश्चित रूप से व्यक्त ''प्राण का अधिकार '' नैसर्गिक अधिकार है किन्तु आत्महत्या प्राण की अनैसर्गिक समाप्ति अथवा अंत है और इसलिए प्राण के अधिकार की संकल्पना के साथ असंयोज्य और असंगत है .
           ये तो हम सभी जानते हैं कि भारत में किसी को भी कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं है और ऐसे में इस धारा को ख़त्म करने का निर्णय लेकर यहाँ यह अधिकार भी उस अवसादग्रस्त जनता को दे रहे हैं जो प्राण की समाप्ति को उतारू है .इंग्लैण्ड में आत्महत्या अधिनियम १९६१ पारित होते ही स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक परिपत्र जारी करके सभी चिकित्सकों तथा सबंधित प्राधिकारियों को यह निर्देश दिया कि आत्महत्या को एक चिकित्सीय तथा सामाजिक समस्या माना जाना चाहिए और यही इस अपराध के प्रति सही कानूनी दृष्टिकोण है .आत्महत्या की ओर प्रवृत होने वाले व्यक्ति के प्रति सहानुभूति के दो शब्द तथा कुशल परामर्श की व्यवस्था होनी चाहिए न कि जेलर का पाषाणी व्यवहार या अभियोजक की सख्त कार्यवाही क्योंकि वास्तव में देखा जाये तो आत्महत्या ''सहायता के लिए पुकार  है दंड के लिए नहीं '' इसलिए इस धारा के खात्मे की सोचना लोकेन्द्र सिंह .....में दिए गए उच्चतम न्यायालय के निर्णय के अनुसार जनता को प्राण की अनैसर्गिक सम्पति का अधिकार देना है जो कि संविधान के अनुच्छेद २१ के अस्तित्व पर भी प्रश्नचिन्ह लगाता है जबकि वास्तव में इसमें दिए गए दंड की व्यवस्था में बदलाव की आवश्यकता है जो ऐसा कदम उठाने की सोचने वाले की सोच को मोड़कर सही दिशा दे सके इसलिए यदि वर्तमान केंद्र सरकार में पिछली सरकारों की अपेक्षा कुछ अद्भुत करने की महत्वाकांक्षा है , गुंजाईश है  तो उसे इस धारा के दंड में बदलाव करते हुए अपराधी को सहानुभूति की दो शब्द व् कुशल चिकित्सकों की देख-रेख में रहकर मानसिक स्थिति सुधरने व् मजबूत करने का दंड देने की व्यवस्था करनी चाहिए .

    शालिनी कौशिक
           [कानूनी ज्ञान ]



     

    सोमवार, 8 दिसंबर 2014

    जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें सोनिया गांधी जी .


    ''कैंची से चिरागों की लौ काटने वालों ,सूरज की तपिश को रोक नहीं सकते ,
     तुम फूल को चुटकी से मसल सकते हो ,पर फूल की खुशबू समेट नहीं सकते .''
          सोनिया गांधी जी भारतीय राजनीति के लिए  फूल के समान हैं जिसकी खुशबू को उनके विरोधी भरसक प्रयत्नों के बावजूद भी खत्म नहीं कर सकते .इसीलिए वे इन्हें कभी विदेशी कह हमले करते हैं तो कभी इनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि को लेकर इन्हें देश के दुश्मनों की श्रेणी में लाने की कोशिश करते हैं जबकि सोनिया जी का व्यक्तित्व इन सभी आरोपों को ठीक वैसे ही ठेंगा दिखा देता है जैसे कि सूरज के चमकते ही अँधेरे को सूर्य का प्रकाश ठेंगा दिखाता है .
        सोनिया जी का पूर्व जीवन क्या रहा है इसके बारे में आप सभी उनकी विकिपीडिया पर मौजूद जानकारी से इस बारे में जान सकते हैं -
    Early life


    Sonia Gandhi's birthplace, 31, Contrada Maini (Maini street),Lusiana, Italy (the house on the right)
    She was born to Stefano and Paola Maino in Contrada Màini ("Maini quarter/district"), at Lusiana,[13][14] a little village 30 km from Vicenza in Veneto,[15] Italy, where families with the family name "Màino" have been living for many generations.[16][17][18] She spent her adolescence in Orbassano,[19] a town near Turin, being raised in a traditional Roman Catholic family and attending aCatholic school. Her father, Stefano Maino, was a building mason, who owned a small construction business in Orbassano.[20] Stefano fought against theSoviet military alongside Hitler's Wehrmacht on theeastern front in World War II, he called himself a loyal supporter of Benito Mussolini and Italy's National Fascist Party.[20] He died in 1983.[21] Her mother and two sisters still live around Orbassano.[22]
    In 1964, she went to study English at the Bell Educational Trust's language school in the city of Cambridge.[23] In 1965 at a Greek restaurant (the Varsity Restaurant in Cambridge) she met Rajiv Gandhi, who was enrolled in Trinity College at the University of Cambridge.[24] Sonia and Rajiv Gandhi married in 1968, in a Hindu ceremony[25] following which she moved into the house of her mother-in-law and then Prime Minister, Indira Gandhi.[26]    
      




    सोनिया जी को कोई सत्ता का लालची कहता है तो कोई पब की डांसर

     किन्तु ये नहीं देखता कि ऐसा कहने से उनकी गरिमा में कोई  कमी नहीं 

    आती अपितु हमारी गन्दी सोच का ही पता लगता है जो सच्चाई को

    स्वीकार नहीं सकते और एक महिमामय व्यक्तित्व को गिराने की व्यर्थ

    चेष्टा करते हैं .सोनिया जी क्या हैं यह उन्होंने राजीव जी की मृत्यु के

    पश्चात राजनीति से दूर रहकर और २००४ में प्रधानमंत्री पद ठुकराकर 

    स्वयं ही दिखा दिया था जबकि वे इन दोनों ही स्थिति में भारत का

    प्रधानमंत्री पद बहुत ही आसानी से हासिल कर सकती थी क्योंकि कोई

    भी संवैधानिक बाध्यता इस कुर्सी और उनके बीच में नहीं थी 


        आज सोनिया जी की पार्टी सत्ता में नहीं है किन्तु वे निश्चित रूप में


    आज भी वैसे ही जीवन यापन करती हैं जैसे कि वे सत्ता में रहकर करती

    हैं .वे पहले भी अपने पुत्र राहुल से सत्ता को जहर कह चुकी हैं और वे ऐसा

     मान सकती हैं क्योंकि ये सत्ता ही है जिसके कारण उन्हें अपनी सास

    श्रीमती इंदिरा गांधी जी को उनके ही अंगरक्षकों द्वारा गोली कहते हुए

     देखना पड़ा और अपने पति श्री राजीव गांधी जी को भी असमय खोना 

    पड़ा .
        सोनिया जी ने पिछली लोकसभा के सत्र के दौरान बहुत सा समय


    अस्वस्थ रहकर गुज़ारा है ऐसे में यह उनके लिए बेहतर ही है कि वे सत्ता 

    के ज़हर से कुछ समय दूर रहें ताकि जो उनपर बेकार के लांछन लगते

     फिरते हैं उन्हें अपनी कुछ योग्यता दिखने का अवसर तो मिले

     .
       आज सोनिया जी के ६९ वें जन्मदिन पर मैं उनके सभी ऐसे प्रशंसकों 


    व् समर्थकों की तरफ से ,जो सच्चाई व् ईमानदारी की कदर करते हैं और

    मलाईदार व् लच्छेदार बातों की अपेक्षा स्वच्छ व्यक्तित्व को तरजीह देते 

    हैं , उन्हें इन शब्दों में हार्दिक शुभकामनायें प्रेषित करती हूँ -

    ''ज़िंदगी की बहार देखो आप

    ,
     ऐश-ए-लैलो नहार देखो आप ,


    एक ही साल की दुआ कैसी

     साल बेहतर हज़ार देखो आप .''


    शालिनी कौशिक


          [कौशल ]

    शनिवार, 6 दिसंबर 2014

    कंछल नहीं कानून का वस्त्रहरण किया वकीलों ने .


    ''लखनऊ में व्यापारी नेता कंछल को वकीलों ने पीटा ,उनके कपडे फाडे और उन्हें मुर्गा बनाया ''आज के समाचार पत्रों में यह समाचार प्रमुखता से छाया रहा .सीधे तौर पर यह मामला कानून के साथ खिलवाड़ है और यह खिलवाड़ कानून के रखवालों द्वारा ही की गयी है इसलिए यह और भी ज्यादा निंदा का विषय है और देखा जाये तो यह एक ऐसा कार्य है जिसके लिए आज वकीलों की संख्या में निरंतर बढ़ोतरी हो रही है क्योंकि एक तबका हमारे देश में ऐसा भी है जो इस व्यवसाय से मात्र जुड़ ही इसलिए रहा है कि इससे व्यक्ति को '' ऑथोरिटी ''मिलती है और जो ऑथोरिटी वे इससे चाहते हैं वह साफ़  तौर पर ऐसी घटनाओं को अंजाम देकर वे दिखा ही देते हैं .अगर वकीलों द्वारा इसी तरह से कानून को अपने हाथ में लेकर आपराधिक  कार्यवाहियों को अंजाम दिया जाता रहा तो कानून को इस  सम्बन्ध में कठोर रवैया अख्तियार करते हुए वकीलों के समूह में जुड़ने से पहले ही बहुत सारी बाध्यताएं भी जोड़नी होंगी ताकि बाद में इनकी डिग्री या पंजीकरण पर रोक तक की स्थिति आने ही न पाये और अपने को कानून का बहुत बड़ा अधिकारी मानने वाले ये अपने कार्यों को करने के लिए कानून का ही सहारा लें न कि अपने बाहुबल का क्योंकि कानून की नज़रों में सभी बराबर हैं वकील हों या मुवक्किल और यदि वकील अपने हाथ में कानून लेकर उससे खिलवाड़ कर रहा है तो वह ज्यादा बड़ा दोषी है क्योंकि वह कानून के रक्षक का स्थान रखता है न कि भक्षक का और इसीलिए यहाँ जो भी वकील इस तरह के कुत्सित कार्य में संलग्न रहे हैं उन सभी के खिलाफ  कठोर कानूनी कार्यवाही होनी चाहिए ताकि आगे से अन्य वकील इस तरह की घटना से सबक लें और यदि ऐसा कुछ करने को आगे बढ़ने की सोच भी रहे हैं तो अपने कदम न चाहते हुए भी पीछे खींच लें .

    शालिनी कौशिक
        [कौशल ]

    गुरुवार, 4 दिसंबर 2014

    ''पता है ६ दिसंबर करीब है ''



    ''पानी की तरह बहता है सड़कों पे रात-दिन ,
    इंसां के खून की कोई कीमत नहीं रही .''
          'इरफ़ान कामिल 'का लिखा यह शेर साध्वी निरंजन ज्योति के दिल्ली में जनसभा के दौरान किये गए कथन में समाये उनके आशय को साबित करने हेतु पर्याप्त  है .खाद्य एवं प्रसंस्करण राज्य मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति के अमर्यादित बोल संसद के दोनों सदनों में कोहराम मचाते हैं और राजनीतिक कार्यप्रणाली के रूप में विपक्ष् उन पर कार्यवाही चाहता है ,उनका इस्तीफा चाहता है और उन पर एफ.आई.आर. दर्ज़ करने की अपेक्षा रखता है और सत्ता वही पुराने ढंग में घुटने टेके खड़ी रहती है . अपने मंत्री के माफ़ी मांगने को आधार बना उनका बचाव करती है जबकि साध्वी निरंजन ज्योति ने जो कुछ कहा वह सामान्य नहीं था .भारतीय कानून की दृष्टि में अपराध था .वे दिल्ली की एक जनसभा के दौरान लोगों को ''रामजादे-हरामजादे में से एक को चुनने को कहती हैं ''   वे कहती हैं -''कि दिल्ली विधानसभा चुनावों में मतदाताओं को तय करना है कि वह रामजादों की सरकार बनायेंगें या हरामजादों की .''राम के नाम पर ६ दिसंबर १९९२ की उथल-पुथल आज भी भारतीय जनमानस के मन से नहीं उतर पाई है और २२ वर्ष बाद फिर ये देश को उसी रंग में रंगने को उतर रहे हैं और ऐसे में इनके वेंकैय्या नायडू निरंजन ज्योति के माफ़ी मांगने को पर्याप्त कह मामले को रफा-दफा करने की कोशिश कर रहे हैं जबकि यह सीधे तौर पर राष्ट्र की अखंड़ता पर हमला है जिसके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा १५३-ख कहती है -

    १५३-ख- [1] जो कोई बोले गए या लिखे गए शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा या दृश्यरूपणों द्वारा या अन्यथा -
    [क] ऐसा कोई लांछन लगाएगा या प्रकाशित करेगा कि किसी वर्ग के व्यक्ति इस कारण से ही कि वे किसी धार्मिक ,मूलवंशीय ,भाषाई या प्रादेशिक समूह या जाति या समुदाय के सदस्य हैं ,विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठां नहीं रख सकते या भारत की प्रभुता और अखंडता की मर्यादा नहीं बनाये रख सकते ,अथवा
    [ख] यह प्राख्यान करेगा ,परामर्श देगा ,सलाह देगा ,प्रचार करेगा या प्रकाशित करेगा कि किसी वर्ग के व्यक्तियों को इस कारण से कि वे किसी धार्मिक ,मूलवंशीय ,भाषाई या प्रादेशिक समूह या जाति या समुदाय के सदस्य हैं ,भारत के नागरिक के रूप में उनके अधिकार न दिए जाएँ या उन्हें उनसे वंचित किया जाये ,अथवा
    [ग] किसी वर्ग के व्यक्तियों की बाध्यता के सम्बन्ध में इस कारण कि वे किसी धार्मिक ,मूलवंशीय ,भाषाई या प्रादेशिक समूह या जाति या समुदाय के सदस्य हैं ,कोई प्राख्यान करेगा ,परामर्श देगा ,अभिवाक करेगा या अपील करेगा अथवा प्रकाशित करेगा और ऐसे प्राख्यान ,परामर्श ,अभिवाक या अपील से ऐसे सदस्यों तथा अन्य व्यक्तियों के बीच असामंजस्य अथवा शत्रुता या घृणा या वैमनस्य की भावनाएं उत्पन्न होती हैं या उत्पन्न होनी सम्भाव्य हैं ,
    वह कारावास से ,जो तीन वर्ष तक का हो सकेगा ,या जुर्माने से या दोनों से दण्डित किया जायेगा .
       और यहाँ साध्वी निरंजन ज्योति के ये बोल भारत की एकता व् अखंडता के प्रतिकूल हैं और इस धारा के अधीन दण्डित होने योग्य किन्तु दंड भुगतने को तो जब भारतीय जनता पड़ी है तब उससे इस पार्टी या ऐसी ही सोच रखने वाली अन्य पार्टी या किसी नेता के दंड भुगतने का तो कोई मतलब ही नहीं रह जाता .भारतीय जनमानस को याद   है आज भी ३० अक्टूबर १९९० को श्रीराम कार सेवा समिति का वह विज्ञापन ,जिसमे कहा गया था -




    और जिसका परिणाम था जनमानस में उबलता वह उफान जो ६ दिसंबर ९२ को बाबरी मस्जिद के विध्वंस से शांत हुआ .आज साध्वी के ये बोल मात्र उनका प्रलाप हैं किन्तु आगे ये जनमानस का प्रलाप बनें इसके लिए बेहतर है कि साध्वी निरंजन ज्योति को कानूनी कठघरे के घेरे में लिया जाये ताकि सबक मिले ऐसे अनर्गल प्रलाप करने वालों को जो मात्र अपने नाम की जय-जयकार बुलवाने को देश व् अन्य देशवासियों के घरों के चूल्हे बुझवाते हैं और उनमे मुर्दानगी का नंगा नाच कराते हैं .
        ६ दिसंबर करीब है और बाबरी विध्वंस के जरिये सत्ता सुख हासिल करने वाले पहले भी सत्ता में रहे और आज भी है किन्तु जिस राम मंदिर को बनाने का वादा कर इन्होने बरसों बरस के भाईचारे को ख़त्म किया उस राम मंदिर के लिए एक ईंट रखने तक के लिए इनके कदम आज तक आगे नहीं बढे ,हाँ इतना अवश्य हुआ कि हिन्दू-मुस्लिम में मतभेद के बीज बोने में ये अवश्य सफल हो गए .फखरूल आलम ने ऐसे ही हालातों को बयां करते हुए कहा है -

    ''आंधी ने तिनका-तिनका नशेमन का कर दिया ,
    पल-भर में एक परिंदे की मेहनत बिखर गयी .''


    यही तो है वह नफरत की राजनीति जिसके बारे में कॉंग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी जी ने पहले भी कहा था कि ''भाजपा नफरत की खेती करती है .''और अब भी कह रही हैं ''कि भाजपा नफरत बोती है .''यही राजनीति पिछले दिनों भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार कर रहे थे और यही राजनीति अब इनकी ये फायर ब्रांड नेता साध्वी निरंजन ज्योति कर रही हैं .वे ''शहजादे ''कहते थे ये ''हरामजादे ''कह रही हैं और उसपर तुर्रा ये कि ये देश के भला करने वाले हैं ऐसे ही अक्लमंदों की मंद पड़ती अक्ल के बारे में ''अकबर इलाहाबादी ''कह गए हैं -
    ''बेइल्म अगर अक्ल को आज़ाद करेंगे ,
    दुनिया तो गई दीन भी बर्बाद करेंगे .
    जब खुद नहीं रहने के किसी अक्ल पे कायम
    क्या खाक वो कायम कोई बुनियाद करेंगे .''

    शालिनी कौशिक
            [कौशल ]
         

    रविवार, 30 नवंबर 2014

    रिश्तों पर कलंक :पुरुष का पलड़ा यहाँ भी भारी



     रिश्तों पर कलंक :पुरुष का पलड़ा यहाँ भी भारी

     ''रिश्तों की ज़माने ने क्या रीत बनायी है ,
       दुश्मन है मेरी जां का लेकिन मेरा भाई है .''
    पुरुष :हमेशा से यही तो शब्द है जो समाज में छाया है ,देश में छाया है और अधिक क्या कहूं पूरे संसार पर छाया है .बड़े बड़े दावे,प्रतिदावे ,गर्वोक्ति पुरुष के द्वारा की जाती है स्वयं को विश्व निर्माता और नारी को उसमे दोयम दर्ज दिया जाता है .और पुरुष के इस दावे को हाल ही की कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं ने पूर्णतया साबित भी कर दिया है .हर जगह हर काम में स्वयं की श्रेष्ठता का गान गाने वाला पुरुष अपने बारे में बिलकुल सही कहता है और सही है ''हर जगह अव्वल है ''.
          २ अप्रैल २०१२ की शाम को कांधला [शामली ]में चार शिक्षिका बहनों पर तेजाबी हमला सुर्ख़ियों में था .हर ओर से इस मामले के खुलासे की मांग की जा रही थी जहाँ परिजन किसी रंजिश से इंकार कर रहे थे वहीँ पुलिस और आम जनता सभी के दिमाग में यह चल रहा था कि आखिर ऐसे ही कोई लड़कियों पर तेजाब क्यों फैंकेगा और आखिर खुलासा हो गया और ऐसा खुलासा जिसने न केवल कांधला कस्बे को शर्मसार किया बल्कि रिश्तों के नाम पर जिस सुरक्षा की एक नौ बेटियों की माँ  ख्वाब संजोये थी उस सुरक्षा को भी अपने नापाक इरादों से खाक कर डाला-
     ''हमने जिस मंजिल पे खोया एतबारे दोस्ती ,
        उसमे अक्सर लोग जाने पहचाने लगे .
    हालत में कुछ ऐसा तगय्युर भी न था ,
        लेकिन वह हुआ जिसका तसव्वुर भी न था .''

       शिक्षिकाओं का बहनोई ही इस घटना का सूत्रधार निकला और जो कि स्वयं भी कांधला कस्बे का निवासी है .स्थानीय निवासी और रिश्ते में जीजा होकर बाबर ने जिस घृणित कृत्य को अंजाम दिया है उससे यह स्पष्ट है कि पुरुष कहीं भी नारी से स्वयं को पीछे नहीं देख सकता और अपने वर्चस्व को बनाये रखने के लिए वह किसी भी हद तक जा सकता है और यह बात स्वयं स्वीकारी है शामली जिले के एस. पी .अब्दुल हमीद जी ने ,जिन्होंने मामले का खुलासा करते हुए कहा -''बाबर ने अपनी साली ईशा को हतोत्साहित करने के लिए ही साथी जावेद के साथ मिलकर तेजाब फैंकने की योजना बनायीं थी .''
          दूसरा मामला जो अभी हाल में काफी निंदा का विषय रहा और जिसमे बाप-बेटे के रिश्ते ही दांव पर लग गए उसका सूत्रधार भी पुरुष ही है .अरबपति बसपा नेता दीपक भरद्वाज की हत्या जो कि उनके छोटे बेटे नितेश भरद्वाज ने ही करायी ,उसी बेटे ने जिसके लिए बड़े बड़े यज्ञ हवन किये जाते हैं ,मन्नतें मांगी जाती हैं ,जश्न मनाये जाते हैं ,पितृ ऋण से मुक्ति की संकल्पना की जाती है वही बेटा ,सृष्टि नियंता पुरुष ही ऐसी घटना को जब अंजाम देता है तब आकाश में बैठे देवी देवता भी मानव की किस्मत को सराहते होंगे और कहते होंगे-
        ''सब लुट गए अरमान मेरी जान में आके,
    लोगों ने मुझे लूटा है मेहमान बनाके ,
    मिलते ही मुझे जिंदगी बीमार हो गयी ,
    चरागरों की हर दवा बेकार हो गयी ,
    जीने की तमन्ना जगी शमशान में आके .''

      यही नहीं भारतीय पुरुष आज सारे विश्व में अपने रिश्ते निभाने की काबिलियत के झंडे गाड रहे हैं .मध्य इटली के लोहा गाँव में ३९ वर्षीय कुमार राज ने पत्नी फ्रांसेस्का दी ग्रेजिया और १९ वर्षीय बेटी मार्टिना की चाकू से गोदकर हत्या कर दी और ऐसा तब जबकि यह शादी उसने वहां की नागरिकता पाने को २००८ में समझौते के तहत की थी .
        पर ऐसा नहीं है कि सिर्फ पुरुष ही इतने वीर हों ,वीरांगनाएँ भी हैं हरियां के पूर्व विधायक रेलूराम पूनिया की बेटी सोनिया ऐसी ही बहादुर नारी हैं जिनका नाम इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जायेगा अपने पिता सहित परिवार के ८ सदस्यों को जहर देकर मौत के घाट उतारने की वीरगाथा उन्होंने लिखी है किन्तु हाय अफ़सोस नारी ये काम भी अकेले न कर सकी और यहाँ भी पुरुष से पिछड़ गयी क्योंकि इस काम में उसने अपने पति संजीव का सहयोग लिया और उसके साथ मिलकर इस पुण्य कृत्य को अंजाम दिया .बेटी ने बाप व् परिवार के साथ जो भी किया यह हमेशा चर्चा का विषय रहेगा किन्तु सबसे ज्यादा प्रशंसा इसी बात की होगी कि नारी के मुकाबले रिश्ते निभाने में भी पुरुष का पलड़ा भारी है ,भले ही जीजा साली का रिश्ता हो ,बाप बेटे का रिश्ता हो पति पत्नी का रिश्ता हो या बाप बेटी का .इसलिए कहना होगा कि पुरुष की जय जयकार और शायद इसलिए नौशाद जी भी कह गए हैं -
       ''ऐतबार अब किसी पर होता नहीं ,
    रात भर कोई बस्ती में सोता नहीं ,
    काम रहजन का तो रहजनी है मगर ,
    अब मुहाफिज का भी कोई भरोसा नहीं ,
    उसको मिलता अगर रंगे इंसानियत ,
    हाथ मेरे लहू से भिगोता नहीं .''
       शालिनी कौशिक
         [कौशल]





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