शुक्रवार, 15 मार्च 2013

मृत शरीर को प्रणाम :सम्मान या दिखावा

मृत शरीर को प्रणाम :सम्मान या दिखावा
Wallpaper last tribute of respect, jackson \ 's funeral, vmi, may 15, 1863


अरस्तू के अनुसार -''मनुष्य एक सामाजिक प्राणी  है समाज जिससे हम जुड़े हैं वहां रोज़ हमें नए तमाशों के दर्शन होते हैं .तमाशा ही कहूँगी मैं इन कार्यों को जिनकी आये दिन समाज में बढ़ोतरी हो रही है .एक शरीर ,जिसमे प्राण नहीं अर्थात जिसमे से आत्मा निकल कर अपने परमधाम को चली गयी ,को मृत कहा जाता है और यही शरीर जिसमे से आत्मा निकल कर चली गयी बड़ी संख्या में लोगों द्वारा उस आत्मा के ही कारण अंतिम प्रणाम किये जाने को अंतिम दर्शन हेतु रखा जाता है जबकि आत्मा के जाने के बाद शरीर मात्र एक त्यागा हुआ वस्त्र रह जाता है .आत्मा के शरीर त्यागने के बाद जल्दी से जल्दी अंतिम संस्कार की क्रिया को अंजाम दिया जाता है क्योंकि जैसे जैसे देरी होती है शरीर का खून पानी बनता है और वह फूलना  शुरू हो जाता है साथ ही उसमे से दुर्गन्ध निकालनी आरम्भ हो जाती है ..अंतिम संस्कार का अधिकार हमारे वेद पुराणों के अनुसार ज्येष्ठ पुत्र को दिया गया है जिसे कभी कभी संयोग या सुविधा की दृष्टि से कोई और भी अंजाम दे देता है और अंतिम संस्कार करने वाले की वहां उपस्थिति को ऐसी स्थिति को देखते हुए अनिवार्यता कह सकते हैं किन्तु परिवहन क्रांति /संचार क्रांति का एक व्यापक प्रभाव यहाँ भी पड़ा है अब बहुत दूर दूर बैठे नातेदारों की प्रतीक्षा भी अंतिम संस्कार में देरी कराती है और संचार क्रांति के कारण जिन जिन को सूचना दी जाती है उन सभी की उपस्थिति की अपेक्षा भी की जाती है न केवल उनके अंतिम दर्शन के भाव को देखते हुए बल्कि अपने यहाँ आदमियों की भीड़ को बढ़ाने के लिए भी जिसमे विशेष स्थान गाड़ियों का है क्योंकि आज गाड़ियाँ इतनी ज्यादा हो गयी हैं कि आज हर कोई बसों की असुविधा को देखते हुए इनका ही इस्तेमाल कर रहा है .और परिणाम यह है कि जो कार्य उस वक़्त शीघ्रता शीघ्र संपन्न होना चाहिए उस ओर विलम्ब प्रक्रिया बढती ही जाती है .
अभी हाल में ही हमारे पड़ोस में  एक बुजुर्ग जिनकी आयु लगभग ८७ वर्ष थी ,का दिन में लगभग ३ बजे निधन हो गया अब बुजुर्ग थे तो अच्छा खासा खानदान लिए बैठे थे तमाम परिवारी जन पास ही मौजूद थे अंतिम क्रिया जिसे करनी थी उस बेटे के घर पर ही उन्होंने अपने प्राण त्यागे थे किन्तु दो बेटे जो और हैं उनमे से एक बेटा व् एक बेटी उस दिन नहीं पहुँच पाए इसलिए अंतिम क्रिया अगले दिन के लिए टाल दी गयी .अब जहाँ तक भावुकता की बात की जाये तो ऐसे उदहारण भी हैं जिसमे मृत शरीर को उनके परिजनों ने लम्बे समय तक अपने पास ही रखा उनका अंतिम संस्कार करने की वे हिम्मत ही नहीं जुटा पाए और ऐसे भाव ही अधिकांश लोग रखते हैं और इसलिए ही कहते हैं कि बेटे बेटी को अंतिम दर्शन का अधिकार है उनसे यह अधिकार नहीं छीना जाना चाहिए और इसलिए यह प्रतीक्षा गलत नहीं है किन्तु मैं पूछती हूँ कि ये अंतिम दर्शन कहा ही क्यूं जाता है ?क्या हमारे बड़ों का जो अंश हममे है और उनके प्रति जो श्रृद्धा व् जो सम्मान हममे है क्या वह बस यहीं ख़त्म हो जाता है ?क्या इस तरह हम यहाँ उन्हें वास्तव में अपने से बिल्कुल अलग नहीं कर देते  हैं ?उनके विचारों को सम्मान देकर उन्हें याद रखकर जो ख़ुशी हम उन्हें जीते जी दे सकते हैं क्या उसका लेशमात्र भी इस दिखावे में है ?
    शरीर से जब प्राण निकल जाते हैं तो वह मात्र देह होती है जो जितनी जल्दी हो सके जिन तत्वों से मिलकर बनी है उनमे मिल जानी चाहिए अन्यथा विलम्ब द्वारा हम उस शरीर की दुर्गति ही करते हैं जिसके अंतिम दर्शनों के नाम पर हम उसका सम्मान करने को एकत्रित होते हैं .आज परिवहन व् संचार क्रांति ने ये संभव कर दिया है तो हम ऐसे मौकों पर दूर-दराज के नाते रिश्तेदारों को भी इस कार्य में जोड़ लेते हैं .ऐसे में  यदि देखा जाये तो महाराजा दशरथ के अंतिम संस्कार भी चौदह वर्ष बाद ही किया जाना चाहिए था क्योंकि उनके दो पुत्र उनके पास नहीं थे और उन्हें भी तो अपने पिता के अंतिम दर्शन का अधिकार था किन्तु तब न तो परिवहन के इतने सुलभ साधन थे और न ही सूचना के लिए हर हाथ में मोबाइल ,तो भगवान राम व् अनुज लक्ष्मण को इस अधिकार से वंचित रहना पड़ा और जहाँ तक मृत शरीर को अंतिम प्रणाम कर हम मृतात्मा के प्रति अपना सम्मान प्रदर्शित करते हैं तो यह मात्र प्रदर्शन है क्योंकि आत्मा कभी नहीं मरती .श्रीमद्भागवत गीता के अध्याय २ के श्लोक २० में कहा गया है -
''न जायते म्रियते वा कदाचि-
    न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः .
अजो नित्यः शाश्वतो$यं  पुराणों
    न हन्यते हन्यमाने शरीरे .२०.''

[यह आत्मा किसी काल में भी न तो जन्मता है और न मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला ही है ;क्योंकि यह अजन्मा ,नित्य ,सनातन और पुरातन है ;शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता .]
इस प्रकार भले ही शरीर रूप में कोई हमारा हमसे अलग हो गया हो किन्तु हमसे वह आत्मा रूप में कभी अलग नहीं होता और न ही हम ऐसा मान सकते हैं इसलिए ऐसे में जिस आपा-धापी में अंतिम दर्शन के नाम पर हम अंतिम संस्कार के लिए जाने में भीड़ बढ़ाते हैं वह महज एक दिखावा है और कुछ नहीं .कविवर गोपाल दास ''नीरज''ने भी कहा है -
''किसके रोने से कौन रुका है कभी यहाँ ,
जाने को ही सब आयें हैं सब जायेंगे .
चलने की तैयारी ही तो बस जीवन है ,
कुछ सुबह गए कुछ डेरा शाम उठाएंगे .''
  शालिनी कौशिक
      [कौशल]

15 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

मृत देह को सम्मान मिले, वह भी शीघ्रातिशीघ्र ।

Aziz Jaunpuri ने कहा…

samman to harhal me milna chahie,aaj kal dhire dhire yah matr aupcharikta ki taraf mudta pratit ho raha hai,

G.N.SHAW ने कहा…

आज कल मर्म के साथ दिखावा भी लागू होता है |

sriram ने कहा…

waah sundar post....thanks

पी.सी.गोदियाल "परचेत" ने कहा…

सुषमा ने तो हाथ ही जोड़े, इन राहुल भैया जी से कौन पूछेगा कि सत्ता के लालच में ( अब्दुल्ला से दोस्ती) इन्होने जो जवान से बन्दूक छीनकर उन्हें मौत के मुह में धकेल उसका जिम्मेदार कौन ?

रविकर ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति आदरेया-
शुभकामनायें स्वीकारें-

Rajendra Kumar ने कहा…

दिखावा ही सही संस्कृति को भूलना नहीं चाहिए,सार्थक आलेख.

शिवनाथ कुमार ने कहा…

आत्मा नश्वर है और शरीर नाशवान ....
हमें उस नश्वर आत्मा का सम्मान करना चाहिए

विजय राज बली माथुर ने कहा…

तर्कसंगत लेख अनुकरण के योग्य है। 'राम' के युग मे यातायात के साधन आज से भी द्रुत गति के थे-भारत ने हनुमान को अयोध्या से 'राकेट' के जरिये 'लंका' भोर होने से पहले पहुंचा दिया था। परंतु उस समय आडंबर नहीं किया था जबकि आजकल मात्र आडंबर रह गया है। केवल लोकप्रियता दिखाने हेतु 'मृत शरीर' की छीछालेदर की जाती है जो नहीं होनी चाहिए।
क्या गांधी जी धर्म निरपेक्ष थे? ---विजय राजबली माथुर

पूरण खण्डेलवाल ने कहा…

आपका कहना सही हो सकता है लेकिन भावनाओं पर तर्कों का असर नहीं होता और लोगों की भावनाएं उस मृत शरीर के साथ जुडी हुयी रहती है !

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

सहमत .बढ़िया तार्किक प्रस्तुति .इस सन्दर्भ में कबीर की ये पंक्तियाँ बड़ी मौजू हैं :

मन फूला फूला फिरे ,जगत में झूंठा नाता रे ,

जब तक जीवे ,माता रोवे ,बहन रोये दस मासा से ,

और तेरह दिन तक तिरिया रोवे ,फेर करे घर वासा रे .

जब शरीर ठंडा हो गया ,आत्मा शरीर छोड़ गया फिर मोह कैसा ?

दिगम्बर नासवा ने कहा…

सामान तो उस आतक मो दिया जाता है ... मृत शरीर तो बस माध्यम है ...
पर ये सामान जरूर मिलना चाहिए ...

Anita ने कहा…

विचारणीय पोस्ट !

abhishek shukla ने कहा…

adbhut.....

Madan Mohan Saxena ने कहा…

बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी ...बेह्तरीन अभिव्यक्ति ...!!शुभकामनायें.

तुम राम बनके दिल यूँ ही दुखाते रहोगे .

अवसर दिया श्रीराम ने पुरुषों को हर कदम , अग्नि-परीक्षा नारी की तुम लेते रहोगे , करती रहेगी सीता सदा मर्यादा का पालन पर ठेकेदार मर्यादा...