तवलीन सिंह की रोटी बंद होने वाली है

तवलीन सिंह की रोटी बंद होने वाली है

तवलीन सिंह की रोटी बंद होने वाली है .क्यूं ?पड़ गए न आश्चर्य में ,जबकि ये आश्चर्य नहीं सत्य है .नेहरु गाँधी परिवार की अनर्गल आलोचना तवलीन को रोटी दिलाती है किन्तु ये आलोचना तभी तो मान्य है जब यह परिवार सत्ता में हो और वर्तमान में कॉंग्रेस नेतृत्व की विफलता और विपक्ष की निरंतर साजिशों ने लगभग इस सरकार के लिए बाहर जाने का  रास्ता तैयार कर दिया है .
            नेहरु गाँधी परिवार जनता में अपनी लोकप्रियता और सत्ता में लम्बी उपस्थिति के कारण आलोचना के घेरे में आता ही रहता है .यह आलोचना यदि सकारात्मक हो तो विवाद या निंदा का न होकर विचार का विषय होगी किन्तु यह अधिकांशतया अनर्गल प्रलाप पर ही आधारित रहती है .मृणाल पांडे  जैसी वरिष्ठ पत्रकार भी इस परिवार के राहुल गाँधी की आलोचना करती हैं किन्तु उनके सही क़दमों की तारीफ भी करती हैं  किन्तु तवलीन सिंह बेसिर-पैर की बाते ही ज्यादा लिखती हैं .महीने में लगभग ५ आलेख उनके हमारे सामने आते हैं और इनमे तभी कुछ विभिन्नता होती है जब कोई विशेष या उत्तेजनात्मक घटना घटित हो जाये नहीं तो उनकी कलम नेहरु गाँधी परिवार से इतर लिखने को मना कर देती है ऐसा हमें लगता है.अगले लोकसभा चुनाव में राहुल गाँधी -नरेन्द्र मोदी का सीधा मुकाबला प्रचारित किया जा रहा है .ऐसे में राहुल गाँधी द्वारा स्वयं को प्रधानमंत्री पद की दौड़ से बेदखल करना तवलीन की नज़रों में कोंग्रेसियों से बेवफाई है 'ये वे कह रही हैं किन्तु लगता है कि ये वे खुद से बेवफाई मानकर चल रही हैं क्योंकि यदि वे स्वयं को इस दौड़ में शामिल रखते हैं तो उनकी कलम को कुछ और भी लिखने का अवसर मिलेगा अनर्गल जो उन्हें और झूठ को पसंद करने वाले बहुत सो को पसंद भी आयेगा जिन्हें सच्चाई से कुछ लेना देना नहीं केवल इस परिवार और राहुल गाँधी की बारे से लेना देना है जबकि इस देश की समस्याओं का इस परिवार से कोई लेना देना नहीं है यह परिवार सत्ता में हो या न हो समस्याएं बनी रहनी हैं क्योंकि ये हमारी पैदा करी हुई हैं .भ्रष्टाचार हमारे द्वारा पोषित ,नेता हमारे द्वारा चयनित फिर इन्हें दोष क्यों देना जबकि हम भी स्वयं अपना काम निकालने वालों में हैं .अब यदि राहुल गाँधी स्वयं को इस दौड़ में शामिल कहते हैं तो तवलीन जी इसे ''तानाशाही ''कहेंगी क्योंकि उन्हें तो कैसे भी हो इनकी बुराई करनी है और अपनी रोटी चलानी है .
  मैं पूछती हूँ क्या गलती है राहुल गाँधी के निर्णय में ?इंदिरा जी की मृत्यु के बाद राजनीति में लगभग नौसीखिए राजीव गाँधी जी को प्रधानमंत्री बना दिया गया और यही नादानी थी उनकी जो उन्हें ''बोफोर्स ''जैसे कांड के घेरे में ले गयी .पंचायती राज ,मतदान की उम्र घटाना ,देश में कंप्यूटर  के लिए किये गए उनके सभी कार्य आज कहीं नहीं गिने जाते ,ये व्यर्थ  की आलोचना करने वाले केवल बोफोर्स और क्वात्रोच्ची ही गाते रहते हैं  ऐसे में यदि राहुल गाँधी पहले संगठन से जुड़कर राजनीति में परिपक्व होकर ही उसमे आगे बढ़ना चाहते हैं तो उनकी आलोचना क्यूं जबकि ऐसे में ही जब विपक्षी भाजपा के नेता संगठन के लिए कार्य करते हैं तो उनकी सराहना में चाँद तारे तक तोड़ कर लाये जाते हैं .राहुल जी के इस निर्णय की आलोचना वही पत्रकार कर सकते हैं जो पत्रकारिता क्या है नहीं जानते ,देश के इस चौथे स्तम्भ की क्या महत्ता है नहीं जानते.
   राहुल स्वयं को पैराशूट से उतारे गए कहते हैं ,सही है ,वे जानते हैं कि उन्हें यहाँ विरासत की जगह मिली है किन्तु पहले की परम्पराओं को तोड़कर वे सामान्य कार्य कर्ता  की तरह कार्य कर यदि सफलता की सीढियां चढ़ना चाहते हैं तो ये तो देश के हित में है क्योंकि इस तरह वे पार्टी में गलत तत्वों को स्वयं परखकर पार्टी से अलग  कर सकते हैं और देशहित  में देश की सबसे बड़ी पार्टी की कार्यप्रणाली में सुधार ला सकते हैं उनके इस कदम की तो सराहना की जानी चाहिए क्योंकि ऐसा वे तब कर रहे हैं जब उन्हें अपनी पार्टी में सर्व स्वीकार्यता मिली हुई है .न कि नरेन्द्र मोदी की तरह जो स्वयं को मोमबत्ती के मोम से प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी में  चिपकाने की चेष्टा कर रहे हैं जबकि स्वयं उनकी पार्टी बीजेपी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह जी गाजियाबाद में एक जनसभा में कहते हैं -
''कि पी.एम्.कौन होगा इसका फैसला संसदीय बोर्ड करेगा .''
 स्वामी विवेकानंद के भारत को जगत गुरु बनाने के सपने को हकीकत में पलटने की बात कहने वाले नरेन्द्र मोदी इतना तक तो जानते नहीं कि जब स्वामी विवेकानंद के गुरु ने उनसे एक लकीर को बिना मिटाए छोटी करने को कहा था तो उन्होंने क्या किया था ,उन्होंने उससे  बड़ी लकीर खींच दी थी जबकि यहाँ वे अपने विरोधियों को मिटाने  की कोशिश में लगे हैं जो उनके स्वामी विवेकानंद की शिक्षा से विपरीत कार्य है और यही उन्होंने गुजरात में किया .कल तक गुजरात ,गुजरात के राग अलापने वाले आज प्रधानमन्त्री बनने के सपने देख रहे हैं अच्छी बात है हर भारतीय को ये सपना देखने का हक़ है किन्तु पहले अपनी पार्टी में तो अपनी स्वीकार्यता ले आयें गठबंधन में तो बाद की और देश में तो सबसे बाद की है .पहले अपने ऊपर से क्षेत्रीय नेता का ठप्पा तो हटा लें राहुल गाँधी की तरह राष्ट्रीय नेता तो बनना बहुत बाद की बात है .आज तक उनकी पार्टी तक तो कौंग्रेस की तरह देश में सर्व स्वीकार्य  हुई नहीं .
    कथित गुजरात विकास के अभिमान से भरे नरेन्द्र मोदी जी के लिए तो यही एक सदमे के समान  हो सकता है कि उनके गुजरात विकास को माकपा नेता प्रकाश करात जी द्वारा नकार दिया गया है जो कहते हैं -
    ''देश विकास के गुजरात मॉडल को कभी स्वीकार नहीं कर सकता क्योंकि इसमें आम लोगों ,दलितों और आदिवासियों की कीमत पर केवल बड़े आद्योगिक घरानों को ही तरजीह मिली है .''
     और जो अपने प्रचार के लिए वे फोटो में मुसलमानों की पसंद के रूप में स्वयं को प्रचारित करते हैं उसे सिरे से नकार रहे हैं देवबंदी विद्वान उलेमा मदनी जी -जो कहते हैं -
''गुजरात दंगों के जख्मों को गैरतमंद इन्सान कभी नहीं भुला सकता .......मोदी का यह कहना कि विकास हो तो मतदाता सभी गलतियों को माफ़ कर देते हैं ...को मदनी ने महज मजाक करार दिया .''
     
देश के प्रधानमंत्री को ''नाईट वाचमेन''कहकर मजाक उड़ाना  प्रधानमंत्री की शख्सियत के लिए कोई मजाक नहीं किन्तु एक नाईट वाचमेन के लिए ज़रूर दुखदायक है जो अपनी रात की नींद का बलिदान दे क्षेत्र के निवासियों को चैन की नींद देता है  .
 तवलीन जी राहुल गाँधी के पैराशूट कहने की हंसी उड़ाती हैं और मोदी जी को राजनीतिक बिसात के लिए सुनामी करार देती हैं क्या नहीं जानती या अंजान बनने की कोशिश कर रही हैं तो उन्हें समझ लेना चाहिए कि पैराशूट तो फिर भी संकट में फंसे लोगों को बचाता है किन्तु सुनामी ज़मीन पर बसे जीवन को उजाड़ कर समुन्द्र में ही ले जाती है जहाँ केवल और केवल मौत का गहरा अँधेरा है क्या उनके मोदी जी ऐसे ही हैं इसका खुलासा भी उन्हें करना होगा .
    और फिर बहुत आजकल नमो नमो हो रही है जबकि ये कलियुग है और नमो यानी भगवान का ध्यान किन्तु सभी जानते हैं ''भगवान के घर देर है अंधेर नहीं ''किन्तु कोई नहीं जानता कितनी और रागा  का प्रभाव सबको पता है .संगीत सम्राट तानसेन इसी के प्रभाव से वर्षा करा देते थे अब इनमे से किसका उच्चारण होना चाहिए ये भारतीय जानता स्वयं तय कर सकती हैऔर वे रॉकेट जो तवलीन जी अपनी पूरी ताकत लगा छोड़ रही हैं उनका हश्र वे स्वयं देखेंगी इस शेर से-
     ''न होगा उसपे मसाइल की बारिशों का असर ,
     जो तजरबों की कड़ी धूप का जला होगा .''
       शालिनी कौशिक
          [कौशल ]

टिप्पणियाँ

जो होना है वो होकर रहेगा !!
दिनेश पारीक ने कहा…
बहुत उम्दा प्रस्तुति आभार

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Akhtar Kidwai ने कहा…
bahut khub likha hai aap ne
MANU PRAKASH TYAGI ने कहा…
हो जाये तो बढिया है

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