शनिवार, 9 नवंबर 2013

आजकल की सास

आजकल की सास

आजकल की सास बहू को पार लगा देगी ,
बेटे की नैया की पतवार डुबा देगी .
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समधी बोला समधिन सुनले काम न आवे बिटिया को ,
समधिन बोले घर तो खुद ही खूब चला लेगी .
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समधिन बोले सुन लो समधी माल तो लूंगी खरा खरा ,
कमी अगर की लेशमात्र भी आग लगा देगी .
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बेटा बोला घरवाली को साथ मैं अपने रखूँगा ,
देख ये तेवर पूरे घर को सिर पे उठा लेगी .
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रोटी दो ही मिलेंगी तुझको दाल मिलेगी चमचा भर ,
बस इतना दे सारे दिनभर नाच नचा लेगी .
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बेटे की न बने बहू से रोटी गले से उतर रही ,
दोनों खुश दिख जाएँ अगर तकरार करा देगी .
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बहू अगर न करने वाली कमी गायेगी सारे में ,
करे अगर वो सास की खातिर नाक चढ़ा लेगी .
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नाकाबिल हो तो सिर फोड़े काबिल हो तो सिर खाये ,
ऐसी बनी कि हर हालत में उसे चबा लेगी .
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कहे ''शालिनी ''सास शब्द में घमंड क्रोध यूँ भरा पड़ा ,
कितनी भी माँ कोशिश करले उसे दबा लेगी .
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

7 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज रविवार (10-11-2013) को सत्यमेव जयते’" (चर्चामंच : चर्चा अंक : 1425) पर भी होगी!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Ramakant Singh ने कहा…

aadhi haqikat aadha fasaana

कालीपद प्रसाद ने कहा…

कहे ''शालिनी ''सास शब्द में घमंड क्रोध यूँ भरा पड़ा ,
कितनी भी माँ कोशिश करले उसे दबा लेगी
बहुत सुन्दर |
नई पोस्ट काम अधुरा है

अजय कुमार झा ने कहा…

हा हा हा उफ़्फ़ ये सीरीयली सासें ....बहुत बढिया सन्नाट वर्णन किया आपने

Annapurna Bajpai ने कहा…

उत्तम रचना ।

मन के - मनके ने कहा…


परिस्थितियां बदल रहीं हैं.

मन के - मनके ने कहा…


परिस्थितियां बदल रहीं हैं.

... पता ही नहीं चला.

बारिश की बूंदे  गिरती लगातार  रोक देती हैं  गति जिंदगी की  और बहा ले जाती हैं  अपने साथ  कभी दर्द  तो  कभी खुशी भी  ...