बुधवार, 5 दिसंबर 2012

शोध -माननीय कुलाधिपति जी पहले अवलोकन तो किया होता .

५ दिसंबर २०१२ दैनिक जागरण का मुख पृष्ठ चौधरी चरण सिंह विश्वविध्यालय के २४ वें दीक्षांत समारोह की अध्यक्षता कर रहे माननीय कुलाधिपति /उत्तर प्रदेश के राज्यपाल बी.एल.जोशी के कथनों को प्रमुखता से प्रकाशित कर रहा था .एक ओर जहाँ माननीय राज्यपाल महोदय ने युवाओं को दहेज़ जैसी कुप्रथाओं के खिलाफ आगे आने का आह्वान कर अपनी संवेदनशीलता का परिचय दिया वहीँ उन्होंने शोध के सम्बन्ध में ''....लेकिन  तमाम विश्वविद्यालयों  में एक भी रिसर्च ऐसी नहीं देखने को मिल रही जिसका हम राष्ट्रीय या वैश्विक स्तर पर गौरव के साथ उल्लेख कर सकें .''कह अपने नितान्त असंवेदनशील होने का परिचय दिया है .
                   न्याय के सम्बन्ध में एक महत्वपूर्ण कथन है ''कि भले ही सौ गुनाहगार छूट जाएँ किन्तु एक निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए .''मैंने शोधार्थियों  के वर्तमान शोध में से केवल एक के शोध का अवलोकन किया है और उसके आधार पर मैं कह सकती हूँ कि माननीय कुलाधिपति महोदय का ये कथन उन शोधार्थियों के ह्रदय को गहरे तक आघात पहुँचाने वाला है जिन्होंने अपनी दिन रात की मेहनत से ये उपाधि प्राप्त की है .और जिस शोध का मैं यहाँ जिक्र कर रही हूँ उसके आधार पर मैं ये दावे के साथ  कह सकती हूँ कि पी एच.डी.को लेकर जो सारे में ये फैला रहता है कि ये धन दौलत के बल पर हासिल कर ली जाती है यह पूर्ण रूप से सत्य नहीं है बल्कि कुछ शोधार्थी हैं जो अपनी स्वयं की मेहनत के बलबूते इस उपाधि को धारण करते हैं न कि दौलत से खरीदकर .डॉ . शिखा कौशिक ने इस वर्ष चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय से ''हिंदी की महिला उपन्यासकारों  के उपन्यासों में स्त्री-विमर्श ''विषय पर पी एच.डी.की उपाधि प्राप्त की है और यदि कुलाधिपति महोदय इस शोध का अवलोकन करते तो शायद उनके मुखारविंद से ये कथन नहीं सुनाई देते .
           ६ अध्यायों में विस्तार से ,हिंदी उपन्यास में चित्रित परंपरागत नारी जीवन ,नारी जीवन की त्रासदी और विड्म्बनाएँ   ,सुधारवादी आन्दोलन और नारी उत्थान ,समाज सुधार संस्थाओं का योगदान ,महिला उपन्यासकारों के उपन्यासों में चित्रित नारी की आर्थिक स्वाधीनता तथा घर बाहर की समस्या ,महिला उपन्यासकारों के उपन्यासों में चित्रित परिवार-संसद का विघटन ,विवाह संस्था से विद्रोह ,महिला उपन्यासकारों के उपन्यासों में राजनैतिक चेतना ;महिलाओं को तैंतीस  प्रतिशत आरक्षण ,महिला उपन्यासकरों के उपन्यासों में चित्रित कुछ अतिवादी और अराजकतावादी स्थितियां ,सामाजिक संबंधों में दरार और विश्रंखलता ,स्वछंद जीवन की प्रेरणा से पाशव जीवन  की ओर प्रवाह ,मुस्लिम नारी समाज की भिन्न स्थिति का संत्रास आदि आदि -स्त्री विमर्श का जो शोध डॉ.शिखा कौशिक जी ने विभिन्न उपन्यासों ,पत्र-पत्रिकाओं के सहयोग से प्रस्तुत किया है वह सम्पूर्ण राष्ट्र में नारी के लिए गौरव का विषय है .संभव है कि अन्य और शोधार्थियों के शोध भी इस क्षेत्र में सराहना के हक़दार हों ,इसलिए ऐसे में सभी शोधों को एक तराजू में तौलना सर्वथा गलत है और इस सम्बन्ध में तभी कोई वक्तव्य दिया जाना  चाहिए जब इस दिशा में खुली आँखों से कार्य किया गया हो अर्थात  सम्बंधित शोधों का अवलोकन किया गया हो.ऐसे में मेरा कहना तो केवल यही है -
   ''कैंची से चिरागों की लौ काटने वालों ,
सूरज की तपिश को रोक नहीं सकते .
तुम फूल को चुटकी से मसल सकते हो ,
पर फूल की खुशबू समेट नहीं सकते .''
                  शालिनी कौशिक
                         [कौशल ]

 

7 टिप्‍पणियां:

Rohitas ghorela ने कहा…

डॉ. शिखा जी को उनके PHD करने पर बहुत बहुत बधाई ...

आपने जिस विषय पर प्रकाश डाला है वो काफी विचारणीय व प्रभावशाली है..

मेरी नयी पोस्ट पर आपका स्वागत है
http://rohitasghorela.blogspot.in/2012/12/blog-post.html

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

इन लोगों से यह पूछा जाना चाहिए कि इन्हों ने कितने शोध-ग्रंथों को पढ़ा है?
ये बात सही है कि आज अधिकांश लोग धन की ताकत पर अपने शोध-कार्य को संपन्न करवाते हैं पर सभी ऐसा नहीं करते हैं,,,,ऐसे में उन्हें अवश्य कष्ट होता है जो मेहनत से अपना शोध-कार्य करते हैं.
अच्छे लेख के लिए बधाई..

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

निस्संदेह शिखा जी का शोध कार्य उच्च स्तर का रहा होगा लेकिन महामहिम ने जो कहा है उसमें सारांश है .हिन्दुस्तान के किसी भीभारतीय प्रोद्योगिकी संस्थान का पहले सौ शीर्ष संस्थानों में

आलमी स्तर पर कोई स्थान नहीं है .

आप पीएचडी की बात करतीं हैं मैं एक डीलिट(हिंदी )महिला का किस्सा बयान करना चाहूंगा .उनके पति और वह स्वयं भी वाल्किंग में राष्ट्रीय ,एशियाई प्रतियोगिताओं में इनाम लाते रहे हैं .अखबार

को एक रिपोर्ट देनी थीं .मेरे पास आईं -

मैंने इमला बोला -हरियाणा के श्री ......उन्होंने लिखा हरियाणा केसरी ...यह स्तर है डीलिटों का थोक के भाव मिलते हैं .

आप शिखाजी के अभिनव शोध कार्य की अलग से समीक्षा लिखिए अभिनव विषय है उनका उसे यूं जाया न करें उसके अंश ब्लॉग पे रखें .

Virendra Kumar Sharma ने कहा…


विश्वविद्यालयों में शोध छात्रों का हर स्तर पर शोषण होता है मैंने इस विश्वविद्यालयीन व्यवस्था को एक छात्र के रूप में चार वर्षों तक और प्राध्यापक के बतौर 38 बरस तक नज़दीक से देखा है

.सेना के ऑडरली की मानिंद इनका सेवन होता है .हाँ प्रतिरक्षा व्यवस्था में तो रह ही रहा हूँ फिलाल .

शुक्रिया आपकी टिपण्णी के लिए ,हमारे लिए बेश -कीमती है आपकी लिखी .

liveaaryaavart.com ने कहा…

उत्कृष्ट लेखन !!

Akash Mishra ने कहा…

शिखा जी को बहुत बहुत बधाई |
और रही राज्यपाल जी की बात तो उन्होंने जो पढ़ा उसमे उनका कोई हाथ नहीं है , उनके भाषण लिखने वाला अगर उन्हें कोई फ़िल्मी गाना भी लिख के दे देता तो शायद वो उसे भी पढ़ देते |

सादर

madhu singh ने कहा…

शालिनी जी,बेहतरीन प्रस्तुति,सुन्दर भाव, नामुमकिन है यह मिलन और होना भी नहीं चाहिए

''बेटी को इंसाफ -मरने से पहले या मरने के बाद ?

   '' वकील साहब '' कुछ करो ,हम तो लुट  गए ,पैसे-पैसे को मोहताज़ हो गए ,हमारी बेटी को मारकर वो तो बरी हो गए और हम .....तारी...