मंगलवार, 3 सितंबर 2013

ये देखो आज भरत से राम वध करा गयी .


शामली में बवाल, आगजनी व फायरिंग


Shamli

भाइयों के बीच ये मंथरा क्यूं आ गयी ,
त्रेता में किये काम का कलियुग में फल चखा गयी .
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मिल-बैठ मुश्किलों को थे गैर राह दिखा रहे ,
ये आके समझ-बूझ में आग ही लगा गयी .
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अमन दिलों में खूब था ,वतन ये पुरसुकून था ,
तीर ज़हर से भरे ये सबके ही चुभा गयी .
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फिजाओं में थी बह रही हमारे प्यार की महक ,
इसी की कूटनीतियाँ खाक बनके छा गयी .
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आपसी सद्भाव से तरक्की जो थे पा रहे ,
तोड़ धागा प्रेम का ये खाट से लगा गयी .
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बुजुर्गों की हिदायतें संभालती नई पीढियां ,
दबे कदम पधारकर ये दीमकें घुसा गयी .
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कुर्बानियों भरोसों की खड़ी थी जो इमारतें ,
बारूद की चिंगारियां ये नीव में दबा गयी .
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ज़रा ज़रा सी बात पर प्यासे हुए हैं खून के ,
ये देखो आज भरत से राम वध करा गयी .
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देखकर हालात ये संभल न सकी ''शालिनी ''
बुराई अब भलाई पर सहज में विजय पा गयी .
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शब्दार्थ -खाट से लगाना -अशक्त होना ,



   शालिनी कौशिक
               [कौशल ]





मुज़फ्फरनगर

4 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बुधवार (04-09-2013) गुरु हो अर्जुन सरिस, अन्यथा बन जा छक्का -चर्चा मंच 1359 में "मयंक का कोना" पर भी है!
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Rajesh Yadav ने कहा…



बहुत अच्छी रचना ! बधाई स्वीकार करें !

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डा श्याम गुप्त ने कहा…

सुन्दर ग़ज़ल....खूब...

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सबको सम्मति दे भगवान।

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