गुरुवार, 14 जुलाई 2011

बचपन के वो पल

बचपन के वो पल






 आज बैठे बैठे बचपन की याद आ गयी.शायद मानव जीवन का सबसे खूबसूरत समय यही होता है .मनुष्य जीवन के तनावों से परे यह समय मेरी नज़रों में स्वर्णिम कहा जा सकता है .हरदम रोमांच से भरा बचपन रहा है हमारा  बिलकुल वैसे ही जैसे सीमा पर जवानों का रहता है उनको सामना करना होता है पडोसी देश की सेनाओं का तो हमें हरदम सामना करना पड़ता खतरनाक वानर सेनाओं का .होश सँभालते ही बंदरों की फ़ौज मैंने घर में देखी और घर हमारा इतने पुराने समय का बना है कि कहीं कोई रास्ता बंद नहीं था कहीं से भी बन्दर आ जा सकते थे जहाँ चलो ये देखकर चलो कहीं यहीं पर बन्दर बैठा हो .
   एक बार की बात तो ये है कि जब मैं बहुत छोटी थी तो अपनी बुआजी के साथ छज्जे पर लेटी थी तो एक बन्दर मेरे ऊपर से कूद कर गया था .एक बार जब मैं कहीं बाहर से आकर केले खा रही थी तो बन्दर मेरे हाथ से केले छीन कर भाग गया था .यूँ तो हमारा एक प्यारा सा कुत्ता भी था जो बंदरों की परछाई देखकर ही भौंक पड़ता था पर हाल ये था कि  एक बार जब वह बन्दर को आगे बढ़ने से रोक रहा था तो बन्दर ने उसके मुहं पर थप्पड़ तक मार दिया था सन १९८७ में २९ मई की शाम को हमारा प्यारा कुत्ता हमें हमेशा के लिए बंदरों में अकेला छोड़ गया और तब शुरू हुआ बंदरों का खतरनाक दौर जिसमे मम्मी के भी बंदरों ने दो बार काट लिया और वो भी ऐसा वैसा नहीं काफी खून मम्मी का बहा भी .ऐसे खतरनाक दौर में हमारे यहाँ कुछ नए बन्दर और जुड़ गए मैं क्योंकि उनकी शक्ल पहचानती थी इसलिए उनके कुछ नाम भी रख दिए थे एक बन्दर जिसका कान कुछ कटा हुआ था  उसका नाम तो ''कनकटा ''वैसे ही पड़ गया था बहुत खतरनाक बन्दर था वो और उसके साथ थी एक बंदरिया जिसका नाम मैंने 'चांटो  'रख दिया और आप भी यदि उससे मिलते तो उसके खतरनाक होने का अंदाजा लगा सकते थे .जब तक वह रही हम घर में एक कमरे में ही लगभग बंद रहते अभी कुछ महीने पहले ही उसके स्वर्ग सिधारने  का पता चला.
  बस एक ही किस्सा लिखती हूँ क्योंकि यदि मैं बंदरो पर लिखती रही तो बहुत पेज  भर जायेगा बस एक ही किस्सा है जिसमे मैं बंदरों को कुछ परेशान कर पाई थी,किस्सा यूँ है कि मैंने छत से देखा कि बन्दर छत के नीचे इकठ्ठा है और हम नीचे नहीं जा पाएंगे तो मैंने बंदरो के बड़े बड़े पत्थर मारे जो उनके लग भी गए और उसके बाद मैं तेजी से भाग कर कमरे में आयी बस शुक्र ये रहा कि बन्दर जीने से आये अगर वे छत से ही छत से ही आते तो उस दिन मेरी शामत आ गयी थी 
   ऐसे ही किस्सों से भरा है मेरा बचपन ,क्यों सही कहा न सैनिकों जैसा था मेरा बचपन 
                                  शालिनी कौशिक 

20 टिप्‍पणियां:

Er. सत्यम शिवम ने कहा…

i like childhood & its memory..nice post:)

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बंदरों का प्रकोप बहुत तगड़ा होता है, कई छतों पर कब्जा जमा लेते हैं।

Sunil Kumar ने कहा…

बहुत रोचक संस्मरण ....

अमरनाथ 'मधुर' ने कहा…

बचपन के दिन भी क्या दिन थे ........

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

शालिनी जी
बचपन वाकई में बहुत ही खूबसूरत होता है!

रविकर ने कहा…

रोमांच से भरा सैनिकों सा बचपन ||
बधाई शालिनी जी ||

आकाश सिंह ने कहा…

"DIDI ji" NICE POST..
MAIN "PROJECT PLANING & MANAGEMENT" KI TRAINING ME GAYA THA.. SAMAY NHI MILNE KE KARAN MAIN BLOG SE DOOR HOTA JA RAHA HOON.. KRIPYA MARGDARSHAN DEIN..
AAPKA CHOTA BHAI-- AKASH KUMAR

आकाश सिंह ने कहा…

अच्छे सवालों का कोई जवाब क्यों नहीं देता? आपकी राय मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है| जरुर पधारें | www.akashsingh307.blogspot.com

anshumala ने कहा…

मजेदार किस्सा हमरे घर भी बहुत बन्दर आते थे वो तो बाकायदा हमारे रसोई में घुस फ्रिज भी खोलना सीख गये थे और कई बार उसमे से भी समान ले कर भाग जाते थे हमें उसे चाबी से बंद कर रखना पड़ता था |

vidhya ने कहा…

आपको मेरी हार्दिक शुभकामनायें.
बहुत ही सुन्दर पेसकस |

vidhya ने कहा…

बहुत हे सुन्दर , क्या बहत है |

सुनीता शानू ने कहा…

हे भगवान कैसी वानर लीला का वर्णन किया है। पढ़ कर ही डर लगने लगा। बड़ा ही रौचक और काटखाने वाला बंदर वृतांत है...:)

शिखा कौशिक ने कहा…

मज़ा आ गया .आभार

महेश बारमाटे "माही" ने कहा…

आपकी कहानी पढ़ के वह दृश्य आँखों के सामने आ जाता है जो मेरी सबसे पुरानी यादों में से एक है..
मैं करीब १.५ साल का रहा हूँगा, छत की सीढ़ियों में बैठा बिस्कुट खा रहा था... अचानक कोई बन्दर पीछे से आया और मेरा बिस्कुट चुरा के ले गया...
पर मुझे जैसे कोई फर्क ही न पड़ा हो...
मेरी मम्मी बताती हैं कि ऐसा मेरे साथ २-३ बार हुआ जब बन्दर मुझसे मेरा खाना चुरा के ले गए और मैं कुछ भी नहीं कर सका, और रोया भी नहीं...

शालिनी जी!
आपका व शिखा जी का छोटा सा परिचय मैंने अपने एक लेख में दिया है कृपया आप भी बताएं मैं कहाँ तक सही हूँ ?
और शिखा जी को भी बता दीजिए...

Maheshwari kaneri ने कहा…

बचपन तो बचपन ही होता है हर कोई उस में खोजाना चाह्ता..सुन्दर यादें...

Maheshwari kaneri ने कहा…

बचपन तो बचपन ही होता है हर कोई उस में खोजाना चाह्ता..सुन्दर यादें...

Anita ने कहा…

बहुत रोचक और रोमांचक पोस्ट !

Jyoti Mishra ने कहा…

wow amazing read... Loved it.
Good old days :D
Even I had experienced this when I used to visit my nani's place.

Miss those days and my nani too :)

mahendra srivastava ने कहा…

क्या बात है, रोचक अनुभव है आपका

ali ने कहा…

रोमांचक संस्मरण !

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