ग़ज़ल-पहेली

 

सियासत से बचो इसकी ,करीब ऐसे दिन आये ,
छुरी घोपे जिन हाथों से ,उन्हीं को जोड़कर आये ,
महारत इसको हासिल है ,क़त्ल में और खुशामद में ,
संभल जाओ वतन वालो ,ये नेता जब नज़र आये .
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मुशफ़िक़ है मुआ ऐसा ,जल्लाद शरम खाये ,
मुस्कान से ये अपनी ,मुर्दा मुझे कर जाये ,
मौका परस्त ऐसा ,मेराज समझ मुझको ,
मैयत मेरी सजाकर ,मासूम बनकर आये .
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जन्मा ये जिस जमीं पर ,उसपर ही ज़ुल्म ढाये ,
जमहूर के गले लग ,जेबें भी क़तर जाये ,
करता खुशामदें है ,पाने को तख़्त आज ,
पाये जो गद्दी ,गरदनों पे छुरी फेर जाये .
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फितरत से है तकसीमी ,तंगदिल ही नज़र आये ,
तजवीज़ ये बड़ों की ,बिल्कुल न समझ पाये ,
कितने ही वार करले ,कितना ही मुंह छुपाले ,
नेता या आम इंसां ,करनी से बच न पाये .
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तरक्की की सभी मंज़िल ,हमारा मुल्क चढ़ जाये ,
मगर जिसकी ये मेहनत है ,उसे ये देख न पाये ,
ये चाहे बांटना हमको ,हिन्दू और मुसलमाँ में ,
भले इसकी सियासत से ,लहू का दरिया बह जाये .
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मुझे तो ये सियासत का ही ,बस पुतला नज़र आये ,
काबिल औ नाकाबिल में ,नहीं ये भेद कर पाये ,
डरे क्या ''शालिनी'' इससे ,डरी है सारी दुनिया ही ,
कोई भी वीज़ा देने को ,इसे आगे न बढ़ पाये .
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शब्दार्थ:मुशफ़िक़-कृपालु ,मुआ-निगोड़ा ,मेराज़ -सीढ़ी ,जमहूर-जनसमूह ,तकसीमी-बंटवारे की चाह वाला ,

-शालिनी कौशिक
[कौशल ]

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