सोमवार, 27 जनवरी 2014

सच्चाई ये ज़माने की थोड़ी न मुकम्मल ,


ज़िंदगी उस शख्स की सुकूँ से गुज़र सकी ,
औलाद जिसकी दुनिया में काबिल न बन सकी .
.....................................
बेटे रहे हैं साथ वही माँ-बाप के अपने ,
बदकिस्मती से नौकरी जिनकी न लग सकी .
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बेटी करे बढ़कर वही माँ-बाप की खातिर ,
मैके के दम पे सासरे के सिर जो चढ़ सकी .
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भाई करे भाई का अदब उसी घडी में ,
भाई की मदद उसकी गाड़ी पार कर सकी .
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बहन बने भाई की तब ही मददगार ,
अव्वल वो उससे उल्लू अपना सीधा कर सकी .
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बीवी करे है खिदमतें ख्वाहिश ये दिल में रख ,
शौहर की शख्सियत से उसकी साख बन सकी .
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शौहर करे है बीवी का ख्याल सोच ये ,
रखवाई घर की दासी से बेहतर ये कर सकी .
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सच्चाई ये ज़माने की थोड़ी न मुकम्मल ,
तस्वीर का एक रुख ही ''शालिनी ''कह सकी .
....
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

8 टिप्‍पणियां:

SATYA SHEEL AGRAWAL ने कहा…

जिन्दगी की हकीकत बयां की है आपने धन्यवाद

Digvijay Agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना बुधवार 29 जनवरी 2014 को लिंक की जाएगी...............
http://nayi-purani-halchal.blogspot.in
आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

Aziz Jaunpuri ने कहा…

vichar to thik lg rahe hai mgar tasbir teji se badal rahi hai

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (28-01-2014) को "मेरा हर लफ्ज़ मेरे नाम की तस्वीर हो जाए" (चर्चा मंच-1506) पर भी है!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बहुत ही प्रभावी पंक्तियाँ

Kaushal Lal ने कहा…

तल्ख़ सच.... सुन्दर

ज्योति-कलश ने कहा…

कटु सत्य की सरस प्रस्तुति ..

Digamber Naswa ने कहा…

हकीकत का भाव लिए हर शेर ... लाजवाब ..

... पता ही नहीं चला.

बारिश की बूंदे  गिरती लगातार  रोक देती हैं  गति जिंदगी की  और बहा ले जाती हैं  अपने साथ  कभी दर्द  तो  कभी खुशी भी  ...