रविवार, 19 जनवरी 2014

जा हाथ तू दुःख का थाम ले


दुःख
एक एहसास
एक अमिट एहसास
साये की तरह
सदा देता है साथ
प्रिय नहीं
पर संग
प्रियतम की तरह
पुष्प नहीं
किन्तु सुगंध
महकाती
जीवन को
हर पल
प्रति पल
सिहर जाता
देख इसे
हर सुख
वह सुख
जो
छूमंतर
दुःख की
झलक मात्र
पाकर
जो वचन
ख़ुशी का देकर भी
हाथ छुड़ा होता
गायब
दुःख देख बजे
इसकी घंटी
इस पर भी मानव
रोमांचित
सुख
संग चले
वह जीने को
और
तत्पर
दुःख देख
नयन भिगोने को
पहचान
सके
पहचान ले
सच्चे साथी
को जान ले
फिर मानव
कभी न बहकेगा
जा हाथ तू
दुःख का
थाम ले .
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

1 टिप्पणी:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

जहाँ दुख सहला देता है, मन वज्र सा बन जाता है।