मंगलवार, 7 जनवरी 2014

अपनी करनी पार उतरनी -लघु कथा

'नीरू 'सुनती हो मनोज जी ने अपने बेटे को मुकदमा जीतने के बाद घर से निकाल दिया ,सच्ची क्या ऐसा हुआ है ,दिनेश जी की बात सुन नीरू के मुंह से निकला ,पर वे बाप हैं उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था आखिर अब कहाँ जायेगा नरेन् ,अपने परिवार को लेकर ,क्या कह रही हो नीरू ,''तब तो तुमने कुछ नहीं कहा था जब नरेन् ने मनोज जी को उनका बेटा होते हुए घर से निकाल दिया था ,वे भी तो पहले ठोकरे खाते फिरे थे और काफी दुःख सहने के बाद आखिर दिल पर पत्थर रख अदालत की शरण में गए थे .''नीरू को उसके पुराने व्यवहार की याद दिलाते हुए दिनेश जी ने कहा ,सही कह रहे हो जी ,''अपनी करनी पार उतरनी '',नरेन् अपने ही किये अनुसार फल पा गया है अब ,नीरू ने गहरी साँस लेते हुए कहा .
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

4 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बुधवार (08-01-2014) को "दिल का पैगाम " (चर्चा मंच:अंक 1486) पर भी है!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

प्रेम से प्रेम उपजता है, द्वेष से द्वेष।

पूरण खण्डेलवाल ने कहा…

जैसी करनी वैसी भरनी !!

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

beautiful

pls do come at my new post at

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