गुरुवार, 16 जनवरी 2014

कॉंग्रेस:संविधान सर्वोपरि

एक बार फिर कॉंग्रेस ने साबित कर दिया है कि उसके लिए भारतीय संविधान सर्वोपरि है कॉंग्रेस ने पी.एम्.पद के उम्मीदवार का नाम घोषित न करते हुए कहा कि यह कॉंग्रेस की परंपरा नहीं है ,ये बात ही ज़ाहिर करती है कि संविधान द्वारा निश्चित किये गए मानकों को अपनाना ही कॉंग्रेस की परंपरा है और संविधान ने यह अधिकार सांसदों को दिया है इसलिए किसी के भी अधिकारों को न छीनते हुए कॉंग्रेस ने एक बार फिर देश के सामने एक आदर्श पार्टी का अपना स्वरुप कायम रखा है क्योंकि संविधान का इस सम्बन्ध में कहना है -
भारतीय संविधान के अनुच्छेद ७५[१] में कहा गया है -
*अनुच्छेद ७५[१]-प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करेगा और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह पर करेगा .''
यदि इस अनुच्छेद को सर्वमान्य माना जाये तो प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति के विवेक पर निर्भर करती है और राष्ट्रपति की स्थिति संविधान के अनुसार यह है -
-अनुच्छेद ५२ कहता है कि भारत का एक राष्ट्रपति होगा .
-अनुच्छेद ५३ [१] कहता है कि संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होगी और वह उसका प्रयोग इस संविधान के अनुसार या अपने अधीनस्थ अधिकारियों के द्वारा करेगा .
-और अनुच्छेद ७४ कहता है कि [१] राष्ट्रपति को उसके कृत्यों का प्रयोग करने में सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी जिसका प्रधान प्रधानमंत्री होगा और राष्ट्रपति ऐसी सलाह के अनुसार कार्य करेगा .
परन्तु राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद से ऐसी सलाह पर साधारणतया या अन्यथा पुनर्विचार करने की अपेक्षा कर सकेगा और ऐसे पुनर्विचार के पश्चात् दी गयी सलाह के अनुसार कार्य करेगा .
[२] इस प्रश्न की किसी न्यायालय में जाँच नहीं की जायेगी कि क्या मंत्रियों ने राष्ट्रपति को कोई सलाह दी और दी तो क्या दी .
इस प्रकार संविधान के अनुसार राष्ट्रपति नाममात्र का ही प्रधान है वास्तविक प्रधानता मंत्रिपरिषद में ही निहित है और उसका प्रधान प्रधानमंत्री होता है जो लोक सभा में बहुमत प्राप्त दल का नेता होता है और जिसका चयन चुनाव पश्चात् ही किया जा सकता है क्योंकि वास्तविक स्थिति चुनाव पश्चात् ही सबके सामने होती है .ऐसे में किसी भी दल को यह अधिकार नहीं है कि वह बताये कि कौन प्रधानमंत्री होगा जैसा कि भारत के एक प्रमुख दल भारतीय जनता पार्टी ने देश के संविधान को नकारते हुए आगे बढ़कर नरेंद्र मोदी को अपना प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया है जबकि भारत में प्रधानमंत्री पद के लिए कोई चुनाव होता ही नहीं है वह तो लोक सभा में बहुमत प्राप्त दल का नेता होता है और यदि वह राज्य सभा का सदस्य है तो उसके लिए आवश्यक है कि वह लोक सभा के बहुमत का विश्वास प्राप्त करे .
ऐसे में संवैधानिक व्यवस्था को नकारते हुए अपने इरादों को देश पर थोपने का अधिकार किसी भी दल को नहीं है क्योंकि प्रधानमंत्री कौन होगा यह जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों का अधिकार है और उन्हें प्रतिनिधित्व देने वाली जनता का अधिकार है और इसे छीनने की यदि किसी भी दल द्वारा कोशिश की जाती है तो इसे संविधान की अवमानना की श्रेणी में रखा जाना चाहिए क्योंकि संविधान ने भारत को ''सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य ''का दर्जा दिया है जो कि यह तभी है जब जनता अपने प्रतिनिधि चुने और प्रतिनिधि अपना नेता और जो स्थिति भारतीय जनता पार्टी ने नरेंद्र मोदी को अपना अगुवा बनाकर प्रस्तुत की है ऐसे में न तो यह लोकतंत्र ही रह सकता है और न ही गणतंत्र ,ऐसे में ये मात्र दलतंत्र ही कहा जा सकता है क्योंकि दल अपनी पसंद जनता पर थोप रहे हैं और एक यह दल ऐसे कुत्सित कार्य कर अन्य दलों को भी इस कार्य के लिए उकसाकर सारी संवैधानिक व्यवस्था को डगमगाने की कार्यवाही कर रहा है ऐसे में संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन करने में अग्रणी रहने वाली भारतीय जनता पार्टी की मान्यता रद्द होनी चाहिए .
और वही भाजपा ,संविधान से अलग राह लेकर चलने वाली होते हुए इस सम्बन्ध में कहती है कि कॉंग्रेस राहुल को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं करना चाहती क्योंकि वह सच्चाई जानती है .एक संविधान विरोधी दल से ऐसी प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी क्योंकि उसे तो कुछ कहने को चाहिए था यदि कॉंग्रेस राहुल को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर देती तो वह कहती-देखिये इसे कहते हैं वंशवाद ,केवल भारतीय जनता पार्टी में ही एक चाय बेचने वाला आम आदमी प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित हो सकता है आदि ..आखिर ऐसे थोड़े ही गाना बन गया कि
कुछ तो लोग कहेंगे लोगों का काम है कहना .....
फिर भी कोई कुछ भी कहे कॉंग्रेस ने एक बार फिर से दिखा दिया कि उसके लिए संविधान सर्वोपरि है वह किसी भी देश विरोधी ताकत के उकसावे में आकर अपने संविधान के खिलाफ नहीं जायेगी .साथ ही यह भी दिखा दिया है कि कोई भी पार्टी से ऊपर नहीं है भले ही कितनी बड़ी लोकप्रियता का चोला ओढ़कर आ जाये ,भले ही गुब्बारा बन कितना ऊँचा उड़ ले किन्तु कॉंग्रेस ऐसी पार्टी है जहाँ व्यक्ति से ऊपर सिद्धांत हैं और इसके लिए बार बार हाईकमान को अपने अधीनस्थों से परामर्श की भी कोई आवश्यकता नहीं क्योंकि पूर्णतया लोकतान्त्रिक प्रक्रिया से उन्हीं अधीनस्थों ने उन्हें हाईकमान का दर्जा दिया है और उनके दिए गए अधिकारों का पूर्ण रूप से सही इस्तेमाल हाईकमान द्वारा करते हुए देश के संविधान के प्रति निष्ठा रखते हुए एक बार फिर देश की एकमात्र अनुशासित पार्टी का गौरव स्थापित किया गया है .
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

कोई टिप्पणी नहीं:

न भाई ! शादी न लड्डू

  ''शादी करके फंस गया यार ,     अच्छा खासा था कुंवारा .'' भले ही इस गाने को सुनकर हंसी आये किन्तु ये पंक्तियाँ आदमी की उ...