सोमवार, 22 अगस्त 2011

एक बार फिर विचार करे सुप्रीम कोर्ट




एक बार फिर विचार करे सुप्रीम कोर्ट .कहना पड़ रहा है किन्तु क्या कहें ये  ज़रूरी है कि एक बार सुप्रीम कोर्ट अपने आज अमर उजाला के पृष्ठ ११ पर प्रकाशित  निर्णय पर विचार करे निर्णय का शीर्षक है ''जन्मपत्री मान्य ,पर एक कमज़ोर सबूत:सुप्रीम कोर्ट ''इस निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी शख्स की जन्मतिथि साबित करने के लिए उसकी जन्मपत्री को सबूत तौर पर स्वीकार तो  किया   जा   सकता है लेकिन यह ज्यादा विश्वसनीय नहीं होती है .जस्टिस मुकुंदम  शर्मा  और और जस्टिस अनिल आर दवे ने यह फैसला  मद्रास के रजिस्ट्रार जनरल की ओर से निचली अदालत के एक जज एम्.मनिक्कम के खिलाफ दायर याचिका पर सुनाया .जज मनिक्कम १९९३ से अपनी जन्मतिथि २४ नवम्बर १९५० से बदलवाकर १९ मार्च १९४७ करवाने के लिए प्रयासरत हैं .बेंच ने कहा कि इस अदालत की ओर से पूर्व में दिए गए फैसलों के मुताबिक हम दोबारा यह कह रहे हैं कि जन्मपत्री एक कमज़ोर सबूत है ओर इसे पेश करने वाले व्यक्ति के पास इसे साबित करने की बड़ी जिम्मेदारी होती है.''
   यूँ तो  यहाँ तक देखने तक उच्चतम न्यायालय का निर्णय सही प्रतीत होता है किन्तु जैसे कि मैं व्यक्तिगत तौर पर जानती हूँ कि कितने ही लोग अपने बच्चों के विवाह के लिए उनकी जन्मपत्री में हेरफेर कराते हैं ऐसे में जन्मपत्री की विश्वसनीयता संदेह  के घेरे में आ जाती है  और फिर जब कोई मामला पड़ता है पद प्रतिष्ठा  का तो फिर जन्मपत्री की विश्वसनीयता कैसे स्वीकार की जा सकती है. ऐसे में मेरा सुप्रीम कोर्ट से केवल यही कहना है कि जन्मपत्री को सबूतों की श्रेणी से निकाल दिया जाना चाहिए क्योंकि यह  बनाना पंडित वर्ग के हाथ में है और साथ ही इसे बनाने के लिए किसी स्टाम्प पेपर की भी कोई आवश्यकता नहीं पड़ती इसे किसी पंडित से जब चाहे बनवा लिया  जाये और इसके लिए किसी गवाह के हस्ताक्षर भी नहीं चाहिए इसलिए इसका तो अस्तित्व कोर्ट को केवल व्यक्ति के निजी जीवन के क्रिया कलाप के लिए ही छोड़ देना चाहिए .यहाँ यह बात भी गौर करने के लायक है कि जहाँ आज भारत के नगर नगर में लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ उमड़ रहे हैं वहीँ लोगों की निजी जिंदगी बहुत कुछ ऐसे भ्रष्टाचरण अपने में समेटे है कि कहते हुए भी शर्म आती है कि अपने बच्चों के विवाह जैसे पुनीत कार्य की नीव भी झूठ पर रखते नहीं हिचकिचाते.सारी कुंडली ही पलट देते हैं जहाँ विवाह में मंगली  की मंगली  से शादी का विधान उनके ही हित में बताया जाता है कुंडली की नवीन स्थापना करा कर उसमे परिवर्तन कर देते हैं और चाहे बाद में यह परिवर्तन उनके बच्चे के लिए घातक ही क्यों न रहे. हम एक अधिवक्ता है और कितने ही बच्चों के शपथपत्र में उनकी मनमानी आयु तो हम ही निर्धारित  कर देते हैं और इस पर कोई किसी की रोक भी नहीं और इसके लिए किसी सबूत की भी ज़रुरत नहीं फिर एक पंडित के द्वारा बनायीं जन्मपत्री पर सबूत के तौर पर विश्वास करने का कोई मान्य आधार न हम मानते हैं न सुप्रीम कोर्ट को मानना चाहिए.
                         शालिनी कौशिक

20 टिप्‍पणियां:

संगीता पुरी ने कहा…

सही कह रही हैं .. जन्माष्टमी की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ !!

शिखा कौशिक ने कहा…

सटीक बात कही है आपने .आभार

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

उच्चतम न्यायालय का निर्णय सही है। उस का पुनरावलोकन अनावश्यक होगा। अब आप इस बात को लें कि मेरी जन्मपत्रिका मेरे दादा जी ने बनाई थी। तब जब मैं पाँच वर्ष की आयु प्राप्त कर चुका था। तब बालक के पाँच वर्ष का होने के पहले पंडित जन्मपत्रिका नहीं बनाते थै। यदि मैं जन्मपत्रिका अदालत में प्रस्तुत कर यह बयान करूँ कि इसे मेरे दादा जी ने उन की हस्तलिपि में बनाया था। और किसी अन्य दस्तावेज को साथ में प्रस्तुत कर यह साबित करूँ कि जन्मपत्रिका मेरे दादा जी की हस्तलिपि में है। दादा जी का देहान्त हुए आज उन्तीस वर्ष हो चुके हैं तो वैसी परिस्थिति में जन्मपत्रिका के आधार पर मेरी जन्मतिथि को साबित किया जा सकता है। यह साक्ष्य अधिनियम के अनुसार होगा।

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

Wah ...

great article .

बुख़ारी साहब का बयान इस्लाम के खि़लाफ़ है
दिल्ली का बुख़ारी ख़ानदान जामा मस्जिद में नमाज़ पढ़ाता है। नमाज़ अदा करना अच्छी बात है लेकिन नमाज़ सिखाती है ख़ुदा के सामने झुक जाना और लोगों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होना।
पहले सीनियर बुख़ारी और अब उनके सुपुत्र जी ऐसी बातें कहते हैं जिनसे लोग अगर पहले से भी कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हों तो वे आपस में ही सिर टकराने लगें। इस्लाम के मर्कज़ मस्जिद से जुड़े होने के बाद लोग उनकी बात को भी इस्लामी ही समझने लगते हैं जबकि उनकी बात इस्लाम की शिक्षा के सरासर खि़लाफ़ है और ऐसा वह निजी हित के लिए करते हैं। यह पहले से ही हरेक उस आदमी को पता है जो इस्लाम को जानता है।
लोगों को इस्लाम का पता हो तो इस तरह के भटके हुए लोग क़ौम और बिरादराने वतन को गुमराह नहीं कर पाएंगे।
अन्ना एक अच्छी मुहिम लेकर चल रहे हैं और हम उनके साथ हैं। हम चाहते हैं कि परिवर्तन चाहे कितना ही छोटा क्यों न हो लेकिन होना चाहिए।
हम कितनी ही कम देर के लिए क्यों न सही लेकिन मिलकर साथ चलना चाहिए।
हम सबका भला इसी में है और जो लोग इसे होते नहीं देखना चाहते वे न हिंदुओं का भला चाहते हैं और न ही मुसलमानों का।
इस तरह के मौक़ों पर ही यह बात पता चलती है कि धर्म की गद्दी पर वे लोग विराजमान हैं जो हमारे सांसदों की ही तरह भ्रष्ट हैं। आश्रमों के साथ मस्जिद और मदरसों में भी भ्रष्टाचार फैलाकर ये लोग बहुत बड़ा पाप कर रहे हैं।
ये सारे भ्रष्टाचारी एक दूसरे के सगे हैं और एक दूसरे को मदद भी देते हैं।
अहमद बुख़ारी साहब के बयान से यही बात ज़ाहिर होती है।
ब्लॉगर्स मीट वीकली 5 में देखिए आपसी स्नेह और प्यार का माहौल।

देवेश प्रताप ने कहा…

sateek kaha aapne ....

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

अच्छा आलेख है!

Jyoti Mishra ने कहा…

It feels great to read your posts. How u write about those small things which matters a lot in our lives but we all have a propensity to ignore it.

Nice read !!

डॉ0 ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Dr. Zakir Ali 'Rajnish') ने कहा…

विचारणीय मुद्दा।

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लो जी, मैं तो डॉक्‍टर बन गया..
क्‍या साहित्‍यकार आउट ऑफ डेट हो गये हैं ?

anshumala ने कहा…

हा खबर पढ़ी थी अजीब लगा हाल में एक और खबर पढ़ी थी की हिन्दू अपना धर्म बदल कर कुछ दूर के रिश्ते के भाई बहन भी विवाह कर सकते है जबकि कुछ समय पहले पढ़ा था की कोर्ट ने इस्लाम कबूल कर दूसरा विवाह करने वाले हिन्दुओ को मान्यता नहीं देने की बात की थी | कभी कभी वाकई ये फैसले समझ नहीं आते है |

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

आपकी बात से शत-प्रतिशत सहमत हूं.

JHAROKHA ने कहा…

shalini ji
bahut hi sshakt v prabhav -shali dhang se aapne apni baat rakkhi hai jisse main bhi puri tarah se sahmat hun.
vaise bhi aaj-kal dekha jaaye to in janknudliyo ko sach manana bhi galat hi lagta hai.
bahut se aise prman hai jiske dwara log apmi janm -tithi ko ghta badha kar likhte hain to fir yah vishvasniy kahan rah gai.
bahut hi behtreen abhivykti
bahut bahut badhai
poonam

एक स्वतन्त्र नागरिक ने कहा…

सही हैं.सचिन भारत रत्न के लायक नहीं है. इस विषय पर तार्किक एवं दिमाग खोलने वाला आलेख पढ़े. http://sachin-why-bharat-ratna.blogspot.com

S.N SHUKLA ने कहा…

nice post, aabhaar

Maheshwari kaneri ने कहा…

बिल्कुल सही कह रही हैं .. विचारणीय लेख...

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

गहन आलेख

Sawai Singh Rajpurohit ने कहा…

very very informative post shalini ji abhar

रविकर ने कहा…

शुक्रवार --चर्चा मंच :

चर्चा में खर्चा नहीं, घूमो चर्चा - मंच ||
रचना प्यारी आपकी, परखें प्यारे पञ्च ||

ZEAL ने कहा…

नगर निगम का प्रमाणपत्र अधिक विश्वसनीय है।

रविकर ने कहा…

श्रेष्ठ रचनाओं में से एक ||
बधाई ||

आशा जोगळेकर ने कहा…

sahee hai. Janmapatri vishwasaneey nahee rah gaee hai.

''बेटी को इंसाफ -मरने से पहले या मरने के बाद ?

   '' वकील साहब '' कुछ करो ,हम तो लुट  गए ,पैसे-पैसे को मोहताज़ हो गए ,हमारी बेटी को मारकर वो तो बरी हो गए और हम .....तारी...