मंगलवार, 2 अगस्त 2011

मेक-अप से बिगाड़ करती महिलाएं

कवि शायर कह कह कर मर गए-
  ''इस सादगी पे कौन न मर जाये ए-खुदा,''
''न कजरे की धार,न मोतियों के हार,
न कोई किया सिंगार फिर भी कितनी सुन्दर हो,तुम कितनी सुन्दर हो.''
पर क्या करें आज की महिलाओं  के दिमाग का जो बाहरी सुन्दरता  को ही सबसे ज्यादा महत्व देता रहा है और अपने शरीर का नुकसान तो करता ही है साथ ही घर का बजट  भी बिगाड़ता है.लन्दन में किये गए एक सर्वे के मुताबिक ''एक महिला अपने पूरे जीवन में औसतन एक लाख पौंड यानी तकरीबन ७२ लाख रूपए का मेकअप बिल का भुगतान कर देती है  .इसके मुताबिक १६ से ६५ वर्ष तक की उम्र की महिला ४० पौंड यानी लगभग तीन हज़ार रूपए प्रति सप्ताह अपने मेकअप पर खर्च करती हैं .दो हज़ार से अधिक महिलाओं के सर्वे में आधी महिलाओं का कहना था कि'' बिना मेकअप के उनके बॉय  फ्रैंड उन्हें पसंद ही नहीं करते हैं .''
''दो तिहाई का कहना है कि उनके मेकअप किट की कीमत ४० हज़ार रूपए है .''
''ब्रिटेन की महिलाओं के सर्वे में ५६ प्रतिशत महिलाओं का कहना था कि १५०० से २००० रूपए का मस्कारा खरीदने में ज्यादा नहीं सोचती हैं .''
    ये तो चंद आंकड़े हैं जो इस तरह के सर्वे प्रस्तुत करते हैं लेकिन एक भेडचाल  तो हम   आये दिन अपने आस पास ही देखते रहते हैं वो ये कि महिलाएं इन्सान बन कर नहीं बल्कि प्रोडक्ट  बन कर ज्यादा रहती हैं .और बात बात में महंगाई का रोना रोने वाली ये महिलाएं कितना ही महंगा उत्पाद हो खरीदने से झिझकती नही हैं .और जहाँ तक आज की युवतियों की कहें कि उन्हें बॉय फ्रैंड कि वजह से मेकअप करना  पड़ता  है तो ये भी उनकी भूल ही कही जाएगी .वे नहीं जानती सादगी की कीमत-
''इस सादगी पे कौन मर  जाये ए खुदा .''
               और फिर ये तो इन मेकअप की मारी महिलाओं को सोचना  ही होगा कि आज जितनी बीमारियाँ  महिलाओं में फ़ैल रही हैं उसका एक बड़ा कारण इनके मेकअप के सामान हैं .और एक शेर यदि वे ध्यान दें तो शायद इस और कुछ प्रमुखता कम हो सकती है.राम प्रकाश राकेश कहते हैं-
गागर छलका करती सागर नहीं छलकते देखे,
    नकली कांच झलकता अक्स  हीरे नहीं झलकते देखे,
कांटे सदा चुभन ही देते,अक्स  फूल महकते देखे.
  तो फिर क्या सोचना फूल बनने की चाह में वे कांटे क्यों बनी जा रही हैं .कुछ सोचें और इन्सान बने प्रोडक्ट नहीं.
                 शालिनी  kaushik  

11 टिप्‍पणियां:

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

सहमत... इस चक्कर में सीरत की सुन्दरता को भूल गए हैं हम ... बस सूरत पर ही ध्यान है ..

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

प्राकृतिक सौन्दर्य किसी मेक अप का मोहताज़ नहीं।

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

jai ho...

S.N SHUKLA ने कहा…

हिन्दुस्तान में तो बहुत सारे परिवारों की इतनी आमदनी भी नहीं है इसलिए यह किसी दूसरी दुनिया का सर्वे लगता है, फिर भी बहुत सुन्दर प्रस्तुति, आखिर यह मुद्दा तो है ही.

kumar ने कहा…

बहुत ही सुन्दर लिखा है...
एकदम सच....
ना जाने क्यूँ हम वास्तविक सुन्दरता को भूलकर बाहरी आवरण को ही तब्बजो देते हैं....

सादर

anshumala ने कहा…

कई बार देखा है लोगों को महिलाओ के सजने सवरने को बुरा मनाते है पर मुझे इसमे कोई बुराई नहीं लगती है | कहने को ये भी कहा जाता है की दाल रोटी खाओ प्रभु के गुण गाओ तो क्या सारा जीवन बस दाल रोटी खा कर ही गुजर दिया जाये | सुन्दर दिखना एक प्राकृतिक स्वभाव है और इसमे सिर्फ महिलाए शामिल नहीं है पुरुष भी खुद को सजने सवरने के लिए सभी तरह के उत्पाद प्रयोग करते है इसी का नतीजा है की आज बाजार में पुरुषो के लिए कई उत्पाद बाजार में उपलब्ध है | दोनों में से किसी के भी सजने सवरने की अच्छा दिखने की इच्छा में कोई बुराई नहीं है | रही बाद महंगे उत्पाद की तो हर व्यक्ति अपनी जेब के हिसाब से ये समान खरीदता है बाजार में सस्ते महंगे सभी तरह के उत्पाद है जिसकी जो हैसियत होती है वो खरीदता है |

ZEAL ने कहा…

Make-up cannot match the natural beauty .

Sawai Singh Rajpurohit ने कहा…

आदरणीया शालिनी जी
आपकी बात १००% सही है और बहुत अच्छा लगा. इस लेख के लिए हार्दिक बधाई.

S.N SHUKLA ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति , आभार

kshama ने कहा…

Ek maryada ke andar shrungaar bura bhee nahee,lekin jahan shrungaar adhik aur sadagee na ke barabar ho wo bhadkeela lagta hai!

Suman ने कहा…

bahut sunder bilkul sahmat hun....

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