सोमवार, 22 जून 2015

शाईस्तगी को भूल ये सत्ता मद में चूर हैं ....


तानेज़नी पुरजोर है सियासत  की  गलियों में यहाँ ,
ताना -रीरी कर रहे हैं  सियासतदां  बैठे यहाँ .

इख़्तियार मिला इन्हें राज़ करें मुल्क पर ,
ये सदन में बैठकर कर रहे सियाहत ही यहाँ .

तल्खियाँ इनके दिलों की तलफ्फुज में शामिल हो रही ,
तायफा बन गयी है देखो नेतागर्दी अब यहाँ .

बना रसूम ये शबाहत रब की करने चल दिए ,
इज़्तिराब फैला रहे ये बदजुबानी से यहाँ .

शाईस्तगी  को भूल ये सत्ता मद में चूर हैं ,
रफ्ता-रफ्ता नीलाम हशमत मुल्क की करते यहाँ .

जिम्मेवारी ताक पर रख फिरकेबंदी में खेलते ,
इनकी फितरती ख़लिश से ज़ाया फ़राखी यहाँ .

देखकर ये रहनुमाई ताज्जुब करे ''शालिनी''
शास्त्री-गाँधी जी जैसे नेता थे कभी यहाँ .

शब्दार्थ :-तानेजनी -व्यंग्य ,ताना रीरी -साधारण गाना ,नौसीखिए का गाना
तलफ्फुज -उच्चारण ,सियाहत -पर्यटन ,तायफा -नाचने गाने आदि का व्यवसाय करने वाले लोगों का संघटित दल ,रसूम -कानून ,शबाहत -अनुरूपता  ,इज़्तिराब-बैचनी  ,व्याकुलता   ,शाईस्तगी-शिष्ट  तथा सभ्य होना ,हशमत -गौरव  ,ज़ाया -नष्ट  ,फ़राखी -खुशहाली
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

3 टिप्‍पणियां:

Jitendra tayal ने कहा…

बहुत सुन्दर सार्थक और सटीक रचना

Jitendra tayal ने कहा…

बहुत सुन्दर सार्थक और सटीक रचना

Jitendra tayal ने कहा…

बहुत सुन्दर सार्थक और सटीक रचना

संभल जा रे नारी ....

''हैलो शालिनी '' बोल रही है क्या ,सुन किसी लड़की की आवाज़ मैंने बेधड़क कहा कि हाँ मैं ही बोल रही हूँ ,पर आप ,जैसे ही उसने अपन...