रविवार, 28 फ़रवरी 2016

तलवार अपने हाथों से माया को सौंपिये.


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बेबाक बोलना हो बेबाक बोलिये,
पर बोलने से पहले अल्फाज तोलिये.
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दावा-ए-सर कलम का करना है बहुत आसां,
अब हारने पर अपने न कौल तोडिये.
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बारगाह में हो खडे बन सदर लेना तान,
इन ताना-रीरी बातों की न मौज लीजिए.
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पाकीजा खयालात अगर जनता के लिये हैं,
मांगने से पहले हक उनका दीजिए.
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सच्चाई दिखानी है माया को स्मृति,
अपने कहे हुए से पीछे न लौटिये.
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मुश्किल अगर हो काटना, अपने ही हाथों सिर,
तलवार अपने हाथों से माया को सौंपिये.
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अब सर-कलम न मुद्दा रह गया स्मृति,
सरकार की इज्जत की ना नीलामी बोलिये.
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ये "शालिनी" दे रही है, खुल तुमको चुनौती,
कानून के मजाक की ना राह खोलिये.
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शालिनी कौशिक
कौशल

1 टिप्पणी:

जेपी हंस ने कहा…

बहुत अच्छा...शानदार

... पता ही नहीं चला.

बारिश की बूंदे  गिरती लगातार  रोक देती हैं  गति जिंदगी की  और बहा ले जाती हैं  अपने साथ  कभी दर्द  तो  कभी खुशी भी  ...