ऐसा साधु देखा कभी


     बड़े बड़े शहरों में ,महानगरों में जाम की समस्या से सामना होता ही रहता है और इसे बड़े शहरों के लिए एक वरदान के रूप में स्वीकार भी लिया जाता है किन्तु छोटे कस्बे और गावों के लिए जाम को स्वीकार नहीं किया जा सकता इनमे ज़िंदगी आसान ही इसीलिए होती है क्योंकि इनमे किसी भी जगह जाने के लिए समय नहीं गंवाना पड़ता और हर जगह पैदल पहुँच में होती है लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में २८ सितम्बर २०११ को बना शामली जिला इस मामले में अनोखा है .
       दुनिया का एक नियम है वह अपने सभी दुःख अपने तक सीमित रखना चाहती है और सुख बाँट देना चाहती है किन्तु यह जिला सारे सुख तो खुद में समेट लेना चाहता है और अपने सभी दुःख -परेशानियां सबको बाँट देने के लिए तत्पर रहता है .इसका एक मुख्य उदाहरण शामली जिले में जिला जज की कोर्ट स्थापना का मामला है .शामली जिले में कोर्ट की स्थापना के लिए स्थान नहीं है और जिला जज की कोर्ट तो दूर की बात है वहां तो आज तक सिविल जज [जूनियर डिवीज़न ]की कोर्ट भी नहीं है और इन सभी कोर्ट की स्थापना के लिए एक लम्बी अवधि और एक बहुत बड़ा क्षेत्र चाहिए और शामली जिले की ही तहसील कैराना में  ए.डी.जे.कोर्ट तक स्थापित हैं जो कि जिला जज की कोर्ट से मात्र एक पायदान नीचे है .कई बार वहां विशेष अधिकारी द्वारा दौरा किया गया किन्तु शामली में इतना बड़ा दिल नहीं मिला जो जिला जज की कोर्ट स्थापना तक इस कोर्ट की स्वीकृति कैराना के लिए दे सके क्योंकि उसे डर है कि कहीं जिला जज का मन वहीँ लग गया तो शामली फिर एक बार जिला बार की उपाधि से व् जिले स्तर की कोर्ट से वंचित रह जायेगा और इसलिए आज तक जिला स्तर की न्यायालयीन कार्यवाही मुज़फ्फरनगर से कार्यान्वित हो रही हैं .
        तो ये तो रहा शामली का सुख को लेकर नजरिया लेकिन ऐसा नहीं है कि उसमे कुछ भी बाँटने की क्षमता नहीं ,है  मैंने पहले ही कहा है शामली में दुःख बाँटने का अनोखा ज़ज़्बा है और शामली ने ये दिखाया भी है अपनी जाम की समस्या कैराना -कांधला कस्बे में व् ऊँचा गांव,अलदी ,जिधाना,भभीसा आदि में भेजकर और आप सभी देख सकते हैं अगर इस क्षेत्र की कभी भी अब बदकिस्मती से यात्रा करनी पड़ जाये .बदकिस्मती ही कहनी होगी क्योंकि कांधला से कैराना मात्र २० मिनट का रास्ता और अब १ घंटे से कम नहीं लगेगा ऐसे ही कांधला से बुढ़ाना अपनी गाड़ी से मात्र 30 मिनट का रास्ता पर अगर  १ घंटे 30 मिनट से पहले पहुँच जाओ तो मान जाएँ .जाम की समस्या पहले शामली में रहा करती थी पर अब शामली द्वारा इस समस्या को कैराना कांधला की तरफ फेंक दिया गया है जिससे ये क्षेत्र आज पूरी तरह परेशानी में डूब गया है क्योंकि न तो इस क्षेत्र की सड़कें इतने भारी वाहनों का बोझ उठाने में सक्षम हैं और न ही इधर की तरफ इतनी पुलिस की व्यवस्था है जो इनकी आवाजाही को नियंत्रित कर सके .स्थिति ये आ गयी है कि दिन में वाहन किसी तरह जोखिम उठाकर घंटों खड़े रह रहे हैं और रात में आगे वाले ड्राइवर को जगा-जागकर आगे बढ़ रहे हैं और १०-१५ मिनट की जगह २-३ घंटे में घर पहुँच रहे हैं .
         इस तरह शामली जिला महान है जिसने अपना इतना बड़ा ट्रेफिक संसार इन कस्बों व गावों की पुलिस को चालान काटने के लिए ईनाम में दिया है और सामान्य जनता को ''जागते रहो-भागते रहो'' का पुण्य दार्शनिक सन्देश .यह एक ऐसा साधु है जो केवल सुख ग्रहण करता है और दुःख को फूंक मारकर उड़ा देता है और आज की मतलबी दुनिया में और रंग बदलती दुनिया में ऐसे ही साधु संसार का प्रचलन है इसलिए कबीर की ये पंक्तियाँ आज के इन शामली जैसे साधुगण पर सटीक बैठती हैं -
''साधु ऐसा चाहिए ,जैसा सूप सुभाय ,
सार-सार को गहि रहे ,थोथा देई उड़ाय .''

शालिनी कौशिक
   [कौशल ]

टिप्पणियाँ

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (05-12-2017) को दरमाह दे दरबान को जितनी रकम होटल बड़ा; चर्चामंच 2808 पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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