शनिवार, 30 अप्रैल 2011

माँ-मेरी माँ

माँ,मेरी माँ,
   खुद को क्यों न देखती हो?
बच्चे कुछ बन जाये मेरे,
   हरदम ये ही  सोचती हो.

बच्चे खेलें तो तुम खुश हो,
    पढ़ते देखके व्यस्त काम में,
बच्चे सोते तब भी जगकर,
    खोयी हो बस इस ख्याल में,
चैन से बच्चे सोये मेरे इसीलिए तुम जगती हो!
बच्चे कुछ बन जाये मेरे हरदम ये ही सोचती हो.

बच्चे जो फरमाइश करते,
              आगे बढ़ पूरी करती.
अपने खाने से पहले तुम ,
            बच्चों का हो पेट भरती .
बच्चे पर कोई आंच जो आये,आगे बढ़कर झेलती हो!
बच्चे कुछ बन जाएँ मेरे हरदम ये ही सोचती हो.

बच्चे केवल खुद की सोचें,
        तुम बस उनको देखती हो.
तुम्हारे लिए कुछ करें न करें,
       तुम उनका सब करती हो.
अच्छे  जीवन के सपने तुम,बच्चों के लिए बुनती हो!
बच्चे कुछ बन जाये मेरे,हरदम ये ही सोचती हो.
                         

सोमवार, 25 अप्रैल 2011

मानक नए नए

''तुमने सुना नीलम की बेटी नूतन ने ब्रह्मण होते हुए जाट से शादी कर ली ''कमलेश के यह कहते ही सरोज ने हाथ से मुहं छिपाते हुए कहा ''अरे कौन नई बात है उनके तो घर का ढंग ही बिगड़ा हुआ था लड़कों का तो उनके घर पर पहले ही आना-जाना था ''.सुनकर कमलेश ने कहा पर ऐसे को तो बिरादरी से बाहर कर देना चाहिए ;हाँ बहन होना तो ऐसा ही चाहिए पर आज के समाज में ऐसा करता कौन है ,हम तो बस यह कर सकते हैं की हम उससे बोलचाल बंद कर दें और मतलब ख़त्म कर दें.सरोज कमलेश से यह कह ही रही थी कि सरोज के बेटे ने एक शादी का कार्ड आकर माँ के हाथ में थमा दिया .कार्ड हाथ में आते ही सरोज चहक उठी कहने लगी कमलेश सुनो,''कल शाम को तैयार रहना ,इंजीनियर साहब की बेटी कीशादी का कार्ड मिल गया है तुम्हारा भी तो आ गया होगा ,चलना है.''
माँ के मुहं से यह सुनते ही बेटा जो खड़ा हुआ माँ की ख़ुशी देख रहा था बोला-'माँ !इंजीनियर साहब तो वैश्य हैं और उनकी बेटी भी जाट लड़के से शादी कर रही है और आप वहां जाने की आंटी से बाते कर रही हैं और अभी तो आप नीलम आंटी की बेटी के जाट लड़के से शादी करने पर बहिष्कार की व् मतलब ख़त्म करने की बातें कर रही थी .''सुनकर सरोज बोली -''बेटा !तू नहीं समझता,अभी छोटा है न,ये सब बातें गरीबों के लिए की जाती है इंजीनियर साहब बड़े आदमी हैं ,और बड़े लोगों में ये सब चलता ही रहता है ,उनमे कोई बुराई नहीं है और मुझे सिखाने की जरूरत नहीं है ''.यह कहते हुए कमलेश से कल चलने का वायदा ले लिया .

मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

हाल -ए -उत्तर प्रदेश

     उत्तर प्रदेश एक ऐसा प्रदेश जहाँ २००७ तक सरकार के स्थायित्व की बात करें तो कोई भी सरकार ऐसी नहीं रही जिसने पांच वर्ष तक का कार्यकाल पूरा किया हो ऐसे प्रदेश में बसपा जनित सरकार वर्ष २०१२ में अपना पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा कर रही है और जहाँ तक सरकार की कार्य प्रणाली में रुकावटों की बात करें तो एक कमजोर विपक्ष के आलावा यहाँ कोई रूकावट नहीं रही .सरकार एक दल की ही क्या एक व्यक्ति की रही और ऐसे में जिन उपलब्धियों की आशा की जाती है वे नगण्य हैं.
             प्रदेश में बिजली व्यवस्था जो उद्योग धंधों के लिए आवश्यक है लगभग ठप्प पड़ चुकी है .विभिन्न कस्बों में कभी दिन तो कभी रात  में बिजली आपूर्ति होती है और वह भी ८ घंटे से कम.अब ऐसे में उद्योग धंधे चलाने,घरों  आदि के लिए अलग से बिजली व्यवस्था करनी पड़ती है और इसका सारा भर व्यापारी वर्ग व् उपभोक्ता वर्ग पर पड़ता है ऐसे में उद्योग धंधों का भविष्य यहाँ चौपट है साथ ही बाहर के प्रदेशों में रहने वाले यहाँ के नाते रिश्तेदार भी यहाँ नहीं आना चाहते क्योंकि बिन बिजली सब सून की कहावत यहाँ प्रचार में है.
      न्यायिक व्यवस्था की बात करें तो स्थान स्थान पर न्यायालयों की स्थापना की जा रही है किन्तु न्यायालयों में अधिकारियों की नियुक्ति न हो पाने के कारण वकील-मुवक्किल सभी निराश हैं.और न्यायिक व्यवस्था भी ठप्प है.
         शिक्षा व्यवस्था की बात करें तो प्राइवेट स्कूलों  की भरमार है और सरकारी विद्यालयों में प्रवेश कठिन होने के कारण व् दुसरे यहाँ की शिक्षा की गुणवत्ता जनता की नज़र में उज्जवल भविष्य में सहयोगी न होने के कारण प्राइवेट स्कूल चांदी काट रहे हैं.मनमानी फीस यहाँ वसूली जाती है.सरकारी माध्यम से छात्रो को दी जाने वाली छात्रवृत्ति जो सभी विद्यालयों के विद्यार्थियों को मिलती है घोटाले कर प्रबंधकों के पेट में जा रही है.आप देख सकते हैं कि विद्यार्थी इसके लिए आन्दोलन पर भी उतर आये हैं-
साभार-अमर उजाला,दैनिक हिंदुस्तान
   साथ ही प्राइवेट विद्यालय विद्यालय के मानक पूरे न करते हुए भी विद्यालय की मान्यता प्राप्त कर रहे हैं.
          विद्यार्थियों के भविष्य की बात करें तो वह चौपट है क्योंकि सरकारी नौकरियों के लिए लगभग हर वर्ष हर वर्ग के विद्यार्थी से अच्छी फीस वसूली जा रही है और भ्रष्टाचार इतनी ऊंचाई पर है कि चपरासी तक की नौकरी के लिए लाखों रूपये देकर नौकरी हासिल की जा रही है क्योंकि हर लगने वाला जानता है कि आज एक खर्च कर हम कल को चार कमाएंगे.
     अब यदि सुरक्षा व्यवस्था की बात करें तो बात न ही की जाये तो बेहतर होगा क्योंकि समाचार पत्र ही इसकी पोल अच्छी तरह खोल रहे हैं.रोज दिन दहाड़े डकैती डाली जा रही हैं और अपराधी पुलिस की गिरफ्त से बाहर हैं.जनता के दबाव में यदि किसी अपराधी को पकड़ भी लिया जाता है तो वह पहले ही कई अपराधों का वांछित होता है और पहले ही पुलिस की सूची में होता है जिसे जनता के दबाव में अपराध खोलने के नाम पर प्रस्तुत कर दिया जाता है.लोगों को अपना सामान्य कार्य करना कठिन हो गया है.बहुत सी बार किसी कारण वश पूरे परिवार को घर से बाहर रहना या एक दो दिन के लिए जाना होता हैतो कांधला कसबे का ये हाल है कि जिस घर पर ताला लगा हो चाहे एक रात के लिए लगा हो वहां चोरी हो रही है.अभी हाल में ही तीन घरों में चोरी हुई ये तीन घर -एक व्यापारी का था जिसे ब्लड कैंसर के कारन खून बदलवाने जाना पड़ा एक दो रात ही घर से बहार रहा और चोर मकान साफ कर गए,एक प्रवक्ता के घर में जबकि गली में आस-पास भी काफी मकान थे -मोटे बड़े ताले लगे थे कसबे का सुरक्षित स्थल होने पर भी चोरों के हाथ अवसर आ गया,एक प्राइवेट स्कूल की शिक्षिका जो की केवल एक रात शादी में गयी थी चोरी की घटना की शिकार हुई.और ये सब तब जबकि रात को चौकीदार टहलते हैं.और ये घटनाएँ खुलेंगी भी नहीं क्योंकि ये चोरी जिन घरों में हुई हैं उनकी ओर से पुलिस पर कोई दबाव भी नहीं डाला जा सकता.शामली कसबे में आये दिन घरों तक में बैठे महिलाओं की सोने की चेन लुट रही हैं सड़कों का तो कहना ही क्या सारा मुज़फ्फरनगर त्रस्त है.बुढाना कसबे का हाल ये देखिये-
साभार-अमर उजाला 


ये व्यापारी जो चित्र में दिखाई दे रहा है इसका  पुत्र व् उसका परिवार रात को घर बाहर से बंद कर पास के ही मंदिर में कीर्तन में गए ओर चोरों ने इस ८० वर्षीय वृद्ध के साथ मारपीट की ओर इसके यहाँ चोरी की घटना घटित हो गयी.
इस तरह लगभग हर मोर्चे पर विफल उत्तर प्रदेश सरकार को देखकर तो यही लगता है की एक दल की सरकार हो या पञ्च वर्ष तक जमने वाली सरकार राजनीतिक मजबूरी जनता की मजबूरी होती है ओर लोकतंत्र होने पर भी जनता को ही परेशानी झेलनी होती है.
    सबसे दुखद समाचार ये है की बुढाना डकैती में घायल ८० वर्षीय श्री ताराचंद जी का कल ८ दिन के कोमा में रहने के बाद देहांत हो गया और इस तरह सरकारी विफलता एक और जान को निगल गयी.
                                            
                

बुधवार, 13 अप्रैल 2011

हिन्दू मुस्लिम एकता की मिसाल-फ़तेह खां का मकबरा

ऐतिहासिक दृष्टिकोण से मुज़फ्फरनगर जिले का इतिहास काफी उल्लेखनीय है एक ओर जहाँ मुज़फ्फरनगर में किरण ''कर्ण नगरी ''के नाम से विख्यात है वहीँ कांधला''कर्ण दल'' का अपभ्रंश है.हिन्दू मुस्लिम एकता के लिए मुज़फ्फरनगर जिला मिसाल है.शामली तहसील जो आज जिला बनने  की ओर  अग्रसर है इतिहास के पन्नो में अपनी एक अलग पहचान रखता है.देखने वाले इसे पुरानी दिल्ली की संज्ञा देते हैं वहीँ धार्मिक रूप से भी इसका अपना एक विशेष स्थान है.
     शामली कस्बे के बाबरी थाना क्षेत्र के गाँव बंतिखेरा  में   हिन्दू मुस्लिम एकता का प्रतीक ''शेरशाह सूरी के सिपहसालार फ़तेह खां का मकबरा है.''
      

बंतिखेरा   एक  ऐसा गाँव जो बन काटकर बसाया गया और इसलिए बंतिखेरा  नाम से प्रसिद्द हुआ.करीब ३०० साल पुराने इस गाँव में एक  प्राचीन गुम्बद हैजिसके बारे में यह कहा जाता है कि ये गुम्बद बादशाह शेरशाह सूरी के सिपहसालार फ़तेह खां का मकबरा है जिसकी यहाँ आकर मृत्यु हो गयी थी और बादशाह द्वारा उसकी याद में यह मकबरा बनवाया  गया था.
        जहाँ तक एतिहासिक तथ्यों की बात है तो शेरशाह सूरी का शासन सन १५४० इसवी से १५४५ इसवी तक रहने का अनुमान है तो ऐसा माना  जाता है कि यह गुम्बद भी इसी बीच में बनवाया गया होगा..गाँव के बुजुर्गों का मानना है कि आज़ादी से पूर्व दोनों समुदायों के लोग मन्नत मांगकर चढ़ावा  चढाते थे .प्रतिदिन शाम को वहां दिया जलाते थे.सन १९४७ में हिंदुस्तान पाकिस्तान का बंटवारा होने के साथ ही इसमें फर्क आया .बताया जाता है कि कुछ असामाजिक तत्वों द्वारा गुम्बद में स्थित कब्र को बिस्मार कर दिया गया लेकिन फिर  भी यहाँ तीज त्यौहार  को लोग  आते  रहते  हैं .
             करीब २ दशक पूर्व पुरातत्व विभाग ने  इस गुम्बद को अपने कब्ज़े में लिया और इस पर ताला  डाल  दिया.यहाँ चपरासी भी नियुक्त  किया गया जिसकी लगभग 15 वर्ष  पूर्व मृत्यु हो गयी.गुम्बद बदहाली  के कगार  पर है और आस  पास  की खाली पड़ी   भूमि पर ग्रामीणों  ने कब्ज़ा कर लिया है और पुरातत्व विभाग पूरी  तरह  अंजान   बना   हुआ है.इस तरह  मुगलकालीन    संस्कृति   का एक  अंश   विलुप्तता    की ओर  अग्रसर     है.

मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

ये सच है.

ये सच है जो कल के हिंदुस्तान के मुख्य पृष्ठ पर सरकारी तंत्र के भ्रष्टाचार के खिलाफ सफल लड़ाई लड़ने वाले सर्व श्री किसान बाबूराव हजारे[अन्ना हजारे]के मुख से प्रकट हुआ.मैं पहले भी कई बार कह चुकी हूँ और अब भी कह रही हूँ की नेताओं,प्रशासन आदि को भ्रष्ट बनाने वाली जनता ही है जो काका हाथरसी के इस वक्तव्य को सर माथे पर रखती है-
''क्यों घबराता है नर तू रिश्वत लेकर,
रिश्वत पकड़ी जाये छूट जा रिश्वत देकर.''
   वह जनता जो आज अन्ना हजारे जी को सर पर बैठा रही है वही उनके चुनाव में खड़े होते ही पलट जायेगी,और संभव है की उनकी जमानत ही जब्त हो जाये क्योंकि सिद्धांतवादी अन्ना शायद जनता की वह इच्छा पूरी नहीं करेंगे जो आज के जीतने वाले नेता गण कर रहे हैं.पंचायत चुनाव से लेकर लोकसभा चुनाव तक सभी में पैसा,शराब का ही बोलबाला हो चूका है.और ऐसे भी नेता हैं जो मात्र लाठी के दम पर ही चुनाव लड़ते और जीतते  हैं.हर जगह सुसंस्कृत,सभ्य लोगों का राजनीति से मन हट चुका है.क्योंकि उछ्रिंखिल ,असभ्य लोगों का इसमें जमावड़ा बढ़ता ही जा रहा है जिनके लिए किसी के लिए भी अपशब्दों का प्रयोग आम है और ये उनका अपमान तक करने से बाज नहीं आते.सभी जानते हैं और इससे आगे शायद जानना भी नहीं चाहते की आज की राजनीति में न तो कोई अच्छा टिक सकता है और न ही चुना जा सकता है क्योंकि सभी को रिश्वत देने और लेने की लत पद चुकी है.अब तो वह पागल कहलाता है जो ईमानदारी से काम करता है या करवाना चाहता है.इस पर तो मुझे प्रख्यात शायर ''बशीर बद्र ''की ये पंक्तियाँ याद आ रही हैं-
''कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मजाज का शहर है जरा फासले से मिला करो.''
  

मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

जानते भी हो दिल क्या होता है-----शाहिद

सैफ़ी  सिरोजी की एक ग़ज़ल की पंक्तियाँ कहती हैं-
"उम्र भर करता रहा हर शख्स पर मैं तबसरे,
झांक कर अपने गिरेबाँ में कभी देखा नहीं."
       मुझे इस वक़्त ये पंक्तियाँ पूर्ण रूप से पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के    कप्तान ''शाहिद आफरीदी ''पर अक्षरश :   खरी उतरती प्रतीत हो रही हैं क्योंकि एक ऐसे देश के नागरिक होते हुए ,जिसने कई बार एक ऐसे देश पर आक्रमण किये जिसने हमेशा उसे छोटे भाई का दर्जा दिया और उसकी गुस्ताखियों को नजरंदाज करते हुए उसे सुधरने का अवसर दिया है,वे तंग दिल का ठीकरा उसी बड़े दिल वाले भारत पर ठोक रहे हैं दिल जैसी शै से शायद वे अनजान हैं क्योंकि दिल जिस उदारता का परिचायक है वह उदारता पाकिस्तानी खिलाडियों के व्यवहार में कहीं से लेकर कहीं तक भी दृष्टिगोचर नहीं होती .भारत वह देश है जिसका रिकोर्ड है कि उसने आज तक भी किसी देश पर आक्रमण नहीं किया है वह हमेशा से दुश्मनों से अपने बचाव के   लिए ही हथियार जुटाता रहा है क्योंकि भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता है और इस सोने की चिड़िया को लूटने विश्व भर के यहाँ जुटे रहे और यहाँ की धरती को रक्त रंजित करते रहे ऐसे देश ने हमेशा दोस्तों का साथ दिया है और दुश्मनों का मुहं तोडा है.ऐसे में भारतीयों को तंगदिल कहना शाहिद के   दिमागी तनाव का ही परिचायक है.शाहिद स्वयं कितने दिलदार हैं इसका पता तो सचिन के   शतक को लेकर उनके कथन से ही जाहिर है हालाँकि बाद में वे उस कथन से अपना पल्ला झाड़ चुके हैं किन्तु जो बात मुहं से निकल चुकी है उसे वे चाह कर भी वापस नहीं   ले सकते .मीडिया के   बारे में वे कुछ न ही बोलें तो बेहतर है क्योंकि ये मीडिया ही है जो गलत को गलत और सही को सही का आईना   दिखाता है और पाकिस्तान में क्रिकेट खिलाडियों के  हालिया हाल से भारतीय जनता को रू-ब-रू करता है.यह  पाकिस्तानियों की  दिलदारी ही है जो भारत पाकिस्तान के मैच को जोश व् जूनून से देखने का माद्दा  तैयार करती है और यह भारतीयों की तंगदिली ही है जो किसी के भी कुछ कहने को सिरे से नकार देती है और अपनी दोस्ती में आड़े नहीं आने देती-
"अरफान ज़माने की आदत है बुरा कहना,
है अपनी तबियत के नासाज़ नहीं होती.''

शनिवार, 2 अप्रैल 2011

प्यार है पवित्र पुंज ,प्यार पुण्य धाम है

प्यार है पवित्र पुंज ,प्यार पुण्य धाम है.
 पुण्य धाम जिसमे कि राधिका है श्याम  है .
श्याम की मुरलिया की हर गूँज प्यार है.
प्यार कर्म प्यार धर्म प्यार प्रभु नाम है."
   एक तरफ प्यार को "देवल आशीष"की उपरोक्त पंक्तियों से विभूषित किया जाता है तो एक तरफ प्यार को "बेकार बेदाम की चीज़ है"जैसे शब्दों से बदनाम किया जाता है.कोई कहता है जिसने जीवन में प्यार नहीं किया उसने क्या किया?प्यार के कई आयाम हैं जिसकी परतों में कई अंतर कथाएं    छिपी हैं .प्रेम विषयक दो विरोधी मान्यताएं हैं-एक मान्यता के अनुसार यह व्यर्थ चीज़ है तो एक के अनुसार यह  जीवन में सब कुछ है .पहली मान्यता को यदि देखा जाये तो वह भौतिकवाद  से जुडी है .जमाना कहता है कि लोग प्यार की अपेक्षा दौलत को अधिक महत्व देते हैं लेकिन यदि कुछ नए शोधों पर ध्यान दें तो प्यार का जीवन में स्थान केवल आकर्षण तक ही सीमित  नहीं है वरन प्यार का जीवन में कई द्रष्टिकोण  से महत्व है .न्यू   हेम्पशायर विश्व विध्यालय के प्रोफ़ेसर एडवर्ड लीमे और उनके येल विश्व विध्यालय के साथियों ने शोध में पाया कि जिन लोगों को दुनिया में बहुत प्यार और स्वीकृति मिलती है वे भौतिक वस्तओं को कम तरजीह देते हैं.वे लोग जिन्हें ऐसा लगता है कि उन्हें लोग ज्यादा प्यार नहीं करते और अपना नहीं मानते ,वे भौतिक चीजों से ज्यादा जुड़े होते हैं .शोध कर्ताओं ने १८५ लोगों पर शोध किया और पाया कि दूसरी तरह के लोग ,पहली तरह के लोगों के मुकाबले वस्तओं को पांच गुना महत्व दे रहे थे .इसका सीधा साधा अर्थ यह है कि जिन्हें जीवन में प्रेम और जुडाव की कमी ज्यादा महसूस होती है वे चीज़ों के प्रति ज्यादा लगाव महसूस करते हैं या उनमे असुरक्षा की भावना होती है जिसे वे भौतिक उपलब्धियों के जरिये पूरा करने की कोशिश करते हैं .जाहिर है कि जिसको यह लगता है कि आसपास के लोग उसे प्यार नहीं करते या उसे अपना नहीं मानते वह असुरक्षित महसूस करने लगता है और तब उसे लगेगा कि दुनियावी चीज़ें ही उसे सहारा और सुरक्षा दे सकेंगी.
               अमेरिका के स्टेनफोर्ड विश्व विध्यालय के एक हालिया शोध में पता चला है कि प्रेम के कारन उपजे दर्दे दिल का इलाज भी प्रेम की अनुभूति से ही होता है .शोधकर्ताओं ने कुछ छात्रों को हल्का शारीरिक दर्द पहुंचाते हुए उनकी प्रतिक्रियाएं रिकोर्ड   की .गौरतलब है कि अधिकांश छात्र प्रेम की शुरूआती अवस्था में थे ,और पाया कि छात्रों के सामने उनके प्रेमी या प्रेमिका की तस्वीर रखने पर उनका ध्यान मामूली सा बँटा .शोध में सभी छात्रों के मस्तिष्क का स्कैन  किया गया  था .शोध में शामिल डॉ.जेरेड यंगर का कहना है "कि प्रेम एक दर्द निवारक का भी काम करता है."
      असलम कोल असली ने कहा है-
"कभी इश्क करो और फिर देखो,
इस आग में जलते रहने से
कभी दिल पर आंच नहीं आती
कभी रंग ख़राब नहीं होता."
   प्रेम के बारे में कवि, दार्शनिक,प्रेमीजन आदि ऐसे विचार व्यक्त करते ही रहे हैं किन्तु प्रेम न  सिर्फ कलाकारों,लेखकों और दार्शनिकों को प्रेरित करता है अपितु आम इंसानों की रोजमर्रा की जिन्दगी में आने वाली परेशानियों से और तनावों से उबरने में भी मदद करता है .वाशिंगटन पोस्ट ने एक शोध के बारे में बताते हुए कहा कि यदि हमारा करीबी भावनात्मक संबल या सलाह दे तो नकारात्मक विचारों या तनाव  से आसानी से  उबरा जा सकता है .शोध के दौरान उन्होंने पाया कि एक खुशहाल दंपत्ति का ब्लड  प्रेशर अविवाहित लोगों के मुकाबले कम था .हालाँकि बुरे वैवाहिक संबंधों से गुजर रही जोड़ी का ब्लड प्रेशर सबसे ज्यादा पाया गया.प्रेम सम्बन्ध जिन्दगी को मायने और अर्थ देते हैं .एरोन ने पाया कि "प्यार का एहसास मस्तिष्क के डोपेमायीं रिवार्ड सिस्टम को सक्रिय कर देता है  .ख़ुशी और प्रेरणा जैसी भावनाओं के लिए दिमाग का यही हिस्सा जिम्मेदार है.
       प्रेम के क्षेत्र में बाधा बनकर आज "एड्स "भी उपस्थित हुआ है  किन्तु इस बीमारी के लिए भी कहा जाता है  कि "एड्स के रोगी को नफरत नहीं प्यार दीजिये,इससे उसकी उम्र बढ़ेगी रोग घटेगा."इस बात की पुष्टि की है  स्वित्ज़रलैंड स्थित वेसल इन्स्तितुत  फार क्लिनिकल अपिदेमोलोग्य ने.रिपोर्ट के अनुसार अगर एड्स प्रभावित रोगी प्यार पाए ,रोमांस करे तो उसकी जीवन अवधि बढ़ जाती है  .शोधकर्ता डॉ.हेनर सी.बचर ने अपने प्रयोग को एक बड़े समूह पर किया .हैरान करते परिणाम यह थे कि जो रोगी घबराये हुए थे और जीने की आस छोड़ चुके थे उनमे न केवल जीने की लालसा बढ़ी बल्कि वे नई स्फूर्ति से भर गए.शोधकर्ता का मानना  है  कि उनके परिक्षण इस बात की पुष्टि करते हैं कि "प्यार और स्वास्थ्य साथसाथ चलता है ."
  इस प्रकार देखा जाये तो प्रेम ही जीवन  ऊर्जा का शिखर है  जिसने प्रेम को जान लिया उसने सब जान लिया,जो प्रेम से वंचित रहा वह सबसे वंचित रह गया .प्रेम का अर्थ है  समर्पण की दशा जहाँ दो मिटते है  और एक बचता है  .जिसे अपने लक्ष्य से,सहस से ,उद्देश्य से जरा भी प्रेम है  वह स्वयं को मिटा देता है  .यही सच्चा प्रेम है  रही और मंजिल एक हो जाते हैं .जीवन आनंद की सच्ची रह वहीँ से निकलती है  .कबीर ने भी कहा है -
"प्रेम न हाट बिकाय"
     अर्थात प्रेम किसी बाज़ार में नहीं बिकता.प्यार के मायने बदल सकते हैं किन्तु सच्चे प्रेम का स्वरुप कभी नहीं बदल सकता.सच्चा प्रेम वह महक है  जो हर दिशा को महकाती है  .सच्चे प्रेम को तलवार की धार कहा जाता है  और हर किसी के बस का इस पर चलना नहीं होता.इसलिए सच्चा प्रेम कम ही दिखाई देता है .वर्तमान युवा पीढ़ी प्रेम की और अग्रसर  है  किन्तु उसके लिए सच्चे  प्रेम का स्वरुप कुछ अलग है  .होटल मैनजमेंट   कर रही पारुल के अनुसार-"प्रेम को मैं तलवार की धार नहीं मानती हूँ  पर हंसी  खेल  भी नहीं मानती हूँ .मेरा  मानना है  कि ये  एक देवी  एहसास  है  जिसे सिर्फ  महसूस  किया जा  सकता है  ,व्यक्त  नहीं किया जा  सकता है ."
पल्लवी  कहती   हैं-"प्रेम करना  आसान  लग  सकता है  पर यह निभाना  उतना  ही मुश्किल  है .ये  एक ऐसा  करार  है   जो कभी ख़त्म  नहीं होता है  ."
 ये  तो प्रेम का एक रूप  है  .प्रेम तो कई    स्वरूपों  में ढला  है .देश  प्रेम,प्रभु  प्रेम.मानव  प्रेम,मात्र -प्रेम पितृ  प्रेम,पुत्र  प्रेम आदि  इसके  अनेको  स्वरुप हैं.प्रभु  ईसा  मसीह  ने सभी  प्राणियों , अपने पड़ोसियों  आदि  से प्रेम का सन्देश  दिया .गुरु  नानक  ने प्रेम करने  वालो  को सारी  दुनिया  में बिखर  जाने   का आशीर्वाद  दिया  ताकि  वे प्यार को सारेजहाँ  में फैला  सकें .सभी  धर्मो  के गुरु  जन प्राणी  मात्र   को प्रेम का सन्देश  देते  हैं और आपस  में मिलजुल  कर रहने  की शिक्षा  देते  हैं.उनका  भी मानना है  कि प्रेम वह है  जो अपने प्रिय  के हित  में सर्वस्व  त्याग  करने  को तैयार  रहता  है  .प्यार त्याग  करता  है  बलिदान  नहीं मांगता .प्रेम की ही महिमा  को हमारे  कविजनो  ने  अलग अलग तरह  से वर्णित  किया है    -
देश -प्रेम
"जो भरा  नहीं  भावों  से बहती  जिसमे  रसधार  नहीं ,
वह ह्रदय  नहीं है  पत्थर  है  जिसमे  स्वदेश  का प्यार  नहीं ."
मानव  प्रेम-
"यही  प्रवर्ति  है  जो आप  आप  ही चारे  ,
मनुष्य  है  वही  जो मनुष्य  के लिए मरे."
प्रेमी जनों  का प्यार यहाँ देखिये-
"जब जब कृष्ण की बंसी बाजी  निकली राधा सज के 
जन अजान का ध्यान भुला के लोक लाज को तज के ,
वन वन डोली जनक दुलारी पहन के प्रेम की माला,
दर्शन जल की प्यासी मीरा पी गयी विष का प्याला."
मात्र पितृ भक्ति कहे या मात्र पितृ प्रेम -इसके वशीभूत हो श्रवण कुमार माता पिता को कंधे पर बिठाकर तीर्थ यात्रा करते हैं,पितृ भक्ति में परशुराम माता का गला काट देते हैं,मात्र भक्ति में श्री गणेश भगवान भोलेनाथ से अपना मस्तक कटवा देते हैं और पुत्र प्रेम में माँ पार्वती भयंकर रूप धारण करती हैं और गणेश को भोलेनाथ से पुनर-जीवन दिलवाकर उन्हें देवताओं में प्रथम पूज्य के स्थान पर विराजमान कराती हैं.
  सच पूछा जाये तो दुनिया की समस्त समस्याओं का हल प्रेम में है.अनादर,उपेक्षा,द्वेष,ईर्षा और अंधी स्पर्धा की मारी हुई इस दुनिया में हर व्यक्ति हर प्रसंग एक बिदके हुए घोड़े की तरह हमारा वजूद कुचलने को उद्धत घूम  रहा हो तब आहत अहम् पर यह    कितना बड़ा मरहम है की कोई तो है जो मेरी कद्र करता है,कोई तो है जिसकी आँखों में मुझे देख चमक पैदा होती है .मुझे देखकर जो मेरी भलमन साहत पर प्रश्न chinh    नहीं लगाता.
  इस तरह यदि हम विचार करें तो प्रेम का जीवन में वास्तविक महत्व जीवन अस्तित्व से है और अस्तित्व ऐसा की -
"हज़ार बर्फ गिरें लाख आंधियां चलें
वो फूल खिलकर रहेंगे जो खिलने  वाले हैं,"
प्यार से बढ़कर कुछ नहीं और सच्चा  प्रेम वही  है जो रोते को हंसी दे ,गिरते को उठने की ताक़त दे
मरणासन्न व्यक्ति में   जान फूँक दे.सच्चे प्रेम की महक  yah   संसार महसूस करता है और सच्चे  प्रेम के आगे ये दुनिया झुकती है.सच्चा प्रेम  समस्याएँ मिटाता है चाहे दिलों की हों या देशों की.बलिउद्दी देवबंदी ने कह है-
"फैसले सब के होते   नहीं तलवार से ,
प्यार से भी मसलों का हल   निकलता है." 
       शालिनी कौशिक
http://shalinikaushik2.blogspot.com/


भारतीय ब्लॉग लेखक मंच की महाभारत प्रथम में मेरा यह आलेख संयुक्त रूप  से प्रथम घोषित किया गया है और ब्लॉग मंच द्वारा निम्न प्रमाण पत्र प्रदान किया गया है-
मैं भारतीय ब्लॉग लेखक मंच को अपने ब्लॉग के माध्यम से हार्दिक आभार व्यक्त करती हूँ. 

''बेटी को इंसाफ -मरने से पहले या मरने के बाद ?

   '' वकील साहब '' कुछ करो ,हम तो लुट  गए ,पैसे-पैसे को मोहताज़ हो गए ,हमारी बेटी को मारकर वो तो बरी हो गए और हम .....तारी...