सोमवार, 5 सितंबर 2011

शिक्षक दिवस की बधाइयाँ






शिक्षक दिवस एक ऐसा दिवस जिसकी नीव ही हमारे दूसरे राष्ट्रपति श्रद्धेय पुरुष डॉ.राधा कृष्णन जी के जनम दिवस पर पड़ी .डॉ.राधा कृष्णन जी को श्रृद्धा सुमन अर्पित करने हेतु ही देश प्रतिवर्ष ५ सितम्बर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाता है .सर्वप्रथम डॉ.राधाकृष्णन जी को जन्मदिन पर मैं उन्हें ह्रदय से नमन करती हूँ.
.मैं जब बी.ए. में थी तो आगे के लिए करियर चुनने को मुझसे जब कहा एम्.ए.संस्कृत व् आगे पीएच डी.कर शिक्षण क्षेत्र को अपनाने का सुझाव दिया गया तो मैंने साफ इंकार कर दिया क्योंकि मैं अपने में वह योग्यता नहीं देख रही थी जो एक शिक्षक में होती है मेरी मम्मी जिन्होंने हमें हमारे विद्यालय की अपेक्षा उत्तम शैक्षिक वातावरण घर में ही दिया वे शिक्षक बनने के योग्य होने के बावजूद घर के  कामों में ऐसी रमी की उसमे ही उलझ कर रह गयी और कितने ही छात्र छात्राएं जो उनसे स्तरीय शिक्षा प्राप्त कर सकते थे वंचित रह गए..परिवार को प्रथम पाठशाला  और माता को प्रथम शिक्षिका कहा जाता है इसलिए मैंने सबसे पहले  अपनी शिक्षिका अपनी मम्मी को ही इस अवसर पर याद किया है ये उनका ही प्रभाव है कि हमें कभी ट्यूशन के ज़रुरत नहीं पड़ी जबकि हमारे साथ की अन्य छात्राएं लगभग २-३ विषयों के ट्यूशन सारे साल पढ़ती थी और आजकल की आधुनिक मम्मी जब ये कहती हैं कि हमारे बच्चे हमसे नहीं  पढ़ते तब हमारा मन ये मानने को तैयार ही नहीं होता क्योंकि हमारी मम्मी ने मारने की जगह मारकर और समझाने की जगह समझाकर हमें उत्तम शिक्षा प्रदान की है . 
आज शिक्षक विवादों के घेरे में हैं छात्र नेताओं से परेशां चौधरी चरण सिंह विश्व विद्यालय  के कुलपति महोदय त्याग पत्र दे रहे हैं .विश्वविद्यालय में पी.ए.सी.की नियुक्ति चाह रहे हैं और भी जगह शिक्षक गुटबाजी कर रहे हैं छात्रों को विद्यालय में अपने गुट में जोड़कर प्रधानाध्यापक पर दबाव डाल रहे हैं .इसके साथ ही विद्यालय में छात्रों पर दबाव डाला जाता है की वे सम्बंधित विषय के अध्यापक का ट्यूशन लगायें और छात्र अधिक नंबरों के फेर में ऐसा करने को मजबूर हैं हमें ये सब शिक्षक दिवस पर कहना अच्छा नहीं लग रहा है किन्तु ह्रदय की व्यथा तभी सामने आती है जब उसी विषय पर बात की जाती है जिसने ह्रदय को पीड़ित किया है .जहाँ एक ओर हमने अपने विद्यालय में शिक्षिकाओं का पक्षपात पूर्ण रवैया देखा वहीँ हमारी एक शिक्षिका ने वास्तव में अपने आदर्श को हमारे ह्रदय में स्थापित किया और ये बताया कि वास्तव में शिक्षक कैसे होने चाहिए ?
बचपन से लेकर अभी तक के जीवन में हमें अपनी श्रीमती सुरेश बाला गुप्ता दीदी  [यही  कहती थी उस वक़्त छात्राएं अपनी मैडम को] ने हमारा एक अच्छी शिक्षिका के इतरह मार्गदर्शन किया और एक अच्छे हमदर्द की भांति साथ निभाया .वे हमसे गलतियाँ  होने पर मारती भी थी और अच्छा काम करने पर खुलकर सराहना भी करती थी .उनकी ये बात हम बच्चों में बहुत सराही गयी थी कि विद्यालय में एक सुन्दर कुशल  न्रित्यांगना छात्रा को उन्होंने हमारे कार्यक्रम में से केवल इसलिए अलग कर दिया था कि वह विध्यालय के और बहुत से कार्यक्रमों में भाग ले रही थी उनका  कहना था कि इसे तो सब ले लेंगे अपने कार्यक्रम में मैं तो अपने इन्ही बच्चों को लूंगी 
जब एल एल .बी के बाद पी.सी.एस.[जे] के लिए मुझे उर्दू सीखने की आवशयकता थी तब उन्होंने विद्यालय में नव नियुक्त होकर आये उर्दू अध्यापक से हमारी पहचान करायी और उनसे हमें उर्दू सिखाने का आग्रह किया साथ ही मैं आभार व्यक्त करती हूँ उर्दू अध्यापक श्री मुनव्वर हुसैन जी का जिन्होंने हमसे कोई जानकारी न होते हुए भी हमें उर्दू सिखाई और हमसे इसका कोई पारिश्रमिक भी नहीं लिया .
         शिक्षक दिवस पर मैं अपने जीवन के इन सभी श्रेष्ठ अध्यापकों को दिल से नमन करती हूँ.
                                     शालिनी कौशिक 

रविवार, 4 सितंबर 2011

समाज के लिए अभिशाप बनता नशा‏


 खुशबु(इन्द्री)
नशा जिसे हम एक सामाजिक बुराई कहते हैं,के कारण आज के युवा विनाश की गर्त में जा रहे हैं। आज समाज में नशाखोरी कंी प्रवृति इस कद्र अपना साम्राज्य फै ला चुकी है कि युवा इसके कारण मौत के आगोश में समा रहे हैं। आये दिन नशे की ओवरडोज के कारण  किसी न किसी घर का चिराग बुझता रहता है। नशाखोरी के कारण समाज में अनुशासनहीनता बढ़ रही है। गांव की न्याय व्यवस्था चरमरा रही है तथा परिवार के परिवार उजड़ रहे हैं। लोगों की मानसिक, शारीरिक तथा आर्थिक हालत बिगड़ रही है।  
नई पीढ़ी में तो नशाखोरी की प्रवृत्ति दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। नशे के कारण तो नई युवा पीढ़ी शिक्षा प्राप्ति के मार्ग से विमुख हो रही है। व्यक्ति चाहे अमीर हो या गरीब, युवा हो या वृद्ध, महिला हो या पुरूष कोई भी वर्ग इस नशे की प्रवृति से अछूता नहीं है । घर हो या दफ्तर, स्कूल हो या कालेज, गांव हो या शहर,सडक़ हो या नुक्कड़ सभी स्थानों पर नशाखोरों की जमात दिखाई देती है । 
नशाखोरी क्या है? एक बीमारी या एक प्रवृति जिसके चलते इंसान अपनी जिंदगी से हाथ धो बैठता है। यह केवल एक बीमारी नहीं है बल्कि यह अनेक रोगों की जननी भी है। इसी प्रवृत्ति के चलते मनुष्य का मानसिक, शारीरिक एवं आर्थिक पतन तेजी से हो रहा है। सामाजिक मर्यादाए भंग हो रही है । नैतिक मूल्यों का तेजी से हृास हो रहा है । समाज में बढ़ रही आपराधिक प्रवृति के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार किसी को माना जा सकता है तो वह नशाखोरी ही है । शराब के नशे मे चूर व्यक्ति असामान्य हालात में वो भी कर जाता है जो उसे नहीं करना चाहिए। समाचार पत्रों में ाआये दिन नशाखोरों की कोई न कोई हरकत सुनने व पढऩे को मिलती ही रहती हैं। नशाखोरी से न केवल अपराध बढ़ रहें है बल्कि इससे दुघर्टनाएं भी तेजी से बढ़ रही है । आधे से अधिक सडक़ दुर्घटनाओं के लिए नशाखोरी को ही जिम्मेदार माना गया है । कभी यात्री बस पलट जाती है तो कभी बारातियों से भरा वाहन दुर्घटना ग्रस्त हो जाता है। पर परवाह नहीं क्योंकि नशा इंसान पर इस कद्र हावी हो जाता है कि उसे किसी की जिंदगी की परवाह ही नहीं रहती।
आजकल तो नशा करना ऐश्वर्य प्रदर्शन का एक माध्यम बन गया है । अनेक लोग इसे विलासिता की वस्तु मान कर इस्तेमाल करते है । अपनी तथाकथित प्रतिष्ठा में चार चांद लगाने के लिए महंगी से महंगी शराब पीना आज फैशन हो गया है । तीज त्योहार हो या मांगलिक कार्य पीनेवालों को तो केवल बहाना ही चाहिए । नशे के लिए आज इंसान घर परिवार एवं जमीन जायदाद सबकुछ त्यागने को तैयार हो जाता है।  रिश्ते-नाते तक छोड़ देता है। 
युवा तो युवा युवतियां भी नशे की प्रवृति से अछूती नहीं रही हैं। हर युग में चर्चा और आकर्षण का केंद्र बिंदु रहने वाली नारी आज पल-पल बदलते परिवेश में जिस प्रकार पुरूषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर प्रगति की ओर अग्रसर हो रही है, वह प्रारंभ से रूढि़वादी परम्पराओं और प्रथाओं से घिरे भारतीय नारी समाज के लिए सुखद बात है। लेकिन, दूसरी ओर आधुनिक बनने के चक्कर में पश्चिमी सभ्यता व संस्कृति को अपना कर नशाखोरी जहरीले रास्ते पर भी चल पड़ी है। आज भारत देश में नवयुवतियों पर नशाखोरी का भूत किस तरह सवार है, इसका पता हमें ‘इंडियन कांउसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च’ द्वारा किए गए सर्वेक्षण से लगता है। इस सर्वक्षण में यह बात सामने आई है कि दिल्ली, इलाहाबाद में युवकों से अधिक नशाखोरी का शिकार नवयुवतियां है। मद्रास, दिल्ली और जयपुर यूनिवर्सिटी में लड़कियां एक से ज्यादा बार खतरनाक मीठे जहर चरस, गांजा, अफीम, गर्भ निरोधक दवाएं, कोकीन आदि दवाइयों का इस्तेमाल कर चुकी हैं। नशाखोरी के शौकीनों की तादाद उन कॉलेजों में ज्यादा है, जहां को-एजुकेशन है। कॉलेजों-विश्वविद्यालयों के हॉस्टल तो आज नशाखोरी के अड्डे बन गये हैं। इस हॉस्टलों में रहने वाले 19 से 26 साल के बीच की उम्र के लडक़े और लड़कियां हॉस्टलों में रहकर पढ़ाई करने के नाम पर अपने मां-बाप की आंखों में धूल झोंक रहे हैं। ये खुलासा किया है एसोचैम यानि एसोसिएटेड चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री इन इंडिया की रिपोर्ट ने। रिपोर्ट के मुताबिक घर से दूर हॉस्टल में रहने वाले बच्चों में नशे की लत बढ़ती जा रही है। पिछले सात से आठ साल के भीतर शराब और सिगरेट पीने वाले बच्चों की संख्या 60 फीसदी बढ़ चुकी है। साल 2001 के मुकाबले आज 60 प्रतिशत ज्यादा छात्र नशे का सेवन करते हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक हॉस्टल में रहने वाले दस में से आठ छात्र-छात्राएं अत्यधिक शराब का सेवन करते हैं। ये लोग अपने परिवार से छुपकर शराब पीते हैं। हर महीने ये छात्र-छात्राएं हजार से 12 सौ रुपये सिगरेट और शराब पर बर्बाद करते हैं। इस सर्वे के मुताबिक नशा करने वाले छात्रों में दिल्ली और गुडग़ांव के हॉस्टलों में रहने वाले बच्चों की संख्या सबसे ज्यादा है। आज हमारी चिंता का सबसे बड़ा विषय भी छात्रों में तेज़ी से बढ़ती नशाखोरी की प्रवृत्ति ही है। आज हम किसी भी सरकारी स्कूल के बाहर यह नज़ारा खुले-आम देख सकते हैं कि छठी से लेकर बारहवीं कक्षा तक के बच्चे मजे से,बेखटके सिगरेट के छल्ले उड़ा रहे हैं,पान-मसाला चबा रहे हैं और मदिरालय के आस-पास मंडरा रहे हैं। यही काम पब्लिक स्कूलों के बच्चे भी करते हैं ,पर लुक -छुपकर।
समाज में बढ़ती नशाखोरी पर ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ द्वारा कराये गये एक सर्वे के अनुसार, भारत के विभिन्न विश्वविद्यालयों की लगभग साठ प्रतिशत लड़कियां धूम्रपान की शौकीन पाई गई हैं और कॉलेजों व पब्लिक स्कूलों के होस्टलों में रहने वाले लडक़े-लड़कियां भी नशीली दवाइयों के शिकार हैं। इन सर्वे रिपोर्टों के अलावा भी एक तथ्य से सर्वविदित है कि देह व्यापार में लिप्त अधिकतर महिलाएं और नवयुवतियां शराब पीने के बाद ही अपने पुरुष ग्राहकों से शारिरिक संबंध स्थापित करती हैं, जो एड्स जैसे महारोग की भयावहता को और बढ़ाता है। बहरहाल वैसे हमारे लिए अभी भी सुखद बात यह है कि देश में ड्रग्स व धूम्रपान की शौकीन नवयुवतियों की तादाद केवल कुछ महानगरों तक ही सिमटी हुई हैं। छोटे शहरों एवं ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं अभी भी इन कुप्रवृत्तियों से दूर हैं, इसलिए इस समय इन आदतों से छुटकारा दिलाने के लिए सरकार व समाजसेवी संस्थाए जो कार्यक्रम चला रही हैं, उसे और तेजी प्रदान की जाए, तो संभव है कि नवयुवतियों को नशाखोरी के गर्त में जाने से बचाया जा सकता है, क्योंकि ये ऐसा रोग नहीं है कि जिससे छुटकारा नहीं पाया जा सकता। आवश्यकता केवल अपने आप में दृढ़ इच्छाशक्ति पैदा करने की है और उस वातावरण से बचने की हैं, जहां नशाखोरी का प्रचलन हो। साथ ही, मन-मस्तिष्क से इस गलतफहमी को भी निकालना होगा कि गम भूलने और अपने-आपको आधुनिक बताने के लिए नशाखोरी को अपनाना आवश्यक है, क्योंकि वर्तमान समय में नशे के प्रति बने इस भ्रम के कारण ही अच्छे-खासे लडक़े-लड़कियां इस अंधी गली में घुस जाते हैं, जहां उन्हें मिलता क्या है? एक पीड़ादायक, रोगों से ग्रस्त जीवन और घर परिवार व समाज में अपमान। 
अब सवाल यह पैदा होता है कि आखिर वे कौन से कारण है, जिससे प्रभावित होकर नवयुवतियां नशाखोरी जैसी कुप्रवृत्तियों का शिकार होती जा रही हैं। इस संबंध में सर्वे रिपोर्ट में बताया गया कि भारत में अधिकतर नवयुवतियां व छात्राएं परीक्षा में फेल होने, मनचाही कामयाबी न मिलने, मोहब्बत में नाकाम होने पर गम को भुलाने के लिए नशीली दवाइयों के सेवन करने की तरह मुड़ जाती है, जहां उन्हें सुकून की जगह मिलता है घातक शारिरिक रोगों का जहरीला तोहफा, जो जीते-जी जिंदगी को दोजख में धकेल देता है।
रिपोर्ट में ये भी स्पष्ट किया गया कि भारत में अभी नशा करने वाली शादीशुदा औरतों की तादाद बहुत कम है। नशाखेरी की कुप्रवत्ति कॉलेज में पढऩे वाली लड़कियों में ज्यादा है, जिस कारण उनका विवाहित जीवन कई तरह की परेशानियों से घिर जाता है। दरअसल, हमारे यहां युवा लड़कियों में नशाखोरी की शुरुआत धूम्रपान से होती है। धुम्रपान कर वह अपने आपको दुनिया के सामने फैशनेबल व आधुनिक युवती बताने का प्रयास करती हैं। शायद यही कारण था कि आज से तीन-चार वर्ष पूर्व देश की एक सबसे बड़ी सिगरेट कम्पनी गोल्डन टोबैको ने ‘मैस’ नाम से महिलाओं के लिए एक सिगरेट बाजार में ऐसे उतारी, जैसे वह भारतीय नारी समाज पर कोई बड़ा अहसान कर रही हो। लेकिन, जब स्वयं महिला संगठनों ने इसका खुलकर विरोध किया, तो कंपनी ‘गोवा’ गुअखा की तरह सिगरेट का प्रचार-प्रसार विज्ञापन बोर्ड और होर्डिंगों पर नहीं कर पाई। वैसे भी हमारे देश में नशाखोरी या धूम्रपान करने वाली महिलाओं व नवयुवतियों की तादाद बड़े शहरों में ही अधिक है। शर्म की बात तो ये है कि इन कुप्रवृत्तियों का शिकार वह शिक्षित तबका है, जो इसके दुष्परिणामों को भली-भांति जानता है, फिर भी वह ‘आ बैल मुझे मार’ वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए नशाखोरी की अंधी गलियों में घुसते जा रहा है। इससे बड़ी हास्यास्पद स्थिति और क्या हो सकती है कि जिस तम्बाकू की पत्तियों को बैल व गधे तक नहीं खाते, उसका सेवन समझदार मनुष्य बड़े शौक और ठसक से करते हैं। सिगरेट में भरी जाने वाली तम्बाकू, जो ‘निकोटियन’ नामक पौधों की सूखी पत्तियां है, जब धुएं या खाली खाने के साथ शरीर में जाती है, तो इसका प्रभाव शरीर पर धीमे जहर के रूप में होता है। इसके दुष्प्रभाव से गर्भवती महिला को गर्भपात, मृत गर्भ या कम वजन का बच्चा पैदा होता है। निकोटिन के कारण बच्चे को जन्म देने वाली महिला में कम दूध बनता है और मुंह गले व स्तन कैंसर, फेफड़ों के रोग पैदा होते हैं। इसके बावजूद पश्चिमी सभ्यता के अंधानुकरण में फंस चुकी नवयुवतियां धूम्रपान जैसे विषैले प्रभाव को जानने के बाद भी इस शौक की तरफ बढ़ी जा रही है, जबकि अफीम, गांजा, भांग, चरस, ब्राउन शुगर, मार्फिन, एलएसडी जैसे ड्रग्स के विषैले प्रभाव की कम्पना करने से ही कलेजा कांप उठता है।
नशाखोरी की बढ़ती प्रवृति के लिए हमारी कार्यपालिका यानी सरकार ही मुख्य रूप से दोषी मानी जाएगी। नैतिक शिक्षा का पाठ तो बच्चे कब का भूल चुके हैं क्योंकि उन्हें हमने विरासत में अश्लील टी.वी. सीरियल,लपलपाती महत्वाकांक्षाएं व पश्चिम की भोंड़ी नकल दी है। इसके लिए सरकार द्वारा सरकारी राजस्व अर्जित करने की आड़ में चलायी जा रही शराब की फै कट्रियां और नशीली वस्तुएं बनाने वाल कंपनियां भी जिम्मेवार हैं जिनसे सरकार को करोड़ों रूपये की आय होती है लेकिन समाज को मिलता है विनाश। 
नशे के  निर्माता व वितरक तो हरे भरे हो ही रहें है । लोगों के जीवन की हरियाली को भी बंजर बनाया जा रहा है । प्रतिवर्ष लाखों-करोड़ों जिन्दगियों को तबाह करने का लाइसेंस मुटठी़भर लोगों के दे दिया जाता है। देश में भौतिक विकास के नाम पर प्रति वर्ष अरबों रूपये खर्च कर दिये जाते हैं लेकिन समझ में नहीं आता कि यह विकास किसके लिए? नशे की गर्त में समा चुके लोगों के लिए जबकि किसी भी समाज के भौतिक विकास के साथ साथ उसका नैतिक विकास भी जरूरी है। 
देश का मानव संसाधन कितना स्वस्थ, पुष्ट एवं मर्यादित है यह देश की सरकार को ही देखना होगा। क्योंकि देश के मानव संसाधन के समुचित दोहन से ही राष्ट्र्र विकसित हो सकता । जरूरत है देश के मौजूद मानव संसाधन को रचनात्मक विकास की दिशा मे लगाने की। कोई भी देश या समाज अपने मानव संसाधन को निरीह, नि:शक्त या निर्बल बनाकर खुद शक्तिशाली नहीं बन सकता है ?  
यह नशाखोरी का ही दुष्परिणाम है कि आज का मानव कमजोर, आलसी व लापरवाह होता जा रहा है । आज समाज का नैतिक पतन हो रहा है। हमें नशाखोरी की बढ़ती प्रवृति को रोकना होगा । लोगों के हाथों में दारू की बोतल नहीं बल्कि काम करने वाले औजार होने चाहिए । कौन देगा उन्हें ऐसी प्रेरणा ? इस बुरी लत को सरकार के किसी कानून से खत्म नहीं किया जा सकता । इसके लिए समाज में जागरूकता लानी होगी । बेहतर होगा कि इंसान अपनी कीमती जिंदगी से प्यार करते हुए इस दलदल में फंस से बचे और औरों को भी बचाये। संकल्प शक्ति के समक्ष इस कुप्रवृत्ति की शक्ति बहुत तुच्छ है क्योंकि किसी ने सही कहा है- आज बस में जिसके है आदमी, आज छाई है मौत बनकर, जो कर ही है बरबाद जिदंगी, है उस मौत का दूसरा नाम है नशा। नई पीढ़ी को इस नशे के दुष्परिणामों का बोध कराना होगा । समाजसेवियों एवं समाज के कर्णधारों को बिना वक्त गवायें अब इस दिशा में आगे बढऩे की जरूरत है क्योकि हमें शांति ,सदभाव व भाईचारे का वातावरण निर्मित कर स्वस्थ समाज का निर्माण करना है 
आलेख -खुशबु गोयल 
प्रस्तुति-शालिनी कौशिक 

शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

रहे सब्ज़ाजार,महरे आलमताब भारत वर्ष हमारा.



गूगल से साभार
तू ही खल्लाक ,तू ही रज्ज़ाक,तू ही मोहसिन है हमारा.
रहे सब्ज़ाजार,महरे आलमताब भारत वर्ष हमारा.

एक आशियाँ बसाया हमने चैनो -अमन  का   ,
नाकाबिले-तकसीम यहाँ प्यार हमारा.

कुदरत के नज़ारे बसे हैं इसमें जा-ब-जा,
ये करता तज़्किरा है संसार हमारा.

मेहमान पर लुटाते हैं हम जान ये अपनी ,
है नूर बाज़ार-ए-जहाँ ये मुल्क  हमारा.

आगोश में इसके ही समां जाये ''शालिनी''
इस पर ही फ़ना हो जाये जीवन ये हमारा.

कुछ शब्द अर्थ-
खल्लाक-पैदा करने वाला,रज्ज़ाक-रोज़ी देने वाला
मोहसिन-अहसान करने वाला,सब्ज़ाजार-हरा-भरा
महरे आलमताब -सूरज,नाकाबिले-तकसीम--अविभाज्य
तज़्किरा-चर्चा,बाज़ार-ए-जहाँ--दुनिया का  बाज़ार
आगोश-गोद या बाँहों में,जा-ब-जा--जगह-जगह
शालिनी कौशिक