मंगलवार, 28 अप्रैल 2015

एन.जी.टी.सुधारेगा लातों के भूतों को


NGT announces Rs 5,000 fine for open burning of leaves, garbage in Delhi


NGT announces Rs 5,000 fine for open burning of leaves, garbage in DelhiZee Media Bureau/Salome Phelamei
New Delhi: Stepping up its effort to curb pollution, the National Green Tribunal (NGT) on Tuesday announced a fine of Rs 5,000 on individuals spotted burning garbage, leaves, plastic, rubber etc in open areas in parts of Delhi and the National Capital Region (NCR).

एक महत्वपूर्ण फैसला लेते हुए मंगलवार २८ अप्रैल को राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने कचरा ,पत्तियां ,प्लास्टिक व् रबर इत्यादि को खुले में जलाये जाने पर दिल्ली व् एन.सी.आर.में  ५००० रूपये का जुर्माना लगाया है .एक स्वस्थ पर्यावरण के लिए यह एक सराहनीय व् समय के अनुसार उपयोगी कदम है क्योंकि आज स्थिति ये आ गयी है कि अगर कोई भी काम सफलतापूर्वक किया जाना है तो उसके लिए जनता व् सम्बंधित विभाग को जुर्माने की चपेट में लेना ही होगा क्योंकि यहाँ अब एक ही कहावत के अनुसार काम किया जा सकता है और वह है ''लातों के भूत बातों से नहीं मानते '' और ऐसे लातों के भूत हमें आज अपने आस पास बहुसंख्या में दिखाई देते हैं .जहाँ तहाँ कचरे इत्यादि के ढेर और उनके निबटारे के लिए उसे आग लगा देना एक सुविधाजनक निबटारे के रूप में उपयुक्त साधन माना जा रहा है इतना अवश्य है कि राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण द्वारा अभी इसे बहुत छोटे क्षेत्र में इस्तेमाल किया गया है इसकी जद में पूरे देश को लाया जाना बहुत ज़रूरी है जिससे पूरे देश का पर्यावरण सही रूप में लाया जा सके  हाँ इतना ज़रूर है कि दिल्ली के साथ एन.सी.आर .को जोड़कर बहुत ही प्रशंसनीय कदम उठाया गया है और अब कम से कम वे प्रबुद्ध जन, जो पिछले दिनों पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बहुत से शहरों को एन.सी.आर. से जोड़ने के लिए ज्ञापन दे रहे थे ,आंदोलन कर रहे थे ,इस तरफ अपना ध्यान केंद्रित कर अपना कोई कर्तव्य भी ग्रहण करने की ओर उन्मुख होंगे .
शालिनी कौशिक
    [कौशल ]

सोमवार, 27 अप्रैल 2015

बेटी मेरी तेरी दुश्मन ,तेरी माँ है कभी नहीं ,



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बेटी मेरी तेरी दुश्मन ,तेरी माँ है कभी नहीं ,
तुझको खो दूँ ऐसी इच्छा ,मेरी न है कभी नहीं .
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नौ महीने कोख में रखा ,सपने देखे रोज़ नए ,
तुझको लेकर मेरे मन में ,भेद नहीं है कभी नहीं .
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माँ बनने पर पूर्ण शख्सियत ,होती है हर नारी की ,
बेटे या बेटी को लेकर ,पैदा प्रश्न है कभी नहीं .
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माँ के मन की कोमलता ही ,बेटी से उसको जोड़े ,
नन्ही-नन्ही अठखेली से ,मुहं मोड़ा है कभी नहीं .
.........................................................................
सबकी नफरत झेल के बेटी ,लड़ने को तैयार हूँ,
पर सब खो देने का साहस ,मुझमे न है कभी नहीं .
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कुल का दीप जलाने को ,बेटा ही सबकी चाहत ,
बड़े-बुज़ुर्गों  की आँखों का ,तू तारा है कभी नहीं .
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बेटे का ब्याह रचाने को ,बहु चाहिए सबको ही ,
बेटी होने पर ब्याहने का ,इनमे साहस है कभी नहीं .
............................................................................
अपने जीवन ,घर की खातिर ,पाप कर रही आज यही ,
माफ़ न करना अपनी माँ को ,आना गर्भ में कभी नहीं .
..............................................................................
रो-रोकर माँ कहे ''शालिनी ''वसुंधरा भी सदा दुखी ,
बेटी के आंसू बहने से ,माँ रोक सकी है कभी नहीं .
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     शालिनी कौशिक 
            [कौशल ]

रविवार, 26 अप्रैल 2015

नारी स्वयं मर्द से गर्दन कटवाने को तैयार

उम्रकैद की सजा काट रहा हत्यारा मनु शर्मा

जेसिका के हत्यारे मनु शर्मा ने रचाई शादी [अमर उजाला से साभार ]

  जेसिका लाल मर्डर केस में उम्रकैद की सजा काट रहा हत्यारा मनु शर्मा (सिद्धार्थ वशिष्ठ) ने मुंबई की लड़की से शादी रचा ली। ये समाचार आज चर्चा का विषय है और कल को एक आम बात हो जायेगा .जब मैं इस विषय पर लिखने चली तो मेरे इस कदम पर खुद मैं ही अपने पक्ष में नहीं थी कि आखिर क्या एक हत्यारे को शादी का अधिकार नहीं है ? जब भारत का उच्चतम न्यायालय किसी के क़त्ल में सजा काट रहे अपराधी को यह हक़ देता है तब मैं इसका विरोध करने वाली भला कौन होती हूँ ? किन्तु मेरे दिमाग में तब मात्र मनु शर्मा नहीं था वरन ऐसे सब पुरुष थे जो कभी प्रेम में तो कभी दहेज़ के लिए पागल होकर अपनी प्रेमिका या पत्नी की हत्या कर देते हैं और इस सबके बावजूद उनके लिए रिश्तों की कोई कमी नहीं होती बल्कि उनके लिए लड़कियों की लाइन ही लगी रहती है और ऐसा तब है जब इस देश में लड़कियों का प्रतिशत लड़कों की तुलना में बहुत कम है .
     हत्या बहुत खौफनाक वारदात होती है और इसीलिए इसकी सजा फांसी या आजीवन कारावास हमारे देश के कानून ने दी है और इससे भी खौफनाक सजा एक हत्यारे को हमारे देश का समाज देता है ,वह उसका अपनी बिरादरी से निकाला घोषित करता है, उसका हुक्का-पानी बंद कर देता है और न केवल उसका बल्कि उसके पूरे परिावर का किन्तु जैसे कि भेद-भाव हमारे समस्त समाजों की रग-रग में भरा है  वह यहाँ भी खुलेआम दृष्टिगोचर होता है क्योंकि ऐसा व्यवहार मात्र उसी हत्यारे के व् उसके परिवार के साथ किया जाता है जो गरीब होता है अगर हत्यारा पैसे वाला है तो वह सौ खून भी कर ले सब माफ़ कर दिए जाते हैं और उसे अपने घर -परिवार में सम्मिलित करने में सभी गौरवान्वित महसूस करते हैं .
 ऐसे ही एक अंतर यहाँ और भी है नारी-पुरुष का एक पुरुष चाहे दहेज़ के लिए हत्या करे या प्रेम के लिए उसके लिए लड़कियों की रिश्तों की कमी नहीं और एक नारी अगर किसी पुरुष की हत्या कर दे तो वह कुलटा या चुड़ैल करार दी जाती है उसके द्वारा किये गए अपराध में कोई परिस्थिति नहीं देखता मात्र उसके स्वभाव के विपरीत कार्य देखते हैं जिसमे केवल घुट-घुटकर मरना लिखा है किसी को घोटकर मारना नहीं  और मनु शर्मा द्वारा जैसिका लाल की हत्या की सजा काटते हुए शादी किये जाने के बारे में बस यही कहा जायेगा कि ये अंतर यूँ ही चलता जायेगा और मर्द चाहे कितने ही खून कर ले उसके लिए नारियों का काफिला गर्दन कटवाने को पक्तिबद्ध होकर खड़ा नज़र आएगा .
शालिनी कौशिक 
  [कौशल ]   

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2015

गजेन्द्र की मौत के लिए पुलिस ,मीडिया ,मोदी सरकार और हम सब जिम्मेदार

नेता और उनकी कार्यप्रणाली हमेशा से विवादास्पद रहे हैं और यही हो रहा है इस वक़्त आप की रैली के दौरान दौसा के किसान गजेन्द्र के द्वारा फांसी लगाने पर ,लेकिन क्या हम अक्ल के अंधे नहीं कहे जायेंगे अगर हम वास्तविक स्थितियों को नज़रअंदाज़ कर बेवजह का दोषारोपण आरम्भ कर देते हैं .दिल्ली में आप की किसान रैली के दौरान जितनी संख्या में नेता थे उससे कहीं अधिक संख्या में मीडिया कर्मी और पुलिस वाले थे और गजेन्द्र वहां जो कुछ भी कर रहा था उससे परिचित मीडिया वाले भी थे और पुलिस वाले भी इसका जीता जगता उदाहरण समाचारपत्रों में प्रकाशित ये समाचार और चित्र हैं -
पुलिसकर्मियों ने बचाने के बजाय मुंह फेर लिया
मरने दो साले को! गजेंद्र को पेड़ पर झूलते देख एक पुलिस अधिकारी के मुंह से ये शब्द निकले थे।[ [अमर उजाला से साभार]
 
[दैनिक जनवाणी से साभार]

समाचार और चित्र वहां के परिदृश्य व सही घटनाक्रम को हम लोगों के दिमाग में सही रूप में प्रस्तुत करने के लिए काफी हैं और ये स्पष्ट कर रहे हैं कि कहीं से भी इस घटनाक्रम के जिम्मेदार आप पार्टी के कार्यकर्ता व नेता नहीं हैं.दैनिक जनवाणी अपनी रिपोर्ट में कहता है -''आप के नेताओं व् कार्यकर्ताओं ने उसे नीचे उतरने की बार बार अपील की .पुलिस इस पूरी घटना को देख रही थी तो आप के कार्यकर्ता उसे बचाने को पेड़ पर चढ़ गए .''
  और अमर उजाला कहता है - जंतर मंतर पर आयोजित आम आदमी पार्टी की रैली में लगभग 12.30 बजे के आसपास दौसा का किसान गजेंद्र सिंह पेड़ पर चढ़ा था। उसके हाथों में झाड़ू था और वह मोदी सरकार के विरोध में नारे लगा रहा था। 
फर्स्टपोस्ट के मुताबिक, लोगों को लगा कि वह मीडिया का ध्यान अपनी ओर खींचने की कोशिश कर रहा है। उसने ‌थोड़ी देर बाद सफेद गमछे से अपनी गर्दन में फंदा लगा लिया। अपनी दोनों बाहों से पेड़ की डालियों को पकड़ रखा था। पैरों से उसने एक दूसरी डाली से सहारा ले रखा ‌था।

वह जब तक उस डाली के सहारे रहा, ठीक रहा। हालांकि नीचे खड़ी भीड़ लगातर शोर कर रही थी। मी‌डियाकर्मियों ने वहां खड़े पुलिसकर्मियों से कहा के वे गजेंद्र को नीचे उतारे। पुल‌िसकर्मी मूकदर्शक की तरह खड़े रहे। उन्हें पुलिसकर्मियों में से एक ने कहा, 'मरने दो साले को।'

   अब सही हाल जानकर भी अगर हम केजरीवाल या आप के कार्यकर्ताओं या उनकी रैली को दोषी ठहराते हैं तो यह हमारी अक्ल की कमी या फिर एक तरफ़ नेताओं की बुराई के लिए स्थिर दिमागी परिस्थिति ही कही जाएगी .पुलिस ने मुख्यमंत्री केजरीवाल की अपील नहीं सुनी क्योंकि वह उनके नियंत्रण में ही नहीं और मीडिया ने केवल पुलिस से अपील की या फिर उसके फांसी वाले दृश्यों के चित्र  उतारे क्या वे आगे बढ़कर उसे नहीं रोक सकते थे ? अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ना और क्या है ? क्या हर जिम्मेदारी नेताओं की है हमारी या आपकी कुछ नहीं जिनकी आँखों के सामने कुछ भी घट जाये और हम हाथ से हाथ बांधकर खड़े हो जाएँ .
  और रही बात नेताओं पर दोषारोपण की तो पहले ये जिम्मेदारी राजस्थान की सपा पार्टी पर आती है जिसका टिकट गजेन्द्र ने माँगा था और टिकट न मिलने के कारण उसपर निराशा छायी थी और दूसरी जिम्मेदारी हमारी मोदी सरकार पर जाती है जिसके विरोध में गजेन्द्र मरने से पहले नारे लगा रहा था ऐसे में अपने दिमाग के द्वार खोलते हुए हमें सही बात ही कहनी चाहिए और सही बात यही है कि आप या केजरीवाल गजेन्द्र की मौत के उत्तरदायी नहीं और गजेन्द्र की मौत होने के बावजूद रैली को जारी रखना उनकी दिलेरी और सिस्टम के प्रति गजेन्द्र की नाखुशी का साथ ही देना है जिसके कारण गजेन्द्र को मौत का मुंह चुनना पड़ गया उसे घर लौटने का रास्ता नहीं मिला .गृह मंत्री राजनाथ सिंह का आप को ये कहना कि -''जब गजेन्द्र पेड़ पर चढ़े थे तो लोग तालियां बजा उन्हें उकसा रहे थे .नेता भाषण दे रहे थे .'' उनकी पूर्व में की गयी संवेदनहीनता को नहीं छिपा सकती जब उनके विमान का पायलट मौत का शिकार हो गया था और वे उसकी मौत का गम न मना अपनी सभा में भाषण देने चले गए थे जबकि यहाँ जब कि बात वे बता रहे हैं तब किसान गजेन्द्र केवल पेड़ पर चढ़ा था वह मरने की सोच रहा है यह किसी को गुमान नहीं था .इसलिए किसान गजेन्द्र की मौत पर व्यर्थ का दोषारोपण छोड़ते हुए हमें आगे ऐसे उपाय सोचने  चाहिए जिसके कारण हमारे किसान मौत की ओर अग्रसर न होते हुए अपने कार्य में ही इस विश्वास से जुटें कि ये देश हमारा है और हर परिस्थिति में हमारे साथ है .

शालिनी कौशिक 
  [कौशल ]

गुरुवार, 23 अप्रैल 2015

अमर उजाला दैनिक समाचारपत्र भारतीय दंड संहिता-१८६० के अधीन दोषी



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अमर उजाला हिंदी दैनिक समाचारपत्र का पृष्ठ -२ पर आज प्रकाशित एक समाचार भारतीय दंड संहिता -१८६० के अधीन उसे अर्थात अमर उजाला को कानून के उल्लंघन का दोषी बनाने हेतु पर्याप्त है जिस पर अमर उजाला ने एक दुष्कर्म पीड़िता , जो कि विक्षिप्त है और उसके परिजनों द्वारा उसके दुष्कर्म के बाद बेड़ियों से बांधकर रखी गयी है,से सम्बंधित समाचार को सचित्र प्रकाशित किया है-
 
 जिसके मुद्रण या प्रकाशन के सम्बन्ध में भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत कई पाबंदियां लगायी गयी हैं जो इस प्रकार हैं -
   भारतीय दंड संहिता की धारा २२८-क कहती है -

[१] - जो कोई किसी नाम या अन्य बात को ,जिससे किसी ऐसे व्यक्ति की [ जिसे इस धारा में इसके पश्चात पीड़ित व्यक्ति कहा गया है ] पहचान हो सकती है , जिसके विरुद्ध धारा ३७६ , धारा ३७६-क ,धारा ३७६-ख , या धारा ३७६-घ के अधीन किसी अपराध का किया जाना अभिकथित है या किया गया पाया गया है , मुद्रित या प्रकाशित करेगा वह दोनों में किसी भांति के कारावास से , जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी , दण्डित किया जायेगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा ;

[२] - उपधारा [१] की किसी भी बात का विस्तार किसी नाम या अन्य बात के मुद्रण या प्रकाशन पर , यदि उससे पीड़ित व्यक्ति की पहचान हो सकती है ,तब नहीं होता है जब ऐसा मुद्रण या प्रकाशन -

 [क] -पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी के या ऐसे अपराध का अन्वेषण करने वाले पुलिस अधिकारी के , जो ऐसे अन्वेषण के प्रयोजन के लिए सद्भावपूर्वक कार्य करता है , द्वारा या उसके लिखित आदेश के अधीन किया जाता है ; या 

 [ख]- पीड़ित व्यक्ति द्वारा या उसके लिखित प्राधिकार से किया जाता है ; या 

 [ग] - जहाँ पीड़ित व्यक्ति की मृत्यु हो चुकी है अथवा वह अवयस्क या विकृतचित्त है वहां , पीड़ित व्यक्ति के निकट सम्बन्धी द्वारा या उसके लिखित प्राधिकार से , किया जाता है ;

परन्तु निकट सम्बन्धी द्वारा कोई ऐसा प्राधिकार किसी मान्यता प्राप्त कल्याण संस्था या संगठन के अध्यक्ष या सचिव को ,चाहे उसका जो भी नाम हो , भिन्न किसी व्यक्ति को नहीं दिया जायेगा .

स्पष्टीकरण -इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए , ''मान्यता प्राप्त कल्याण संस्था या संगठन '' से केंद्रीय या राज्य सरकार द्वारा इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए मान्यता प्राप्त कोई समाज कल्याण संस्था या संगठन अभिप्रेत है .

[३] -जो कोई उपधारा [१] में निर्दिष्ट किसी अपराध की बाबत किसी न्यायालय के समक्ष किसी कार्यवाही के सम्बन्ध में कोई बात , उस न्यायालय की पूर्व अनुज्ञा के बिना मुद्रित या प्रकाशित करेगा , वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से , जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी दण्डित किया जायेगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा .

स्पष्टीकरण -किसी उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय के निर्णय का मुद्रण या प्रकाशन इस धारा के अर्थ में अपराध की कोटि में नहीं आता है .

  इस प्रकार अमर उजाला द्वारा दुष्कर्म पीड़िता विक्षिप्त बेटी के समाचार को सचित्र प्रकाशित किया जाना कहीं से भी यह आभास नहीं देता कि उसे ऐसी कोई अनुमति मिल चुकी थी या उसने ऐसी अनुमति की प्राप्ति के लिए कोई यत्न कर उस बेटी के हित या उसके प्रति सद्भाव रखते हुए यह समाचार सचित्र प्रकाशित किया .साफ तौर पर यह आज की रेटिंग पत्रकारिता है जो अपने समाचारपत्र को ज्यादा रेटिंग दिलाने के लिए ऐसे समाचारों को अपने अख़बार में प्रकाशित करने जैसे कार्य की ओर आज की पत्रकारिता को बढ़ा देती है  और नहीं देखती कि इस तरह के समाचार पहले से ही दुःख से घिरे पीड़ित व् उसके परिजनों पर कितनी भारी पड़ती है जिसे ध्यान में रखते हुए ही कानून द्वारा इस पर रोक लगायी गयी है .ऐसी पत्रकारिता पर रोक के लिए यह आवश्यक है कि अमर उजाला के इस कृत्य को ध्यान में रखते हुए उसपर अति शीघ्र कानूनी कार्यवाही की जाये .

शालिनी कौशिक 
   [कौशल ]



सोमवार, 20 अप्रैल 2015

अपना ज्ञान सुधारो भटकाने वालों- नेहरू सुभाष के बचाने वाले थे

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किसी शायर ने खूब सोच-समझकर कहा है -
''हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम ,
वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होती .''
  और शायद किसी पर यह पंक्तियाँ खरी उतरें न उतरें नेहरू-गांधी परिवार पर ये पंक्तियाँ अक्षरशः खरी उतरती हैं और देश के लिए बार बार अपनी जान कुर्बान करने के बावजूद इस परिवार को विरोधी अपने निशाने पर लेने में लगे ही रहते हैं और पूरी जानकारी न होते हुए भी जनता को बरगलाने को अनाप-शनाप बोलते रहते हैं ,मुंह खोलते रहते हैं .अभी पिछले दिनों इसकी एक बानगी राहुल गांधी द्वारा ५६ दिन की छुट्टी पर जाने को देखने को मिली जिसे लेकर सारे देश में जब तक राहुल नहीं आ गए तब तक अनुमानों की सुनामी लगाकर परिस्थितियों के कारण भगोड़ा आदि कहकर  उन्हें लज्जित करने का वाही तारकासुर प्रयत्न किया गया जो तारकासुर ने शिव पुत्र को पहले न होने देने और बाद में उन्हें समाप्त करने हेतु किया था और वह प्रयत्न न तब सफल होना था और न अब ,राहुल छुट्टियों के बाद सबके सामने आये और सबके लिए अपने उन्हीं प्रयासों में जुट गए जिनमे वे छुट्टियों से पहले जुटे हुए थे और जिनमे केवल जनता की भलाई समाई है किसी तरह की वह दिखावट नहीं जिसका इस्तेमाल कर वे चुनावों के दौरान जनता को बरगलाते और सत्ता को हासिल करने के लिए बेवकूफ बनाने की गलत कोशिशें करते .
     राहुल गांधी के साथ विरोधियों का यह व्यवहार नया नहीं है उनके परिवार को यह सब झेलना ही पड़ता है क्योंकि इस देश में यह पुराना रिवाज़ है यहाँ करने वाले को गालियाँ और अपशब्द ही मिलते हैं और कुछ न करने वाले काम करने वालों पर कीचड उछालने में लगे ही रहते हैं .
   ऐसा ही देखने को मिल रहा है आजकल एक पुराने ऐसे मुद्दे के बारे में जिसे इस परिवार के विरोधी दल भाजपा द्वारा जब भी कहीं अपने आप कुछ काम न हो पा रहा हो ,अपनी छवि का आईना निरंतर टूटता जा रहा हो तब ध्यान भटकाने को उठा लिया जाता है .नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु विमान हादसे में हुई या नहीं हुई ये आजतक रहस्य का विषय है और जब तक ये दुनिया है शायद रहस्य ही रहेगी और भाजपा के लिए अपना देशप्रेम दिखाने का एक गैस का गुब्बारा मुद्दा जिसे जब चाहे फुला लिया और उड़ा  दिया .नेताजी सुभाष चन्द्र बोस भारत के महान वीर थे और जब तक यह देश है यह विश्व है उनका नाम सम्मान के साथ ही लिया जायेगा और उनके सम्बन्ध में नेहरू जी पर जासूसी के इलज़ाम लगाकर निरंतर नेहरू जी को बदनाम करने की जो साज़िशें की जा रही हैं वह साफतौर पर पूर्ण जानकारी का अभाव और मात्र जनता का ध्यान किसानों की निरंतर हो रही मौत के दुखद पहलू से हटाने की कोशिश कही जाएगी .
  हमारा स्वतंत्रता का इतिहास कहता है कि  हिटलर से निराश सुभाष ने ८ फरवरी १९४३ को जर्मनी छोड़ा .१३ जून को वे टोकियो पहुंचे तथा जापान ने भारत को स्वतंत्र कराने में पूर्ण मदद का आश्वासन दिया .४ जुलाई को सिंगापुर में सुभाष ने आजाद हिन्द फ़ौज की कमान संभाली .उन्होंने ''दिल्ली चलो '' युद्ध का नारा दिया .आजाद हिन्द फ़ौज का सैनिक अभियान फरवरी मार्च १९४४ में हुआ मई में उसने मडोक् पर अधिकार कर लिया फिर भारत भूमि पर कदम रखा तथा सितम्बर तक कैप्टेन सूरजमल के नेतृत्व में सैनिक टुकड़ी वहां बनी रही

The Defeat of the INA and the Collapse of the Provisional Government[edit]
Left to defend[citation needed] Rangoon from the British advance without support from the Japanese, the INA was soundly defeated. Bose had fled Burma and returned to Singapore before the fall of Rangoon; the government Azad Hind had established on the Andaman and Nicobar Islands collapsed when the island garrisons of Japanese and Indian troops were defeated by British troops and the islands themselves retaken. Allegedly Bose himself was killed in a plane crash departing from Taiwan attempting to escape to Russia. The Provisional Government of Free India ceased to exist with the deaths of the Axis, the INA, and Bose in 1945.
The troops who manned the brigades of the Indian National Army were taken as prisoners of war by the British. A number of these prisoners were brought to India and tried by British courts for treason, including a number of high-ranking officers such as Colonel Gurbaksh Singh Dhillon. The defence of these individuals from prosecution by the British became a central point of contention between the British Raj and the Indian Independence Movement in the post-war years.
मई मास में ही जापान की सेना के साथ मिलकर आजाद हिन्द फ़ौज ने कोहिमा पर अधिकार कर लिया लेकिन अंततः यह अभियान असफल रहा ,जापानियों की पराजय के साथ ही आई,एन.ए.की भी पराजय हो गयी तथा उसके अधिकांश सैनिक युद्ध बंदी बना लिए गए .न केवल ये सैनिक युद्ध बंदी बनाये गए बल्कि इन पर देश में ही मुक़दमे आरम्भ हो गए जिस कांग्रेस को बदनाम कर नेहरू पर सुभाष की जासूसी का इलज़ाम लगाया जा रहा है उन्ही नेहरू की कॉंग्रेस ने उन युद्ध बंदियों के लिए एक बचाव समिति का गठन किया था तथा उनकी आर्थिक मदद व् पुनर्वास हेतु ''आजाद हिन्द फ़ौज  जाँच व् राहत समिति का गठन किया था और बचाव पक्ष के वकील के रूप में भी वही कॉंग्रेसी उपस्थित थे जिनके नाम भूलाभाई देसाई ,सर तेजबहादुर सप्रू ,कैलाश नाथ काटजू तथा आसफ अली थे . आज उन्ही नेहरू को बदनाम करने की साजिशें निरंतर जारी हैं जिन्हें भारत में सदैव गुमनामी बाबा के साथ देखा गया और यहाँ तक कयास लगाये गए कि वे गुमनामी बाबा नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ही थे .यदि यह अनुमान सही कहा जाये कि वे गुमनामी बाबा ही नेताजी थे तो क्या यह कल्पना भी की जा सकती है कि नेताजी जैसे वीर को कोई अपने बंदी के रूप में रख सकता है और वह भी नेहरू जी जिन्होंने नेताजी को युद्ध बंदी के रूप में यदि वे जीवित थे तो उनका ब्रिटेन को सौंपना उनके ट्रायल के लिए रोकने हेतु ही उनका इस तरह से रहना स्वीकार किया होगा क्योंकि यह भी एक तथ्य एक अंतराष्ट्रीय समाचार पत्र द्वारा सामने लाया गया था कि भारत को एक अंतराष्ट्रीय अपराधी की हैसियत से नेताजी को ब्रिटेन को सौंपने का दायित्व था .आज इस तरह की बातें किया जाना  केवल नेहरू जी वरन सुभाष चन्द्र बोस की शहादत पर भी ऊँगली उठाने के समान है उनकी वीरता को चुनौती देने जैसा है कि एक वीर जो हिटलर जैसे क्रूरतम तानाशाह को एक तरफ कर सकता है वह अपने देश में ही किसी से डरकर निवास करता .वे जो करते थे अपने मन की शक्ति से करते थे अपनी इच्छा से करते थे और नेहरू जी ने भी अगर उनकी जासूसी करायी थी तो इसमें पूर्ण तथ्यों को न जानते हुए उन्हें पूरी तरह से दोषी करार दिया जाना गलत है क्योंकि देश से ऊपर कुछ नहीं और नेहरू जी ने अपने सभी कार्यों द्वारा यही हमेशा दिखाया है .उनके सम्बन्ध में बस यही कहा जा सकता है -
''हज़ारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है,
 बड़ी मुश्क़िल से होता है चमन में दी-दावर पैदा .''
शालिनी कौशिक
   [कौशल]

रविवार, 19 अप्रैल 2015

ये जनता भोली कैसे है ! जरा बताएं.



   
''जवां सितारों को गर्दिश सिखा रहा था ,
 कल उसके हाथ का कंगन घुमा रहा था .
 उसी दिए ने जलाया मेरी हथेली को ,
  जिसकी लौ को हवा से बचा रहा था .''
तनवीर गाजी का ये शेर बयां करता है वह हालात  जो रु-ब-रु कराते हैं हमें हमारे सच से ,हम वही हैं जो सदैव से अपने किये की जिम्मेदारी लेने से बचते रहे हैं ,हम वही हैं जो अपने साथ कुछ भी बुरा घटित होता है तो उसकी जिम्मेदारी दूसरों पर थोपते रहते हैं हाँ इसमें यह अपवाद अवश्य है कि यदि कुछ भी अच्छा हमारे साथ होता है तो उसका श्रेय हम किसी दूसरे को लेने नहीं देते -''वह हमारी काबिलियत है ,,वह हमारा सौभाग्य है ,हमने अपनी प्रतिभा के ,मेहनत के बल पर उसे हासिल किया है .''...ऐसे ऐसे न जाने कितने महिमा मंडन हम स्वयं के लिए करते हैं और बुरा होने पर .....यदि कहीं किसी महिला ,लड़की के साथ छेड़खानी देखते हैं तो पहले बचकर निकलते हैं फिर कहते हैं कि माहौल बहुत ख़राब है ,यदि किसी के साथ चोरी ,लूट होते देखते हैं तो आँखें बंद कर पुलिस की प्रतीक्षा करते हैं आदि अदि .आज जनता जिन हालात से दो चार हो रही है उसके लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है ,एक तरह से सही भी है क्योंकि परिवार के बड़े का यह दायित्व बनता है कि वह परिवार की हर तरह की ज़रुरत को देखे और पूरी करे व् समस्याओं से भली भांति निबटे किन्तु  इससे परिवार के सदस्यों की जिम्मेदारी कम नहीं हो जाती .
  *अभी हाल ही में १६ सितम्बर २०१२ को दिल्ली में दामिनी गैंगरेप कांड हुआ .जब तक बस में दामिनी व् उसका दोस्त थे किसी को जानकारी नहीं थी किन्तु जब वे सड़क पर गिरे हुए थे वस्त्र विहीन रक्त रंजित पड़े हुए थे क्या जनता में से किसी एक ने भी उनके पास जाकर मानव होने का सबूत दिया ,नहीं दिया ,बल्कि सभी गाड़ियाँ बचा-बचाकर निकल ले गए और सब कुछ पुलिस पर छोड़ दिया गया ,ये तो ,ये तो बस के भीतर कांड हो रहा था कोई नहीं जानता था कि क्या हो रहा है किन्तु २ अप्रैल २०१३ को कांधला [शामली]में चार बहनों पर तेजाब फेंका गया .एक बहन ने एक आरोपी को पकड़ा भी किन्तु जनता की व्यस्त आवाजाही की वह सड़क क्यूं नपुंसक बन गयी न तो किसी  आरोपी को तब पकड़ा और न ही बहनों की सहायता को आगे बढ़ी और वे बहनें खुद ही किसी तरह रिक्शा करके अस्पताल गयी .क्या ऐसी जनता को मदद का हक़दार कहा जा सकता है ? 
*दिनदहाड़े क़त्ल होते हैं ,लोगों के बीच में होते हैं जनता आरोपियों को पहचानती है ,आरम्भ में भावुकतावश गवाही भी देती है किन्तु बाद में होश में आये हुए की तरह अदालत में जाकर मुकर जाती है क्या कानून की सहायता जनता का कर्तव्य नहीं है ?क्या अपराधियों के इस तरह खुलेआम फिरने में जनता स्वयं मददगार नहीं है ?वीरप्पन जैसे कुख्यात अपराधी जो कानून व् प्रशासन की नाक में दम किये रहते हैं ,निर्दोषों का क़त्ल करते हैं क्या जनता की मदद  के बगैर वीरप्पन  इतने लम्बे समय तक कानून को धोखा दे सकता था ?
*खुलेआम लड़कियों के साथ छेड़खानी होती है दुष्कर्म की घटनाएँ बढ़ रही हैं और जनता धर्म,जाति व् वर्गों में ही उलझी हुई है .जिनके लड़के ऐसी वारदातें कर रहे हैं वे स्वयं दूसरे पक्ष पर दोषारोपण कर अपने लड़कों  को बचा रहे हैं  ,जनता में से ही एक वर्ग ऐसी घटनाओं का विरोध करने वालों को अंजाम भुगतने की धमकी दे रहा है ,क्या ये जनता की कारस्तानियाँ नहीं हैं ?क्या ये सभी की जानकारी में नहीं हैं ?
*खाद्य पदार्थों की बिक्री करने वाले व्यापारी अपने यहाँ असली नकली सभी तरह  का सामान रखते हैं .अनपढ़ ,सीधे साधे लोगों को यदि किसी सामान की ,क्योंकि उनके द्वारा उसकी मिलावट की जाँच किया जाना संभव नहीं होता इसलिए खुले रूप में बिक्री करते हैं और यदि पकड़ लिए जाएँ तो कहते हैं कि ''हमें अपने  बच्चे पालने हैं  ''क्या ये जनता नहीं है जिसे अपने बच्चे तभी पालने हैं  जब वह दूसरे के बच्चे मार ले .और ये तो पकडे जाने पर हाल हैं वर्ना मामला तो इससे पहले ही जाँच अधिकारी के आने की सूचना मिल जाने के कारण सामान को खुर्द बुर्द कर पहले ही रफा दफा कर दिया जाता है और व्यापारी को क्लीन चिट मिल जाती है और पकडे जाने में भी जनता की कोई निस्वार्थ कार्यवाही नहीं बल्कि एक गलत काम करने वाला अपनी प्रतिस्पर्धा के कारण अपने प्रतिद्वंदी को पकडवा देता है .क्या ये जनता भोली कही जाएगी ?
*अदालतों में काम नहीं होता इसी जनता की आम शिकायत है जबकि मुक़दमे जनता के ,वादी-प्रतिवादी जनता ,कभी वादी द्वारा अनुपस्थिति की दरख्वास्त तो कभी प्रतिवादी द्वारा ,वकील की अनुपस्थिति को तो कोर्ट कोई महत्व नहीं देती ,उस पर तारीख-पे तारीख पे तारीख का रोना भी जनता ही रोती है  ,अदालती कार्यवाही  को बेकार भी जनता ही कहती है क्या उसका ऐसी स्थिति में कोई योगदान नहीं ?
*बिजली के लिए पहले लगाये गए तारों पर कटिया डालकर बिजली आसानी से अवैध रूप से ली जा रही थी जब नए तार लगाने के लिए बिजली कर्मचारी जनता के बीच पहुँचते हैं तो उन्हें वही न्यायप्रिय जनता मार-पीटकर क्यूं भगा देती है मात्र इसलिए क्योंकि अब वे तार रबड़ के हैं और कटिया डालकर अवैध रूप से बिजली लेना संभव नहीं रहेगा .
*धूम्रपान सार्वजानिक स्थलों पर मना किन्तु जनता जब तब इस कानून का उल्लंघन करती है .गुटखा खाना मना पर कहाँ मना हुआ बिकना जनता चोरी छिपे इसका प्रयोग करती है .गाड़ियों पर काले शीशे मना  किन्तु अब  भी दिखती हैं जनता की काले शीशे  की गाड़ियाँ .सिगरते १८ साल से कम उम्र के बच्चे को बेचना माना किन्तु वे खरीदते भी हैं और पीते भी हैं जनता के बीच में ही .
*कुपोषण का ठीकरा भी अब सरकार के माथे फोड़ा जा रहा है ,कहा जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद अन्न सड़ रहा है ,जनता को नहीं बांटा  जा रहा है ,सरकार की प्रतिबद्धता में कमी है किन्तु यदि सरकार इन्हें जनता में बाँटने के लिए अपने अधीनस्थ अधिकारियों में वितरित भी कर दे तो हाल क्या होगा ?जनता निश्चित दिन लेने पहुंचेगी और उसे अगले दिन ,किसी और समय कहकर टरका दिया जायेगा और जब बांटा जायेगा तब ऐसी आपाधापी में कि जनता को मात्र ऐसे पहुंचेगा जैसे ऊंट के मुहं में जीरा .
   *सरकार की योजना मिड-डे-मील ,जो अन्न आता है बच्चों में बाँटने के लिए कितने ही स्कूल उसे बाज़ार में बेच रहे हैं ऐसी सूचनाएँ सभी  जानते हैं .
  सरकार चाहे कौंग्रेस की हो या भाजपा की या जनता दल या किसी अन्य दल की ,जनता के हित  में बहुत सी योजनायें बनती हैं किन्तु पहले नेता ,फिर सरकारी अधिकारी फिर व्यापारी और फिर जनता में से हम में से ही कुछ दबंग उन्हें निष्फल बना  देते हैं .कुछ लोगों के लिए ही ये लाभकारी रहती हैं और जनता जनता का एक बड़ा वर्ग इसके लिए तरसता ही रहता है .क्यूं जनता यहाँ अपनी जिम्मेदारी से इंकार करती है जबकि इसके लिए सबसे बड़ी जिम्मेदारी जनता की ही है .
जब चुनाव का वक्त आता है ,वोट देने का नंबर आता है तब जनता गरीबी के कारण शराब ,साड़ी में बिक जाती है किन्तु ऐसा नहीं है कि केवल गरीब जनता  ही बिकती है ,अमीर जनता भी बिकती है ,वह शरीफ ,योग्य ,ईमानदार प्रत्याशी के स्थान पर देखती है दबंगई ,वह देखती है कि किस प्रत्याशी में दम है कि मेरे मुक़दमे अदालत के बाहर  निबटवा दे ,मुझे अपने प्रभाव से टेंडर दिलवा दे ,दूसरे की जमीन का ये हिस्सा मुझे गुंडागर्दी से दिलवा दे ,मेरे साथ खड़ा हो तो दूसरों को भय ग्रस्त  करा दे .ऐसे में जनता सरकार को दोष देने का अधिकार ही कहाँ रखती है जबकि वह स्वयं भी इस देश को लूटकर खाने में लगी है .जब कोई कालिदास बन उसी शाख पर बैठकर उसी को काट रहा हो तो क्या उसे होने वाले नुकसान के लिए आकाश या पाताल को उत्तरदायी ठहराया जायेगा .डॉ.ओ.पी.वर्मा कहते हैं -
  ''बाग को माली जलाना चाहता है ,
 तुम नए पौधे लगाकर क्या करोगे .
लूट ली डोली कहारों ने स्वयं ही ,
सेज दुल्हन की सजाकर क्या करोगे .''
      शालिनी कौशिक  
             [कौशल  ]

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2015

गुलाम हर किसी को समझें हैं मर्द सारे



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हर दौर पर उम्र में कैसर हैं मर्द सारे ,
गुलाम हर किसी को समझें हैं मर्द सारे .
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बेटे का जन्म माथा माँ-बाप का उठाये ,
वारिस की जगह पूरी करते हैं मर्द सारे.
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ख़िताब पाए औरत शरीक-ए-हयात का ,
ठाकुर ये खुद ही बनते फिरते हैं मर्द सारे .
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रुतबा है उसी कुल का बेटे भरे हैं जिसमे ,
जिस घर में बसे बेटी मुल्ज़िम हैं मर्द सारे .
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लड़की जो बढे आगे रट्टू का मिले ओहदा ,
दिमाग खुद में ज्यादा माने हैं मर्द सारे .
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जिस काम में भी देखें बढ़ते ये जग में औरत ,
मिलकर ये बाधा उसमे डाले हैं मर्द सारे .
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मिलती जो रियायत है औरत को हुकूमत से ,
जरिया बनाके उसको लेते हैं मर्द सारे .
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आरामतलब जीवन औरत के दम पे पायें ,
आसूदा न दो घड़ियाँ देते हैं मर्द सारे .
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पाए जो बुलंदी वो इनाने-सल्तनत में ,
इमदाद-ए-आशनाई कहते हैं मर्द सारे .
'''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''
बाज़ार-ए-गुलामों से खरीदकर हैं लाते ,
इल्ज़ाम-ए-बदचलन उसे देते हैं मर्द सारे.
'''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''
मेहर न मिले मन का तो मारते जलाकर ,
खुद पे हुए ज़ुल्मों को रोते हैं मर्द सारे .
''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''
हालात ''शालिनी''ही क्या -क्या बताये तुमको ,
देखो इन्हें पलटकर कैसे हैं मर्द सारे .
''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''
शब्दार्थ:-ठाकुर -परमेश्वर ,कैसर-सम्राट ,आशनाई-प्रेम दोस्ती ,इमदाद -मदद ,आसूदा-निश्चित और सुखी ,इमदाद-ए-सल्तनत -शासन सूत्र .

              शालिनी कौशिक 
                    [कौशल ]


मंगलवार, 14 अप्रैल 2015

प्रधानमंत्री जी लालकिले के भाषण को सत्य साबित करें अपने राज्य के परिप्रेक्ष्य में


हिंदू बच्चे भगवा रंग में तो मुस्लिम बच्चों का हरा रंग

धर्म के आधार पर ड्रेस निर्धारित करने पर सफाई

 
दो स्कूलों में हरी और भगवा रंग की ड्रेसधर्म के आधार पर ड्रेस निर्धारित करने पर सफाईObama's Comments on 'Religious Intolerance': Mixed Reactions in India
''…माना अपनी वेशभूषण और बोलियाँ अनेक हैं ,
   रीति-रिवाज़ धर्म और जाति ,विचारधारा अनेक हैं ,
पर गूंजती है चहुँ दिशा में दिल की धड़कन एक है … ''
अब ये कहना मुमकिन नहीं क्योंकि अब इस देश में भेदभाव का जहर बच्चों में घोलने का कार्य आरम्भ हो चुका है और वह भी हमारे माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के ही गृह राज्य से।
   अहमदाबाद के शाहपुर में जिस स्कूल में हिन्दू बच्चों की संख्या ज्यादा है वहां बच्चों की यूनिफार्म केसरिया रंग की व् जहाँ मुस्लिम बच्चों की संख्या ज्यादा है वहां हरे रंग की यूनिफार्म निर्धारित की गयी है। भारत जहाँ हमेशा से विभिन्न धर्म संस्कृतियों का मेल मिलाप रहा है ,जहाँ धर्म इबादत की भगवान को पाने की राह का राही रहा है कोई एक दूसरे से दंगा फसाद या भेदभाव की पृष्ठभूमि नहीं। जहाँ साम्प्रदायिकता की आग फ़ैलाने के लिए कलंक झेल रहे हमारे प्रधानमंत्रीजी लालकिले से उच्चस्वर में सभी के साथ चलने की बात करते हैं -
Prime Minister Narendra Modi
This country has been built on such foundation of ancient cultural heritage, where we were told of only onemantra during Vedic period, which is indicative of our workculture, which we have learnt, we have memorized – “Sangachchhdhvam Samvadadhvam sam wo manansi jaanataam.” We walk together, we move together, we think together, we resolve together and together we take this country forward. Having imbibed this basic mantra, 125 crores of countrymen have taken the nation forward. 
   इसे केवल बात और भाषण ही कहा जा सकता है और भारत में फ़ैल रही यह सच्चाई इस समय दुनिया के कोने कोने में पहुँच रही है और इसी तरफ इशारा किया था हमारे गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि अमेरिका के राष्ट्रपति श्री बराक ओबामा जी ने ,जिन्होंने कहा था -


On Thursday, in a 25-minute address to the National Prayer Breakfast, President Obama referred to India while talking about religious freedom. "Michelle and I returned from India -- an incredible, beautiful country, full of magnificent diversity -- but a place where, in past years, religious faiths of all types have, on occasion, been targeted by other peoples of faith, simply due to their heritage and their beliefs -- acts of intolerance that would have shocked Gandhiji, the person who helped to liberate that nation," he said.
क्या गलत कहा उन्होंने अगर हम अहमदाबाद के इन स्कूलों के परिप्रेक्ष्य में देखें।  शर्म की बात है यह हम हिन्दुस्तानियों के लिए जहाँ फ़िल्में तक आजतक यही सन्देश विश्व में प्रसारित करती आई हैं -
''इंसान का इंसान से हो भाईचारा ,
   यही पैगाम हमारा,यही पैगाम हमारा। ''
  वहां हमारे अतिथि हमें इस सम्बन्ध  में समझ देने की कोशिश करें। भारत के महापुरुषों ने इस देश में ही क्या समस्त विश्व में भाईचारे का सन्देश फैलाया है भाई को चारे के रूप में इस्तेमाल करने का नहीं ,वहां हमें देखना होगा कि हमारी पीढ़ियां आपस में प्रेम का ,सौहार्द का ,समभाव का सन्देश लेकर आगे बढ़ें न कि इस तरह के भेदभाव का। हमें कवि श्रेष्ठ गोपाल दास 'नीरज ' जी की इन पंक्तियों को ध्यान में रख इस सम्बन्ध में सही सोच को अपनाना ही होगा -
''अब तो मजहब कोई ऐसा भी चलाया जाये ,
    जिसमे इंसान को इंसान बनाया जाये। 
आग बहती है यहाँ गंगा में भी झेलम में भी ,
   कोई बतलाये कहाँ जाके नहाया जाये। 
मेरे दुःख-दर्द का तुझ पर हो असर ऐसा ,
   मैं रहूँ भूखा तो तुझसे भी न खाया जाये। ''

शालिनी कौशिक 
    [कौशल ]


सोमवार, 13 अप्रैल 2015

भारत में मताधिकार ही समाप्त करा दो राउत जी



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हमारा संविधान हमारे देश का सर्वोच्च कानून है और सभी इसका ह्रदय से सम्मान करते हैं अब करते हैं या नहीं ,पूरे विश्वास से नहीं कह सकते किन्तु इतना अवश्य कह सकते हैं कि सम्मान का दिखावा अवश्य करते हैं और विशेषकर वे जिनके हाथों में हमारे इस लोकतंत्र की बागडोर है .लोकतंत्र जिसके लिए बड़े जोर-शोर से कहा जाता है कि ''ये मूर्खों का ,मूर्खों के लिए और मूर्खों के द्वारा किया गया शासन है '' ऐसा केवल कथन रूप में ही नहीं वास्तविकता में भी साबित होता है क्योंकि ये यहाँ की जनता की मूर्खता ही कही जाएगी जो बार बार अपने ऊपर मूर्खों को राज करने का मौका देती है और अपने ही पैरों में ठीक वैसे ही कुल्हाड़ी मार लेती है जैसी कुल्हाड़ी कालिदास पेड़ की उस डाल पर मार रहे थे जिस पर वे खुद बैठे हुए थे और जनता के पैरों में कुल्हाड़ी अबकी बार मारी है राजग की सहयोगी पार्टी शिवसेना के राज्यसभा संसद राउत ने जिन्होंने ओवेसी बंधुओं पर हमला बोलते हुए देश के सर्वोच्च कानून संविधान की इस संकल्पना, जिसके द्वारा संविधान सामाजिक ,आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय की स्थापना करता है ,पर ही गहरा आघात कर दिया ,उन्होंने कहा कि मुस्लिमों से मताधिकार छीन लेना चाहिए क्योंकि मताधिकार ख़त्म होते ही ख़त्म हो जाएगी मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति, क्या भारत में केवल मुस्लिम वोट बैंक की ही राजनीति चल रही है यहाँ तो विभिन्न जातियों की भी वोट बैंक की राजनीति की जाती है जिसमे कोई दलित वोट बैंक की राजनीति करता है ,तो कोई जाट वोट बैंक की ,कोई यादव वोट बैंक की राजनीति करता है तो कोई ब्राह्मण वोट बैंक की ,ऐसे में अगर इस देश में वोट बैंक की राजनीति ऐसे ही ख़त्म करनी है तो इन सबकी वोट भी खत्म की जानी चाहियें और ऐसे में तो भारत में मताधिकार ही समाप्त कर देना चाहिए क्योंकि न मताधिकार होगा और न वोट बैंक की राजनीति .

शालिनी कौशिक
    [कौशल ]

रविवार, 12 अप्रैल 2015

''हे प्रभु अगले जन्म मोहे बिटिया न कीजो .''


 कई बार पहले भी देख चुकी 'चक दे इंडिया' को फिर एक बार देख रही थी .बार बार कटु शब्दों से भारतीय नारी का अपमान किया गया किन्तु एक वाकया जिसने वाकई सोचने को मजबूर कर दिया और भारतीय नारी की वास्तविक स्थिति को सामने लाकर खड़ा कर दिया वह वाक्य कहा था फ़िल्म में क्रिकेट खिलाडी अभिमन्यु सिंह ने चंडीगढ़ की हॉकी खिलाडी प्रीति से ,

''हार जाओगी तो मेरी बीवी बनोगी ,जीत जाओगी तो भी मेरी बीवी बनोगी ऐसा तो नहीं है कि वर्ल्ड कप से से आओगी तो सारा हिंदुस्तान तुम्हारा नाम जप रहा होगा .''
कितना बड़ा सच कहा अभिमन्यु ने और इससे हटकर भारतीय नारी की स्थिति और है भी क्या ,फ़िल्म में काम करती है तो हीरो के बराबर मेहनत किन्तु मेहनताना कम ,खेल में खेलने में बराबर मेहनत किन्तु पुरुष खिलाडी के मुकाबले कम मैच फीस .खेलों में क्रिकेट में पुरुष टीम भी और महिला टीम भी किन्तु पुरुष टीम के पीछे पूरा भारत पागल और महिला टीम के प्रति स्वयं महिला भी नहीं .पुरुष टीम वर्ल्ड कप जीत लाये इसके लिए एक महिला [पूनम पांडे ] निर्वस्त्र तक होने को तैयार जबकि पुरुषों में महिला टीम के प्रदर्शन तक को लेकर कोई क्रेज़ नहीं .
हमारे एक अंकल की बेटी ने जब अंकल से कहा कि आपने हमारी पढाई के लिए कुछ नहीं किया जो किया मम्मी ने किया तो वे कहते हैं कि वह क्या कर सकती थी ,वह क्या एक भी पैसा कमाती थी ? ये है एक नारी के अपनी ज़िंदगी अपने परिवार के लिए ,बच्चों के लिए स्वाहा कर देने की कीमत कि उसके लिए उसके परिवार तक में उसके बीमार पड़ने पर कह दिया जाता है ''कि अपने कर्म भुगत रही है ''जबकि वही नारी जब अपने पति को बीमारी की गम्भीर अवस्था में देखती है तो अपनी ताकत से बाहर अपनी क्षमता जाग्रत करती है और सावित्री बन सत्यवान के प्राण तक यमराज से छीन लाती है .
आज हर तरफ महिलाएं छायी हुई हैं ,घर तो उनका कार्यक्षेत्र है ही और उनके बिना घर में गुजारा भी नहीं है ,गावों में खेतों में महिलाएं पुरुषों के साथ खेत पर मेहनत करती हैं और घर के भी सारे काम निबटाती हैं .शहरों में नौकरी भी करती हैं और सुबह को काम पर जाने से पहले और काम से आने के बाद भी घर के काम निबटाती हैं और कितने ही काम इनके ऑफिस से छुट्टी के दिन इकट्ठे रहते हैं अर्थात नौकरी से भले ही अवकाश हो किन्तु उनके लिए अवकाश नाम की चीज़ नहीं .छुट्टी वाले दिन जहाँ आदमी पैर पसार कर सोते हैं या सिनेमा हाल में फ़िल्म देख दोस्तों के साथ हंसी मजाक में व्यतीत करते हैं वहीँ महिलाएं हफ्ते भर के इकट्ठे गंदे कपडे धोती हैं ,मसाले तैयार करती हैं ,कपड़ों पर प्रैस आदि का काम करती हैं और इस सबके बावजूद उसकी अक्ल घुटनों में ,वह करती ही क्या है ,ऐसे विशेषणों से नवाज़ी जाती है ,उसी के जन्म पर आंसू बहाये जाते हैं और रोने वालों में पुरुषों से आगे बढ़कर नारियां ही होती हैं .
आज तक न तो पुरुष ने नारी की कद्र की और न नारी ने स्वयं नारी की ,दोनों के लिए ही वह बेकार है और ऐसी बेकार है जिसकी बहु रूप में तो आवश्यकता है बेटे का घर बसाने के लिए किन्तु बेटी रूप में नहीं ,माँ रूप में तो ज़रुरत है बच्चे के पालन पोषण के लिए किन्तु बच्चे के रूप में नहीं और इसलिए सही कहा अभिमन्यु सिंह ने कि नारी की एक ही नियति है ''पुरुष की गुलामी ''स्वयं करे या अपने परिजनों के कहने पर करे ,अरैंज करे या लिव इन में रहे हर हाल में उसे यही करना है और यदि नहीं करती है तो कुल्टा कह समाज में तिरस्कृत किया जाता है और ऐसे परिणाम से बचने के लिए भी वह पुरुष के ही वश में होती है और इसलिए शायद यही प्रार्थना करती है कि-हे प्रभु अगले जन्म मोहे बिटिया न कीजो .''
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2015

बालियान खाप सम्मान की हक़दार

 

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Balyan Khap

Balyan Khap khap has 100 villages. Its head village is Sisauli in muzaffarnagar. Its main villages are: Sauram, Harsauli , Barbala. Ch. Mahendra Singh Tikait - President, Bharatiya Kisan Union, is from this khap. The famous jat historian Choudhary Kabul Singh was from this khap and It has been mentioned in the chronicles of Jat 'Sarv Khap', which are still preserved with Chaudhry Kabul Singh. The great Bappa Rawal was their ancestor. James Tod has called them Balvanshi. [7] 
 खाप वर्तमान में सर्वाधिक चर्चा में रहती हैं . अपने विवादास्पद फरमानों को लेकर -कभी लड़कियों के मोबाईल पर पाबन्दी तो कभी जींस पर ;इन फरमानों को आधुनिकता के मद्देनज़र भले ही विवाद की श्रेणी में रख दिया जाये किन्तु समाज के गिरते नैतिक व् चारित्रिक स्तर को सँभालने हेतु सही ही कहा जायेगा और भले ही इन फरमानों को विवादित श्रेणी में रख दिया जाये किन्तु ९ अप्रैल २०१५ को शाहपुर के रसूलपुर जाटान में बालियान खाप ने सम्पूर्ण भारतीय समाज के सामने एक मार्गदर्शक आदर्श स्थापित कर दिया .
    शाहपुर थाना क्षेत्र के रसूलपुर जाटान निवासी बालियान खाप का एक युवक सेना में तैनात है .शामली के गाँव   कासमपुर निवासी ग्रामीण ने अपनी बेटी का रिश्ता उससे तय किया था .२४ अप्रैल को शादी थी और उससे पहले वर पक्ष द्वारा शादी में गाड़ी मांगने की बात सामने आई .इसी के मद्देनज़र बालियान खाप ने वर पक्ष को दहेज़ मांगने पर सजा के रूप में दो साल के लिए शादी पर पाबन्दी लगा दी और ८१ हज़ार रूपये का जुर्माना किया .जुर्माने का भुगतान पंचायत में ही लड़की पक्ष को कराया गया .
      आज आधुनिकता की ओर बढ़ रहे समाज में इन खापों को पिछड़े होने का दर्ज प्राप्त है और इनके द्वारा ऐसा ऐसा कदम उठाया जाना आज की आधुनिकता में रँगे उस समाज के मुंह पर करारा तमाचा है जो करते तो बात आधुनिकता की हैं और शादी के नाम पर बेटे को बेचते हैं और वह भी उस समय में जब लड़कियां योग्यता में लड़कों से चार कदम आगे ही नज़र आ रही हैं .दहेज़ जैसी कुप्रथा को समाप्त करने की दिशा में यह निर्णय एक मील के पत्थर के समान है और वर पक्ष के लालच को इतने अनूठे फरमान द्वारा लगभग दफ़न ही कर दिए जाने के लिए बालियान खाप की प्रशंसा सभी को मुक्त कंठ से करनी चाहिए .

शालिनी कौशिक
   [कौशल ]

संभल जा रे नारी ....

''हैलो शालिनी '' बोल रही है क्या ,सुन किसी लड़की की आवाज़ मैंने बेधड़क कहा कि हाँ मैं ही बोल रही हूँ ,पर आप ,जैसे ही उसने अपन...