कैराना -मोदी-योगी को घुसने का मौका


             पलायन मुद्दे के शोर ने कैराना को एकाएक चर्चा में ला दिया ,सब ओर पलायन मुद्दे के कारण कैराना की बात करना एक रुचिकर विषय बन गया था ,कहीं चले जाओ जहाँ आपने कैराना से जुड़े होने की बात कही नहीं वहीं आपसे बातचीत करने को और सही हालात जानने को लोग एकजुट होने लगते ,उन्हीं दिनों मुझे भी आयोग के समक्ष एक साक्षात्कार  में जाने का अवसर मिला तो बोर्ड के सदस्यों ने यह जानते ही कि मैं कैराना में वकालत करती हूँ ,मुझसे पहला प्रश्न यही किया ''कि कैराना पलायन मुद्दे की वास्तविकता क्या है ?'' अब सच क्या है ये मैं यहाँ अपने विचारों से आपके समक्ष कुछ तो रख ही दूंगी और जानती हूँ कुछ न कुछ तो आप भी अपने आप निकाल ही लेंगे क्योंकि सच है कि आज की जनता सब जानती है ,बेवकूफ नहीं है ,किसी से पागल बनने वाली भी नहीं है .
               राजनीती और गठरी उद्योग कैराना की नसों में पल रहा है .यहाँ एक तरफ नेता हैं तो दूसरी तरफ गठरी के माध्यम से तस्करी करने वाले .एक तरफ लोगों के पेट नेतागर्दी से भरता है तो दूसरी तरफ अवैध सामानों को गठरी में बांधकर बॉर्डर पार ले जाकर पैसा कमाने से ,जबकि एक स्थानीय निवासी के अनुसार ,गठरी उद्योग तो अब समाप्त हो गया है और उसकी जगह ले ली है अब स्मैक के कारोबार ने ,जिसकी चपेट में न केवल कैराना के बल्कि आस-पास के गांव व् कस्बों के युवा भी तेजी से आ रहे हैं किन्तु एक अन्य स्थानीय निवासी के अनुसार गठरी उद्योग पुलिस की चौकसी के कारण छुपकर हो रहा है उसका कहना है -'' अरे ये भी कहीं ख़त्म हुआ करें क्या ?सब चलता रहवे और चल भी रहा है .''
              इस सब के बीच जो बात बिलकुल ही बर्दाश्त के बाहर है वह है शहर के उस स्वागत द्वार पर जो कांधला की ओर है कूड़े-कचरे का ढेर ,जो कि मात्र ढेर ही नहीं है बल्कि गंदगी का साम्राज्य अगर कह दिया जाये तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी और उस पर कूड़े में से कुछ बीनते बच्चे व् गंदगी खाते सुअर और साथ ही २०१३ के दंगों में भागकर आये लोगों का उसी गंदगी में जीवनयापन करना ,वाकई बर्दाश्त की हद के बाहर है .कांधला से कैराना में प्रवेश एक ऐसा खतरनाक कार्य है जो कि ब्लू व्हेल गेम से भी ज्यादा जानलेवा है ,क्योंकि ब्लू व्हेल गेम तो जो खेलेगा वही मरेगा किन्तु कांधला से कैराना में प्रवेश ,न चाहते हुए भी स्वास्थ्य को झेलना पड़ेगा ,आँखों को देखना पड़ेगा और नाक को सूंघना भी पड़ेगा .
           मोदी सरकार द्वारा स्वच्छता अभियान के लिए करोड़ों रूपये की योजनाएं चलायी जा रही हैं ,जिला खुले में शौचमुक्त [ओडीएफ ]घोषित किया जा रहा है फिर कहाँ है योजना की सफलता जब सारी गंदगी यहाँ खुले में दिखाई दे रही है .मात्र कागजों में खुले में शौचमुक्ति को सफलता नहीं कहा जा सकता है ,ये सफलता तब दिखाई देगी जब कहीं भी ऐसी गंदगी के कारण रुमाल से नाक न ढकनी पड़े और रही अन्य गंदगी की बात ,प्रदेश में पॉलिथीन प्रतिबंधित है ,कोई बताये कहाँ है प्रतिबन्ध -फल सब्जी पॉलिथीन में मिल रहे हैं ,मौसमी आदि फलों का जूस कहीं ले जाने के लिए पॉलिथीन में मिल रहा है और यही पॉलिथीन इस्तेमाल के पश्चात् कैराना के बाहर फेंकी जा रही है जिसे बच्चे बीनते हुए गंदगी के ढेर में घुमते हुए आप स्वयं मेरे द्वारा प्रत्यक्ष लिए गए फोटो में देख सकते हैं वैसे भी कहा गया है -''प्रत्यक्षं किं प्रमाणं ?'' और कहना यहाँ के स्थानीय निवासियों का पेट पालने को ये बच्चे गंदगी में घुस रहे हैं और गंदगी बर्दाश्त करने को स्मैक की  लत पाल रहे हैं .
            और सबसे जरूरी जो सबके लिए ही है ''पापी पेट का सवाल '' वो भी यहाँ खतरे में पड़ गया है .कैराना में जो लोगों की आय का एक महत्वपूर्ण साधन था वह भी अब लगभग हिलता जा रहा है और वह है कैराना कोर्ट .उन तहसील का बनना ,यहाँ से फैमिली कोर्ट का जाना ,कई थाने कटना और शामली जिला बनना जिससे जिला जज के जिले में ही बैठने के कारण कैराना से कोर्ट का लगभग काम छिनने वाला है और छिनने वाला है निवाला बहुतों के मुंह से जो दशकों से यहाँ लगे थे और अपने परिवार का पालन-पोषण हर विपत्ति के बावजूद यहाँ रहकर कर रहे थे .
             ये हाल हैं कैराना के ,अब कोई बताये कि ऐसे में भला कोई सभ्य-सुशिक्षित यहाँ कैसे रह लेगा ,मर्डर-चोरी-रंगदारी ने तो पहले ही यहाँ के लोगों की कमर तोड़ दी है और अब ये जो हाल है ,पहले तो इसमें कोई भी खुद ही मर जायेगा और अगर दुर्भाग्य से कहूं या सौभाग्य से किसी तरह बच गया तो पलायन करेगा ही करेगा आखिर अपनी पीढ़ियों को वो माहौल कौन देना चाहेगा जो कैराना दे रहा है और लगता नहीं कि ये कैराना किसी को भी जीने देगा ,नगरपालिका चुनाव में वोटों को बटोरने के प्रयास हेतु ये आसपास के भी सभी गांव ख़तम करके ही छोड़ेगा क्योंकि दंगों से भागकर आये लोगों की वोट बटोरने का प्रयास शुरू हो चुका है.जो गंदगी सारे कार्यकाल में नहीं दिखी वह अब दिख रही है और उसे यहाँ से ट्रेक्टर-ट्रालियों में उठवाकर पास के गांव के खेतों-बागों के आगे डलवाया जा रहा है .फोटो आपके सामने हैं इसलिए कहना ही पड़ेगा कि कैराना के वास्तव में दुर्दिन आ गए हैं या फिर मोदी -योगी वाले अच्छे दिनों का मौका .


शालिनी कौशिक
    [कौशल ]

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