रविवार, 31 अगस्त 2014

मेरे लहू में है ,


कहने की नहीं हसरत ,मेरे लहू में है ,
सहने की नहीं हिम्मत ,मेरे लहू में है ,
खंजर लिए खड़ा है ,मेरा ही भाई मुझ पर ,
जीने की नहीं उल्फत ,मेरे लहू में है .
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खाते थे रोटी संग-संग ,फाके भी संग किये थे ,
मुश्किल की हर घडी से ,हम साथ ही लड़े थे ,
अब वक़्त दूसरा है ,मक़सूम दिल हुआ है ,
मिलने की नहीं उल्फत ,मेरे लहू में है .
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सौंपी थी मैंने जिसके ,हाथों में रहनुमाई ,
अब आया वही बढ़कर ,है करने को तबाही ,
मुस्कान की जगह अब ,मुर्दादिली है छाई ,
हमले की न महारत ,मेरे लहू में है ,
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वो पास खड़े होकर ,यूँ मारते हैं पत्थर ,
सिर पर नहीं ये चोटें ,आके लगे हैं दिल पर ,
इंसानियत के टुकड़े, वे बढ़के कर रहे हैं ,
झुकने की न मुरौवत ,मेरे लहू में है ,
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बर्बाद कर रहे ये ,सदियों का भाईचारा ,
इनके लिए है केवल ,पैगाम ये हमारा ,
मिल्लत के दुश्मनों को , ''शालिनी ''क़त्ल कर दे ,
क़ुरबानी की ही चाहत ,मेरे लहू में है ,
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शालिनी कौशिक 
       [कौशल ]

8 टिप्‍पणियां:

yashoda agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना मंगलवार 02 सितम्बर 2014 को लिंक की जाएगी........
http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

कालीपद "प्रसाद" ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना वर्त्तमान परिस्थिति पर !
गणपति वन्दना (चोका )
हमारे रक्षक हैं पेड़ !

abhishek shukla ने कहा…

behtareen!!!

Anita ने कहा…

धर्म के नाम पर भेद भाव को अब विदा होना होगा..भारतीयों को एकजुट होकर देश को आगे ले जाना होगा..सुंदर संदेश देती कविता..

Deepak Sharma ने कहा…

किस दर्द की ये बातें,सभ्यों की करामातें,किस राह के इशारे,लब्जों में गुनगुनाते ! हर राह देखकर भी,हर मोड़ गुजारे,पर,खामोश सी अदाएं,मेरे लहूँ में है !!

Yashwant Yash ने कहा…

बेहतरीन रचना

सादर

Preeti 'Agyaat' ने कहा…

एक सच्चाई..बेबाकी से लिखी गई !

Anusha Mishra ने कहा…

बहुत सुन्दर

काश ऐसी हो जाए भारतीय नारी

चली है लाठी डंडे लेकर भारतीय नारी , तोड़ेगी सारी बोतलें अब भारतीय नारी . ................................................ बहुत दिनों ...