गुरुवार, 7 अगस्त 2014

लिव इन की तो सोच ही चोट है .-[भारतमित्र मंच द्वारा आयोजित जुलाई की मासिक प्रतियोगिता में विजेता का सम्मान प्राप्त ]

[भारतमित्र मंच द्वारा आयोजित जुलाई की मासिक प्रतियोगिता में  विजेता का सम्मान प्राप्त ]


प्रसिद्द समाजशास्त्री आर.एन.सक्सेना कहते हैं कि-
''ज्यों ज्यों एक समाज परंपरा से आधुनिकता की ओर बढ़ता है उसमे शहरीकरण ,औद्योगीकरण ,धर्म निरपेक्ष मूल्य ,जनकल्याण की भावना और जटिलता बढ़ती जाती है ,त्यों त्यों उसमे कानूनों और सामाजिक विधानों का महत्व भी बढ़ता जाता है .''
     सक्सेना जी के विचार और मूल्यांकन सही है  किन्तु यदि हम गहराई में जाते हैं तो हम यही पाते हैं कि मानव प्रकृति जो चल रहा है ,चला आ रहा है उसे एक जाल मानकर छटपटा उठती है और भागती है उस तरफ जो उसके आस पास न होकर दूर की चीज़ है क्योंकि दूर के ढोल सुहावने तो सभी को लगते हैं .हम स्वयं यह बात अनुभव करते हैं कि आज विदेशी भारतीय संस्कृति अपनाने के पीछे पागल हैं तो भारतीय विदेशी संस्कृति अपनाने की पीछे पागल हैं ,देखा जाये तो ये क्या है ,मात्र एक छटपटाहट परिवर्तन के लिए जो कि प्रकृति का नियम है जिसके लिए कहा ही गया है कि -
   ''change is the rule of nature .''
 और यह सांस्कृतिक परिवर्तन चलता ही रहता है क्योंकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और वह मानव ही इसलिए है क्योंकि उसकी एक संस्कृति है ,उसके पास संस्कृति है ,संस्कृति ही वह अनुपम धरोहर है जो मनुष्य को पशु से श्रेष्ठ घोषित करती है और इसी की सहायता से मानव पीढ़ी दर पीढ़ी प्रगति की ओर उन्मुख होता है .
       संस्कृति का अर्थ होता है विभिन्न संस्कारों के द्वारा सामूहिक जीवन के उद्देश्यों की प्राप्ति ,यह परिमार्जन की एक प्रक्रिया है .संस्कारों को संपन्न करके ही एक मानव सामाजिक प्राणी बनता है .
      राबर्ट बीरस्टीड लिखते हैं -''संस्कृति वह सम्पूर्ण जटिलता है जिसमे वे सभी वस्तुएं सम्मिलित हैं ,जिन पर हम विचार करते हैं ,कार्य करते हैं और समाज के सदस्य होने के नाते अपने पास रखते हैं .''

      बोगार्डस के अनुसार -''संस्कृति किसी समूह के कार्य करने व् सोचने की समस्त विधियां हैं .''
और भारतीय संस्कृति जिसकी पहचान ही है मानव में मानवीय मूल्यों दया,करुणा,भाईचारा .सहृदयता ,कोमलता [संवेदनाओं से भरा हुआ मन ],आपसी सद्भाव ,ममता ,समर्पण ,सरलता ,सहजता ,सरसता जैसे सुन्दर गुणों को व्यक्तित्व में समेटे होना ,यह वह संस्कृति है जो मानव को इंसान से देवता बना देती है ,यह वह संस्कृति है जो कहती है कि -
''धन से भोजन मिलता है -भूख नहीं ,
  धन से दवा मिलती है -स्वास्थ्य नहीं ,
  धन से साथी मिलते हैं -सच्चे मित्र नहीं ,
  धन से एकांत मिलता है -शांति नहीं ,
  धन से बिस्तर प्राप्त कर सकते हैं -नींद नहीं ,
  धन से आभूषण मिलते हैं -रूप नहीं ,
  धन से  सुख मिलता है -आनंद नहीं ,
    इसलिए धनवान होने से ज्यादा चरित्रवान होना आवश्यक है .''
श्री कृष्ण गोयल कहते हैं -''मनुष्य परमात्मा का अंश है ,उसमे परमात्मा के दिव्य ज्ञान ,गुण तथा शक्तियां सुप्त अवस्था में पड़े हैं अपने मन को ध्यान तथा एकाग्रता द्वारा परमात्मा का चिंतन करके दिव्यता को ग्रहण करना तथा प्रसारित करना भारतीय संस्कृति का लक्ष्य रहा है ,इसी कारण भारतीय संस्कृति की जड़ें बहुत गहरी तथा विस्तृत है .भारतीय संस्कृति आध्यात्म तथा मानवता पर आधारित है तथा चेतना के विकास द्वारा प्रेम ,समरसता  तथा मानवीय मूल्यों को सम्पूर्ण मान्यता प्रदान करती है .इसमें चरित्र तथा आंतरिक गुणों पर विशेष बल दिया गया है .मनुष्य के कर्म तथा व्यवहार में दिव्य गुण परिलक्षित होना सफल संस्कृति की ही देन है .''
    हमारी भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है आपसी भाईचारा और परिवार प्रेम और यही परिवार प्रेम मानव संस्कृति के एक महत्वपूर्ण पहलू की आवश्यकता को भी सामने लाता है जिसे विवाह कहते हैं .विवाह के बारे में बोगार्डस लिखते हैं -
      ''विवाह स्त्री पुरुष के पारिवारिक जीवन में प्रवेश करने की एक संस्था है .''
 इसी संबंध में प्रभु व् अल्टेकर कहते हैं -
   ''पति-पत्नी एवं बच्चों से युक्त मानव ही पूर्ण मानव है .वेदों में अविवाहित व्यक्ति को अपवित्र माना गया है .धार्मिक दृष्टि से वह अपूर्ण है और संस्कारों में भाग लेने योग्य नहीं है .''
    विदेशी विद्वान जहाँ विवाह को यौन संबंधों का नियमन मात्र ही मानते हैं वहीँ भारतीय संस्कृति इसे एक पवित्र धार्मिक संस्कार के रूप में परिभाषित करती है .
     विदेशी विद्वान डब्ल्यू .एच.आर.रिवर्स के अनुसार -
   ''जिन साधनों द्वारा मानव समाज यौन संबंधों का नियमन करता है उन्हें विवाह की संज्ञा दी जा सकती है .''
 जबकि भारतीय संस्कृति जो कि मुख्यतः आर्य मान्यताओं को मानने वाली है और जिस मान्यता को हिन्दू मान्यता का स्वरुप आज प्रमुखतः प्राप्त हो चुका है वहां विवाह एक धार्मिक संस्कार है ,गृहस्थ आश्रम स्वर्ग है ,यहाँ विवाह धार्मिक कर्तव्य की पूर्ति ,पुत्र प्राप्ति ,पारिवारिक सुख ,सामाजिक एकता पितृ ऋण से मुक्ति ,पुरुषार्थों की पूर्ति आदि उद्देश्यों से किया जाता है .डॉ.कपाड़िया ने हिन्दू विवाह को परिभाषित करते हुए कहा है कि -
 ''हिन्दू विवाह एक संस्कार है ....हिन्दू विवाह के तीन उद्देश्य हैं -धार्मिक कार्यों की पूर्ति ,संतान प्राप्ति और यौन सुख .''
 ऐसे में एक नए तरह का सम्बन्ध सामने आता है न ढोल ,न नगाड़ा ,न किसी से रायशुमारी बस सिर्फ पहचान ..एक लड़का ..एक लड़की ..आधुनिकता की ओर बढ़ती सभ्यता के समय में स्वयं साथ रहने का फैसला करते हैं ,जिसमे किसी तीसरे का कोई हस्तक्षेप नहीं ,कोई स्थान नहीं ,कोई पारिवारिक जिम्मेदारी नहीं ,कोई सामाजिक दायित्व नहीं ,जब तक साथ रहना संभव हो रहे ,जब सम्बन्ध असहज हो गए ..हिंसक हो गए तब अलग हो गए ...भले ही साथ रहने से कोई भावनात्मक सम्बन्ध बने हों ,शारीरिक संबंध बने हों ,कोई दायित्व नहीं ,भले ही अलग होने से सम्बन्ध के साथ दिल के भी शीशे की तरह टुकड़े-टुकड़े हो गए हों ,कोई एहसास नहीं ...सिर्फ यही एहसास कि एक प्रयोग कर रहे थे ...सफल हो जाते तो पति-पत्नी की तरह ज़िंदगी गुजार देते और असफल रहे तो जैसे सफर पूरा होने पर ट्रेन के यात्री बिछड़ जाते हैं ऐसे ही बिछड़ गए ...और आज युवा इस सोच की राह पर आगे बढ़ रहा है .फिल्म अभिनेत्री ईशा देओल भी मानती हैं कि -
  ''शादी से पहले लगभग २ साल लिव इन में रहना ज़रूरी है .''
प्रसिद्द मॉडल मेहर भसीन कहती हैं कि -
''आज के समय में लिव इन इसलिए ज़रूरी है क्योंकि तलाक का प्रतिशत बढ़ता जा रहा है .विवाह टूट रहे हैं .अब वह ज़माना नहीं रहा कि लोग मजबूरी में रिश्तों को ढोहें ,इसलिए लिव इन का विकल्प लोगों को आकर्षित कर रहा है क्योंकि यहाँ रिश्तों में जबरदस्ती नहीं है .'' 
 लिव इन को लेकर युवाओं की सकारात्मक सोच ही आज इस सम्बन्ध को भारतीय संस्कृति पर चोट साबित करने हेतु पर्याप्त है .जिस सम्बन्ध को भारतीय संस्कृति मात्र दो व्यक्तियों का मिलन न मानकर दो परिवारों दो सभ्यताओं का मिलन मानती है ,जहाँ नारी और पुरुष का ये रिश्ता सामाजिक समझदारी ,पारिवारिक सहयोग से निर्मित होता है ,जिस संस्कृति का गौरव परिवार-प्रेम ,भाईचारा है ,जिसमे माता पिता को देवोभवः की उपाधि दी गयी है उस देश में जहाँ सीता जैसी आर्य पुत्री जो सर्व सक्षम हैं ,भूमि से ऋषि मुनियों के रक्त से उत्पन्न आर्य कन्या हैं ,तक श्री राम को अपने वर के रूप में पसंद करते हुए भी अपने पिता के प्रण को ऊपर रखती हैं और माता गौरी से कहती हैं -

''मोर मनोरथ जानहु नीके ,बसहु सदा उर पुर सबही के ,
कीनेउ प्रगट न कारन तेहि ,अस कही चरण गहे वैदेही .''
अर्थात मेरी मनोकामना आप भली-भांति जानती हैं ,क्योंकि आप सदैव सबही के ह्रदय मंदिर में वास करती हैं ,इसी कारण मैंने उसको प्रगट नहीं किया ,ऐसा कहकर सीता ने उमा के चरण पकड़ लिए .[बालकाण्ड ]


 और ऐसे ही श्रेष्ठ आर्यपुत्र भगवान राम के बारे में महाराजा जनक के कुलगुरु शतानन्द जी भी यही महाराजा दशरथ को बताते हैं कि धनुष यज्ञ सम्पन्न होने पर सीता से राम विवाह सम्पन्न हो गया किन्तु वे सीता का पत्नी रूप में ग्रहण पिता की आज्ञा के अनुसार ही करेंगें ,ऐसी उनकी मनोकामना है .

   ऐसे आदर्श चरित्र भारतीय संस्कृति की शोभा हैं और ऐसे ही विवाह जैसे संस्कार के समय हिन्दू धर्म में पति-पत्नी द्वारा अग्नि के समक्ष लिए जाने वाले फेरे भारतीय संस्कृति की इस संबंध के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त करते हैं -जिनका विवरण कुछ यूँ है -

१- ॐ ईशा एकपदी भवः -हम यह पहला फेरा एक साथ लेते हुए वचन देते हैं कि हम हर काम में एक दूसरे  का ध्यान पूरे प्रेम ,समर्पण ,आदर ,सहयोग के साथ आजीवन करते रहेंगे .

  २- ॐ ऊर्जे द्विपदी भवः -इस दूसरे फेरे में हम यह निश्चय करते हैं कि हम दोनों साथ साथ आगे बढ़ेंगे .हम न केवल एक दूजे को स्वस्थ ,सुदृढ़ व् संतुलित रखने में सहयोग देंगे बल्कि मानसिक व् आत्मिक बल भी प्रदान करते हुए अपने परिवार और इस विश्व के कल्याण में अपनी उर्जा व्यय करेंगे .
 ३-ॐ रायस्पोशय  त्रिपदी भवः -तीसरा फेरा लेकर हम यह वचन देते हैं कि अपनी संपत्ति की रक्षा करते हुए सबके कल्याण के लिए समृद्धि का वातावरण बनायेंगें .हम अपने किसी काम में स्वार्थ नहीं आने देंगे ,बल्कि राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानेंगें .
 4- ॐ मनोभ्याय चतुष्पदी  भवः -चौथे फेरे में हम संकल्प लेते हैं कि आजन्म एक दूजे के सहयोगी रहेंगे और खासतौर पर हम पति-पत्नी के बीच ख़ुशी और सामंजस्य बनाये रखेंगे .
 ५- ॐ प्रजाभ्यःपंचपदी भवः -पांचवे फेरे में हम संकल्प लेते हैं कि हम स्वस्थ ,दीर्घजीवी संतानों को जन्म  देंगे और इस तरह पालन-पोषण करेंगे ताकि ये परिवार ,समाज और राष्ट्र की अमूल्य धरोहर साबित हो .
 ६- ॐ रितुभ्य षष्ठपदी  भवः -इस छठे फेरे में हम संकल्प लेते हैं कि प्रत्येक उत्तरदायित्व साथ साथ पूरा करेंगे और एक दूसरे का साथ निभाते हुए सबके प्रति कर्तव्यों का निर्वाह करेंगे .
     ७-ॐ सखे सप्तपदी भवः -इस सातवें और अंतिम फेरे में हम वचन देते हैं कि हम आजीवन साथी और सहयोगी बनकर रहेंगे .
         और लिव इन जिसके बारे में अर्चना पूरण सिंह बड़े उत्साह से कहती हैं कि -
''हम बिना शादी साथ रहे हैं ,ऐसी कोई भी घोषणा हमने नहीं की ,एक स्त्री-पुरुष जो २४ घंटों में १० घंटे साथ बिताते हैं ;उनमे कोई ऐसा सम्बन्ध न हो ऐसा संभव नहीं है .महानगरों की यही विशेषता है कि यहाँ कोई किसी से नहीं पूछता .अपने तरह से जीवन जीने की स्वतंत्रता ,आसान और बेरोकटोक ज़िंदगी ,ये सब बातें बड़े शहरों में इन संबंधों को पनपने का मौका देती हैं ,तेज रफ़्तार ज़िंदगी में यहाँ हर संबंध आम है .जीवन साथी का चुनाव करना यहाँ कठिन है .विवाह स्त्री संबंधों की एक मंजिल है यह मंजिल सुखद हो इसके लिए लिव इन एक जरिया हो सकता है .कम से कम टूटती हुई शादियां ,बिखरते परिवारों और बिना माँ-बाप के पल रहे बच्चों से तो अच्छा है .''
    और इनकी यह उन्मुक्तता स्वयं गृहलक्ष्मी पत्रिका में सोनी चैनल के लेडीज़ सेक्शन में नीना गुप्ता से एक प्रश्न के जरिये मुंह बंद करने को विवश प्रतीत होती है .जिसमे पूछा गया है -
  ''मैं २० साल की कामकाजी महिला हूँ .मैं एक व्यक्ति के साथ 'लिव इन रिलेशनशिप' में हूँ  जो मुझसे बहुत प्यार करता है .हम लोग लिव इन रिलेशनशिप' में पिछले एक साल से हैं इस रिलेशनशिप में बंधने से पहले हम दोनों ने एक दूसरे को अच्छी तरह से जाना समझा पर पिछले कुछ समय से वह मेरी उपेक्षा कर रहा है .मैं इस बात से घबराई हूँ कि कहीं वह मुझको धोखा तो नहीं दे रहा है .मैं सचमुच उससे बहुत प्यार करती हूँ और उसके साथ रहना चाहती हूँ कहीं वह इस रिलेशनशिप को छोड़ तो नहीं देगा .?''
    यही डर  इस संबंध की नीव है और कंगूरा भी ,यही आगाज है यही अंजाम है और चाँद-फ़िज़ा ,विपाशा बासु-जॉन अब्राहम ,राजेश खन्ना-अनीता जैसे मामले इस संबंध के परिणाम स्वरुप सभी के सामने हैं .ये वह सम्बन्ध नहीं जिसे भारतीय संस्कृति में जन्म-जन्मान्तर का सम्बन्ध कहा जाता है ,जिसमे पति पत्नी के सम्मान की खातिर राक्षसों के राजा रावण का कुल सहित विनाश करता है ,जिसमे पत्नी पति के प्राणों को यमराज से भी छीन लाती है.
      आज का युवा उन्मुक्त ज़िंदगी का आदी हो रहा है .दबाव से बचने में लगा है ,अपनी पसंद को सर्वोपरि रखता है ,हर चीज़ पैसे से खरीदना चाहता है और चिंता ,जिम्मेदारी से मुक्त ज़िंदगी का चयन करते हुए लिव इन को सकारात्मक नजरिये से देख रहा है जो निश्चित रूप से भारतीय संस्कृति पर चोट है और जिसके लिए भारतीय संस्कृति भी तनवीर गाज़ी के शब्दों में बस यही कहती नज़र आती है -
    ''जवाँ सितारों को गर्दिश सीखा रहा था ,
       कल उसके हाथ का कंगन घुमा रहा था ,
    उसी दिए ने जलाया मेरी हथेली को
       जिसकी लौ को हवा से बचा रहा था .''

शालिनी कौशिक
     [कौशल] 

5 टिप्‍पणियां:

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

सुन्दर भाव भूमि

सहजीवन का कच्चा चिठ्ठा सांगोपांग आपने पढ़ा दिया। बहुत सुन्दर लिखा है आपने।

सहजीवन आनंद -कारज तभी अच्छा।

लिविंग इन तो आत्मा परमात्मा का साथ है। जहां बाप बेटे (हृदय में बैठा परमात्मा और आत्मा )साथ निवास करते हैं सहजीवन में हैं।

यही जीवन का अंतिम सुख है ग्राहस्थ्य उसकी पहली सीढ़ी है सहजीवन (कथित )एक लस्ट से अधिक कुछ नहीं। काम(लस्ट ) का अभिनव नग्न लोकचिढाऊ रूप सहजीवन है। बहुत बहुत मुबारक आपको इनाम जीतने के लिए सार्थक समाज सापेक्ष लेखन के लिए। जग जग जियो। जय कृष्णा !

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

सुन्दर भाव भूमि

सहजीवन का कच्चा चिठ्ठा सांगोपांग आपने पढ़ा दिया। बहुत सुन्दर लिखा है आपने।

सहजीवन आनंद -कारज तभी अच्छा।

लिविंग इन तो आत्मा परमात्मा का साथ है। जहां बाप बेटे (हृदय में बैठा परमात्मा और आत्मा )साथ निवास करते हैं सहजीवन में हैं।

यही जीवन का अंतिम सुख है ग्राहस्थ्य उसकी पहली सीढ़ी है सहजीवन (कथित )एक लस्ट से अधिक कुछ नहीं। काम(लस्ट ) का अभिनव नग्न लोकचिढाऊ रूप सहजीवन है। बहुत बहुत मुबारक आपको इनाम जीतने के लिए सार्थक समाज सापेक्ष लेखन के लिए। जग जग जियो। जय कृष्णा !

Anita ने कहा…

समसामायिक सार्थक लेख..

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

वर्ण -आश्रम है हमारा धर्म। हमारे स्वाभाव पूर्वजन्म के संस्कार के अनुसार चार वर्ण बतलाये गए हैं ब्राह्मण -क्षेत्रीय -वैश्य -शूद्र। जो श्रोत्रिय है उपनिषद का ज्ञाता है वह ब्राह्मण है जो इस ज्ञान के अतिरिक्त ब्राह्मणों की शेष समाज की सुरक्षा के लिए निमित्त है वह क्षत्रीय है जो कृषिकर्म करता है व्यापार करता है वह वैश्य है और जो सभी की समभाव सेवा का निमित्त बनता है वह शूद्र है। इस व्यवस्था में अपने पुरुषार्थ सेल्फ एफर्ट से शूद्र को प्रोन्नति करके ब्राह्मण बनने का अवसर उपलब्ध था क्योंकि यह व्यवस्था स्वभाव और गुणों के अनुरूप थी।ऊपर से नीचे भी व्यक्ति आता था आचरण में गिरावट के बाद। यह जन्म प्रधान व्यवस्था न होकर स्वभाव संस्कार प्रधान व्यवस्था थी ताकि समाज सुव्यवस्थित रूप चलता रहे। उसे हर व्यक्ति से महत्तम योगदान प्राप्त होता रहे।

आश्रम जीवन की विभिन्न अवस्थाएं हैं ब्रह्मचर्य (शिक्षा अर्जन ,सेलीबेसी ),ग्राहस्थ्य ,वनप्रवास (वानप्रस्थ )और संन्यास (रिनन्शिएशन ).

आधुनिक लिविंग टुगेदर इस आश्रम व्यवस्था का विचलन है डीवीएसशन है। जीवन यापन का यह निम्न स्तर है मानवेतर जीवों (पशुओं की तरह )इंस्टींक्टिव लिविंग है यह।

बढ़िया आलेख और पुरुस्कृत होने के लिए आपको पुनश्च बधाई।

वीरुभाई ,५१ १३१ ,अपलैंड व्यू स्ट्रीट ,

कैन्टन (मिशिगन )

४८ १८८ -३४८५

एक प्रतिक्रिया ब्लॉग पोस्ट :

http://shalinikaushik2.blogspot.com/2014/08/blog-post_7.html?utm_source=feedburner&utm_medium=feed&utm_campaign=Feed%3A+blogspot%2FTxmJU+%28kaushal%29

[भारतमित्र मंच द्वारा आयोजित जुलाई की मासिक प्रतियोगिता में विजेता का सम्मान प्राप्त ]

SHALINI KAUSHIK
Has won the Monthly Competition for the blog :लिव इन की तो सोच ही चोट है .

BLOGPRAHARI ने कहा…

आपका ब्लॉग पढ़कर अच्छा लगा. अंतरजाल पर हिंदी समृधि के लिए किया जा रहा आपका प्रयास सराहनीय है. कृपया अपने ब्लॉग को “ब्लॉगप्रहरी:एग्रीगेटर व हिंदी सोशल नेटवर्क” से जोड़ कर अधिक से अधिक पाठकों तक पहुचाएं. ब्लॉगप्रहरी भारत का सबसे आधुनिक और सम्पूर्ण ब्लॉग मंच है. ब्लॉगप्रहरी ब्लॉग डायरेक्टरी, माइक्रो ब्लॉग, सोशल नेटवर्क, ब्लॉग रैंकिंग, एग्रीगेटर और ब्लॉग से आमदनी की सुविधाओं के साथ एक सम्पूर्ण मंच प्रदान करता है.
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