मौके -बेमौके ''शालिनी''ने भी कोशिश ये की है .




बात न ये दिल्लगी की ,न खलिश की है ,
जिंदगी की हैसियत मौत की दासी की है .

...................................................................
न कुछ लेकर आये हम ,न कुछ लेकर जायेंगें ,
फिर भी जमा खर्च में देह ज़ाया  की है .

.....................................................................
पैदा किया किसी ने रहे साथ किसी के ,
रूहानी संबंधों की डोर हमसे बंधी है .

........................................................................
नाते नहीं होते हैं कभी पहले बाद में ,
खोया इन्हें तो रोने में आँखें तबाह की हैं.

...................................................................
मौत के मुहं में समाती रोज़ दुनिया देखते ,
सोचते इस पर फ़तेह  हमने हासिल की है .

.....................................................................
जिंदगी गले लगा कर मौत से भागें सभी ,
मौके -बेमौके ''शालिनी''ने भी कोशिश ये की है .

...........................................................................
शालिनी कौशिक
[कौशल ]


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

aaj ka yuva verg

अरे घर तो छोड़ दो

माचिस उद्योग है या धोखा उद्योग