मंगलवार, 24 नवंबर 2015

हिम्मतें दुश्वारियों में दोस्त बन जाएँगी .


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ज़िंदगी की मुश्किलें हर रोज़ आज़माएंगी ,
डरते-डरते गर जियेगा यूँ ही ज़ान जाएगी .
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इस जहाँ में कोई तेरा साथ देगा ही नहीं ,
यूँ डरेगा ,परछाई भी साथ छोड़ जाएगी .
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आये हैं तन्हा सभी जायेंगे तन्हा सभी ,
न समझ इस बार दुनिया तेरे साथ जाएगी .
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गम नहीं अपने मुकाबिल दुश्मनों को देख ले ,
मंज़िलें यूँ हर कदम पर नित नयी मिल जाएँगी .
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झेलकर हर बदजुबानी समझा रही ''शालिनी '',
हिम्मतें दुश्वारियों में दोस्त बन जाएँगी .
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शालिनी कौशिक
[कौशल ]

6 टिप्‍पणियां:

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, कहीं ई-बुक आपकी नींद तो नहीं चुरा रहे - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Rushabh Shukla ने कहा…

​​​​​​सुन्दर रचना ..........बधाई |
​​​​​​​​​​​​आप सभी का स्वागत है मेरे इस #ब्लॉग #हिन्दी #कविता #मंच के नये #पोस्ट #​असहिष्णुता पर | ब्लॉग पर आये और अपनी प्रतिक्रिया जरूर दें |

​http://hindikavitamanch.blogspot.in/2015/11/intolerance-vs-tolerance.html​​

Dilbag Virk ने कहा…

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 27-11-2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2172 में दिया जाएगा
धन्यवाद

सदा ने कहा…

Behatreen

राकेश कौशिक ने कहा…

बहुत सुन्दर

Kavita Rawat ने कहा…

झेलकर हर बदजुबानी समझा रही ''शालिनी '',
हिम्मतें दुश्वारियों में दोस्त बन जाएँगी .
..बहुत खूब!

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