सोमवार, 26 सितंबर 2016

मुस्लिम महिलाओं को भी मिले तीन तलाक का अधिकार

मुस्लिम विधि में तलाक का एक तरीका है - "तलाक - उल - बिददत". वर्तमान में यह तरीका ही विवाद का विषय बना हुआ है और आंध्र व तेलंगाना के मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष आबिद रसूल खान का इसी तलाक के दुष्परिणाम के लिए कहना है "कि आज मुस्लिम समुदाय के सामने यह बड़ी सामाजिक समस्या है क्योंकि सही मायने में लाखों की संख्या में महिलाएं तलाक से पीड़ित हैं. उनके पतियों ने तीन बार तलाक शब्द का इस्तेमाल कर उन्हें अलग कर दिया. मैंने पर्सनल लॉ बोर्ड व जमियत - उलेमा - ए-हिंद को लिखा है कि 3 साल के मेरे कार्यकाल में मैने पाया है कि तमाम मुस्लिम महिलाएं उत्पीड़न, परित्याग, गुजारा भत्ता न मिलने जैसी समस्याओं से जूझ रही हैं. "उन्होंने कहा कि बोर्ड तीन तलाक पर जोर देता है तो वह हमारी लाखों बहनों के साथ अन्याय कर रहा है.                                                                                      
  अब यदि हम आगे इस विषय में कुछ कहना चाहते हैं तो पहले जरूरी है कि इस तलाक के रूप को भली भांति समझ लें - " तलाक - उल - बिददत को तलाक - उल - बैन के नाम से भी जाना जाता है. यह तलाक का निंदित या पापमय रूप है. विधि की कठोरता से बचने के लिए तलाक की यह अनियमित रीति ओमेदिया लोगों ने हिज्रा की दूसरी शताब्दी में जारी की थी. शाफई और हनफी विधियां तलाक - उल - बिददत को मान्यता देती हैं यघपि वे उसे पापमय समझते हैं. शिया और मलिकी विधियां तलाक के इस रूप को मान्यता ही नहीं देती. तलाक की यह रीति नीचे लिखी बातों की अपेक्षा करती है -                                
 1- एक ही तुहर के दौरान किये गये तीन उच्चारण, चाहे ये उच्चारण एक ही वाक्य में हों-"जैसे - मैं तुम्हें तीन बार तलाक देता हूं. " अथवा चाहे ये उच्चारण तीन वाक्यों में हों जैसे -" मैं तुम्हें तलाक देता हूं, मैं तुम्हें तलाक देता हूं, मैं तुम्हें तलाक देता हूं. "                                                      
  2-एक ही तुहर के दौरान किया गया एक ही उच्चारण, जिससे    रद्द न हो सकने वाला विवाह विच्छेद का आशय साफ प्रकट हो :जैसे"  मैं तुम्हें  रद्द न हो सकने वाला तलाक देता हूं."                                                  
      आज ये तलाक विवाद का विषय बना है और इसे गैर इस्लामिक कहकर मुस्लिम विधि से हटाये जाने की कोशिश जारी है जो कि असंभव ही लगता है क्योंकि आजतक भी मुस्लिम पर्सनल लॉ में कभी न्यायालय द्वारा हस्तक्षेप नहीं किया गया है. एेसा कोई भी परिवर्तन निश्चित रूप में बाद में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के ही जिम्मे सौंप दिया जाएगा. अब ये मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के ही ऊपर है कि वह यहां भी अपनी महिलाओं के साथ समानता दिखाये जैसा कि वह हमेशा से यह दावा करता आया है कि मुस्लिम समुदाय में समानता का अधिकार है क्योंकि यहां मुस्लिम महिलाओं को मेहर का अधिकार मिला है. अब अगर समानता है तो मुस्लिम महिलाओं के साथ समानता का व्यवहार मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को करके दिखाना चाहिए कम से कम उन्हें भी तीन तलाक के प्रयोग का अधिकार तो मिलना ही चाहिए.                                          
 शालिनी कौशिक एडवोकेट,
(कौशल) 

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