रविवार, 28 फ़रवरी 2016

तलवार अपने हाथों से माया को सौंपिये.


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बेबाक बोलना हो बेबाक बोलिये,
पर बोलने से पहले अल्फाज तोलिये.
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दावा-ए-सर कलम का करना है बहुत आसां,
अब हारने पर अपने न कौल तोडिये.
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बारगाह में हो खडे बन सदर लेना तान,
इन ताना-रीरी बातों की न मौज लीजिए.
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पाकीजा खयालात अगर जनता के लिये हैं,
मांगने से पहले हक उनका दीजिए.
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सच्चाई दिखानी है माया को स्मृति,
अपने कहे हुए से पीछे न लौटिये.
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मुश्किल अगर हो काटना, अपने ही हाथों सिर,
तलवार अपने हाथों से माया को सौंपिये.
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अब सर-कलम न मुद्दा रह गया स्मृति,
सरकार की इज्जत की ना नीलामी बोलिये.
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ये "शालिनी" दे रही है, खुल तुमको चुनौती,
कानून के मजाक की ना राह खोलिये.
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शालिनी कौशिक
कौशल

सोमवार, 22 फ़रवरी 2016

ये था सरकारी मंसूबा - जाट आरक्षण


जाट आरक्षण पर राज्य और केन्द्र में बुरी तरह फंसी भाजपा
देश एकबार फिर आरक्षण की आग में झुलस रहा है और इसका खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ रहा है. हरियाणा सरकार आंदोलनकारियों की मांग मानने को राजी हो गई है और ये सब तब जब लोगों की दुकानों में आग लगा दी गई, बाजार लूट लिए गए, बसों, ट्रेनों को नुकसान पहुंचाया गया, मतलब क्या निकला यही ना कि इस देश मे अगर किसी को अपनी बात मनवानी है तो उसे जनजीवन को अस्त-व्यस्त करना होगा, तोड़फोड़ करनी होगी, सरकारी प्रतिष्ठानों में आग लगानी होगी. मात्र दो दिन में जाटों ने देश हिला दिया जबकि ये केवल एक राज्य में आरक्षण मांगने चले थे लेकिन अपना हित साधने में सफल रहे और इस तरह एक संदेश सारे देश के बरसों से जुटे आंदोलनकारियों को दे गये विशेष रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाइकोर्ट खंडपीठ की मांग में लगे वकीलों के समुदाय को. और संदेश यह है -
"खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले ,
खुदा बंदे से खुद पूछे बता तेरी रजा क्या है."
इसलिए सरकार का इनके प्रति सही कदम न उठाते हुए इनकी नाजायज मांगों को स्वीकार करना देश में अराजकता को फैलाने में सहयोग करना ही कहा जाएगा क्योंकि सेना को भी वहां कार्यवाही करने को तब मुक्त किया गया जब जनजीवन लुटपिट चुका या यूँ कहें तो ज्यादा सही होगा कि सरकार को अपने मंसूबे को पूरा करने का उपयुक्त माहौल मिल चुका.
शालिनी कौशिक
[ कौशल
]

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016

वास्तव में ऐसा प्रधानमंत्री पहले कभी नहीं मिला


परमाणु सम्मेलन में भाग लेने जा रहे दोनों पीएम
कहने वाले कह गए हैं -
''कोई दुश्मन भी मिले तो करो बढ़कर सलाम ,
 पहले खुद झुकता है औरों को झुकाने वाला .''
   अपने शपथ ग्रहण समारोह से लेकर आजतक भारतीय प्रधानमंत्री मोदी और पाक प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ की कई मुलाकातें भी हो चुकी हैं और कई उपहारों का आदान प्रदान भी ,जो शायद करने वाले भारतीय प्रधानमंत्री के अनुपम ह्रदय की मिसाल कही जा सकती है क्योंकि हमने आजतक किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री को पाक समकक्ष पर इतना उदार नहीं देखा होगा हो भी क्यों न भारत देश को आजतक इतना श्रेष्ठ प्रधानमंत्री मिला ही कहाँ था ?और वे भाजपा के हैं जो कि शायद देश का एकमात्र संगठन है [आर.एस.एस. के बाद आर.एस.एस.राजनीतिक संगठन नहीं है न ] जो देश से प्यार करता है और इसीलिए  देश के सबसे बड़े दुश्मन से अपने सिद्धांतों को ताक पर रखकर भी मिलता रहता है ये इनके देश से प्यार करने की एक अद्भुत मिसाल है और इस मिसाल के कारण हमें इन्हें शत शत नमन करना ही चाहिए .अभी अभी प्राप्त समाचारों के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके पाकिस्तानी समकक्ष नवाज शरीफ के बीच अगले महीने अमेरिका में मुलाकात हो सकती है। दोनों अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की मेजबानी में आयोजित परमाणु सम्मेलन में भाग लेने जा रहे हैं।

पाकिस्तान के अखबार डॉन में छपी खबर के अनुसार दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों ने वाशिंगटन में 31 मार्च और एक अप्रैल को होने वाले कार्यक्रम का न्योता स्वीकार कर लिया है।

एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि मोदी और शरीफ के बीच इस कार्यक्रम से अलग मुलाकात होने की संभावना प्रबल है।
    और जैसे कि इनकी हर मुलाकात देश पर किये गए एहसान के समान रही है ये भी रहेगी ये सभी भारतीयों को ज्ञात है और इसलिए कुछ न कहते हुए इन्हें हार्दिक शुभकामनायें ही दी जा सकती हैं भले ही हमारे मन   के भाव ये हो -
''अपने दुश्मन की खुशामद से ये बेहतर होगा ,
 अपनी रखी हुई तलवार उठा ली जाये .''

शालिनी कौशिक
   [कौशल ]

रविवार, 14 फ़रवरी 2016

हर्ष फायरिंग प्रतिबंधित हो

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हर्ष फायरिंग एक ऐसा शब्द जो पूरी तरह से निरर्थक कार्य कहा जा सकता है और इससे ख़ुशी जिसे मिलती हो मिलती होगी लेकिन लगभग 10 हर्ष फायरिंग १ जान तो ले ही लेती है ये अनुमान संभवतया लगाया जा सकता है .अभी हाल ही में कैराना ब्लॉक प्रमुख के चुनाव की मतगणना के बाद हुई हर्ष फायरिंग में एक बच्चे को अपनी जान से हाथ धोना पड़ गया और कितनी ही बार ये शादी ब्याह में भी लोगों के लिए मृत्यु का कारण बनती है तब भी इस पर कोई प्रतिबन्ध नहीं लगाया जा रहा जैसे की यह कोई बहुत आवश्यक कार्य हो जैसे किसी भी पूजा से पहले गणेश जी की पूजा ज़रूरी है ,जैसे रामायण पाठ से पहले हनुमान जी का आह्वान आवश्यक है वैसे ही लगता है कि ये हर्ष फायरिंग भी ख़ुशी के इज़हार का सबसे ज़रूरी कार्य है और भले ही कितने लोग इसके कारण शोक में डूब जाएँ लेकिन इसका किया जाना प्रतिबंधित नहीं किया जायेगा क्योंकि अभी हाल में ही हुई हर्ष फायरिंग से कैराना क्षेत्र में स्थिति ऐसी आ गयी कि वहां फ़ोर्स बुलानी पड़ गयी इतने पर भी बस यह निर्देश की इसके लिए पहले पुलिस को सूचना देनी होगी अगर यह इतनी ही ज़रूरी है तो फिर परमाणु के प्रयोग पर ही क्यों प्रतिबन्ध है जब आम आदमी को ख़ुशी मनाने के लिए हर्ष फायरिंग की अनुमति है तो फिर देश को तो अपनी ख़ुशी मनाने के लिए परमाणु प्रयोग की अनुमति मिलनी ही चाहिए .वे भी तो ये कह सकते हैं -
''हम क़त्ल भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम ,
वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होती .''

शालिनी कौशिक
     [कौशल ]

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2016

मीडियाई वेलेंटाइन / तेजाबी गुलाब


मीडियाई वेलेंटाइन तेजाबी गुलाब
                              Goddess Saraswati
  १४ फरवरी अधिकांशतया वसंत ऋतू के  आरम्भ का समय है .वसंत वह ऋतू जब प्रकृति  नव स्वरुप ग्रहण करती है ,पेड़ पौधों पर नव कोपल विकसित होती हैं ,विद्या की देवी माँ सरस्वती का जन्मदिन भी धरती वासी वसंत पंचमी को ही मनाते हैं .इस दिन विद्यार्थियों के लिए विद्या प्राप्ति के क्षेत्र में पदार्पण शुभ माना जाता  है.ये सब वसंत के आगमन से या फरवरी के महीने से सम्बन्ध ऐसे श्रृंगार हैं जिनसे हमारा हिंदुस्तान उसी प्रकार सुशोभित है जिस प्रकार विभिन्न धर्मों ,संस्कारों ,वीरों ,विद्वानों से अलंकृत है .यहाँ की शोभा के विषय में कवि लिखते हैं -
    ''गूंजे कहीं शंख कहीं पे अजान है ,
  बाइबिल है ,ग्रन्थ साहब है,गीता का ज्ञान है ,
दुनिया में कहीं और ये मंजर नहीं नसीब ,
  दिखलाओ ज़माने को ये हिंदुस्तान है .''
 ऐसे हिंदुस्तान में जहाँ आने वाली  पीढ़ी के लिए आदर्शों की स्थापना और प्रेरणा यहाँ के मीडिया का पुनीत उद्देश्य हुआ करता था .स्वतंत्रता संग्राम के समय मीडिया के माध्यम से ही हमारे क्रांतिकारियों ने देश की जनता में क्रांति का बिगुल फूंका था .आज जिस दिशा में कार्य कर रहा  हैं वह कहीं से भी हमारी युवा पीढ़ी के लिए मार्गदर्शक व् प्रेरक नहीं कहा जा सकता .आज १४ फरवरी वेलेंटाइन डे के नाम से विख्यात है .एक तरफ जहाँ इस दिन को लेकर युवाओं के दिलों की धडकनें तेज़ हो रही हैं वहीँ दूसरी ओर लाठियां और गोलियां भी चल रही हैं और इस काम में बढ़ावा दे  रहा है हमारा मीडिया -आज का मीडिया .
     जहाँ एक ओर मीडिया की सुर्खियाँ हुआ करती थी -
''जो भरा नहीं है भावों से बहती जिसमे रसधार नहीं ,
 वह ह्रदय नहीं है पत्थर है जिसमे स्वदेश का प्यार नहीं .''

''पूछा उसने क्या नाम बता ?
  आज़ाद !पिता को क्या कहते ?
  स्वाधीन पिता का नाम ,और बोलो किस घर में हो रहते ?
  कहते हैं जेलखाना जिसको वीरों का घर है
   हम उसमे रहने वालें हैं ,उद्देश्य मुक्ति का संघर्ष है .''

आज प्रमुखता दे रहा है -
''यूँ मेरे ख़त का जवाब आया ,
     लिफाफे में एक गुलाब आया .''
एक तरफ सत्य का उजाला ,एक तरफ समाज की वास्तविकता ,राजनीति की कालिख सबके सामने लेन का विश्वास दिलाने वाला मीडिया आज युवाओं को बेच रहा है विदेशी संस्कृति जिसे भारतीय अपसंस्कृति भी कह सकते हैं ,गलत प्रवर्तियाँ भी कह सकते हैं .प्यार जिसके लिए भारतीय संस्कृति में जो भाव विद्यमान है उसे देवल आशीष अपने शब्दों में यूँ व्यक्त करते हैं -
''  प्यार है पवित्र पुंज ,प्यार पुण्य धाम है ,
पुण्य धाम जिसमे कि राधिका है श्याम है ,
श्याम की मुरलिया की ,हर गूँज प्यार है ,
प्यार कर्म प्यार धर्म ,प्यार प्रभु नाम है .''
भारतीय मीडिया द्वारा बिकाऊ श्रेणी में लाया जा रहा है .रोम के संत वेलेंटाइन के नाम पर मनाया जाने वाला यह सप्ताह भारत में समाचार पत्रों द्वारा जोर शोर से प्रचारित किया जा रहा है .७ फरवरी से ही रोज हमारे समाचार पत्र बताते हैं -
''आज से बहेगी गुलाबी बयार ''
''आज रोज़ डे .आज प्रोमिस डे,चोकलेट डे ,प्रपोज डे ,ऐसे करें प्रपोज आदि आदि .''
 यही नहीं ज्योतिषी आकलन कर भी बताया जाता है कि किस किस के लिए रोज़ डे अच्छा रहेगा किसके लिए प्रपोज डे, कपडे का रंग कैसा हो और इनके अच्छे रहने के लिए ज्योतिषी उपाय भी बताये जाते हैं जिनके जरिये लड़की के बाप-भाई, समाज के संस्कारों के ठेकेदारों रुपी विपत्तियों  से बचा जा सकता है .कुल मिलाकर  यही कहा जा सकता है कि बाज़ार में बिकने के लिए और विश्व में सर्वाधिक पठनीय ,रेटिंग आदि उपलब्धियां अर्जित करने के लिए मीडिया के ये अंग भारतीय समाज में आवारागर्दी को बढ़ावा दे रहे हैं .ये आज की फ़िल्में हैं जो प्यार के नाम पर वासना का भूत युवाओं के सिर पर चढ़ा रही हैं .ये समाचार पत्र हैं  जो अपनी बिक्री बढ़ाने के लिए कहीं फेयरवेल समारोह के तो कहीं फ्रेशर पार्टी में लड़के लड़कियों के युगल नृत्यों के चित्र छाप रहे हैंमीडिया के इन अंगों में हीरोइनों के अश्लील चित्रों का ही असर है कि लड़कियां जो पहले भारतीय  परिधानों में गौरवान्वित महसूस करती थी आज कपडे छोटे करने में खुद को हीरोइन बनाने में [और वह भी फ़िल्मी न कि ऐतिहासिक ] जुटी हैं .ये फ़िल्मी असर ही है कि दिन रात  कभी भी लड़के लड़कियों के जोड़े शहरों में अभद्र आचरण करते घूमते हैं  और ये समाचार पत्रों की ही कारस्तानी है जो वासना ,आकर्षण में डूबे इन जोड़ों को प्रेमी युगल कहकर सम्मानित करता है .ये ऐसे सम्मान का ही असर है कि दामिनी जैसी गैंगरेप की घटनाएँ घट  रही हैं और बढती जा रही हैं .क्योंकि जब सभ्य समाज कहे जाने वाले  ये युवा खुद पर नियंत्रण नहीं रख पा रहे हैं तो जंगली ,गंवार कहे  जाने वाले वे युवा तो पहले ही से नियंत्रण जैसी भावनाओं को जानते ही नहीं ,उनका कहना तो मात्र ये होता है ''-जब तू एक के साथ फिर सकती है तो हमारे साथ क्यों नहीं ,हम ही क्या बुरे ?''ये हमारा मीडिया ही है जो चार बच्चों की माँ को भी ''प्रेमिका '' कहकर संबोधित करता है .क्या नहीं जानता कि ये भारतीय समाज है जहाँ की संस्कृति में लड़कियों को शर्म लाज से सजाया जाता है और लड़कों को बड़ों का  आज्ञा पालन व् आदर करना सिखाया जाता है .यह वह संस्कृति है जहाँ सीता राम को पसंद करते हुए भी माँ गौरी से प्रार्थना करती हैं -
''..........करहूँ चाप गुरुता अति थोरी .''
अर्थात हे माँ धनुष को थोडा हल्का कर दीजिये .''वे अपनी चाहत माँ गौरी की आराधना से पूरी करना चाहती हैं न कि पिता का प्रण  तोड़ राम के साथ घर से भागकर .ऐसे ही राम सीता के प्रति आसक्त होते हुए भी गुरु विश्वामित्र की आज्ञा के पश्चात् ही धनुष को उठाने को आगे बढ़ते हैं-
   ''.....उठहु राम भंजहु भव चापा ,
   मेटहु तात जनक के तापा .''
 और पिता दशरथ की आज्ञा की प्राप्ति के पश्चात् ही सीता को वधू के रूप में स्वीकार करते हैं .ये भारतीय संस्कृति ही है जो राम कृष्ण दोनों के भगवान  होने पर भी राम की सर्व-स्वीकार्यता स्थापित करती है उनका मर्यादा पुरुषोत्तम होना और सीता का मर्यादा का पालन करना ही वह गुण है जो सभी पुत्र रूप में राम की और पुत्री रूप में सीता की कामना करते हैं .
   आज भारतीय मीडिया अपने सांस्कृतिक स्वरुप को खो रहा हैं और विदेशों के खुले वातावरण को जहाँ संस्कारों के लिए कोई स्थान ही नहीं है यहाँ मान्यता दिलाने का प्रयास कर रहे हैं किन्तु यहाँ ऐसे प्रयास कुचेष्टाएं ही कही जाएँगी क्योंकि भारत में इन्हें कभी भी मान्यता नहीं मिल सकती जो ऐसे प्रयासों को आगे बढ़ अपनाने के फेर में अपनी संस्कृति की उपेक्षा करते हैं उनको डिम्पल मिश्र जैसे अंजाम भुगतने पड़ते हैं .आज मीडिया युवाओं को उकसाकर उन्हें रोज़ डे ,प्रोमिस डे,प्रोपोज डे ,हग डे ,चोकलेट डे जैसे भ्रमों में डालकर  जो कार्य करने को उन्हें आगे बढ़ा रहा है उसे यहाँ की देसी भाषा में ''आवारागर्दी ''कहते हैं और उसका परिणाम शिव सैनिकों की उग्रता के रूप में दुकानों को भुगतना पड़ता है. आज जिस चेहरे में ख़ूबसूरती के चाँद नज़र आते हैं कल को उसे अपने से अलग होने पर तेजाब से झुलसा दिया जाता है और ये लड़की के लिए जीवन भर का अभिशाप बनकर रह जाता है .आज मीडिया के इसी गलत प्रचार का ही परिणाम है की लड़कियां गोली का ,तेजाब का शिकार हो रही है ,लड़के अपराध या फिर आत्महत्या की राह पर आगे बढ़ रहे हैं .आज गुलामी का समय नहीं है किन्तु मीडिया का दायित्व आज भी बहुत अधिक है क्योंकि इसका प्रभाव भी बहुत अधिक है .मीडिया लोकतंत्र का एक मजबूत  स्तम्भ है और उसे जानना ही होगा कि हम भले ही कितने अग्रगामी हो जाएँ किन्तु हमारी संस्कृति में भाई भले ही किसी से प्यार कर ले किन्तु अपनी बहन को उस राह पर आगे बढ़ते नहीं देख सकता और ये भी हमारी संस्कृति ही है जो आई ए एस में सर्वोच्च रेंक हासिल करने वाली शेन अग्रवाल से भी विवाह के सम्बन्ध में माता -पिता की ही सोच को मान्यता दिलाती है .इस संस्कृति के ही कारण हमारे परिवार ,हमारा समाज विश्व में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं विदेशियों को आकर्षित करते हैं और जोड़ते हैं हमें किसी और संस्कृति की नक़ल करने की कोई आवश्यकता ही नही है और इसलिए मेरा भारतीय मीडिया से हाथ जोड़कर निवेदन है कि मीडिया हमें भारतीय ही बने रहने दे विदेशी सोच में ढलने की कोशिश  न करे .क्योंकि हम कितने सक्षम हैं ये हम तो जानते ही हैं मीडिया भी जान ले-
''जब जीरो दिया मेरे भारत ने ,दुनिया को तब गिनती आई ,
तारों की भाषा भारत ने दुनिया को पहले सिखलाई ,
देता न दशमलव भारत तो यूँ चाँद पे जाना मुश्किल था ,
धरती और चाँद की दूरी का अंदाजा लगाना मुश्किल था ,
सभ्यता जहाँ पहले आई पहले जनमी है जहाँ पे कला ,
अपना भारत वो भारत है जिसके पीछे संसार चला ,
संसार चला और आगे बढ़ा यूँ आगे बढ़ा बढ़ता ही गया ,
भगवान् करे ये और बढे ,बढ़ता ही रहे और फूले फले .''
इसलिए मीडिया आज के इस दिन माँ सरस्वती को पूजे न कि रोम की संस्कृति वेलेंटाइन को
''वक्त के रंग में यूँ न ढल जिंदगी ,
     अब तो अपना इरादा बदल जिंदगी ,
असलियत तेरी खो न जाये कहीं ,
   यूँ न कर दूसरों की नक़ल जिंदगी .

   आप सभी को वसंत पंचमी की बहुत बहुत शुभकामनायें .
       शालिनी कौशिक
                      [कौशल ]
     

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2016

सौतेली माँ की ही बुराई :सौतेले बाप का जिक्र नहीं .WHY ?



आमतौर पर यदि हम ध्यान दें तो जहाँ देखो सौतेली माँ की ही बुराई जोरों पर होती है.किसी भी बच्चे की माँ अगर सौतेली है तो उसके साथ सभी की सहानुभूति होती है किन्तु कहीं भी सौतेले बाप का जिक्र नहीं किया जाता जबकि मेरी अपनी जानकारी में यदि मैं देखती हूँ तो हर जगह भेदभाव ही पाती हूँ.अभी हाल में ही मेरी जानकारी की एक लड़की का निधन हो गया  वह लम्बे समय से बीमार थी किन्तु कहा गया कि लम्बे इलाज के बाद भी वह ठीक नहीं हो पाई.सभी को उसके पिता से बहुत सहानुभूति थी और सभी यही कह रहे थे कि ये तो अपनी लड़की से बहुत प्यार करते थे और दुःख में इनके आंसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे हैं.ये मुझे बाद में पता चला की वह लड़की अपनी माँ के साथ आयी थी अर्थात उसकी माँ की ये दूसरी शादी थी और उस लड़की के वे दूसरे पिता थे.अब कीजिये गौर इसके दूसरे पहलू पर यदि यह स्थिति किसी महिला के साथ होती तो सब क्या कहते-''सौतेली माँ थी मगरमच्छी आंसू बहा रही थी.इसीने उसकी कोई देखभाल नहीं की इसीलिए वह मर गयी.''आखिर ये हर जगह नारी और पुरुष की स्थिति में अंतर क्यों कर दिया जाता है?
मेरी सहेली की बहन की जिससे शादी हुई है उसके पहले से ही दो बेटियां हैं और वह उन दोनों बेटियों को भी अपने बच्चों की तरह ही पाल रही है.और ये नहीं कि ये   कोई दो दिन की बात है लगभग १५ साल पहले हुई इस शादी की सफलता मेरी सहेली की बहन पर ही निर्भर रही है.जबकि मेरे पड़ोस की ही एक लड़की जिसका तलाक हुआ है और जिसके एक लड़का है उसके दूसरी शादी होने पर उसके माता पिता ने उसके लड़के को अपने पास रखा है क्योंकि उसका दूसरा पति उसके बेटे को अपनाने को तैयार नहीं था.
मेरी एक सहपाठिनी मित्र जिसके पिता की मृत्यु पर उसकी मम्मी की शादी एक ऐसे पुरुष से हो गयी जिसके बच्चे भी उसके मम्मी से बड़े थे और मेरी सहपाठिनी को उसके पूर्व पिता की ओर से कुछ संपत्ति भी मिली थी किन्तु इस सबके बावजूद उसके चेहरे पर हर वक़्त सहमापन रहता था और आज अपनी छोटी बहन की शादी वह ही करवा चुकी है ओर स्वयं सरकारी नौकरी कर रही है किन्तु उसके सौतेले पिता को उसकी जिंदगी की कोई सुध नहीं.
मेरा तो यही कहना है कि जब भी सौतेले शब्द का जिक्र हो तो केवल वही बुराई का केंद्र बिंदु हो न कि सौतेले माँ या बाप.क्योंकि जहाँ एक ओर अब्राहम लिंकन की सौतेली माँ की महानता हमारे सामने है वही सौतेले बाप द्वारा कई बच्चों को गंडासे से काटने के उदाहरण भी हमारे समक्ष हैं.
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

कानून पर कामुकता हावी

१६ दिसंबर २०१२ ,दामिनी गैंगरेप कांड ने हिला दिया था सियासत और समाज को ,चारो तरफ चीत्कार मची थी एक युवती के साथ हुई दरिंदगी को लेकर ,आंदोल...