हिन्दू मान्यताओं के अनुसार प्रथमा यादव देती पिता प्रतीक यादव को मुखाग्नि
लखनऊ में बैकुंठधाम में मुलायम सिंह यादव के छोटे पुत्र प्रतीक यादव का अंतिम संस्कार कर दिया गया। प्रतीक यादव की पत्नी अपर्णा यादव के पिता व प्रतीक के ससुर अरविंद सिंह बिष्ट ने चिता को मुखाग्नि दी। इस मौके पर मुलायम सिंह यादव के बड़े बेटे अखिलेश यादव व चाचा शिवपाल सिंह मौजूद रहे। प्रतीक यादव की दोनों बेटियां प्रथमा यादव (12) और प्रतीक्षा यादव भी मौजूद रहीं।
प्रतीक यादव को मुखाग्नि उनके ससुर अरविन्द सिंह बिष्ट द्वारा दी गई. हिंदू धर्म की पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, ससुर द्वारा दामाद को मुखाग्नि देना शास्त्रों के विरुद्ध और वर्जित माना जाता है। दाह संस्कार का अधिकार केवल रक्त संबंधियों (पुत्र, भाई) का होता है, क्योंकि दामाद दूसरे गोत्र का हिस्सा बन जाता है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार प्रतीक यादव के चचेरे भाई धर्मेन्द्र यादव मुखाग्नि देने के लिए तैयार भी थे. ऐसे में ससुर द्वारा दामाद को मुखाग्नि देना हिन्दू धर्म की मान्यताओं के विपरीत है इसके मुख्य कारण निम्न अनुसार हैं -
⚫ परंपरा: ससुर और दामाद का रिश्ता ऐसा है कि ससुर दामाद का धुआं भी नहीं देखता है।
⚫ अपवाद: अगर बेटा या कोई अन्य करीबी रक्त संबंधी न हो, तो आजकल बेटियां या निकटतम परिजन ही यह अंतिम संस्कार करते हैं, लेकिन ससुर के लिए यह अनुचित माना जाता है।
⚫ सामाजिक धारणा: दामाद को 'जम' (यमराज) का रूप माना जाता है, इसलिए उन्हें शव या श्मशान से दूर रखा जाता है।
⚫ अपवाद/आधुनिक संदर्भ: विशेष परिस्थितियों में या जब कोई और न हो, तो परिवार के फैसले के अनुसार ससुर मुखाग्नि दे सकते हैं, लेकिन यह सामान्य प्रथा नहीं है।
वर्तमान समय में बेटियों को समाज में मुखाग्नि दिए जाने को समर्थन मिल रहा है.आधुनिक समय और बदलती मान्यताओं के अनुसार, बेटी बिल्कुल अपने पिता या माता को मुखाग्नि दे सकती है। यद्यपि पारंपरिक रूप से ज्येष्ठ पुत्र को यह अधिकार प्राप्त है, लेकिन शास्त्र और गरुड़ पुराण के आधुनिक व्याख्याकारों के अनुसार, पुत्र न होने पर या बेटी की इच्छा होने पर वह पूरे विधि-विधान से यह जिम्मेदारी निभा सकती है। इसके शास्त्रानुसार निम्न कारण हैं -
➡️ मुखाग्नि और बेटियां: प्रमुख तथ्य
⚫ बदलती परंपराएं: आज बेटियां न केवल मुखाग्नि दे रही हैं, बल्कि अंतिम यात्रा के अन्य कर्मकांड भी पूरे कर रही हैं, जिससे पारंपरिक सोच बदल रही है।
⚫ शास्त्रों का मत: कई आधुनिक विद्वान मानते हैं कि यदि पुत्र न हो तो पुत्री, पौत्र या भतीजा भी अग्नि दे सकते हैं। अगर बेटा नहीं है तो, गरुड़ पुराण के अनुसार पत्नी को भी मुखाग्नि देने का अधिकार है।
⚫ भावनात्मक और व्यावहारिक: बेटी के मुखाग्नि देने से परिवार के भावनात्मक जुड़ाव का पता चलता है। कई मामलों में, बेटा न होने पर बेटियों ने ही पिता की अंतिम इच्छा पूरी करने के लिए यह नजीर पेश की है।
ऐसे हालात में, जब कि प्रतीक यादव के कोई पुत्र नहीं था, ज्येष्ठ पुत्री प्रथमा यादव जिसकी उम्र 12 वर्ष है अपने पिता को मुखाग्नि दे सकती थी और अंतिम संस्कार के सभी क्रियाकलाप भली भांति पूर्ण कर सकती थी. ऐसे में जबकि मुख्य जिम्मेदारी पत्नी अपर्णा यादव की थी तो अपर्णा यादव को बेटी से ही उसके पिता को अंतिम विदाई का कार्य सम्पन्न कराना चाहिए था और हिन्दू धर्म की मान्यताओं का पालन करना चाहिए था.
द्वारा
शालिनी कौशिक
एडवोकेट
कैराना (शामली)


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