बुधवार, 2 सितंबर 2015

तिरंगा फहराने के लिए राष्ट्रीय भावनाएं ज़रूरी-फैसले की प्रति नहीं .


इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मदरसों में तिरंगा फहराना अनिवार्य घोषित किया है जबकि भारतीय ध्वज संहिता ऐसा कोई कर्तव्य ऐसी किसी संस्था पर नहीं आरोपित करती जिसमे तिरंगा फहराना उसके लिए अनिवार्य हो। भारतीय ध्वज संहिता २००२ कहती है -

भारतीय ध्वज संहिता

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लाल किला, दिल्ली की प्राचीर पर फहराता तिरंगा
भारतीय ध्वज संहिता भारतीय ध्वज को फहराने व प्रयोग करने के बारे में दिये गए निर्देश हैं। इस संहिता का आविर्भाव २००२ में किया गया था। भारत का राष्ट्रीय झंडा, भारत के लोगों की आशाओं और आकांक्षाओं का प्रतिरूप है। यह राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है। सभी के मार्गदर्शन और हित के लिए भारतीय ध्वज संहिता-२००२ में सभी नियमों, रिवाजों, औपचारिकताओं और निर्देशों को एक साथ लाने का प्रयास किया गया है। ध्वज संहिता-भारत के स्थान पर भारतीय ध्वज संहिता-२००२ को २६ जनवरी २००२ से लागू किया गया है।[1]
  • जब भी झंडा फहराया जाए तो उसे सम्मानपूर्ण स्थान दिया जाए। उसे ऐसी जगह लगाया जाए, जहाँ से वह स्पष्ट रूप से दिखाई दे।
  • सरकारी भवन पर झंडा रविवार और अन्य छुट्‍टियों के दिनों में भी सूर्योदय से सूर्यास्त तक फहराया जाता है, विशेष अवसरों पर इसे रात को भी फहराया जा सकता है।
  • झंडे को सदा स्फूर्ति से फहराया जाए और धीरे-धीरे आदर के साथ उतारा जाए। फहराते और उतारते समय बिगुल बजाया जाता है तो इस बात का ध्यान रखा जाए कि झंडे को बिगुल की आवाज के साथ ही फहराया और उतारा जाए।
  • जब झंडा किसी भवन की खिड़की, बालकनी या अगले हिस्से से आड़ा या तिरछा फहराया जाए तो झंडे को बिगुल की आवाज के साथ ही फहराया और उतारा जाए।
  • झंडे का प्रदर्शन सभा मंच पर किया जाता है तो उसे इस प्रकार फहराया जाएगा कि जब वक्ता का मुँह श्रोताओं की ओर हो तो झंडा उनके दाहिने ओर हो।
  • झंडा किसी अधिकारी की गाड़ी पर लगाया जाए तो उसे सामने की ओर बीचोंबीच या कार के दाईं ओर लगाया जाए।
  • फटा या मैला झंडा नहीं फहराया जाता है।
  • झंडा केवल राष्ट्रीय शोक के अवसर पर ही आधा झुका रहता है।
  • किसी दूसरे झंडे या पताका को राष्ट्रीय झंडे से ऊँचा या ऊपर नहीं लगाया जाएगा, न ही बराबर में रखा जाएगा।
  • झंडे पर कुछ भी लिखा या छपा नहीं होना चाहिए।
  • जब झंडा फट जाए या मैला हो जाए तो उसे एकांत में पूरा नष्ट किया जाए।

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भारतीय नागरिक अब रात में भी राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फहरा सकते हैं। इसके लिए शर्त होगी कि झंडे का पोल वास्तव में लंबा हो और झंडा खुद भी चमके।[2] गृह मंत्रालय ने उद्योगपति सांसद नवीन जिंदल द्वारा इस संबंध में रखे गये प्रस्ताव के बाद यह फैसला किया। इससे पहले जिंदल ने हर नागरिक के मूलभूत अधिकार के तौर पर तिरंगा फहराने के लिहाज से अदालती लड़ाई जीती थी। कांग्रेस नेता जिंदल को दिये गये संदेश में मंत्रालय ने कहा कि प्रस्ताव की पड़ताल की गयी है और कई स्थानों पर दिन और रात में राष्ट्रीय ध्वज को फहराने के लिए झंडे के बड़े पोल लगाने पर कोई आपत्ति नहीं है। जिंदल ने जून २००९ में मंत्रालय को दिये गये प्रस्ताव में बड़े आकार के राष्ट्रीय ध्वज को स्मारकों के पोलों पर रात में भी फहराये जाने की अनुमति मांगी थी। जिंदल ने कहा था कि भारत की झंडा संहिता के आधार पर राष्ट्रीय ध्वज जहां तक संभव है सूर्योदय से सूर्यास्त के बीच फहराया जाना चाहिए, लेकिन दुनियाभर में यह सामान्य है कि बड़े राष्ट्रीय ध्वज १०० फुट या इससे उंचे पोल पर स्मारकों पर दिन और रात फहराये गये होते हैं।                            
    साथ ही भारतीय संविधान के भाग-४ में अनुच्छेद ५१ क में बताये गए मूल कर्तव्यों में भी ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो इसे अनिवार्य बनाये। अनुच्छेद ५१ क का भाग क कहता है कि -
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[क]   संविधान का पालन करे और उसके आदर्शों ,संस्थाओं ,राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान  का आदर करें। 
        इसलिए भारतीय कानून का वर्तमान स्वरुप इस अनिवार्यता की राह में बाधा है और यह तभी अनिवार्य हो सकता है जब सम्बंधित कानून में संशोधन हो।
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   अब ये तो रही कानून की बात जिसमे केवल और केवल नियम और कायदों का ही स्थान होता है किसी भी तरह की भावनाओं के लिए यहाँ कोई स्थान नहीं होता जबकि तिरंगा फहराना एक भारतीय के ह्रदय के उल्लास और तीव्र राष्ट्रीय भावनाओं का प्रदर्शन है जिसके प्रदर्शन के लिए हर सच्चा भारतीय लालायित भी रहता है और प्रतिपल उत्सुक भी .मदरसों में मुसलमान बच्चे शिक्षा प्राप्त करते हैं और वह शिक्षा जिसे दीनी तालीम भी कहा जाता है जिसके बारे में बताया गया है -

India[edit]

This is a madarasa of the Jamia Masjid mosque in Srirangapatna, India. Thismosque dates back to the 1700s and is where Tipu Sultan used to pray.
In India the majority of these schools follow the Hanafi school of thought. The religious establishment forms part of the mainly two large divisions within the country, namely the Deobandis, who dominate in numbers (of whom the Darul Uloom Deoband constitutes one of the biggest madrasas) and the Barelvis, who also make up a sizeable portion (Sufi-oriented). Some notable establishments include: Al Jamiatul Ashrafia, Mubarakpur, Manzar Islam Bareilly, Jamia Nizamdina New Delhi, Jamia Nayeemia Muradabad which is one of the largest learning centres for the Barelvis. The HR[clarification needed] ministry of the government of India has recently[when?] declared that a Central Madrasa Board would be set up. This will enhance the education system of madrasas in India. Though the madrasas impart Quranic education mainly, efforts are on to include Mathematics, Computers and science in the curriculum. In July 2015, the state government of Maharastra created a stir de-recognised madrasa education, receiving critisicm from several political parties with the NCP accusing the ruling BJP of creating Hindu-Muslim friction in the state, and Kamal Farooqui of the All India Muslim Personal Law Board saying it was "ill-designed"[76] [77]

ऐसे में इलाहाबाद हाई कोर्ट के निर्णय पर दारूल उलूम देवबंद के मोहतमिम मौलाना अबुल कासमी नोमानी का ये कहना ''कि जब तक हम हाई कोर्ट के फैसला नहीं देख लेते ,तब तक कुछ भी कह पाना मुनासिब नहीं होगा .'' नोमानी ने कहा कि मुमकिन है कि ऐसा आदेश उन मदरसों के लिए हो ,जिन्हे सरकार अनुदान देती है .उन्होंने कहा कि सही बात फैसला देखने पर ही सामने आएगी -उनकी एक सच्चे भारतीय होने की स्थिति पर प्रश्नचिन्ह लगाती है क्योंकि हम भारतीयों ने अंग्रेजों से बहुत लम्बे संघर्ष के बाद अपने देश में अपना तिरंगा फहराने का अधिकार पाया और अब जब यह अधिकार हमें मिला है तो हम इसके लिए नवीन जिंदल की तरह इसके लिए और अधिकार तो मांगते शोभित होते हैं नोमानी की तरह फैसले की प्रति मांगते नहीं .वैसे भी राष्ट्रकवि मैथली शरण गुप्त जी ने कहा है -
'' जो भरा नहीं है भावों से , बहती जिसमे रसधार नहीं ,
 वह ह्रदय नहीं है पत्थर है ,जिसमे स्वदेश का प्यार नहीं .''
    और यहाँ ऐसा ही कुछ दृष्टिगोचर हो रहा है .

शालिनी कौशिक 
   [कौशल ]
  

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बृहस्पतिवार (03-09-2015) को "निठल्ला फेरे माला" (चर्चा अंक-2087) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Rakesh Kaushik ने कहा…

"वह ह्रदय नहीं है पत्थर है ,जिसमे स्वदेश का प्यार नहीं"