सोमवार, 28 मार्च 2016

क्या ये जनता भोली है ?


   
''जवां सितारों को गर्दिश सिखा रहा था ,
 कल उसके हाथ का कंगन घुमा रहा था .
 उसी दिए ने जलाया मेरी हथेली को ,
  जिसकी लौ को हवा से बचा रहा था .''
तनवीर गाजी का ये शेर बयां करता है वह हालात  जो रु-ब-रु कराते हैं हमें हमारे सच से ,हम वही हैं जो सदैव से अपने किये की जिम्मेदारी लेने से बचते रहे हैं ,हम वही हैं जो अपने साथ कुछ भी बुरा घटित होता है तो उसकी जिम्मेदारी दूसरों पर थोपते रहते हैं हाँ इसमें यह अपवाद अवश्य है कि यदि कुछ भी अच्छा हमारे साथ होता है तो उसका श्रेय हम किसी दूसरे को लेने नहीं देते -''वह हमारी काबिलियत है ,,वह हमारा सौभाग्य है ,हमने अपनी प्रतिभा के ,मेहनत के बल पर उसे हासिल किया है .''...ऐसे ऐसे न जाने कितने महिमा मंडन हम स्वयं के लिए करते हैं और बुरा होने पर .....यदि कहीं किसी महिला ,लड़की के साथ छेड़खानी देखते हैं तो पहले बचकर निकलते हैं फिर कहते हैं कि माहौल बहुत ख़राब है ,यदि किसी के साथ चोरी ,लूट होते देखते हैं तो आँखें बंद कर पुलिस की प्रतीक्षा करते हैं आदि  .आज जनता जिन हालात से दो चार हो रही है उसके लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है ,एक तरह से सही भी है क्योंकि परिवार के बड़े का यह दायित्व बनता है कि वह परिवार की हर तरह की ज़रुरत को देखे और पूरी करे व् समस्याओं से भली भांति निबटे किन्तु  इससे परिवार के सदस्यों की जिम्मेदारी कम नहीं हो जाती .
  *अभी हाल ही में १६ सितम्बर २०१२ को दिल्ली में दामिनी गैंगरेप कांड हुआ .जब तक बस में दामिनी व् उसका दोस्त थे किसी को जानकारी नहीं थी किन्तु जब वे सड़क पर गिरे हुए थे वस्त्र विहीन रक्त रंजित पड़े हुए थे क्या जनता में से किसी एक ने भी उनके पास जाकर मानव होने का सबूत दिया ,नहीं दिया ,बल्कि सभी गाड़ियाँ बचा-बचाकर निकल ले गए और सब कुछ पुलिस पर छोड़ दिया गया ,ये तो ,ये तो बस के भीतर कांड हो रहा था कोई नहीं जानता था कि क्या हो रहा है किन्तु २ अप्रैल २०१३ को कांधला [शामली]में चार बहनों पर तेजाब फेंका गया .एक बहन ने एक आरोपी को पकड़ा भी किन्तु जनता की व्यस्त आवाजाही की वह सड़क क्यूं नपुंसक बन गयी न तो किसी  आरोपी को तब पकड़ा और न ही बहनों की सहायता को आगे बढ़ी और वे बहनें खुद ही किसी तरह रिक्शा करके अस्पताल गयी .क्या ऐसी जनता को मदद का हक़दार कहा जा सकता है ? 
*दिनदहाड़े क़त्ल होते हैं ,लोगों के बीच में होते हैं जनता आरोपियों को पहचानती है ,आरम्भ में भावुकतावश गवाही भी देती है किन्तु बाद में होश में आये हुए की तरह अदालत में जाकर मुकर जाती है क्या कानून की सहायता जनता का कर्तव्य नहीं है ?क्या अपराधियों के इस तरह खुलेआम फिरने में जनता स्वयं मददगार नहीं है ?वीरप्पन जैसे कुख्यात अपराधी जो कानून व् प्रशासन की नाक में दम किये रहते हैं ,निर्दोषों का क़त्ल करते हैं क्या जनता की मदद  के बगैर वीरप्पन  इतने लम्बे समय तक कानून को धोखा दे सकता था ?
*खुलेआम लड़कियों के साथ छेड़खानी होती है दुष्कर्म की घटनाएँ बढ़ रही हैं और जनता धर्म,जाति व् वर्गों में ही उलझी हुई है .जिनके लड़के ऐसी वारदातें कर रहे हैं वे स्वयं दूसरे पक्ष पर दोषारोपण कर अपने लड़कों  को बचा रहे हैं  ,जनता में से ही एक वर्ग ऐसी घटनाओं का विरोध करने वालों को अंजाम भुगतने की धमकी दे रहा है ,क्या ये जनता की कारस्तानियाँ नहीं हैं ?क्या ये सभी की जानकारी में नहीं हैं ?
*खाद्य पदार्थों की बिक्री करने वाले व्यापारी अपने यहाँ असली नकली सभी तरह  का सामान रखते हैं .अनपढ़ ,सीधे साधे लोगों को यदि किसी सामान की ,क्योंकि उनके द्वारा उसकी मिलावट की जाँच किया जाना संभव नहीं होता इसलिए खुले रूप में बिक्री करते हैं और यदि पकड़ लिए जाएँ तो कहते हैं कि ''हमें अपने  बच्चे पालने हैं  ''क्या ये जनता नहीं है जिसे अपने बच्चे तभी पालने हैं  जब वह दूसरे के बच्चे मार ले .और ये तो पकडे जाने पर हाल हैं वर्ना मामला तो इससे पहले ही जाँच अधिकारी के आने की सूचना मिल जाने के कारण सामान को खुर्द बुर्द कर पहले ही रफा दफा कर दिया जाता है और व्यापारी को क्लीन चिट मिल जाती है और पकडे जाने में भी जनता की कोई निस्वार्थ कार्यवाही नहीं बल्कि एक गलत काम करने वाला अपनी प्रतिस्पर्धा के कारण अपने प्रतिद्वंदी को पकडवा देता है .क्या ये जनता भोली कही जाएगी ?
*अदालतों में काम नहीं होता इसी जनता की आम शिकायत है जबकि मुक़दमे जनता के ,वादी-प्रतिवादी जनता ,कभी वादी द्वारा अनुपस्थिति की दरख्वास्त तो कभी प्रतिवादी द्वारा ,वकील की अनुपस्थिति को तो कोर्ट कोई महत्व नहीं देती ,उस पर तारीख-पे तारीख पे तारीख का रोना भी जनता ही रोती है  ,अदालती कार्यवाही  को बेकार भी जनता ही कहती है क्या उसका ऐसी स्थिति में कोई योगदान नहीं ?
*बिजली के लिए पहले लगाये गए तारों पर कटिया डालकर बिजली आसानी से अवैध रूप से ली जा रही थी जब नए तार लगाने के लिए बिजली कर्मचारी जनता के बीच पहुँचते हैं तो उन्हें वही न्यायप्रिय जनता मार-पीटकर क्यूं भगा देती है मात्र इसलिए क्योंकि अब वे तार रबड़ के हैं और कटिया डालकर अवैध रूप से बिजली लेना संभव नहीं रहेगा .
*धूम्रपान सार्वजानिक स्थलों पर मना किन्तु जनता जब तब इस कानून का उल्लंघन करती है .गुटखा खाना मना पर कहाँ मना हुआ बिकना जनता चोरी छिपे इसका प्रयोग करती है .गाड़ियों पर काले शीशे माना किन्तु अब  भी दिखती हैं जनता की काले शीशे  की गाड़ियाँ .सिगरते १८ साल से कम उम्र के बच्चे को बेचना माना किन्तु वे खरीदते भी हैं और पीते भी हैं जनता के बीच में ही .
*कुपोषण का ठीकरा भी अब सरकार के माथे फोड़ा जा रहा है ,कहा जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद अन्न सड़ रहा है ,जनता को नहीं बांटा  जा रहा है ,सरकार की प्रतिबद्धता में कमी है किन्तु यदि सरकार इन्हें जनता में बाँटने के लिए अपने अधीनस्थ अधिकारियों में वितरित भी कर दे तो हाल क्या होगा ?जनता निश्चित दिन लेने पहुंचेगी और उसे अगले दिन ,किसी और समय कहकर टरका दिया जायेगा और जब बांटा जायेगा तब ऐसी आपाधापी में कि जनता को मात्र ऐसे पहुंचेगा जैसे ऊंट के मुहं में जीरा .
   *सरकार की योजना मिड-डे-मील ,जो अन्न आता है बच्चों में बाँटने के लिए कितने ही स्कूल उसे बाज़ार में बेच रहे हैं ऐसी सूचनाएँ सभी  जानते हैं .
  सरकार चाहे कौंग्रेस की हो या भाजपा की या जनता दल या किसी अन्य दल की ,जनता के हित  में बहुत सी योजनायें बनती हैं किन्तु पहले नेता ,फिर सरकारी अधिकारी फिर व्यापारी और फिर जनता में से हम में से ही कुछ दबंग उन्हें निष्फल बना  देते हैं .कुछ लोगों के लिए ही ये लाभकारी रहती हैं और जनता जनता का एक बड़ा वर्ग इसके लिए तरसता ही रहता है .क्यूं जनता यहाँ अपनी जिम्मेदारी से इंकार करती है जबकि इसके लिए सबसे बड़ी जिम्मेदारी जनता की ही है .
जब चुनाव का वक्त आता है ,वोट देने का नंबर आता है तब जनता गरीबी के कारण शराब ,साड़ी में बिक जाती है किन्तु ऐसा नहीं है कि केवल गरीब जनता  ही बिकती है ,अमीर जनता भी बिकती है ,वह शरीफ ,योग्य ,ईमानदार प्रत्याशी के स्थान पर देखती है दबंगई ,वह देखती है कि किस प्रत्याशी में दम है कि मेरे मुक़दमे अदालत के बाहर  निबटवा दे ,मुझे अपने प्रभाव से टेंडर दिलवा दे ,दूसरे की जमीन का ये हिस्सा मुझे गुंडागर्दी से दिलवा दे ,मेरे साथ खड़ा हो तो दूसरों को भय ग्रस्त  करा दे .ऐसे में जनता सरकार को दोष देने का अधिकार ही कहाँ रखती है जबकि वह स्वयं भी इस देश को लूटकर खाने में लगी है .जब कोई कालिदास बन उसी शाख पर बैठकर उसी को काट रहा हो तो क्या उसे होने वाले नुकसान के लिए आकाश या पाताल को उत्तरदायी ठहराया जायेगा .डॉ.ओ.पी.वर्मा कहते हैं -
  ''बाग को माली जलाना चाहता है ,
 तुम नए पौधे लगाकर क्या करोगे .
लूट ली डोली कहारों ने स्वयं ही ,
सेज दुल्हन की सजाकर क्या करोगे .''
      शालिनी कौशिक  


2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (30-03-2016) को "ईर्ष्या और लालसा शांत नहीं होती है" (चर्चा अंक - 2297) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Satish Saxena ने कहा…

प्रभावशाली अभिव्यक्ति , मंगलकामनाएं आपको !!

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